संदर्भ
भारत दो-पहिया और चार-पहिया वाहनों के लिए वर्ष 2028 तक इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) में अनिवार्य संक्रमण की नीति पर विचार कर रहा है, जो प्रदूषण नियंत्रण, ऊर्जा सुरक्षा और ऑटोमोबाइल क्षेत्र के दीर्घकालिक पुनर्गठन पर आधारित है।
संबंधित तथ्य
- भारत ने वर्ष 2030 तक EV बिक्री को निजी कारों में 30%, वाणिज्यिक वाहनों में 70%, बसों में 40% और दो- एवं तीन-पहिया वाहनों में 80% तक बढ़ाने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है।
- वैश्विक स्तर पर, इलेक्ट्रिक वाहन बाजार का मूल्य वर्ष 2025 में US$ 917.30 बिलियन था और वर्ष 2034 तक इसके US$ 4,886.20 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान है, जो वर्ष 2026-34 के दौरान 20.43% CAGR से बढ़ेगा।
इलेक्ट्रिक वाहन (EV) संक्रमण के बारे में
- EV संक्रमण से तात्पर्य पेट्रोल और डीजल द्वारा संचालित आंतरिक दहन इंजन (ICE) वाहनों से बैटरियों में संगृहीत विद्युत ऊर्जा द्वारा संचालित इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर धीरे-धीरे परिवर्तन से है।
- इसमें पारंपरिक वाहनों के स्थान पर इलेक्ट्रिक कार, बसें, दो-पहिया और वाणिज्यिक वाहनों को अपनाना शामिल है, साथ ही चार्जिंग स्टेशन, बैटरी निर्माण और रीसाइक्लिंग प्रणालियों जैसी सहायक अवसंरचना का विकास भी शामिल है।
- यह संक्रमण स्वच्छ परिवहन, कम उत्सर्जन, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता में कमी और सतत् गतिशीलता प्राप्त करने का लक्ष्य रखता है।

EV परिवर्तन को क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है?
- पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य की अनिवार्यता: परिवहन क्षेत्र शहरी वायु प्रदूषण में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है, विशेषकर दिल्ली-NCR जैसे शहरों में, जहाँ वाहनों से उत्सर्जन PM2.5 का प्रमुख स्रोत है।
- WHO के अनुसार, वायु प्रदूषण हर वर्ष विश्व स्तर पर लाखों समयपूर्व मौतों का कारण बनता है, जिसमें भारत सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल है।
- EV अपनाने से टेलपाइप उत्सर्जन (NOx, CO, पार्टिकुलेट मैटर) में कमी आती है, जिससे शहरी वायु गुणवत्ता और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
- इसलिए, EV अपनाना केवल ऊर्जा परिवर्तन नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है।
- ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता: जीवाश्म ईंधन आयात भारत की बाह्य संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं, विशेषकर कच्चे तेल पर निर्भरता के कारण।
- EV ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करते हैं, क्योंकि विद्युत का उत्पादन देश के भीतर, विशेषकर नवीकरणीय स्रोतों से किया जा सकता है।
- बैटरियाँ और मैग्नेट स्थायी संपत्तियाँ हैं; ईंधन के विपरीत EV संचालन के लिए निरंतर आयात की आवश्यकता नहीं होती है।
- जलवायु प्रतिबद्धताएँ और नेट-जीरो लक्ष्य: भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य (COP26) निर्धारित किया है।
- परिवहन क्षेत्र ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का प्रमुख स्रोत है, इसलिए इसका विद्युतीकरण आवश्यक है।
- EV, राष्ट्रीय इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन योजना (NEMMP) और फेम इंडिया जैसी योजनाओं के अनुरूप हैं।
- आर्थिक दक्षता और कम परिचालन लागत: EV की प्रति किमी. संचालन लागत, आंतरिक दहन इंजन (ICE) वाहनों की तुलना में कम होती है, क्योंकि:
- बिजली की लागत पेट्रोल/डीजल से कम होती है।
- कम गतिशील उपकरण होने के कारण रखरखाव कम होता है।
- औद्योगिक परिवर्तन और विनिर्माण वृद्धि: EV परिवर्तन एक नए ग्रीन औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र के विकास को बढ़ावा देता है:
- बैटरी और ऊर्जा भंडारण
- पॉवर इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर
- चार्जिंग अवसंरचना।
- शहरी नियोजन और तेल निर्भरता में कमी: EV अपनाने से शहरों की जीवाश्म ईंधन वितरण नेटवर्क (फ्यूल स्टेशन, लॉजिस्टिक्स शृंखला) पर निर्भरता कम होती है।
- विदेशी मुद्रा बचत और व्यापक आर्थिक स्थिरता: तेल आयात में कमी से चालू खाते पर दबाव कम होता है और विदेशी मुद्रा स्थिरता में सुधार होता है।
- भारत अपने आयात बिल का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल पर व्यय करता है; EV परिवर्तन इस संरचनात्मक व्यापार घाटे को कम कर सकता है।
- तकनीकी उन्नयन का अवसर: EV भारत को पारंपरिक ICE विकास चरणों को छोड़कर सीधे उन्नत मोबिलिटी तकनीकों को अपनाने का अवसर देते हैं। यह AI आधारित फ्लीट प्रबंधन, स्मार्ट ग्रिड और ‘व्हीकल-टू–ग्रिड’ (V2G) प्रणाली के एकीकरण को संभव बनाता है।
- ग्रामीण और शहरी गतिशीलता में परिवर्तन: EV, विशेषकर दो- और तीन-पहिया वाहन, भारत के कम दूरी के यात्रा पैटर्न के लिए अत्यंत उपयुक्त हैं। कम संचालन लागत ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में गतिशीलता की वहनीयता को बढ़ाती है।
- बैटरी पुनरुपयोग और चक्रीय अर्थव्यवस्था की संभावनाएँ: EV बैटरियों का उपयोग उनकी ऑटोमोबाइल संबंधी अनुप्रयोग सीमा के बाद ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में पुनः किया जा सकता है। यह लीथियम, कोबाल्ट, निकल के पुनर्चक्रण के माध्यम से चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल को बढ़ावा देता है।
EV संक्रमण के लिए संरचनात्मक आवश्यकताएँ
- चार्जिंग अवसंरचना का विस्तार: EV अपनाने के लिए चार्जिंग नेटवर्क का विस्तार आवश्यक है, जिसे पेट्रोल पंप, पार्किंग स्थल, आवासीय क्षेत्रों और सार्वजनिक स्थानों में विकसित किया जाना चाहिए।
- विश्वसनीय बिजली आपूर्ति और स्मार्ट चार्जिंग प्रणालियों के लिए विद्युत वितरण कंपनियों को प्रमुख हितधारक के रूप में शामिल करना आवश्यक है।
- अंतरिम रणनीतिक उपाय: आपूर्ति शृंखला जोखिमों को कम करने के लिए महत्त्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ मृदा तत्त्वों का रणनीतिक भंडारण आवश्यक है।
- त्वरित अवमूल्यन समर्थन, ऑटोमोबाइल कंपनियों को ICE वाहनों से संक्रमण के दौरान होने वाले नुकसान को प्रबंधित करने में सहायता कर सकता है।
- घरेलू बैटरी और EV घटक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश आवश्यक है।
- उद्योग–सरकार सहयोग: ऑटोमोबाइल कंपनियों को EV अनुसंधान, चार्जिंग नेटवर्क और बैटरी रीसाइक्लिंग अवसंरचना में निवेश करना चाहिए, ताकि EV पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत हो सके।
- सरकार को नीतिगत स्थिरता, दीर्घकालिक EV रोडमैप और संक्रमण वित्तपोषण तंत्र पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
- घरेलू बैटरी निर्माण: आयातित बैटरी सेल और घटकों पर निर्भरता कम करने के लिए भारत को एक सशक्त बैटरी निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना होगा।
- महत्त्वपूर्ण खनिज सुरक्षा: दीर्घकालिक EV विकास के लिए लीथियम, कोबाल्ट, निकल और दुर्लभ मृदा तत्त्वों की उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
- ग्रिड आधुनिकीकरण और नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण: EV संक्रमण के लिए बिजली ग्रिड को मजबूत करना और नवीकरणीय ऊर्जा का एकीकरण आवश्यक है।
- सौर ऊर्जा आधारित चार्जिंग स्टेशन पारंपरिक बिजली स्रोतों पर दबाव कम कर सकते हैं।
- कौशल विकास और कार्यबल संक्रमण: पारंपरिक ऑटोमोबाइल क्षेत्र के श्रमिकों को EV प्रौद्योगिकियों के लिए पुनः कौशल (Reskilling) और कौशल उन्नयन की आवश्यकता है।
- मैकेनिकों को बैटरी प्रबंधन प्रणाली और इलेक्ट्रिक पावरट्रेन में प्रशिक्षित किया जा सकता है।
- बैटरी रीसाइक्लिंग और चक्रीय अर्थव्यवस्था: मूल्यवान सामग्रियों की पुनर्प्राप्ति और सतत् अपशिष्ट प्रबंधन के लिए बैटरी रीसाइक्लिंग पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना आवश्यक है।
- लीथियम-आयन बैटरियों का पुनर्चक्रण आयातित खनिजों पर निर्भरता को कम कर सकता है।
- उपभोक्ता प्रोत्साहन और जागरूकता: सस्ती वित्तीय सहायता, प्रोत्साहन और जागरूकता अभियानों के माध्यम से EV अपनाने को बढ़ावा दिया जा सकता है।
- क्रेडिट योजनाएँ डिलीवरी कर्मियों और छोटे व्यवसायों को इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर स्थानांतरित होने में सहायता कर सकती हैं।
भारत में EV अपनाने को बढ़ावा देने हेतु उठाए गए कदम
| पहल / नीति |
मुख्य विशेषताएँ और उद्देश्य |
| ‘पीएम ई ड्राइव’ योजना (2024–2026) |
PM इलेक्ट्रिक ड्राइव रिवॉल्यूशन इन इनोवेटिव व्हीकल एनहान्समेंट (‘पीएम ई ड्राइव’) योजना हरित गतिशीलता और EV पारिस्थितिकी तंत्र के विकास को बढ़ावा देती है, जिसके लिए दो वर्षों में ₹10,900 करोड़ का प्रावधान किया गया है। |
| चार्जिंग अवसंरचना में निवेश |
‘पीएम ई ड्राइव’ के तहत शहरों, राजमार्गों, हवाई अड्डों और औद्योगिक गलियारों में लगभग 72,000 EV चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने हेतु ₹2,000 करोड़ आवंटित किए गए हैं। |
| FAME II योजना |
सरकार ने लगभग ₹10,000 करोड़ के बजट के साथ FAME II के माध्यम से इलेक्ट्रिक दोपहिया, तिपहिया और बसों को बढ़ावा देकर EV अपनाने का समर्थन किया। |
| इलेक्ट्रिक वाहन विनिर्माण नीति (2024) |
इस नीति का उद्देश्य भारत को EV विनिर्माण केंद्र बनाना है, जिसके लिए न्यूनतम ₹4,150 करोड़ निवेश, 3 वर्षों में उत्पादन इकाइयों की स्थापना तथा 5 वर्षों में 50% घरेलू मूल्य संवर्धन सुनिश्चित करना आवश्यक है। |
| राज्य-स्तरीय EV पहलें |
दिल्ली, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्य इलेक्ट्रिक बस बेड़े का विस्तार कर रहे हैं और सतत् सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने हेतु EV नीतियाँ लागू कर रहे हैं। |
| ACC बैटरियों के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) |
सरकार ने ₹18,100 करोड़ PLI योजना के तहत घरेलू उन्नत रसायन सेल (ACC) बैटरी विनिर्माण को बढ़ावा देने और आयात निर्भरता कम करने के लिए आवंटित किए हैं। |
| SPMEPCI योजना (इलेक्ट्रिक यात्री कारें) |
भारत में इलेक्ट्रिक यात्री कारों के विनिर्माण को बढ़ावा देने हेतु यह योजना आयात शुल्क में कमी और घरेलू उत्पादन प्रोत्साहनों के माध्यम से वैश्विक EV निर्माताओं को निवेश के लिए प्रोत्साहित करती है। |
| EV और चार्जिंग उपकरणों पर GST में कमी |
EV और चार्जिंग उपकरणों पर GST को घटाकर 5% किया गया है, जिससे वाहनों की लागत कम हो और उपभोक्ता अपनाने को प्रोत्साहन मिले। |
| PM e-बस सेवा योजना |
PPP मॉडल के माध्यम से 10,000 इलेक्ट्रिक बसों की तैनाती का लक्ष्य, जिसमें EV आधारित सार्वजनिक परिवहन अवसंरचना के लिए केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है। |
| EV मित्र योजना |
EV सब्सिडी तक आसान पहुँच सुनिश्चित करने और उपभोक्ताओं को प्रोत्साहन प्राप्त करने हेतु एक पारदर्शी मंच के माध्यम से जागरूकता बढ़ाने का उद्देश्य। |
पारंपरिक वाहनों से EV संक्रमण में चुनौतियाँ
- उच्च प्रारंभिक लागत: EV में महँगी बैटरी तकनीक के कारण शुरुआती लागत अधिक होती है, जिससे कई उपभोक्ताओं के लिए वहनीयता एक चुनौती बन जाती है।
- उदाहरण: भारत में वर्ष 2026 की शुरुआत में एक सामान्य हाई-स्पीड इलेक्ट्रिक स्कूटर की कीमत ₹1.20 लाख से ₹1.50 लाख (ऑन-रोड) के मध्य होती है, जबकि समान पेट्रोल स्कूटर ₹95,000 से ₹1.10 लाख के बीच उपलब्ध है।
- धीमी स्वीकृति: नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत में केवल लगभग 7.6% बिक्री ही इलेक्ट्रिक थी, जो वर्ष 2030 के 30% लक्ष्य से काफी कम है।
- अर्थात्, लगभग 10 वर्षों में 7.6% स्तर तक पहुँचने के बाद, अब अगले 5 वर्षों में 22% से अधिक वृद्धि आवश्यक है।
- चार्जिंग अवसंरचना की कमी: चार्जिंग स्टेशनों की सीमित उपलब्धता सीमा संबंधी चिंताएँ उत्पन्न करती है और EV के व्यापक उपयोग को प्रभावित करती है।
- उदाहरण: ग्रामीण क्षेत्रों और राजमार्गों पर पेट्रोल पंपों की तुलना में चार्जिंग सुविधाएँ कम हैं।
- महत्त्वपूर्ण खनिजों पर निर्भरता: बैटरी निर्माण के लिए आवश्यक लीथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा तत्त्वों के लिए भारत आयात पर निर्भर है।
- उदाहरण: वैश्विक आपूर्ति बाधाओं से बैटरी की कीमतें बढ़ सकती हैं और EV उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
- बिजली ग्रिड की तैयारी: बड़े पैमाने पर EV अपनाने के लिए बिजली ग्रिड का उन्नयन और स्मार्ट चार्जिंग प्रणालियों की आवश्यकता है।
- उदाहरण: शहरी बिजली नेटवर्क EV चार्जिंग के बढ़ते दबाव के कारण प्रभावित हो सकते हैं।
- बैटरी रीसाइक्लिंग की चुनौती: प्रभावी बैटरी रीसाइक्लिंग और निपटान प्रणालियों की कमी से पर्यावरण और सुरक्षा संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- उदाहरण: लीथियम-आयन बैटरियों के अनुचित निपटान से विषाक्त अपशिष्ट और आग लगने का खतरा बढ़ सकता है।
- रोजगार पर प्रभाव: EV संक्रमण पारंपरिक वाहन निर्माण, मरम्मत और रखरखाव से जुड़े रोजगारों को प्रभावित कर सकता है।
- उदाहरण: आंतरिक दहन इंजन विशेषज्ञ मैकेनिकों को EV से संबंधित नए कौशल सीखने की आवश्यकता होगी।
- उपभोक्ता स्वीकृति में बाधाएँ: बैटरी लाइफ, चार्जिंग समय, पुनर्विक्रय मूल्य और वाहन की विश्वसनीयता को लेकर चिंताएँ EV अपनाने की प्रक्रिया को धीमा करती हैं।
- उदाहरण: कई उपभोक्ता EV प्रदर्शन को लेकर अनिश्चितता के कारण पेट्रोल वाहनों से बदलने में हिचकिचाते हैं।
- ऑटोमोबाइल उद्योग का पुनर्गठन: ऑटोमोबाइल कंपनियों को ICE उत्पादन से EV निर्माण की ओर संक्रमण के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होती है।
- उदाहरण: कंपनियों को अपने कारखानों का पुनःडिजाइन करना पड़ता है और बैटरी तथा सॉफ्टवेयर क्षमताओं में निवेश करना पड़ता है।
आगे की राह
- प्रोत्साहनों से अनिवार्यता की ओर बढ़ना
- शून्य उत्सर्जन वाहन (ZEV) अपनाने के लिए स्पष्ट नीति तथा लक्षित समयसीमा की घोषणा की जानी चाहिए।
- EV के उत्पादन और खरीद को अनिवार्य बनाने तथा ICE वाहनों के उपयोग/उत्पादन को हतोत्साहित करने के लिए क्रमिक रूप से अधिक कठोर योजना तैयार की जानी चाहिए।
- कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी (CAFE) मानकों को अधिक व्यापक वाहन वर्गों तक विस्तारित किया जाना चाहिए।
- नई बैटरी प्रौद्योगिकियों पर अनुसंधान का विस्तार
- नई बैटरी रसायन पर अनुसंधान को तीव्र करने के लिए शैक्षणिक संस्थान–उद्योग–सरकार साझेदारी स्थापित की जानी चाहिए।
- ई-बस और ई-ट्रक के लिए वित्तपोषण सक्षम करना
- सार्वजनिक बजट और बहुपक्षीय विकास बैंकों के योगदान से एक संयुक्त कोष बनाया जाए, जिससे ई-बस और ई-ट्रक खरीद के लिए कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जा सके।
- इन निधियों के प्रभावी उपयोग के लिए उपयुक्त योजना तैयार और लागू की जानी चाहिए।
- चार्जिंग अवसंरचना का रणनीतिक विस्तार
- ई-बस और ई-ट्रक संचालन के लिए 20 उच्च घनत्व वाले कॉरिडोर की पहचान की जाए और इन मार्गों पर चार्जिंग हब के रणनीतिक स्थानों की पहचान हेतु अध्ययन किया जाए।
- निजी चार्जिंग ऑपरेटरों द्वारा निवेश को बढ़ावा देने के लिए व्यवहार्यता अध्ययन तथा आवश्यक अनुमोदनों का समन्वय किया जाए।
- प्रत्येक राज्य में, सिंगापुर की तर्ज पर, नोडल एजेंसियाँ स्थापित की जाएँ ताकि अधिक चार्जिंग स्टेशनों की स्थापना को सुगम बनाया जा सके।
- पूँजीगत लागत से परिचालन लागत की ओर स्थानांतरण
- EV की प्रारंभिक लागत कम करने के लिए बैटरी लीजिंग उद्योग को बढ़ावा दिया जाए।
- बैटरी की स्थिति का आकलन करने हेतु जानकारी प्रदान करने वाली बैटरी पासपोर्ट प्रणाली विकसित की जाए।
- जागरूकता और सूचना उपलब्धता में वृद्धि
- जागरूकता निर्माण कार्यक्रमों की योजना बनाकर उनका प्रभावी संचालन किया जाए।
- विभिन्न हितधारकों की डेटा एवं सूचना आवश्यकताओं का आकलन कर एक समग्र सूचना प्रणाली विकसित की जाए।
निष्कर्ष
वर्ष 2028 तक अनिवार्य EV संक्रमण तकनीकी रूप से संभव है, परंतु संस्थागत रूप से चुनौतीपूर्ण है। यह परिवर्तन केवल नीति घोषणा से नहीं, बल्कि निम्नलिखित तत्त्वों पर निर्भर करता है:
- अवसंरचना निर्माण
- आपूर्ति शृंखला की सुदृढ़ता
- उद्योग का अनुकूलन
- उपभोक्ता वहनीयता तंत्र।
भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि EV संक्रमण को केवल एक नियामक अनिवार्यता के रूप में नहीं, बल्कि एक औद्योगिक परिवर्तन रणनीति के रूप में देखा जाए।