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भारतीय निर्यात में वृद्धि: उभरते अवसर और संरचनात्मक चुनौतियाँ

18 May 2026

संदर्भ 

अप्रैल 2026 में भारत के वस्तु निर्यात (Merchandise Exports) में लगभग 14% की वृद्धि हुई, जो वैश्विक व्यापार व्यवधानों के बावजूद लगभग 43.6 बिलियन डॉलर के स्तर तक पहुँच गई है।

संबंधित तथ्य

  • यह वृद्धि भारत के निर्यात विविधीकरण, बाजार के विस्तार और आपूर्ति शृंखला लचीलापन की दिशा में किए गए प्रयासों को दर्शाती है।

भारतीय निर्यात में वृद्धि के कारण

  • बाजार तक विस्तृत पहुँच: भारतीय निर्यातकों द्वारा सेवा प्रदान किए जाने वाले बाजारों की संख्या में वृद्धि हुई है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, कम-से-कम 20 निर्यात क्षेत्रों में  विगत वर्ष में 17 या उससे अधिक नए गंतव्य शामिल किए गए हैं।
    •  उदाहरण के लिए, वर्तमान में वर्ष 2024-25 की तुलना में  हैंडलूम उत्पाद का 29 से अधिक देशों को निर्यात किया जा रहा है।

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  • प्रमुख निर्यात क्षेत्रों में वृद्धि: अप्रैल 2026 में कई प्रमुख क्षेत्रों में मजबूत निर्यात वृद्धि दर्ज की गई, जो भारत की उत्पादन क्षमता और आपूर्ति शृंखला में लचीलापन को दर्शाती है।
    • प्रमुख क्षेत्रों में शामिल हैं:
      • इंजीनियरिंग वस्तुएँ
      • पेट्रोलियम उत्पाद
      • इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ
      • औषधियाँ और फार्मास्यूटिकल्स
      • कार्बनिक और अकार्बनिक रसायन।
  • सेवा निर्यात की बढ़ती हिस्सेदारी : सेवा क्षेत्र भारत की निर्यात अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ बन गया है। वर्तमान में भारत के कुल निर्यात में लगभग 49% हिस्सा सेवाओं का हैं। तुलनात्मक रूप में वर्ष 2014 में यह भागीदारी लगभग 39% थी।
    • सेवा निर्यात के प्रमुख प्रेरक 
      • आईटी और सॉफ्टवेयर सेवाएँ
      • बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (BPO)
      • वित्तीय सेवाएँ
      • व्यावसायिक और परामर्श सेवाएँ।
  • तेल के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं के निर्यात के संबंध में वृद्धि: अप्रैल 2026 में भारत के तेल के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं के निर्यात में लगभग 9% की वृद्धि हुई, जो लगभग 40 बिलियन डॉलर के स्तर तक रही, जो पेट्रोलियम उत्पादों के अलावा भारत के निर्यात क्षेत्र की मजबूती और स्थायित्व को दर्शाता है।

भारतीय निर्यात अर्थव्यवस्था में उभरते विकास कारक 

  • इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण: भारत धीरे-धीरे एक लो-एंड असेंबली बेस’ से विकसित होकर एक प्रमुख वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की और अग्रसर है, जिसे वैश्विक चाइना प्लस वन” आपूर्ति शृंखला विविधीकरण रणनीति से महत्त्वपूर्ण लाभ मिल रहा है।
    • उदाहरण के लिए: वित्तीय वर्ष 2025 में भारत के स्मार्टफोन का निर्यात रिकॉर्ड 30 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जिसमें एप्पल की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही, जिससे कुल इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात ₹4 ट्रिलियन के स्तर को पार कर गया।
  • सेवा क्षेत्र: भारत का सेवा क्षेत्र व्यापारिक क्षमता का प्रमुख स्तंभ बनकर उभरा है, जो वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के समय वस्तु व्यापार घाटे को संतुलित करने में मदद करता है।
    •  वैश्विक क्षमता केंद्र (GCCs) का अनुसंधान और विकास’, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में तीव्र विस्तार भारत की ज्ञान-आधारित निर्यात क्षमता को सुदृढ़ कर रहा है।
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 2025 में भारत का सेवा निर्यात रिकॉर्ड 387.6 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जिसमें केवल जनवरी 2026 में ही लगभग 43.9 बिलियन डॉलर था, जो देश की ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की बढ़ती शक्ति को दर्शाता है।
  • रक्षा निर्यात: भारत, आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी रक्षा विनिर्माण के प्रयासों के माध्यम से एक बड़े रक्षा आयातक से एक रक्षा निर्यातक के रूप में विकसित हो रहा है।
    •  उदाहरण के लिए: वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड ₹23,622 करोड़ (2.8 बिलियन डॉलर) तक पहुँच गया।
    • भारत ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली जैसे प्रमुख सौदों के माध्यम से अपने रणनीतिक रक्षा निर्यात का विस्तार कर रहा है, जहाँ फिलीपींस के साथ सफल समझौते के बाद वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों ने भी रुचि दिखाई है।
  • फार्मास्यूटिकल क्षेत्र: विश्व की फार्मेसी (Pharmacy of the World)” के रूप में भारत की मजबूत स्थिति जेनेरिक दवाओं, वैक्सीन और फार्मास्यूटिकल उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा दे रही है।
    • कुल फार्मास्यूटिकल निर्यात में 9.4% की वृद्धि के साथ वित्तीय वर्ष 25 में 30.47 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जिससे 30 बिलियन डॉलर का स्तर पार हो गया।
  • इंजीनियरिंग वस्तुएँ: इंजीनियरिंग उत्पादों और औद्योगिक मशीनरी के बढ़ते निर्यात भारत की विनिर्माण क्षमता और वैश्विक बाजारों में एकीकरण को दर्शाते हैं।
    • उदाहरण के लिए, जनवरी 2026 में इंजीनियरिंग वस्तुओं का निर्यात 10.40 बिलियन डॉलर के स्तर से अधिक रहा है।
  • मुक्त व्यापार समझौते: भारत के बढ़ते मुक्त व्यापार समझौते के नेटवर्क से बाजार पहुँच में सुधार हो रहा है और विभिन्न क्षेत्रों में निर्यात विविधीकरण को बढ़ावा मिल रहा है।
    • अप्रैल 2026 में भारत और न्यूजीलैंड ने एक त्वरित FTA पर हस्ताक्षर किए, जिसका उद्देश्य व्यापार, निवेश और गतिशीलता को बढ़ावा देना है, जो अभी अनुमोदन (Ratification) की प्रक्रिया में है।
  • डिजिटल अर्थव्यवस्था और AI सेवाएँ: डिजिटल अर्थव्यवस्था, AI-सक्षम सेवाओं और ज्ञान-आधारित उद्योगों का विस्तार उच्च मूल्य वाले सेवा निर्यात में नए अवसर उत्पन्न कर रहा है।
  • हरित और सतत् निर्यात: नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों, हरित प्रौद्योगिकियों और सतत् उत्पादों की बढ़ती वैश्विक माँग भारत के लिए नवीन निर्यात के अवसर सृजित कर रही है।

चुनौतियाँ

  • उभरती चिंता: कृत्रिम बुद्धिमत्ता का बढ़ता उपयोग आईटी-सक्षम सेवाओं में भारत के पारंपरिक तुलनात्मक लाभ को कम कर सकता है, क्योंकि यह नियमित सॉफ्टवेयर और आउटसोर्सिंग कार्यों को स्वचालित कर रहा है।
  • उच्च लॉजिस्टिक्स लागत: भारत की लॉजिस्टिक्स लागत अभी भी GDP का लगभग 13–14% है, जो चीन जैसे प्रमुख निर्यात प्रतिस्पर्द्धियों की तुलना में अधिक है, जिससे समग्र निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता प्रभावित होती है।
  • कमजोर मल्टीमोडल परिवहन एकीकरण: भारत में माल परिवहन अभी भी मुख्यतः सड़क परिवहन पर निर्भर है, जबकि रेलवे, जलमार्ग और बंदरगाहों के बीच अपर्याप्त एकीकरण परिवहन में व्याप्त कमियों को बढ़ाता है।
    • उदाहरण के लिए, भारत में लगभग 71% माल का परिवहन सड़कों के माध्यम से होता है, जबकि रेलवे से केवल लगभग 18% और अंतर्देशीय जल परिवहन से मात्र 2% प्राप्त होता है।
    • इसके विपरीत, चीन जैसे देश थोक माल परिवहन के लिए रेलवे का अधिक उपयोग करते हैं, जिससे लॉजिस्टिक्स लागत कम होती है और निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार होता है।
  • बंदरगाह की कार्यक्षमता में कमी: कार्गो हैंडलिंग, कस्टम्स क्लीयरेंस और बंदरगाह पर भीड़भाड़ से टर्नअराउंड समय अधिक होता है और निर्यातकों के लिए लेन-देन लागत में वृद्धि होती है।
  • आंतरिक परिवहन की उच्च लागत: आंतरिक माल-भाड़ा और परिवहन लागत में वृद्धि भारतीय वस्तुओं की अंतिम कीमत को बढ़ा देती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उनकी प्रतिस्पर्द्धात्मकता कम हो जाती है।
  • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम में ऋण अंतराल और औपचारीकरण का दबाव: भारत के निर्यात में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) को अधिक ऋण न मिलने की समस्या का सामना करना पड़ता है, जिससे विस्तार, प्रौद्योगिकी अपनाने और वैश्विक गुणवत्ता मानकों के अनुपालन में बाधा आती है।
    • वर्तमान में MSME ऋण अंतराल लगभग ₹30 लाख करोड़ आँका गया है, जबकि भारतीय MSMEs के लिए निर्यात ऋण पर ब्याज दरें वैश्विक प्रतिस्पर्द्धियों की तुलना में 2–4% अधिक होती हैं।
  • गुणवत्ता और मानक संबंधी समस्याएँ: भारतीय निर्यातकों को उन्नत अंतरराष्ट्रीय तकनीकी और गुणवत्ता मानकों को पूरा करने में कठिनाई होती है, जिसका मुख्य कारण अपर्याप्त परीक्षण और प्रमाणीकरण अवसंरचना है।
  • गैर-शुल्क बाधाएँ और गुणवत्ता अनुपालन से संबंधित चुनौतियाँ: भारतीय निर्यातकों को बढ़ती गैर-शुल्क बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ में कठोर स्वच्छता एवं पादप स्वच्छता (Sanitary and Phytosanitary – SPS) मानकों के कारण, जो कृषि उत्पादों के लिए बाजार पहुँच को सीमित करते हैं।
    • हार्मोनाइज्ड सिस्टम (HS) कोड HS04, जिसमें डेयरी उत्पाद, अंडे और शहद शामिल हैं, के अंतर्गत भारत को वर्ष 2010 से वर्ष 2024 के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में 344 शिपमेंट की अस्वीकृतियों का सामना करना पड़ा।
  • आयातित इनपुट पर निर्भरता: कई क्षेत्र अभी भी इलेक्ट्रॉनिक घटकों, सेमीकंडक्टर और कच्चे तेल जैसे आयातित इनपुट पर निर्भर हैं, जिससे घरेलू मूल्य संवर्द्धन सीमित होता है और आपूर्ति शृंखला बाधित होती है।

पश्चिम एशिया संकट के बीच निर्यात को बढ़ावा देने हेतु भारत सरकार की निर्यात प्रतिक्रिया:

  • निर्यातकों के लिए राहत योजना: केंद्र ने ₹497 करोड़ की निर्यात सुविधा के लिए प्रत्यास्थता एवं लॉजिस्टिक्स हस्तक्षेप’ (RELIEF) योजना प्रारंभ की, जिसका उद्देश्य खाड़ी–पश्चिम एशिया समुद्री गलियारे में मालभाड़ा वृद्धि, उच्च बीमा प्रीमियम तथा युद्ध-संबंधित निर्यात जोखिमों से प्रभावित निर्यातकों को समर्थन प्रदान करना है।
  • बीमा और जोखिम कवर: निर्यातकों को निर्यात ऋण गारंटी निगम (ECGC) से जुड़ी जोखिम कवरेज के माध्यम से समर्थन दिया जा रहा है, विशेष रूप से युद्ध-संबंधित जोखिमों और उच्च बीमा लागत के लिए। ECGC के अनुसार, प्रमुख मार्गों पर मालभाड़ा दरें लगभग 90–100% तक बढ़ीं, जिसमें सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) निर्यातकों पर सबसे अधिक दबाव पड़ा।
  • MSME निर्यातक संरक्षण: सरकार ने विशेष रूप से MSME निर्यातकों को लक्षित किया है, क्योंकि उनके पास सीमित कार्यशील पूँजी बफर होते हैं और वे विलंबित भुगतान, उच्च मालभाड़ा लागत और बीमा प्रीमियम वृद्धि के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
  • निर्यात दायित्व राहत: सरकार ने निर्यात दायित्वों के लिए समय सीमा में लचीलापन और विस्तार प्रदान किया है, जिससे उन निर्यातकों पर अनुपालन का दबाव कम हुआ है, जिनकी शिपमेंट क्षेत्रीय संघर्ष और शिपिंग व्यवधानों के कारण विलंबित हुई हैं।
  • अंतर-मंत्रालयी तंत्र के माध्यम से निगरानी: सरकार ने संकट की समीक्षा अंतर-मंत्रालयी मंत्रियों के समूह के माध्यम से की, जिसमें ऊर्जा आपूर्ति, आवश्यक वस्तुएँ और आपूर्ति शृंखला स्थिरता पर ध्यान केंद्रित किया गया, विशेष रूप से पश्चिम एशिया तनाव के संदर्भ में।
  • व्यापार घाटा और आयात प्रबंधन: रुपये पर दबाव और व्यापार घाटे को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने आयात संबंधी उपाय भी अपनाए, जैसे पश्चिम एशिया से संबंधित अस्थिरता के मध्य कीमती धातुओं पर शुल्क बढ़ाना।

आगे की राह

  • डिजिटल और प्रौद्योगिकीय कौशल का उन्नयन: सेवा क्षेत्र में अपनी वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता बनाए रखने के लिए भारत को निम्नलिखित पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए:
    • डिजिटल और प्रौद्योगिकीय कौशल का उन्नयन,
    • उच्च-मूल्य नवाचार और उन्नत सेवाओं की ओर अग्रसर होना,
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम उद्योगों और अनुसंधान में निवेश करना,
    • कम लागत वाले बाह्य-स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय नवाचार-प्रेरित सेवा निर्यात को बढ़ावा देना।
  • निर्यात संवर्द्धन मिशन को सुदृढ़ करना: केंद्र को निर्यात संवर्द्धन मिशन को एक एकल, परिणाम-आधारित ढाँचे के रूप में शीघ्रता से लागू करना चाहिए। इसके लिए वित्त वर्ष 2025–26 से 2030–31 तक ₹25,060 करोड़ का स्वीकृत परिव्यय है, जिसका उद्देश्य विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, प्रथम-बार निर्यातकों और श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार करना है।
  • सुलभ निर्यात ऋण का विस्तार: सरकार को विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए कम लागत और बिना संपार्श्विक वाले व्यापार वित्त तक पहुँच में सुधार करना चाहिए।
    • विस्तारित निर्यातकों के लिए ऋण गारंटी योजना से ₹20,000 करोड़ तक अतिरिक्त ऋण सहायता मिलने की संभावना है, जिससे निर्यातकों को तरलता प्रबंधन और नए बाजारों में प्रवेश में सहायता मिलेगी।
  • प्रधानमंत्री गतिशक्ति के माध्यम से लॉजिस्टिक्स लागत में कमी: केंद्र को प्रधानमंत्री गतिशक्ति और राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति के उपयोग में वृद्धि करनी चाहिए, ताकि कनेक्टिविटी में सुधार हो, आपूर्ति शृंखला संबंधी बाधाएँ कम हों और निर्यात लेन-देन लागत में कमी आए।
    • ये उपाय सीधे सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम निर्यातकों को लॉजिस्टिक्स दक्षता में सुधार के माध्यम से लाभान्वित करते हैं।
  • उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से विनिर्माण को समर्थन: भारत को निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं को और सुदृढ़ करना चाहिए।
    • इन योजनाओं का कुल परिव्यय ₹1.97 लाख करोड़ है, जो 14 प्रमुख क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विनिर्माण को बढ़ावा देने और निर्यात बढ़ाने के उद्देश्य से है।
  • जिलों को निर्यात केंद्र और ई-वाणिज्य निर्यात को बढ़ावा: सरकार को जिलों को निर्यात केंद्र के रूप में विकसित करने की पहल और ई-वाणिज्य निर्यात केंद्रों का विस्तार करना चाहिए, ताकि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, कारीगरों और स्थानीय उत्पादकों को वैश्विक बाजारों से जोड़ा जा सके।
    • ई-वाणिज्य निर्यात केंद्रों का उद्देश्य लॉजिस्टिक्स समय और लागत कम करना, नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाना, तीव्र स्वीकृति प्रदान करना और वापसी संबंधी प्रबंधन को सुगम बनाना है।
  • गुणवत्ता मानकों और वैश्विक ब्रांडिंग में सुधार: केंद्र को गुणवत्ता नियंत्रण आदेश, परीक्षण अवसंरचना और भारतीय मानक ब्यूरो-अनुरूप मानकों के माध्यम से भारत के गुणवत्ता तंत्र को सुदृढ़ करना चाहिए।
    • सरकारी आँकड़ों के अनुसार, गुणवत्ता नियंत्रण आदेश वर्ष 2014 में 106 उत्पादों से संबंधित 14 आदेशों से बढ़कर पिछले दशक में 672 उत्पादों से संबंधित 156 आदेशों तक विस्तारित हुए हैं, जिससे भारत में निर्मित उत्पादों की वैश्विक प्रतिष्ठा को समर्थन मिला है।

निष्कर्ष 

  • भारत की हालिया निर्यात वृद्धि वैश्विक अनिश्चितता के बीच अनुकूलन और सफल विविधीकरण प्रयासों को प्रदर्शित करती है।
  • हालाँकि, दीर्घकालिक निर्यात वृद्धि को बनाए रखने के लिए संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है, जो लागत दक्षता, पैमाना, उत्पाद गुणवत्ता और प्रौद्योगिकीय प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार करें।
  • यदि भारत विविधीकरण को मजबूत विनिर्माण और नवाचार क्षमताओं के साथ संयोजित कर सके, तो वह एक प्रमुख वैश्विक व्यापार प्रतिस्पर्द्धी के रूप में उभर सकता है।

अन्य देशों की निर्यात रणनीति

  • चीन
    • विनिर्माण का पैमाना और मूल्य शृंखला उन्नयन: चीन की निर्यात रणनीति बड़े पैमाने पर विनिर्माण, औद्योगिक सब्सिडी, प्रौद्योगिकी अधिग्रहण तथा उच्च-मूल्य क्षेत्रों जैसे विद्युत वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रोबोटिक्स और अर्द्धचालकों की ओर अग्रसर होने पर केंद्रित है।
      • मेड इन चाइना 2025 नीति का उद्देश्य उन्नत विनिर्माण में चीन की प्रतिस्पर्द्धात्मकता और वैश्विक बाजार हिस्सेदारी को बढ़ाना था।
  • वियतनाम
    • मुक्त व्यापार समझौता-आधारित बाजार पहुँच: वियतनाम ने मुक्त व्यापार समझौतों, कम लागत वाले विनिर्माण और निर्यात-उन्मुख प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का उपयोग कर इलेक्ट्रॉनिक्स, वस्त्र, जूते तथा उपभोक्ता वस्तुओं का एक प्रमुख केंद्र बनने में सफलता प्राप्त की है।
      • इसकी निर्यात रूपरेखा में बाजार विविधीकरण, पारंपरिक बाजारों में वियतनामी वस्तुओं का विस्तार और नए संभावित बाजारों में प्रवेश पर जोर दिया गया है।
  • जर्मनी
    • गुणवत्ता, ब्रांडिंग और ‘मित्तेलश्टैंड’ नामक निर्यातकों का समर्थन: जर्मनी की निर्यात सफलता उच्च गुणवत्ता वाले अभियांत्रिकी उत्पादों, ‘मित्तेलश्टैंड’ नामक सशक्त सूक्ष्म एवं मध्यम निर्यातकों, व्यावसायिक कौशल और सक्रिय निर्यात संवर्द्धन पर आधारित है।
      • जर्मन सरकार विदेशी व्यापार मेलों, बाजार सूचना, वाणिज्य मंडलों के माध्यम से परामर्श सेवाओं और निर्यात ऋण गारंटी (हर्मीस कवर) के माध्यम से निर्यातकों का समर्थन करती है।
  • दक्षिण कोरिया
    • रणनीतिक क्षेत्रीय विशेषीकरण: दक्षिण कोरिया वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी क्षेत्रों जैसे अर्द्धचालक, ऑटोमोबाइल, जहाज निर्माण, बैटरियाँ और इलेक्ट्रॉनिक्स पर ध्यान केंद्रित करता है।
      • इसका व्यापार मंत्रालय कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, जैव प्रौद्योगिकी, अर्द्धचालक, जहाज निर्माण और ऊर्जा सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग तथा प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ावा देता है, जो एक क्षेत्र-विशिष्ट निर्यात रणनीति को दर्शाता है।
  • जापान
    • प्रौद्योगिकी और ब्रांड विश्वसनीयता: जापान का निर्यात मॉडल सटीक विनिर्माण, उच्च अनुसंधान एवं विकास, उत्पाद विश्वसनीयता और सशक्त वैश्विक ब्रांडों पर आधारित है।
      • यह ऑटोमोबाइल, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रोबोटिक्स और उच्च-स्तरीय घटकों जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित है, जहाँ गुणवत्ता और दीर्घकालिक विश्वास निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बनाए रखते हैं।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका
    • नवाचार-प्रेरित निर्यात: अमेरिका की निर्यात रणनीति प्रौद्योगिकी नेतृत्व, बौद्धिक संपदा, उच्च-मूल्य सेवाएँ, रक्षा निर्यात, एयरोस्पेस, सॉफ्टवेयर, औषधियाँ और उन्नत विनिर्माण पर आधारित है।
      • इसकी प्रतिस्पर्द्धात्मकता सशक्त विश्वविद्यालयों, गहरे पूँजी बाजारों, अनुसंधान एवं विकास व्यय और डिजिटल मंचों में वैश्विक प्रभुत्व से आती है।
  • सिंगापुर
    • व्यापार केंद्र और लॉजिस्टिक्स उत्कृष्टता: सिंगापुर ने अपनी निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता विश्व-स्तरीय बंदरगाहों, कुशल सीमा शुल्क, कम व्यापार बाधाओं, उच्च गुणवत्ता वाले लॉजिस्टिक्स और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के साथ एकीकरण के माध्यम से विकसित की है।
      • इसकी रणनीति बड़े घरेलू बाजार पर आधारित न होकर पुनः-निर्यात, वित्त, शिपिंग और सेवाओं के केंद्र के रूप में विकसित होने पर आधारित है।
  • बांग्लादेश
    • श्रम-प्रधान निर्यात पर ध्यान: बांग्लादेश ने परिधान और वस्त्र क्षेत्र पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित किया है, जिसमें कम श्रम लागत, बड़े पैमाने के औद्योगिक समूह और वरीयता प्राप्त बाजार पहुँच का उपयोग किया गया है।
      • इसकी निर्यात रणनीति दर्शाती है कि क्षेत्रीय एकाग्रता तीव्र निर्यात वृद्धि उत्पन्न कर सकती है, हालाँकि इससे सीमित निर्यात बास्केट पर निर्भरता भी बढ़ती है।
  • मलेशिया और थाईलैंड 
    • वैश्विक मूल्य-शृंखला एकीकरण: इन देशों ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, औद्योगिक पार्क, इलेक्ट्रॉनिक्स समूह, ऑटोमोबाइल आपूर्ति-शृंखलाएँ और आसियान व्यापार एकीकरण का उपयोग कर वैश्विक उत्पादन नेटवर्क में प्रवेश किया है। इनका मॉडल दर्शाता है कि घरेलू उद्योगों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जोड़ना निर्यात वृद्धि के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

भारतीय निर्यात में वृद्धि: उभरते अवसर और संरचनात्मक चुनौतियाँ

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