ग्लोबल वार्मिंग में मानव की भूमिका सर्वकालिक उच्च स्तर पर

12 Jun 2026

संदर्भ

हाल ही में जलवायु वैज्ञानिकों की एक स्वतंत्र टीम नेइंडिकेटर्स ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट चेंज’ (IGCC) नामक नवीनतम वार्षिक अध्ययन प्रकाशित किया है।

  • इस रिपोर्ट में एक स्पष्ट चेतावनी दी गई है—मानव गतिविधियों द्वारा हमारे वायुमंडल में उत्सर्जित ऊष्मा वर्ष 2025 में अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच गई।

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अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

रिपोर्ट वर्ष 2025 में दर्ज सटीक तापमान और प्रदूषण स्तर का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है:

  • तापमान में वृद्धि: वर्ष 2025 में पृथ्वी का औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक आधार (1850–1900) की तुलना में 1.39°C अधिक रहा।
  • मानव प्रभाव: इस कुल तापवृद्धि में से 1.37°C सीधे मानव गतिविधियों—मुख्यतः जीवाश्म ईंधनों (कोयला, तेल और गैस) के दहन के कारण हुआ। केवल 0.02°C वृद्धि प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन के कारण हुई।
  • ऐतिहासिक तुलना: तुलना के लिए, पिछले तीन वर्षों में तापवृद्धि में मानव योगदान लगातार बढ़ता गया है (जैसा कि चित्र में दर्शाया गया है)।

IGCC अध्ययन के बारे में

  • यह क्या है: इंडिकेटर्स ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट चेंज’ (IGCC) एक स्वतंत्र वैज्ञानिक परियोजना है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2023 में हुई थी। यह वैज्ञानिक जर्नल अर्थ सिस्टम साइंस डेटा में प्रकाशित होती है।
  • इसे कौन संचालित करता है? यह एक वैश्विक जलवायु वैज्ञानिकों की टीम द्वारा संचालित किया जाता है। इन विशेषज्ञों में से कई संयुक्त राष्ट्र के अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) के प्रमुख लेखक भी हैं।
  • यह क्यों विशिष्ट है: आधिकारिक और प्रामाणिक UN IPCC रिपोर्ट केवल कुछ वर्षों के अंतराल पर प्रकाशित होती हैं। चूँकि हमारी जलवायु तेजी से बदल रही है, नीति-निर्माताओं को प्रत्येक वर्ष अद्यतित डेटा की आवश्यकता होती है।
    • IGCC इसी ज्ञान अंतराल को समाप्त करता है, क्योंकि यह वैश्विक तापवृद्धि का वार्षिक मूल्यांकन करता है और इसके लिए संयुक्त राष्ट्र के समान आधिकारिक दिशा-निर्देशों का उपयोग करता है।

वर्ष 2025 सबसे गर्म क्यों नहीं रहा?

मानव-जनित ताप योगदान अपने सर्वोच्च स्तर पर था, वर्ष 2025 रिकॉर्ड में केवल तीसरा सबसे गर्म वर्ष रहा, जबकि वर्ष 2024 और 2023 उससे अधिक गर्म थे।

  • अध्ययन के अनुसार, इसका प्रमुख कारण एक प्राकृतिक महासागरीय जलवायु चक्र—ला नीना था।
    • ला नीना की अवस्था में, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के सतही जल का तापमान सामान्य से कम हो जाता है। यह ठंडा जल वैश्विक स्तर पर एक प्राकृतिक शीतलन प्रभाव उत्पन्न करता है, जिससे वैश्विक औसत वायुमंडलीय तापमान अस्थायी रूप से कम हो जाता है।
    • अर्थात्, ला नीना ने वर्ष 2025 में मानव-जनित तापवृद्धि की वास्तविक तीव्रता को आंशिक रूप से कम कर दिया।
    • यदि यह प्राकृतिक शीतलन प्रभाव अनुपस्थित होता, तो वर्ष 2025 संभवतः अब तक का सर्वाधिक गर्म वर्ष सिद्ध होता।

वैज्ञानिकों द्वारा उठाई गई चिंताएँ

रिपोर्ट में तीन प्रमुख चेतावनी संकेत उजागर किए गए हैं, जिन पर नीति-निर्माताओं द्वारा त्वरित ध्यान आवश्यक है:

  • रिकॉर्ड स्तर का प्रदूषण: वर्ष 2025 में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़कर 56.8 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य के ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुँच गया।
  • समाप्ति की ओर बढ़ता कार्बन बजट: वैश्विक तापवृद्धि को अपेक्षाकृत सुरक्षित सीमा 1.5°C के भीतर रखने के लिए, वर्ष 2026 से विश्व केवल 130 अरब टन अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड ही उत्सर्जित कर सकता है।
    • वर्तमान तीव्र गति से उत्सर्जन जारी रहने पर यह शेष कार्बन बजट तीन वर्षों से भी कम समय में समाप्त हो जाएगा।
  • तापवृद्धि की तीव्र गति: वर्तमान में पृथ्वी का तापमान लगभग 0.27°C प्रति दशक की दर से निरंतर बढ़ रहा है।
  • अल-नीनो का खतरा: वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि एक शक्तिशाली अल-नीनो चक्र विकसित हो रहा है, जो ला-नीना के विपरीत कार्य करते हुए महासागर से वायुमंडल में अत्यधिक ऊष्मा स्थानांतरित करता है।
    • मानव-जनित उत्सर्जन और अल-नीनो प्रभाव के संयुक्त परिणामस्वरूप वर्ष 2030 से पूर्व कम-से-कम एक वर्ष में 1.5°C सीमा के पार जाने की 91% संभावना व्यक्त की गई है।

ला-नीना के बारे में (UPSC CSE Prelims- 2011)

  • ला नीना एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो तब उत्पन्न होती है जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य एवं पूर्वी भागों के सतही जल का तापमान सामान्य (औसत) से कम हो जाता है।
  • ENSO चक्र का भाग: यह अल नीनो–सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) चक्र का शीत चरण है, जबकि अल-नीनो इसका उष्ण चरण होता है।
  • कारण: ला-नीना का विकास सामान्य से अधिक प्रबल व्यापारिक पवनों के कारण होता है, जो गर्म सतही जल को पश्चिमी प्रशांत महासागर की ओर धकेल देती हैं। इसके परिणामस्वरूप पूर्वी प्रशांत महासागर में गहरे ठंडे जल का ऊपर उठना (अपवेलिंग) शामिल होता है।
  • वैश्विक प्रभाव: प्रशांत महासागर के इस शीतलन से वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है, जिससे विश्वभर में वर्षा पैटर्न, तापमान तथा चरम मौसमी घटनाओं में परिवर्तन होता है।
  • तापमान पर प्रभाव: ला-नीना सामान्यतः वैश्विक औसत तापमान को अस्थायी रूप से कम करने का प्रभाव डालती है, क्योंकि महासागर अधिक ऊष्मा को अवशोषित कर लेते हैं। हालाँकि, यह मानव-जनित दीर्घकालिक वैश्विक तापवृद्धि की प्रवृत्ति को नहीं रोकती है
  • भारत पर प्रभाव: ला-नीना प्रायः निम्नलिखित से संबंधित होती है:
    • अधिक सशक्त भारतीय मानसून
    • सामान्य से अधिक वर्षा की संभावना
    • कुछ क्षेत्रों में बाढ़ का बढ़ा हुआ जोखिम।
  • अल-नीनो से तुलना
    • ला-नीना: ठंडा प्रशांत जल → अपेक्षाकृत ठंडी वैश्विक स्थितियाँ → भारत में प्रायः सशक्त मानसून।
    • अल-नीनो: गर्म प्रशांत जल → वैश्विक तापवृद्धि प्रभाव में वृद्धि → भारत में प्रायः कमजोर मानसून।

आगे की राह

इस आपात स्थिति से निपटने के लिए, जर्मनी के बॉन में आयोजित मध्य-वर्षीय वार्ताओं में जलवायु कूटनीतिज्ञों ने वैश्विक ऊर्जा प्रणाली में संरचनात्मक परिवर्तन का प्रस्ताव दिया है:

  • वर्ष ‘2035 तक 35%’ लक्ष्य: देशों द्वारा यह प्रस्ताव रखा गया है कि वर्ष 2035 तक मानव द्वारा उपभोग की जाने वाली कुल ऊर्जा में बिजली की हिस्सेदारी कम-से-कम 35% होनी चाहिए।
    • वर्तमान में, वैश्विक ऊर्जा उपयोग में बिजली की हिस्सेदारी केवल 20% है, जबकि शेष ऊर्जा का अधिकांश भाग तेल (वाहनों में) तथा कोयला/गैस (उद्योगों में) के दहन से आता है।
  • स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण: वैश्विक स्तर पर विद्युत आधारित ऊर्जा प्रणाली की ओर बढ़ना जीवाश्म ईंधनों के प्रयोग को समाप्त करने का सबसे व्यावहारिक उपाय है।
    • हालाँकि, यह तभी संभव है जब देश तेजी से सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा तथा हरित हाइड्रोजन जैसे हरित ऊर्जा स्रोतों का विकास करें।
  • भारत के लिए अनुकूलन पर बल: भारत जैसे विकासशील देश—जहाँ अनेक शहर अत्यधिक हीट वेव के प्रति संवेदनशील हैं—के लिए संकुचित कार्बन बजट यह संकेत देता है कि समय अत्यंत सीमित है।
    • अतः भारत को निम्नलिखित क्षेत्रों में तीव्र गति से कार्य करना होगा:
      • स्थानीय जलवायु अनुकूलन उपाय (Adaptation)
      • अत्यधिक ताप का सामना करने हेतु शहरी अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण
      • विकसित देशों पर जलवायु वित्त उपलब्ध कराने हेतु दबाव बढ़ाना।
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