INCOIS ने ‘कल्लक्कडल’ तरंगीय महोर्मि (Surges) की निगरानी हेतु तटीय बाढ़ निगरानी प्रणाली का विस्तार किया

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भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (Indian National Centre for Ocean Information Services – INCOIS) ने खतरनाक ‘कल्लक्कडल’ तरंगीय महोर्मि (Surges) के बेहतर पूर्वानुमान हेतु दूसरी तटीय बाढ़ निगरानी प्रणाली (CFMS) स्थापित की है।
‘कल्लक्कडल’ क्या है?
- ‘कल्लक्कडल’ अचानक उत्पन्न होने वाले शक्तिशाली तरंगीय महोर्मि (Surges) को संदर्भित करता है, जो विशेष रूप से भारत के कुछ तटीय क्षेत्रों, खासकर केरल तट पर, अप्रत्याशित तटीय बाढ़ का कारण बनते हैं।
- ये तरंगीय महोर्मि (Surges), जिनकी अवधि 30 से 300 सेकंड तक होती है, तटीय जल स्तर को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकते हैं।
- कल्लक्कडल का अर्थ: ‘कल्लक्कडल’ शब्द मलयालम भाषा के दो शब्दों — कल्लन (चोर) और कडल (समुद्र) — से मिलकर बना है, जो उन अचानक से प्रकट होने वाली समुद्री तरंगों का वर्णन करता है, जो अप्रत्याशित रूप से तटीय क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं।
- कारण: यह घटना मुख्यतः दक्षिणी हिंद महासागर में उत्पन्न चक्रवातों से पैदा होने वाली दीर्घ-अवधि महासागरीय तरंगों के कारण होती है।
- लंबी दूरी की यात्रा: ये तरंगें भारतीय तट तक पहुँचने से पहले लगभग 10,000 किलोमीटर की दूरी तय कर सकती हैं।
- मौसमी प्रकृति: कल्लक्कडल की घटनाएँ पूर्व-मानसून मौसम में, विशेष रूप से केरल तट पर, सबसे अधिक देखी जाती हैं।
- प्रभाव: ये तरंगीय महोर्मि (Surges) मछुआरा समुदायों, तटीय अवसंरचना, बंदरगाहों एवं निम्न-स्थित तटीय क्षेत्रों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करते हैं।
- वैज्ञानिक कारण: वैज्ञानिकों ने कल्लक्कडल घटनाओं को इन्फ्राग्रैविटी तरंगों (Infragravity Waves) तथा उथले तटीय जल में होने वाली वेव शोलिंग (Wave Shoaling) प्रक्रियाओं से जोड़ा है।
- इन्फ्राग्रैविटी तरंगें: इन्फ्राग्रैविटी तरंगें निम्न-आवृत्ति वाली महासागरीय तरंगें होती हैं, जो खुले महासागर में छोटी सतही तरंगों की पारस्परिक क्रियाओं से उत्पन्न होती हैं।
- वेव शोलिंग: वेव शोलिंग वह प्रक्रिया है, जिसमें महासागरीय तरंगें गहरे जल से उथले तटीय क्षेत्रों की ओर बढ़ते समय ऊँचाई में वृद्धि करती हैं।
- तटीय बैथीमेट्री (Coastal Bathymetry) अथवा समुद्र के भीतर की स्थलाकृति भी इन तरंगीय उफानों को और अधिक तीव्र बनाती है तथा अचानक तटीय बाढ़ में योगदान देती है।
सुनामी और कल्लक्कडल के बीच अंतर
- तरंगों की प्रकृति: सुनामी भूकंपीय समुद्री तरंगें होती हैं, जिनमें अत्यधिक विनाशकारी ऊर्जा होती है, जबकि कल्लक्कडल तरंगीय उफानों एवं इन्फ्राग्रैविटी तरंगों से संबंधित होता है।
- उत्पत्ति: सुनामी महासागर तल के नीचे विवर्तनिक गतिविधियों (जैसे- समुद्रतलीय भूकंप या ज्वालामुखीय विस्फोट) से उत्पन्न होती है, जबकि कल्लक्कडल तरंगें दूरस्थ महासागरों में उत्पन्न मौसम संबंधी प्रणालियों से बनती हैं।
- प्रभाव का दायरा: सुनामी पूरे महासागरीय बेसिन एवं अनेक देशों को प्रभावित कर सकती है, जबकि कल्लक्कडल मुख्यतः दक्षिण-पश्चिम भारत के तटीय क्षेत्रों, विशेषकर केरल, को प्रभावित करता है।
- आवृत्ति: कल्लक्कडल घटनाएँ पूर्व-मानसून मौसम में अधिक बार होती हैं, जबकि सुनामी अपेक्षाकृत दुर्लभ घटनाएँ हैं।
- विनाशकारी क्षमता: सुनामी सामान्यतः कल्लक्कडल की तुलना में कहीं अधिक विनाश एवं जनहानि का कारण बनती है, जबकि कल्लक्कडल मुख्यतः तटीय बाढ़ एवं कटाव उत्पन्न करता है।
तटीय बाढ़ निगरानी प्रणाली (CFMS) के बारे में
- INCOIS ने पहली बार ‘तटीय बाढ़ निगरानी प्रणाली’ (CFMS) की स्थापना विजिंझम (Vizhinjam) में की थी इसके बाद केरल के कोल्लम बंदरगाह के निकट इस प्रणाली की स्थापना की गई है।
- उद्देश्य: इस प्रणाली का उद्देश्य तरंगीय महोर्मि के पूर्वानुमान की सटीकता बढ़ाना तथा तटीय प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना है।
- तकनीकी घटक: तटीय बाढ़ निगरानी प्रणाली में शामिल हैं:
- एक तटीय स्वचालित मौसम स्टेशन
- उथले जल में स्थापित चार उच्च-आवृत्ति दाब सेंसर।
- कार्य: यह प्रणाली तरंग परिवर्तन प्रक्रियाओं की निगरानी करती है तथा पूर्वानुमान के लिए वास्तविक समय (Real-Time) तटीय डेटा एकत्रित करती है।
- कोल्लम का चयन क्यों किया गया? केरल का कोल्लम क्षेत्र बार-बार होने वाली तरंगीय उफान घटनाओं का सामना करता है तथा अचानक तटीय बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
- यह स्थान वैज्ञानिकों को तटीय निकटवर्ती तरंग व्यवहार का बेहतर अध्ययन करने एवं पूर्वानुमान मॉडलों में सुधार करने में सहायता प्रदान करता है।
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कलाम एंड कवच 3.0
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रक्षा मंत्रालय रक्षा आधुनिकीकरण, स्वदेशी क्षमता विकास, नवाचार और रणनीतिक साझेदारियों को बढ़ावा देने के लिए कलाम एंड कवच 3.0 के तीसरे संस्करण का आयोजन कर रहा है।
कलाम एंड कवच 3.0 के बारे में
- कलाम एंड कवच 3.0 नई दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में आयोजित एक उच्च-स्तरीय रणनीतिक रक्षा सम्मेलन है।
- यह एक ऐसा मंच है, जो नीति-निर्माताओं, सैन्य नेतृत्व, रक्षा उद्योगों, स्टार्ट-अप्स, शिक्षाविदों, राजनयिकों और रणनीतिक विशेषज्ञों को एक साथ लाता है।
- थीम: “Taking JAI Forward With I²”
- JAI: संयुक्तता, आत्मनिर्भरता और नवाचार
- I²: स्वदेशीकरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग
- उद्देश्य: इस सम्मेलन का उद्देश्य एकीकृत सैन्य क्षमता विकास, स्वदेशी विनिर्माण और वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से भारत के रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना है।
- यह सम्मेलन विकसित भारत@2047 के दृष्टिकोण को प्राप्त करने हेतु रक्षा उत्पादन की मापनीयता को तेज करने का लक्ष्य रखता है।
- चर्चा के प्रमुख क्षेत्र: सम्मेलन में निम्नलिखित उभरती रक्षा प्रौद्योगिकियों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा:
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित युद्ध प्रणाली
- स्वायत्त प्रणालियाँ और ड्रोन
- हाइपरसोनिक प्रौद्योगिकियाँ
- क्वांटम-सक्षम रक्षा प्रणालियाँ
- उन्नत C4ISR क्षमताएँ।
- अंतरिक्ष एवं साइबर सुरक्षा: अंतरिक्ष और निम्न-पृथ्वी कक्षा (LEO) क्षेत्रों से उत्पन्न खतरों तथा एकीकृत सुरक्षा तैयारियों की आवश्यकता पर चर्चा की जाएगी।
- त्रि-सेवा एकीकरण: सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच संयुक्त सैन्य अभियानों और एकीकृत रक्षा योजना पर विशेष जोर दिया जाएगा।
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विस्पा याना जबावा-व्रॉब्लेव्स्कीगो द्वीप

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पोलैंड ने दुर्लभ पक्षियों की सुरक्षा और आर्द्रभूमि (Wetland) जैव विविधता के पुनर्स्थापन के लिए विस्पा याना जबावा-व्रॉब्लेव्स्की (Wyspa Jana Zabawy-Wroblewskiego) नामक एक कृत्रिम द्वीप का निर्माण किया है।
विस्पा याना जबावा-व्रॉब्लेव्स्कीगो द्वीप के बारे में
- निर्माण: यह एक कृत्रिम द्वीप है, जिसका निर्माण शिपिंग चैनल को गहरा करने की परियोजना से निकली ड्रेज्ड सैंड (Dredged Sand) के उपयोग से किया गया है।
- स्थान: यह द्वीप पोलैंड के बाल्टिक तट पर स्थित श्चेचिन लैगून में स्थित है।
- उद्देश्य: इस द्वीप को पर्यटन या व्यावसायिक उपयोग के बजाय दुर्लभ पक्षियों, प्रवासी प्रजातियों और संवेदनशील आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए एक संरक्षित अभयारण्य के रूप में विकसित किया गया है।
- पारिस्थितिकी अनुक्रमण: वैज्ञानिक इस द्वीप पर पारिस्थितिकी अनुक्रमण का अध्ययन कर रहे हैं, जिसमें नवगठित भूमि पर वनस्पति, मिट्टी, कीटों और पक्षी कॉलोनियों के क्रमिक विकास को शामिल किया गया है।
- जैव विविधता: यह द्वीप बाल्टिक क्षेत्र में सीगल (Gulls), टर्न्स (Terns) और अन्य प्रवासी जल पक्षियों के लिए एक महत्त्वपूर्ण घोंसले बनाने और विश्राम स्थल बन गया है।
- महत्त्व: यह परियोजना पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता पुनर्स्थापन को बड़े बुनियादी ढाँचे एवं ड्रेजिंग कार्यों के साथ एकीकृत करने का एक सफल उदाहरण मानी जाती है।
- नामकरण विवाद: यद्यपि इस द्वीप का आधिकारिक नाम यान ‘जबावा’ व्रॉब्लेव्स्की (Jan ‘Zabawa’ Wroblewski) के नाम पर रखा गया है, फिर भी कई स्थानीय लोग इसे अनौपचारिक रूप से ‘ब्रायस्ना’ (Brysna) नाम से पुकारते हैं।
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कैंसर प्रतिरक्षा चिकित्सा

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हाल ही में जर्नल ‘कैंसर डिस्कवरी’ में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि पीडी–1 निरोधक, जो कैंसर प्रतिरक्षा चिकित्सा दवाओं की एक प्रमुख श्रेणी हैं, ब्लड-ब्रेन बैरियर (Blood-Brain Barrier-BBB) को प्रभावित कर सकते हैं।
कैंसर प्रतिरक्षा चिकित्सा (Cancer Immunotherapy)
- यह एक उपचार पद्धति है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का उपयोग करके कैंसर कोशिकाओं की पहचान कर उन्हें नष्ट किया जाता है।
पीडी-1 निरोधक (PD-1 Inhibitors) के बारे में
- इम्यूनोथेरेपी का प्रकार: यह कैंसर उपचार में उपयोग किए जाने वाले प्रतिरक्षा चेकपॉइंट निरोधक (ICIs) हैं।
- प्रतिरक्षा चेकपॉइंट निरोधक (ICIs): ऐसी दवाएँ, जो प्रतिरक्षा कोशिकाओं पर मौजूद निरोधक संकेतों को हटाकर कैंसर-रोधी प्रतिरक्षा क्षमता को बढ़ाती हैं।
- कार्यप्रणाली: ये दवाएँ उन पीडी-1 सिग्नल्स को अवरुद्ध करती हैं, जो प्रतिरक्षा कोशिकाओं की गतिविधि को मंद करते हैं, जिससे ट्यूमर-निरोधी प्रतिरक्षा अभिक्रिया अधिक प्रभावी हो जाती है।
- पीडी-1 (Programmed Cell Death-1): यह T-cells पर पाया जाने वाला एक प्रोटीन है, जो सामान्यतः प्रतिरक्षा गतिविधि को कम करके शरीर में अत्यधिक प्रतिक्रिया को रोकता है।
- T-कोशिका: ये श्वेत रक्त कोशिकाएँ होती हैं, जो संक्रमित या कैंसरग्रस्त कोशिकाओं की पहचान कर उन्हें नष्ट करती हैं।
- ब्रेन मेटास्टेसिस में उपयोग: पीडी–1 निरोधक परिसंचारी प्रतिरक्षा कोशिकाओं को सक्रिय कर सकते हैं, जो BBB को पार करके मस्तिष्क में ट्यूमर कोशिकाओं पर हमला करती हैं।
- ब्रेन मेटास्टेसिस: शरीर के किसी अन्य भाग से कैंसर कोशिकाओं का मस्तिष्क तक फैलना।
रक्त मस्तिष्क अवरोध (BBB) के बारे में
- BBB: यह मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं द्वारा निर्मित एक चयनात्मक सुरक्षात्मक अवरोध है।
- सुरक्षात्मक कार्य: यह रक्त से मस्तिष्क ऊतकों में जाने वाले पदार्थों की गति को नियंत्रित करता है।
- उपचार संबंधी चुनौती: कई कैंसर-रोधी दवाएँ BBB को पार नहीं कर पातीं, जिससे ब्रेन ट्यूमर का उपचार सीमित हो जाता है।
- प्रतिरक्षा पहुँच: प्रतिरक्षा कोशिकाएँ BBB को पार कर मस्तिष्क में ट्यूमर कोशिकाओं को निशाना बना सकती हैं।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
- BBB रिसाव: एंटी-पीडी-1 थेरेपी ने BBB प्रोटीन को कमजोर कर दिया और प्रतिरक्षा कोशिकाओं के मस्तिष्क में प्रवेश को बढ़ा दिया।
- ब्लड-ब्रेन बैरियर की पारगम्यता में वृद्धि से पदार्थ मस्तिष्क में अधिक आसानी से प्रवेश कर पाते हैं।
- ब्रेन मेटास्टेसिस में वृद्धि: जिन चूहों का उपचार किया गया उनमें BBB की अखंडता में कमी के कारण ब्रेन मेटास्टेसिस अधिक देखा गया है।
- BBB अखंडता: BBB की अपनी सुरक्षात्मक निरोधक कार्यक्षमता को बनाए रखने की क्षमता।
- मेटास्टेसिस: कैंसर कोशिकाओं का मूल स्थान से शरीर के अन्य भागों में फैलना।
- DKK1 की भूमिका: DKK1 प्रोटीन को BBB व्यवधान उत्पन्न करने वाले एक प्रमुख मध्यस्थ के रूप में पहचाना गया।
- DKK1 (डिककोफ-1): एक प्रोटीन जो ऊतक विनियमन और रोग की प्रगति से जुड़े कोशिका-संकेत मार्गों में शामिल होता है।
- नैदानिक सहसंबंध: उच्च DKK1 स्तर मस्तिष्क मेटास्टेसिस में वृद्धि और रोग की तीव्र प्रगति से जुड़े थे।
- परिवर्तनशील प्रतिक्रियाएँ: रोगियों में रोगमुक्ति से लेकर रोग की तीव्र प्रगति तक के परिणाम देखे गए।
- रोगमुक्ति: कैंसर के लक्षणों में कमी या उनका गायब हो जाना।
- विपरीत परिणाम: मस्तिष्क के बाहर के ट्यूमर ठीक हो सकते हैं, जबकि मस्तिष्क में नए घाव दिखाई देते रह सकते हैं।
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न्यायालय आधुनिकीकरण के लिए उच्च-स्तरीय समिति

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हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने पूरे भारत में न्यायालय के आधुनिकीकरण के लिए एक रूपरेखा तैयार करने तथा सरकार से ₹40,000–50,000 करोड़ के वित्तपोषण की माँग हेतु एक उच्च-स्तरीय ‘न्यायिक अवसंरचना सलाहकार समिति’ का गठन किया है।
न्यायिक अवसंरचना सलाहकार समिति के बारे में
- अध्यक्ष: न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश।
- समिति का दायित्व: न्यायिक अवसंरचना के आधुनिकीकरण के लिए एक व्यापक ब्लूप्रिंट तैयार करना।
- देशभर की न्यायालयों के उन्नयन हेतु आवश्यक वित्तीय आवश्यकताओं का आकलन करना।
- सिफारिशें 31 अगस्त, 2026 तक प्रस्तुत करना।
- मुख्य फोकस क्षेत्र
- प्रणालीगत बाधाओं की पहचान करना।
- वादियों और वकीलों के लिए सुविधाओं में सुधार करना।
- मामलों के शीघ्र निपटारे हेतु अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी को लागू करना।
- ई-कोर्ट अभियान को सशक्त बनाना।
- डिजिटल विभाजन को कम करना।
- आधुनिक 21वीं सदी के न्यायालय परिसरों का निर्माण करना।
ई-कोर्ट प्रोजेक्ट के बारे में
- प्रकृति: यह राष्ट्रीय ई-शासन योजना के अंतर्गत एक मिशन-मोड प्रोजेक्ट है।
- कार्यान्वयन एजेंसियाँ: इसे न्याय विभाग द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय की ई-कमेटी के सहयोग से लागू किया जा रहा है।
- उद्देश्य: इसका उद्देश्य न्यायालयीय प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण करना और न्यायिक सेवा वितरण में सुधार लाना है।
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