सर्वोच्च न्यायालय ने गृहिणियों को ‘राष्ट्र निर्माता’ के रूप में मान्यता दी

12 Jun 2026

संदर्भ

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गृहिणियों को “राष्ट्र निर्माता” के रूप में मान्यता दी। न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि गृहिणियों द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक घरेलू कार्य का मूल्यांकन मोटर दुर्घटना मृत्यु दावों में न्यूनतम ₹30,000 प्रति माह के आधार पर किया जाना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के प्रमुख बिंदु

  • कानूनी न्यूनतम मानक की स्थापना: न्यायालय ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) को निर्देश दिया कि वह गृहिणियों के अवैतनिक घरेलू श्रम का मूल्यांकन न्यूनतम ₹30,000 प्रति माह के आधार पर करे।
    • MACT एक विशेष अधिकरण है, जिसे राज्य सरकारों द्वारा मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 165 के अंतर्गत मोटर वाहन दुर्घटनाओं से संबंधित दावों के निपटान हेतु स्थापित किया गया है।
  • मुद्रास्फीति से संबद्धता: आर्थिक परिवर्तनों के अनुरूप यह आधार राशि प्रत्येक तीन वर्ष में 10% की दर से स्वतः बढ़ेगी।
  • द्वि-आय सुरक्षा प्रावधान: यदि मृतक गृहिणी किसी औपचारिक वेतनभोगी कार्य में भी संलग्न थी, तो ₹30,000 प्रति माह का मूल्यांकन उसके वेतन के अतिरिक्त प्रदान किया जाएगा।
  • क्षतिपूर्ति के नए आधार की शुरुआत: पीठ ने “घरेलू देखभाल की हानि” (Loss of Domestic Care) को एक स्वतंत्र एवं पृथक आधार के रूप में मान्यता दी, जिससे पारंपरिक क्षतिपूर्ति गणना पद्धति का विस्तार हुआ।
  • त्वरित न्याय का निर्देश: दुर्घटना मामलों में लंबे विलंब को देखते हुए (जिसका मूल मामला वर्ष 2001 से लंबित था), न्यायालय ने निर्देश दिया कि मोटर दुर्घटना क्षतिपूर्ति दावों का निपटान सामान्यतः एक वर्ष के भीतर किया जाए।

‘गृहिणी’ ढाँचा—परिवर्तित शब्दावली और दृष्टिकोण

  • भाषा में परिवर्तन: सर्वोच्च न्यायालय ने पारंपरिक और रूढ़िगत शब्द “हाउसवाइफ” के स्थान पर अधिक सम्मानजनक एवं यथार्थपरक शब्द “होममेकर” के उपयोग की आवश्यकता पर बल दिया।
  • लैंगिक वास्तविकताएँ: पीठ ने यह स्वीकार किया कि पुरुष भी गृहिणी (Homemaker) की भूमिका निभा सकते हैं, किंतु इस मामले में आर्थिक मूल्यांकन को केवल महिलाओं की पारंपरिक भूमिका तक सीमित रखा गया।
    • यह निर्णय भारतीय समाज में महिलाओं पर पड़ने वाले असमान संरचनात्मक भार को प्रत्यक्ष रूप से संबोधित करने के उद्देश्य से लिया गया है।

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भारत में अवैतनिक श्रम की मैक्रो-इकोनॉमिक वास्तविकता

सर्वोच्च न्यायालय ने उन महत्त्वपूर्ण सांख्यिकीय आँकड़ों को रेखांकित किया, जो महिलाओं द्वारा संचालित विशाल किंतु अदृश्य आर्थिक योगदान को उजागर करते हैं:

  • समय असंतुलन: टाइम यूज सर्वे का हवाला देते हुए न्यायालय ने उल्लेख किया कि 15–59 वर्ष की महिलाएँ प्रतिदिन औसतन 7 घंटे से अधिक अवैतनिक घरेलू कार्यों में लगाती हैं, जबकि पुरुष 3 घंटे से भी कम समय देते हैं।
  • देखभाल कार्य में 2.6 गुना अंतर: औसतन महिलाएँ पुरुषों की तुलना में 2.6 गुना अधिक अवैतनिक देखभाल कार्य करती हैं, यहाँ तक कि जब वे औपचारिक रोजगार में भी संलग्न होती हैं और आर्थिक योगदान देती हैं।
  • GDP एवं श्रम बल प्रभाव: महिलाओं द्वारा किया गया अवैतनिक देखभाल कार्य भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 15% से 17% तक योगदान देता है, फिर भी यह राष्ट्रीय लेखा प्रणाली में शामिल नहीं होता।
    • श्रम भागीदारी पर प्रभाव: समाज में यह स्वचालित अपेक्षा कि घरेलू कार्य महिलाओं की जिम्मेदारी है, भारत की LFPR को प्रभावित करती है, जो मात्र 31.7% पर सीमित है।

संवैधानिक आयाम

  • अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार): ऐतिहासिक रूप से न्यायालयों ने गृहिणी के 24×7 देखभाल कार्य को “अकुशल दैनिक श्रम” के समान माना है, जो सारभूत समानता (Substantive equality) के सिद्धांत के विपरीत है।
    • गृहिणी के श्रम का उचित आर्थिक मूल्यांकन करना अनुच्छेद-14 के अनुरूप है, क्योंकि यह महिलाओं के प्रति विद्यमान असमान एवं कम मूल्यांकन वाली धारणा को सुधारता है।
  • अनुच्छेद-21 (जीवन और गरिमा का अधिकार): जीवन के अधिकार में मानव गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। गृहिणी के व्यापक भावनात्मक एवं संरचनात्मक श्रम को “शून्य आय” मानना उसकी आर्थिक गरिमा का हनन करता है।
    • नया “घरेलू देखभाल की हानि” (Loss of Domestic Care) आधार, अवैतनिक श्रमिकों की न्यायिक गरिमा को कानूनी रूप से सुनिश्चित करता है।
  • अनुच्छेद-39 (राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व): यह निर्णय अनुच्छेद-39(a) (पर्याप्त आजीविका का अधिकार) तथा अनुच्छेद-39(d) (समान कार्य के लिए समान वेतन) के अनुरूप है, क्योंकि यह महिलाओं पर पड़ने वाले “दोहरे भार” (घर और कार्यस्थल दोनों का प्रबंधन) को कानूनी एवं आर्थिक रूप से मान्यता प्रदान करता है।

न्यायिक दृष्टांतों का विकास

वर्ष 2026 का यह निर्णय गृहिणियों की ‘नॉमिनल’ आय के निर्धारण से संबंधित लगभग 25 वर्षों के न्यायिक विकास का चरम बिंदु है:

  • लता वाधवा बनाम बिहार राज्य (2001): सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार यह माना कि गृहिणी द्वारा किया गया कार्य आर्थिक मूल्य रखता है तथा आयु एवं अन्य कारकों के आधार पर क्षतिपूर्ति निर्धारण की पद्धति विकसित की।
  • अरुण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2010): न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया कि गृहिणी की आय को केवल पति की आय का छोटा भाग माना जाए। न्यायालय ने इसे लैंगिक पूर्वाग्रह से ग्रसित दृष्टिकोण बताया।
  • कीर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2021): न्यायालय ने कहा कि गृहिणियों के कार्य का मूल्यांकन अनिवार्य है तथा उन्हें भी वेतनभोगी कर्मचारियों की तरह भविष्य के लाभ प्रदान किए जाने चाहिए, अर्थात् मुद्रास्फीति एवं भविष्य वृद्धि के आधार पर आय वृद्धि का लाभ।
  • अरविंद कुमार पाण्डेय बनाम ज्ञानेश पाण्डेय (2024): न्यायालय ने निर्णय दिया कि गृहिणी का मूल्यांकन न्यूनतम दैनिक मजदूरी से कम नहीं हो सकता तथा इसे कम-से-कम कुशल श्रमिक के समकक्ष माना जाना चाहिए।

चिंताएँ और कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ

  • सीमित अनुप्रयोग: यह मौद्रीकरण ढाँचा वर्तमान में केवल दोषपूर्ण दायित्व (Tortious Liability) अर्थात् दुर्घटना एवं मृत्यु से संबंधित क्षतिपूर्ति दावों पर लागू होता है।
    • यह जीवित गृहिणियों के लिए स्वतः किसी मासिक वेतन या प्रत्यक्ष राज्य कल्याण अधिकार में परिवर्तित नहीं होता है।
  • बीमा प्रीमियम पर दबाव: प्रति माह ₹30,000 की उच्च वित्तीय न्यूनतम सीमा निर्धारित होने से बीमा कंपनियों पर क्षतिपूर्ति भुगतान का भार बढ़ेगा, जिससे सामान्य नागरिकों के लिए थर्ड पार्टी मोटर बीमा प्रीमियम में वृद्धि की संभावना उत्पन्न हो सकती है।
  • संतुलन की सतत् चुनौती: यह निर्णय दुर्घटना के बाद आर्थिक न्याय प्रदान करता है, किंतु यह मूल संरचनात्मक समस्या का समाधान नहीं करता—अर्थात् सार्वजनिक क्रेच (बाल देखभाल केंद्र) या लचीले कार्य विकल्पों जैसी व्यवस्थाओं की कमी, जो महिलाओं को घरेलू दायित्वों से मुक्त कर औपचारिक श्रम बाजार में भागीदारी से रोकती है।

आगे की राह

  • राष्ट्रीय लेखा प्रणाली में सुधार: सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) को ऐसे सैटेलाइट अकाउंट्स को शामिल करने पर विचार करना चाहिए, जो अवैतनिक देखभाल कार्य का आकलन करें, जिससे महिलाओं के वास्तविक आर्थिक योगदान को भारत के GDP में दृश्यता प्राप्त हो सके।
  • सार्वजनिक अवसंरचना का विस्तार: महिला श्रम बल भागीदारी दर (Female LFPR) में सुधार हेतु राज्य को सामाजिक अवसंरचना का विस्तार करना चाहिए, जैसे सस्ती बाल देखभाल (क्रेच) सुविधाएँ एवं वृद्ध देखभाल केंद्र, ताकि महिलाओं द्वारा अवैतनिक घरेलू कार्यों में व्यय होने वाला समय कम किया जा सके।
  • न्यायिक एवं बीमा तंत्र: सभी मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) इकाइयों तथा बीमा कंपनियों के लिए स्पष्ट एवं समान दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिए, जिससे ₹30,000 मासिक न्यूनतम मानक को बिना अनावश्यक विवाद के शीघ्र एवं सुचारु रूप से लागू किया जा सके।
सर्वोच्च न्यायालय ने गृहिणियों को ‘राष्ट्र निर्माता’ के रूप में मान्यता दी

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