संक्षेप में समाचार

16 May 2026

थ्यूसीडाइड्स ट्रैप

बीजिंग में आयोजित एक बैठक के दौरान शी जिनपिंग ने चीन और अमेरिका के विकसित होते संबंधों पर चर्चा करते हुए “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” का उल्लेख किया।

थ्यूसीडाइड्स ट्रैप के बारे में

  • अर्थ: ‘थ्यूसीडाइड्स ट्रैप’ उस स्थिति को दर्शाता है, जब कोई उभरती शक्ति किसी स्थापित प्रभुत्वशाली शक्ति को चुनौती देती है और इसके परिणामस्वरूप संघर्ष या युद्ध की संभावना बढ़ जाती है।
  • संघर्ष के मूल कारण: भय, शक्ति-संतरण, रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा तथा सुरक्षा संबंधी आशंकाएँ इस सिद्धांत के प्रमुख तत्त्व हैं।
  • उत्पत्ति: यह अवधारणा प्राचीन यूनानी इतिहासकार थ्यूसीडाइड्स तथा उनके द्वारा वर्णित एथेंस एवं स्पार्टा के मध्य पेलोपोनेसियन युद्ध के विवरण से उत्पन्न हुई है।
    • अवलोकन: थ्यूसीडाइड्स का मत था कि एथेंस के उदय और उससे स्पार्टा में उत्पन्न भय ने युद्ध की संभावना को बढ़ा दिया।
  • आधुनिक लोकप्रियता: इस शब्द को ग्राहम एलिसन ने अपनी पुस्तक “डेस्टिन्ड फॉर वॉर: कैन अमेरिका एंड चाइना एस्केप थ्यूसीडाइड्स ट्रैप?” में लोकप्रिय बनाया।
  • समकालीन प्रासंगिकता: यह अवधारणा प्रायः चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता को समझाने के लिए प्रयुक्त की जाती है।
    • प्रतिस्पर्द्धा के क्षेत्र: आधुनिक प्रतिस्पर्द्धा में व्यापार, प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अर्द्धचालक, ताइवान, साइबर सुरक्षा तथा हिंद-प्रशांत सुरक्षा जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
  • वैकल्पिक व्याख्या: कुछ विद्वानों का मत है कि इस सिद्धांत को युद्ध की अनिवार्यता मानने के बजाय तनाव-वृद्धि से बचने की चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए।
  • महत्त्व: अमेरिका और चीन के बीच किसी भी बड़े संघर्ष का वैश्विक व्यापार, आपूर्ति शृंखलाओं, ऊर्जा बाजारों तथा भू-राजनीतिक स्थिरता पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

निएंडरथल 

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एक नए अध्ययन से पता चलता है कि निएंडरथल लोगों ने लगभग 59,000 वर्ष पूर्व विश्व की सबसे पुरानी ज्ञात दंत चिकित्सा प्रक्रिया की होगी।

संबंधित तथ्य

  • खोज का स्थान: यह प्राचीन दाढ़ (मोलर) रूस की चागिर्स्काया गुफा में मिली, जिसमें एक गहरा छेद पाया गया है, जिसे जानबूझकर ड्रिल किए जाने की संभावना व्यक्त की गई है।
  • वैज्ञानिक प्रमाण: उन्नत सूक्ष्म-टोमोग्राफी प्रतिचित्रण से ऐसे सूक्ष्म खाँचे और निशान मिले, जो प्राकृतिक घिसाव के बजाय जानबूझकर की गई ड्रिलिंग के अनुरूप हैं।
  • ऐतिहासिक महत्त्व: यदि यह खोज प्रमाणित होती है, तो यह दंत चिकित्सा के ज्ञात इतिहास को इटली से प्राप्त पूर्व प्रमाणों की तुलना में 40,000 वर्ष से अधिक पीछे ले जाएगी।
  • मानव विकास के लिए महत्त्व: ये निष्कर्ष संकेत देते हैं कि निएंडरथल आधुनिक सभ्यता से बहुत पहले ही उन्नत समस्या-समाधान क्षमता, स्वास्थ्य देखभाल पद्धतियों और सामाजिक सहयोग रखते थे।

निएंडरथल के बारे में

  • निएंडरथल (होमो निएंडरथलेंसिस): निएंडरथल प्राचीन मानवों की एक विलुप्त प्रजाति थी, जो आधुनिक मानव (Homo sapiens) से निकट संबंध रखती थी।
  • निएंडरथल शब्द का अर्थ: होमो निएंडरथलेंसिस का अर्थ है- “निएंडर घाटी का मानव
    • इसका नाम जर्मनी की निएंडर घाटी के नाम पर रखा गया, जहाँ वर्ष 1856 में इसका पहला प्रमुख जीवाश्म प्राप्त हुआ था।
  • कालखंड: वे लगभग 4 लाख वर्ष पूर्व से 40,000 वर्ष पूर्व तक मध्य और उत्तर प्लीस्टोसीन काल के दौरान जीवित थे।
  • शारीरिक विशेषताएँ: उनके शरीर मजबूत और मांसल थे, मस्तिष्क बड़ा था, नाक चौड़ी थी तथा वे ठंडी जलवायु के अनुरूप अनुकूलित थे।
  • औजारों का उपयोग: निएंडरथल जीवित रहने के लिए उन्नत पत्थर के औजारों का उपयोग करते थे तथा अग्नि का प्रयोग करते थे।
  • आहार और शिकार: वे कुशल शिकारी थे, जो मांस के साथ-साथ वनस्पति-आधारित भोजन भी ग्रहण करते थे।
  • अंतःप्रजनन: आधुनिक मानव और निएंडरथल के बीच अंतःप्रजनन हुआ था और आज भी अनेक मानव आबादियों में निएंडरथल डीएनए के अंश पाए जाते हैं।
  • वैज्ञानिक महत्त्व: निएंडरथल मानव विकास, संज्ञानात्मक क्षमता तथा प्रागैतिहासिक सामाजिक व्यवहार को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

ट्राइएसीटोन ट्राइपरऑक्साइड (TATP) 

राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण ने पाया है कि वर्ष 2025 में दिल्ली के लाल किले में हुए विस्फोट में प्रयुक्त वाहन-आधारित तात्कालिक विस्फोटक उपकरण में ट्राइएसीटोन ट्राइपरऑक्साइड (TATP) का उपयोग किया गया था।

ट्राइएसीटोन ट्राइपरऑक्साइड (TATP) के बारे में

  • ट्राइएसीटोन ट्राइपरऑक्साइड, जिसे एसीटोन परॉक्साइड भी कहा जाता है, एक अत्यंत अस्थिर कार्बनिक पेरॉक्साइड विस्फोटक है, जिसका उपयोग सामान्यतः तात्कालिक विस्फोटक उपकरणों (IEDs) में किया जाता है।
  • संरचना: TATP सामान्यतः बाजार में आसानी से उपलब्ध रसायनों जैसे एसीटोन और हाइड्रोजन पेरॉक्साइड से तैयार किया जाता है।
  • संवेदनशीलता: यह ऊष्मा, झटके, घर्षण और दबाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है, जिससे इसका निर्माण और संचालन अत्यंत खतरनाक हो जाता है।
  • आतंकवादी उपयोग: विश्वभर में आतंकवादी संगठनों द्वारा TATP का उपयोग आत्मघाती हमलों, वाहन-आधारित तात्कालिक विस्फोटक उपकरणों तथा अन्य उच्च-तीव्रता वाले विस्फोटक हमलों में किया गया है।
  • पहचान में कठिनाई: TATP में नाइट्रोजन की मात्रा बहुत कम होती है, जिसके कारण पारंपरिक विस्फोटक पहचान प्रणालियों द्वारा इसका पता लगाना कठिन होता है।
  • सुरक्षा संबंधी चिंता: आतंकवाद-विरोधी एजेंसियाँ TATP उत्पादन से संबधित पूर्ववर्ती रसायनों की उपलब्धता और दुरुपयोग की संभावना के कारण उन पर कड़ी निगरानी रखती हैं।
  • फॉरेंसिक महत्त्व: आतंकवादी विस्फोटों की जाँच के दौरान TATP के अवशेषों की पहचान को एक महत्त्वपूर्ण फॉरेंसिक संकेतक माना जाता है।

अभय

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केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने “अभय” नामक कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सहायता प्रणाली प्रारंभ की है।

“अभय” के बारे में

  • “अभय” केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा विकसित एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सहायता प्रणाली है, जिसका उद्देश्य सीबीआई नोटिसों की प्रामाणिकता की पुष्टि करना तथा नागरिकों को साइबर धोखाधड़ी एवं डिजिटल गिरफ्तारी घोटालों से सुरक्षित रखना है।
  • सीबीआई द्वारा व्यक्त चिंता: एजेंसी के अनुसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीपफेक तकनीक के बढ़ते उपयोग के कारण नागरिकों के लिए वास्तविक तथा कृत्रिम रूप से तैयार सामग्री के बीच अंतर करना कठिन होता जा रहा है।
    • धोखेबाज नकली नोटिसों का उपयोग कर लोगों को तथाकथित “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर जाल में फँसाते हैं और उन पर निगरानी रखते हैं, जबकि भारतीय कानून में ऐसी किसी गिरफ्तारी का कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है।
  • उपलब्धता: नागरिक “अभय” तक सीबीआई की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से पहुँच सकते हैं।

भोजशाला–कमाल मौला परिसर 

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मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने धार स्थित विवादित भोजशाला–कमाल मौला परिसर को देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर घोषित करते हुए वर्ष 2003 की भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण व्यवस्था को निरस्त कर दिया।

निर्णय के प्रमुख बिंदु

  • संरक्षित स्मारक का दर्जा: यह स्थल प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्त्विक स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958 के अंतर्गत संरक्षित स्मारक बना रहेगा।
  • भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण का पर्यवेक्षण नियंत्रण: परिसर के संरक्षण, संवर्द्धन तथा धार्मिक प्रवेश के विनियमन का पर्यवेक्षण नियंत्रण भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण को प्रदान किया गया।
  • प्रबंधन पर केंद्र सरकार का निर्णय: न्यायालय ने केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण को धार जिले की विवादित भूमि पर स्थित भोजशाला मंदिर और संस्कृत शिक्षण केंद्र के भविष्य के प्रशासन एवं प्रबंधन ढाँचे का निर्धारण करने का निर्देश दिया।
  • सरस्वती प्रतिमा की वापसी का निर्देश: न्यायालय ने केंद्र सरकार को उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यूनाइटेड किंगडम ले जाई गई सरस्वती प्रतिमा को वापस लाने के प्रयास करने का निर्देश दिया।
  • वैज्ञानिक सर्वेक्षण की पुष्टि: न्यायालय ने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के वैज्ञानिक सर्वेक्षण को वैध माना, जिसमें कार्बन डेटिंग, पुरालिपि विज्ञान, एक्स-रे फ्लोरोसेंस विश्लेषण तथा संरचनात्मक परीक्षण का उपयोग किया गया था।
  • परिसर में नमाज पर प्रतिबंध: न्यायालय ने कहा कि अब मुस्लिम समुदाय को विवादित परिसर के भीतर नमाज अदा करने की अनुमति नहीं होगी।
  • मस्जिद और वक्फ संबंधी दावों का निरस्तीकरण: न्यायालय ने कहा कि ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जिससे यह सिद्ध हो कि विवादित मस्जिद संरचना वर्ष 1034 ईसवी से पूर्व अस्तित्व में थी।
    • विवादित भूमि को वक्फ (इस्लामी कानून के तहत धर्मार्थ बंदोबस्ती) संपत्ति के रूप में स्थापित करने वाला कोई भी प्रमाण मौजूद नहीं है।
    • वर्ष 1935 के उस आदेश को, जिसमें संपत्ति को मस्जिद के रूप में मान्यता दी गई थी, न्यायालय ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह वैध संवैधानिक या कानूनी आदेश नहीं था।
  • वैकल्पिक भूमि का प्रावधान: न्यायालय ने मुस्लिम समुदाय को मस्जिद निर्माण हेतु मध्य प्रदेश सरकार से वैकल्पिक भूमि की माँग करने की अनुमति दी।

भोजशाला–कमाल मौला परिसर के बारे में

  • स्थान: धार, मध्य प्रदेश।
  • ऐतिहासिक महत्त्व: यह भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित 11वीं शताब्दी का स्मारक है, जिसकी स्थापना राजा भोज के शासनकाल में हुई थी।
    • राजा भोज: वे परमार वंश के प्रमुख शासक थे, जिन्होंने लगभग 1010 से 1055 ईसवी तक मालवा क्षेत्र पर शासन किया।
  • हिंदू पक्ष का दावा: हिंदू समुदाय इस स्थल को देवी सरस्वती (वाग्देवी) को समर्पित प्राचीन भोजशाला मंदिर मानता है।
  • मुस्लिम पक्ष का दावा: मुस्लिम समुदाय इस संरचना को सूफी संत हजरत कमालुद्दीन चिश्ती से संबंधित कमाल मौला मस्जिद मानता है।
  • वर्ष 2003 की भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण व्यवस्था: वर्ष 2003 में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने साझा उपयोग व्यवस्था लागू की थी, जिसके अंतर्गत हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार की नमाज की अनुमति दी गई थी।
  • उच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित सर्वेक्षण: वर्ष 2024 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने परिसर के ऐतिहासिक स्वरूप की जाँच हेतु भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण को वैज्ञानिक सर्वेक्षण और वीडियोग्राफी करने का निर्देश दिया था।

सॉफ्ट-शेल टर्टल

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भारत का पहला सैटेलाइट-टैग्ड सॉफ्ट-शेल टर्टल (Ganges Soft-shell Turtle), ‘लुप्तप्राय प्रजाति दिवस’ (Endangered Species Day), 2026 के अवसर पर, असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व (Kaziranga National Park and Tiger Reserve) में छोड़ा गया।

संबंधित तथ्य

  • प्रमुख संस्थान: सैटेलाइट-टैगिंग (उपग्रह के माध्यम से ट्रैकिंग) का यह कार्य भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के नेतृत्व में किया गया था।
    • यह पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (भारत सरकार) के तहत एक स्वायत्त संस्थान है, जो भारत में वन्यजीव अनुसंधान, प्रशिक्षण और संरक्षण के लिए समर्पित है।
  • सहयोगी एजेंसियाँ: यह परियोजना काजीरंगा अधिकारियों और असम वन विभाग के सहयोग से संचालित की गई थी।
  • वित्तीय सहायता: इस परियोजना को नेशनल ज्योग्राफिक सोसायटी द्वारा वित्तपोषित किया गया था।
    • यह एक वैश्विक गैर-लाभकारी वैज्ञानिक और शैक्षणिक संगठन है, जो भूगोल, प्रकृति और संस्कृति के बारे में अन्वेषण, संरक्षण, अनुसंधान और सार्वजनिक जागरूकता के लिए समर्पित है।
  • छोड़ने का स्थान: कछुए को ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर छोड़ा गया था।
  • सैटेलाइट टैगिंग का उद्देश्य: इस परियोजना का उद्देश्य बेहतर संरक्षण प्रबंधन के लिए मौसमी गतिविधियों के पैटर्न, गृह क्षेत्र, घोंसला बनाने के स्थानों और प्रजनन आवासों का अध्ययन करना है।

सॉफ्ट-शेल टर्टल (Ganges Soft-shell Turtle) के बारे में 

  • वैज्ञानिक नाम: निल्सोनिया गैंगेटिका (Nilssonia Gangetica)।
  • प्रकार: यह मीठे जल के कछुए की एक प्रजाति है।
  • सॉफ्ट-शेल टर्टल की मुख्य विशेषताएँ
    • सिर के निशान: इसके सिर के ऊपरी हिस्से पर तीर के अग्रभाग (Arrowhead) के आकार के निशान होते हैं, जो इसकी पहचान हैं।
    • कैरापेस (पीठ का कवच) की संरचना: कठोर कवच वाले कछुओं के विपरीत, इसमें पीले रंग के बॉर्डर के साथ एक चपटा, दबा हुआ, चिकना और चमड़े जैसा कैरापेस होता है।
    • शारीरिक अनुकूलन: इसमें एक लंबी ट्यूब जैसी थूथन (Snout) होती है, जो स्नोर्कल (श्वसन नली) की तरह कार्य करती है, जिससे यह जल या रेत के नीचे रहने के दौरान भी साँस ले सकता है।
    • खान-पान का व्यवहार: यह एक सर्वाहारी (Omnivorous) प्रजाति है, जो मोलस्क (घोंघे आदि), कीड़े-मकोड़े, मछली, उभयचर (Amphibians), जलीय पौधे, जलपक्षी और सड़े-गले मांस (Carrion) को खाती है।
  • वितरण: यह उत्तरी और पूर्वी भारत में गंगा, सिंधु, महानदी और ब्रह्मपुत्र नदी प्रणालियों में पाया जाता है।
  • भारत के राज्यों में मौजूदगी: यह असम, बिहार, जम्मू और कश्मीर, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में पाया गया है।
  • आवास: यह मृदा या रेत की सतह वाली नदियों, नालों, नहरों, झीलों और तालाबों में रहता है।
  • पारिस्थितिकी भूमिका: यह एक प्रमुख शिकारी और अपमार्जक (Scavenger) के रूप में कार्य करता है, जो शैवाल प्रस्फुटन (Algal Blooms) तथा मृत और सड़ने वाले कार्बनिक पदार्थों को खाकर जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करता है।
  • प्रमुख खतरे: इसे शिकार, अवैध वन्यजीव व्यापार, आवास के नुकसान, प्रदूषण, बाँधों, बाढ़ के मैदानों के जल निकासी (Floodplain Drainage) और मांस के लिए अत्यधिक उपभोग से खतरा है।
  • संरक्षण स्थिति
    • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के तहत संरक्षित।
    • IUCN स्थिति: लुप्तप्राय (Endangered) के रूप में वर्गीकृत।
    • वन्यजीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CITES) का परिशिष्ट I

लुप्तप्राय प्रजाति दिवस (Endangered Species Day) के बारे में

  • लुप्तप्राय प्रजातियों और उनके संरक्षण की आवश्यकता के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रत्येक वर्ष मई के तीसरे शुक्रवार को मनाया जाता है।

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