संदर्भ
हाल ही में स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट (SIPRI) ने ‘डेवलपमेंट्स एंड ट्रेंड्स इन मल्टिलेटरल पीस ऑपरेशंस, 2025’ (Developments and Trends in Multilateral Peace Operations, 2025) शीर्षक से अपनी वर्ष 2026 की रिपोर्ट जारी की है।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि वित्तीय सीमाओं और महाशक्तियों के मध्य बढ़ते भू-राजनीतिक गतिरोध के दोहरे संकट के कारण वैश्विक शांति स्थापना अभियान एक गंभीर दौर से गुजर रहे हैं।
- तैनाती (Deployment) की संख्या में गिरावट: वर्ष 2025 के अंत तक, अंतरराष्ट्रीय शांति सैनिकों की संख्या घटकर लगभग 79,000 (78,633) रह गई।
- यह वर्ष 2016 के बाद से 49% की भारी गिरावट को दर्शाता है और पिछले 25 वर्षों में तैनाती का सबसे निचला स्तर है।
- शांति अभियानों का घटता दायरा : सक्रिय शांति मिशनों की कुल संख्या घटकर 34 देशों में 58 रह गई है।
- वर्ष 2016 के बाद यह पहली बार है, जब सक्रिय शांति अभियानों की संख्या 60 से नीचे पहुँच गई है।
- उच्च भौगोलिक संकेंद्रण : शांति सैनिकों का वितरण समान रूप से नहीं है।
- दुनिया भर के कुल कर्मियों का लगभग तीन-चौथाई (75%) हिस्सा केवल पाँच संघर्ष क्षेत्रों में तैनात है- दक्षिण सूडान, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, सोमालिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) और लेबनान।
ऐतिहासिक और परिचालन पृष्ठभूमि
- उत्पत्ति: संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना (UN Peacekeeping) की शुरुआत वर्ष 1948 में मिडिल ईस्ट में युद्धविराम की निगरानी के लिए संयुक्त राष्ट्र ट्रूस सुपरविजन ऑर्गनाइजेशन (UNTSO) की स्थापना के साथ हुई थी।

- तीन मार्गदर्शक सिद्धांत: सभी शांति अभियानों को अनिवार्य रूप से तीन बुनियादी नियमों का कड़ाई से पालन करना होता है:
- संघर्ष में शामिल मुख्य पक्षों की सहमति होना अनिवार्य है।
- अभियान को बिना किसी भेदभाव के पूरी तरह निष्पक्ष रहना होगा।
- आत्मरक्षा और मिशन के लक्ष्यों की रक्षा को छोड़कर, बल का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
- तैनाती का ढाँचा: संयुक्त राष्ट्र (UN) की अपनी कोई स्थायी सेना (Standing military) नहीं होती है।
- शांति स्थापना अभियानों को विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) द्वारा अधिकृत और नियंत्रित किया जाता है। ये अभियान पूरी तरह से सदस्य देशों द्वारा स्वेच्छा से भेजी गई सेना और पुलिस टुकड़ियों पर निर्भर करते हैं।
PWOnlyIAS विशेष
प्रमुख ऐतिहासिक और सक्रिय शांति मिशन
- UNMOGIP (भारत और पाकिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह): यह मिशन जम्मू और कश्मीर में युद्धविराम की निगरानी के लिए वर्ष 1949 में शुरू किया गया था; यह आज भी संयुक्त राष्ट्र के सबसे पुराने सक्रिय मिशनों में से एक है।
- UNMISET (पूर्वी तिमोर में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन): स्वतंत्रता के बाद वहाँ सरकारी संस्थानों के निर्माण में सहायता करने के लिए इस मिशन ने वर्ष 2002 से 2005 तक कार्य किया।
- UNMIL (लाइबेरिया में संयुक्त राष्ट्र मिशन): सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने, सैनिकों के निशस्त्रीकरण और लोकतांत्रिक संक्रमण (Democratic transitions) में सहायता के लिए इस मिशन ने वर्ष 2003 से 2018 तक कार्य किया।
- MINUSTAH (हैती में संयुक्त राष्ट्र स्थिरता मिशन): हैती में राजनीतिक स्थिरता और सार्वजनिक व्यवस्था बहाल करने के लिए इस मिशन का संचालन वर्ष 2004 से 2017 तक किया गया था।
- MINURCAT (मध्य अफ्रीकी गणराज्य और चाड में संयुक्त राष्ट्र मिशन): शरणार्थियों और संवेदनशील नागरिक आबादी की सुरक्षा के लिए इस मिशन ने वर्ष 2007 से 2010 तक कार्य किया।
भारत की प्रासंगिकता और योगदान
- ऐतिहासिक विरासत: संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों की शुरुआत से ही भारत इसमें संचयी रूप से सबसे बड़े सैन्य योगदानकर्ताओं में से एक रहा है। भारत ने विश्व भर में 50 से अधिक मिशनों में भाग लिया है।
- उच्च परिचालन हिस्सेदारी: भारत के हजारों शांति सैनिक [जिन्हें ‘ब्लू हेलमेट” (Blue Helmets) कहा जाता है] वर्तमान में SIPRI रिपोर्ट में रेखांकित किए गए प्रमुख वैश्विक संघर्ष क्षेत्रों में तैनात हैं, जिनमें UNMISS (दक्षिण सूडान) और UNIFIL (लेबनान) शामिल हैं।
- लैंगिक समानता का नेतृत्व: भारत ने वर्ष 2007 में लाइबेरिया में पहली पूर्ण-महिला पुलिस इकाई की तैनाती करके इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाई थी।
- हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने भारतीय शांति सैनिक मेजर अभिलाषा बराक को प्रतिष्ठित ‘यूएन मिलिट्री जेंडर एडवोकेट ऑफ द ईयर’ पुरस्कार से सम्मानित किया, जो ‘महिला, शांति और सुरक्षा’ (Women, Peace, and Security) पहलों में भारत की अग्रणी भूमिका को उजागर करता है।
- वायस ऑफ ग्लोबल साउथ : जैसा कि SIPRI ने रेखांकित किया है, भारत उन विकासशील देशों में अग्रणी है, जो इन अभियानों में सर्वाधिक भौतिक जोखिम उठाते हैं। यही कारण है कि भारत, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में संरचनात्मक सुधारों तथा अधिक न्यायसंगत निर्णय लेने की शक्तियों का एक प्रमुख समर्थक रहा है।
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शांति स्थापना अभियानों के समक्ष मुख्य चुनौतियाँ
- वित्त की कमी: अमेरिका जैसे प्रमुख दाता देशों द्वारा अपनी प्रतिबद्ध वित्तीय हिस्सेदारी का भुगतान न किए जाने के कारण यह संकट उपजा है।
- इसके कारण वर्ष 2024-25 के लिए संयुक्त राष्ट्र के $5.6 बिलियन के शांति स्थापना बजट में $2 बिलियन की अत्यधिक कमी हुई है, जिससे मजबूरन शांति सैनिकों की संख्या में बड़ी कटौती करनी पड़ी है।
- भू-राजनीतिक गतिरोध: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के स्थायी सदस्यों (P5) के कड़े रुख और वीटो (Veto) की धमकियों के कारण शांति मिशनों के जनादेश का नवीनीकरण करना बेहद कठिन हो गया है।
- उदाहरण के लिए: अमेरिका के भारी दबाव के कारण लेबनान में संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल (UNIFIL) को समाप्त करने की स्थिति बन गई थी, जिसके बाद एक समझौते के तहत सुरक्षा परिषद ने इस मिशन को अंतिम बार केवल दिसंबर 2026 तक के लिए नवीनीकृत किया है।
- क्षेत्रीय मिशनों के वित्त में कटौती: बदलती राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण पश्चिमी देश और संगठन, अब इन मिशनों से अपना वित्तीय समर्थन वापस ले रहे हैं।
- उदाहरण के लिए: यूरोपीय संघ (EU) ने अफ्रीका में लंबे समय से चल रहे शांति अभियानों से अपने यूरोपीय शांति सुविधा (EPF) निधि को हस्तांतरित कर, इसे यूक्रेन और पश्चिम एशिया को प्राथमिकता देने के लिए आवंटित कर दिया है।
- तदर्थ (AdHoc) हस्तक्षेपों का बढ़ना: संयुक्त राष्ट्र (UN) में जारी गतिरोध के कारण, मध्यवर्ती शक्तियाँ (जैसे- यू.ए.ई.) तेजी से द्विपक्षीय सैन्य समझौते कर रही हैं।
- ये समझौते दीर्घकालिक शांति की स्थापना करने के बजाय तात्कालिक और अल्पकालिक सुरक्षा उपायों पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं।
- ग्लोबल साउथ पर असमान दबाव: यह रिपोर्ट एक गंभीर व्यवस्थागत असंतुलन को उजागर करती है, जहाँ शीर्ष 10 सैन्य योगदानकर्ता देशों में (भारत सहित) सभी देश ग्लोबल साउथ (विकासशील देश) से हैं, जबकि अमीर पश्चिमी देश मुख्य रूप से इन मिशनों के जनादेश तय करते हैं और वित्तीय नियंत्रण अपने हाथों में रखते हैं।
आगे की राह
- अनुमानित और सुरक्षित वित्तपोषण: सदस्य देशों को केवल मौखिक समर्थन देने से आगे बढ़कर स्थायी और गारंटीकृत वित्तपोषण सुनिश्चित करना होगा, ताकि मिशनों को आकस्मिक रूप से बंद होने से बचाया जा सके।
- समान उत्तरदायित्व-साझाकरण: विकसित देशों को भी इन अभियानों के भौतिक जोखिमों को साझा करने की आवश्यकता है। उन्हें ग्लोबल साउथ की भारी सैन्य प्रतिबद्धताओं के अनुपात में अपने स्वयं के सैनिकों को भी शांति मिशनों में भेजना चाहिए।
- मजबूत क्षेत्रीय सहयोग: तेजी से बदलते वैश्विक सुरक्षा खतरों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) को क्षेत्रीय संगठनों (जैसे- अफ्रीकी संघ) के साथ मजबूत साझेदारी का निर्माण करना चाहिए।
निष्कर्ष
पारंपरिक संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में निरंतर आ रही गिरावट यह दर्शाती है कि देश अब साझा वैश्विक संघर्ष प्रबंधन से विमुख हो रहे हैं। सतत् वित्तपोषण, संरचनात्मक सुधारों और महाशक्तियों के मध्य आम सहमति के अभाव में, वैश्विक सुरक्षा ढाँचे का यह पतन अंततः निर्दोष नागरिकों को युद्ध की विभीषिका झेलने के लिए विवश कर देगा।