संदर्भ
उर्वरकों की बढ़ती कीमतें और कमजोर मानसून के पूर्वानुमान ने खरीफ 2026 सीजन से पहले भारत की कृषि उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
भारत के कृषि क्षेत्र से जुड़ी प्रमुख चिंताएँ
- उर्वरक आपूर्ति और मूल्य संबंधी तनाव: पश्चिम एशिया में तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के कारण भारत के उर्वरक आयात और घरेलू उत्पादन प्रभावित हुए हैं।
- यूरिया आयात कीमतें लगभग दोगुनी हो गईं, जबकि DAP की कीमतों में तीव्र वृद्धि हुई, जिससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ गया।
- मार्च 2026 में घरेलू यूरिया उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट आई, जिससे खरीफ तैयारी प्रभावित हुई।
- कमजोर मानसून का जोखिम: भारत मौसम विज्ञान विभाग ने दीर्घकालिक औसत के 92% के स्तर पर सामान्य से कम दक्षिण-पश्चिम मानसून का अनुमान लगाया है।
- संभावित एल नीनो परिस्थितियाँ फसल वृद्धि के महत्त्वपूर्ण समय में वर्षा की मात्रा को कम कर सकती हैं।
- धान, दालें, कपास और तिलहन जैसी वर्षा-आधारित फसलें वर्षा की अनिश्चितता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।
- खाद्य सुरक्षा और मुद्रास्फीति पर दबाव: बढ़ती उर्वरक लागत और कमजोर कृषि उत्पादन खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ा सकते हैं तथा ग्रामीण आय को प्रभावित कर सकते हैं।
- कम फसल उत्पादन से सतत् विकास लक्ष्य-2 (शून्य भुखमरी) की दिशा में भारत की प्रगति प्रभावित हो सकती है।
- आपूर्ति में कमी के कारण किसान उर्वरकों के उपयोग में कमी कर सकते हैं, जिससे उत्पादकता और खाद्यान्न उपलब्धता प्रभावित होगी।
- बढ़ता राजकोषीय बोझ: उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था के कारण वैश्विक मूल्य तनावों का भार सरकार पर स्थानांतरित हो जाता है।
- खाड़ी संकट के बढ़ने से पहले ही उर्वरक सब्सिडी बिल संशोधित अनुमानों से अधिक हो चुका था।
- यदि भू-राजनीतिक तनाव जारी रहता है, तो आयात निर्भरता राजकोषीय स्थिरता पर दबाव डाल सकती है।
कृषि संकट के कारण बनने वाले कारक
- आयातित उर्वरकों और LNG पर निर्भरता: भारत LNG और उर्वरक आयात के लिए विशेष रूप से खाड़ी देशों पर अत्यधिक निर्भर है, खासकर यूरिया और DAP के लिए।
- प्राकृतिक गैस यूरिया उत्पादन का मुख्य कच्चा माल है, जिससे घरेलू उत्पादन ऊर्जा आपूर्ति बाधाओं के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान: हॉर्मुज जलडमरूमध्य एक महत्त्वपूर्ण वैश्विक समुद्री मार्ग है, जिसके माध्यम से लगभग एक-तिहाई वैश्विक उर्वरक व्यापार होता है।
- आवागमन में बाधा से परिवहन लागत बढ़ी, आपूर्ति में देरी हुई और वैश्विक उर्वरक कीमतों में वृद्धि हुई।
- जलवायु परिवर्तनशीलता और एल नीनो: एल नीनो घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति ने मानसून की अनिश्चितता को बढ़ा दिया है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक मौसमीय घटनाओं की आवृत्ति बढ़ी है, जिससे बुवाई चक्र और फसल उत्पादन प्रभावित होता है।
- यूरिया-प्रधान कृषि पर संरचनात्मक निर्भरता: भारतीय कृषि अभी भी रासायनिक उर्वरकों और जल-गहन फसलों पर अत्यधिक निर्भर है।
- असंतुलित उर्वरक उपयोग और एकल फसल प्रणाली ने पारिस्थितिकी और आर्थिक संवेदनशीलताओं को बढ़ा दिया है।
आगे की राह
- सतत् और संतुलित कृषि को बढ़ावा देना: आयातित उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए नैनो-यूरिया, जैव उर्वरक और जैविक खेती को प्रोत्साहित किया जाए।
- कम जल-आवश्यकता और जलवायु-सहिष्णु फसलों की ओर फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जाए।
- घरेलू क्षमता और आपूर्ति शृंखला को सुदृढ़ करना: घरेलू उर्वरक उत्पादन क्षमता का विस्तार किया जाए और खाड़ी क्षेत्र से परे आयात स्रोतों का विविधीकरण किया जाए।
- महत्त्वपूर्ण कृषि इनपुट्स के लिए रणनीतिक भंडार बनाए जाएँ और लॉजिस्टिक क्षमता को मजबूत किया जाए।
- जलवायु सहनशीलता में सुधार: सिंचाई अवसंरचना, सूक्ष्म सिंचाई और जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धतियों का विस्तार किया जाए।
- जोखिम न्यूनीकरण के लिए मौसम पूर्वानुमान, फसल बीमा और किसान परामर्श तंत्र को सुदृढ़ किया जाए।
निष्कर्ष
भारत को खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका को भविष्य के तनावों से सुरक्षित रखने के लिए जलवायु-सहिष्णु कृषि, उर्वरक आत्मनिर्भरता और सतत कृषि सुधारों का समन्वय करना होगा।