भारत में ‘डिजाइनर राइस’ का विकास

23 Apr 2026

संदर्भ

केरल के तिरुवनंतपुरम् स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय अंतःविषय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (NIIST) के वैज्ञानिकों ने “’डिजाइनर राइस’” विकसित किया है।

संबंधित तथ्य

  • हाल ही में आयोजित “CSIR-NIIST टेक कनेक्ट: लैब से बाजार तक” शीर्षक वाले प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समारोह के दौरान इस चावल को आधिकारिक रूप से प्रस्तुत किया गया।
  • इस प्रौद्योगिकी को टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड तथा एसएस सोल फूड्स, तमिलनाडु को भी आधिकारिक रूप से हस्तांतरित किया गया।

डिजाइनर राइस’ के बारे में

  • ‘डिजाइनर राइस’ एक पुनर्विकसित चावल का दाना है, जिसे टूटे हुए चावल को आटे में परिवर्तित करके, उसमें प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों से समृद्ध कर, पुनः ऐसे दानों के रूप में ढाला जाता है जो स्वाद, बनावट और रूप में प्राकृतिक चावल के समान होते हैं।

डिजाइनर राइस’ से संबद्ध प्रौद्योगिकी

एक्सट्रूजन (Extrusion) प्रौद्योगिकी 

  • ‘डिजाइनर राइस’ का उत्पादन एक्सट्रूजन प्रौद्योगिकी का उपयोग करके किया जाता है, जो एक आधुनिक खाद्य-प्रसंस्करण तकनीक है, जिसके माध्यम से खाद्य पदार्थों को आवश्यक आकार में पुनर्गठित किया जा सकता है।
  • इस प्रक्रिया में, टूटे हुए चावल के दानों को पहले बारीक आटे में परिवर्तित किया जाता है, जो मूल सामग्री के रूप में कार्य करता है।
  • इसके बाद इस चावल के आटे को प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों के मिश्रण जैसे-आयरन, फोलिक अम्ल और विटामिन B12 के साथ समान रूप से मिलाया जाता है, जिससे इसका पोषण मूल्य बढ़ाया जा सके।
  • इसके पश्चात् इस सुदृढ़ मिश्रण को नियंत्रित तापमान और दाब के अंतर्गत एक्सट्रूडर मशीन में रखा जाता है, जो इसे प्राकृतिक चावल के समान दानों के रूप में ढाल देता है।
  • अंतिम उत्पाद को सुखाया और संसाधित किया जाता है, ताकि यह पारंपरिक चावल की बनावट, रूप और पकाने के व्यवहार के समान हो ।

डिजाइनर राइस’ की प्रमुख विशेषताएँ

  • गैर-आनुवंशिक रूप से परिवर्तित नवाचार: ‘डिजाइनर राइस’ का विकास आनुवंशिक संशोधन के बजाय खाद्य-प्रसंस्करण के माध्यम से किया जाता है, जिससे उपभोक्ताओं की स्वीकार्यता अधिक होती है और आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों से संबंधित चिंताओं से बचा जा सकता है।
    • उदाहरण के लिए, यह फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों के समान है, जहाँ बिना फसल की आनुवंशिक संरचना को बदले इसे पोषक तत्त्व से समृद्ध किया जाता है।
  • उच्च प्रोटीन सामग्री: ‘डिजाइनर राइस’ में 20 प्रतिशत से अधिक प्रोटीन होता है, जबकि सामान्य चावल में 6–8 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है, जिससे यह चावल-आधारित खाद्यान्न पर निर्भर जनसंख्या में प्रोटीन की कमी को दूर करने में सहायक है।
  • आवश्यक पोषक तत्त्वों से सुदृढ़ीकृत: यह चावल आयरन, फोलिक अम्ल और विटामिन B12 जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्त्वों से समृद्ध होता है, जो रक्ताल्पता को कम करने और समग्र पोषण स्तर में सुधार करने में सहायक है।
  • निम्न ग्लाइसेमिक सूचकांक: ‘डिजाइनर राइस’ का ग्लाइसेमिक सूचकांक 55 से कम होता है, जिसका अर्थ है कि यह रक्त में ग्लूकोज को धीरे-धीरे उत्सर्जित करता है और रक्त शर्करा के स्तर में अचानक वृद्धि को रोकने में सहायक होता है।
    • यह जई और मोटे अनाज जैसे निम्न ग्लाइसेमिक सूचकांक वाले खाद्य पदार्थों के समान है, जिन्हें मधुमेह रोगियों और भार प्रबंधन के लिए अनुशंसित किया जाता है।

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डिजाइनर राइस’ के लाभ

  • सतत् एवं समावेशी पोषण का समर्थन: टूटे हुए चावल (एक उप-उत्पाद) के उपयोग द्वारा यह चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है और खाद्य अपव्यय को कम करता है।
    • यह भारत जैसे विकासशील देशों में कुपोषण के लिए एक किफायती और विस्तार योग्य समाधान भी प्रदान करता है।
  • बेहतर चयापचय संबंधी स्वास्थ्य को बढ़ावा: इसके कम ग्लाइसेमिक सूचकांक (GI) और उच्च पोषक तत्त्व से युक्त होने के कारण यह इंसुलिन संवेदनशीलता तथा समग्र चयापचय स्वास्थ्य में सुधार का समर्थन करता है।
    • यह भार प्रबंधन और जीवनशैली संबंधी रोगों की रोकथाम में सहायक हो सकता है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए उपयुक्त: इसे मध्याह्न भोजन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) तथा अन्य कल्याणकारी योजनाओं में प्रभावी रूप से शामिल किया जा सकता है, जिससे बड़े स्तर पर पोषण में सुधार की आशा है।
    • यह आहार की आदतों में परिवर्तन किए बिना बेहतर पोषक तत्त्वों का सेवन सुनिश्चित करता है।
  • रक्ताल्पता से निपटने में सहायक: इसमें आयरन और फोलिक अम्ल की उपस्थिति प्रत्यक्ष तौर पर रक्ताल्पता को कम करने में योगदान देती है।
    • यह विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के लिए उपयोगी है, जो आयरन की कमी के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

डिजाइनर राइस’ की सीमाएँ

  • उच्च लागत और वहनीयता की समस्या: डिजाइनर राइस’ के उत्पादन में उन्नत प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी का उपयोग होता है, जिससे यह पारंपरिक चावल की तुलना में, विशेषकर प्रारंभिक चरणों में, अधिक महँगा हो जाता है।
    • यह कम आय वर्ग के लोगों के लिए इसकी उपलब्धता को सीमित कर सकता है, जो पोषण हस्तक्षेप का मुख्य लक्ष्य समूह हैं।
    • सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के अंतर्गत वितरित सब्सिडी युक्त चावल की तुलना में यह प्रारंभ में महँगा हो सकता है, जिससे इसे बड़े पैमाने पर अपनाने में बाधा आ सकती है।
  • उपभोक्ता जागरूकता और स्वीकार्यता की कमी: अनेक उपभोक्ता प्रसंस्कृत या फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों के बारे में जागरूकता की कमी और भ्रांतियों के कारण इसे अपनाने में संकोच कर सकते हैं।
    • पारंपरिक और प्राकृतिक अनाजों के प्रति सांस्कृतिक प्राथमिकता भी इसकी स्वीकार्यता को धीमा कर सकती है।
    • इसी प्रकार का प्रतिरोध प्रारंभ में आयोडीन युक्त नमक और फोर्टिफाइड गेहूँ के आटे के संदर्भ में में भी देखा गया था।
  • उत्पादन के विस्तार में चुनौतियाँ: बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए विशेष अवसंरचना, मशीनरी (एक्सट्रूडर) और कुशल श्रमबल की आवश्यकता होती है, जो आसानी से उपलब्ध नहीं हो सकते हैं।
    • राष्ट्रीय माँग को पूरा करने हेतु उत्पादन क्षमता का विस्तार करने के लिए महत्त्वपूर्ण निवेश और समन्वय की आवश्यकता होगी।
    • निरंतर आपूर्ति के लिए विभिन्न राज्यों में एक्सट्रूजन इकाइयों की स्थापना पूँजी-गहन हो सकती है।
  • नीतिगत और नियामक अंतराल: डिजाइनर राइस’ के लिए स्पष्ट नियामक मानक, गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र और लेबलिंग दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है।
    • स्पष्ट नीतियों के अभाव में इसे सरकारी पोषण कार्यक्रमों में शामिल करने में देरी हो सकती है।
    • फोर्टिफाइड राइस’ के विपरीत, जिसके लिए नियामक मानक निर्धारित हैं, डिजाइनर राइस’ के लिए अभी मानकीकृत दिशा-निर्देश आवश्यक हैं।
  • मौजूदा सुदृढ़ीकरण कार्यक्रमों के साथ अतिव्यापन: डिजाइनर राइस’ को मौजूदा फोर्टिफाइड राइस’ कार्यक्रमों से प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ सकता है, जो पहले से बड़े पैमाने पर लागू हैं।
    • यह नीतिगत समस्या और कुपोषण से निपटने के प्रयासों में दोहराव उत्पन्न कर सकता है।
    • सरकारी योजनाओं को यह निर्णय लेना पड़ सकता है कि वर्तमान मॉडल जारी रखें या डिजाइनर राइस’ की ओर स्थानांतरित हों।
  • प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी पर निर्भरता: इसका उत्पादन एक्सट्रूडर और निरंतर प्रसंस्करण प्रणालियों जैसी उन्नत मशीनरी पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे यह प्रौद्योगिकी-गहन बन जाता है।
    • मशीनरी या आपूर्ति शृंखला में किसी भी बाधा से उत्पादन की निरंतरता प्रभावित हो सकती है।
    • ग्रामीण या लघु मिलें उच्च लागत और तकनीकी आवश्यकताओं के कारण इन तकनीकों को आसानी से अपनाने में सक्षम नहीं हो सकती हैं।
  • दीर्घकालिक प्रभाव संबंधी सीमित आँकड़े: चूँकि डिजाइनर राइस’ एक अपेक्षाकृत नया नवाचार है, इसके स्वास्थ्य प्रभावों पर दीर्घकालिक नैदानिक और जनसंख्या-स्तरीय प्रमाण सीमित हैं।
    • नीति-निर्माता इसके व्यापक उपयोग को लेकर सावधानी बरत सकते हैं, जब तक कि प्रभावशीलता और सुरक्षा पर पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध न हों।
    • बड़े पैमाने के पोषण हस्तक्षेपों के लिए सामान्यतः कई वर्षों के मैदानी आँकड़ों की आवश्यकता होती है।
  • पोषक तत्त्वों की स्थिरता और भंडारण अवधि संबंधी चिंताएँ: विटामिन B12 और फोलिक अम्ल जैसे जोड़े गए पोषक तत्त्वों की भंडारण, परिवहन और पकाने के दौरान स्थिरता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
    • समय के साथ पोषक तत्त्वों की हानि अपेक्षित स्वास्थ्य लाभों को कम कर सकती है।
    • इसी प्रकार की समस्याएँ फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों में भी देखी जाती हैं, जहाँ अनुचित भंडारण से सूक्ष्म पोषक तत्त्वों का क्षरण होता है।

आगे की राह

  • कल्याणकारी योजनाओं के साथ एकीकरण: डिजाइनर राइस’ को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), एकीकृत बाल विकास सेवाएँ (ICDS) तथा मध्याह्न भोजन योजनाओं में क्रमिक रूप से शामिल किया जाना चाहिए, ताकि बड़े स्तर पर पोषण परिणामों में सुधार हो सके।
    • यह सुनिश्चित करेगा कि संवेदनशील वर्गों को उनके मुख्य आहार में परिवर्तन किए बिना उन्नत पोषण प्राप्त हो।
    • फोर्टिफाइड राइस’ की तरह इसे स्कूली बच्चों और कम आय वाले परिवारों को भी उपलब्ध कराया जा सकता है।
  • जन-जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन अभियान: डिजाइनर राइस’ के स्वास्थ्य लाभ, सुरक्षा तथा गैर-आनुवंशिक रूप से परिवर्तित प्रकृति के बारे में जनता को शिक्षित करना आवश्यक है, ताकि विश्वास और स्वीकार्यता विकसित हो सके।
    • जागरूकता अभियान प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से संबंधित भ्रांतियों को दूर करने में सहायक होंगे।
    • आयोडीन युक्त नमक के लिए चलाए गए अभियानों की तरह, निरंतर प्रयासों से व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त की जा सकती है।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को सुदृढ़ करना: अनुसंधान संस्थानों और निजी कंपनियों (जैसे टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड) के बीच सहयोग से उत्पादन, वितरण और वाणिज्यीकरण को बढ़ाया जा सकता है।
    • PPP मॉडल प्रभावी आपूर्ति शृंखला और बाजार विस्तार सुनिश्चित कर सकते हैं।
    • निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता खाद्य प्रसंस्करण और राष्ट्रीय स्तर पर लॉजिस्टिक्स उपलब्धता को तीव्र कर सकती है।
  • लागत में कमी और वहनीयता उपाय: उत्पादन प्रौद्योगिकी का अनुकूलन और मानदंड आधारित अर्थव्यवस्थाओं को प्राप्त कर लागत को कम करने के प्रयास किए जाने चाहिए।
    • सरकार द्वारा सब्सिडी या प्रोत्साहन प्रदान किए जा सकते हैं, ताकि यह कम आय वर्ग के लिए सुलभ हो सके।
    • फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों में भी बड़े पैमाने पर उत्पादन और नीतिगत समर्थन से लागत में कमी की गई है।
  • निरंतर अनुसंधान और नवाचार: डिजाइनर राइस’ के पोषणीय संरचना, स्वाद और भंडारण अवधि में सुधार हेतु सतत् अनुसंधान आवश्यक है।
    • इसे क्षेत्रीय आहार प्राथमिकताओं और पोषण आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलित किया जाना चाहिए।
    • भविष्य में इसमें जिंक या विटामिन A जैसे अतिरिक्त पोषक तत्त्व भी शामिल किए जा सकते हैं।
  • स्पष्ट नियामक ढाँचे का विकास: सरकार को मानक, गुणवत्ता नियंत्रण मानदंड और लेबलिंग दिशा-निर्देश स्थापित करने चाहिए, ताकि उत्पादन में सुरक्षा और एकरूपता सुनिश्चित हो सके।
    • यह उपभोक्ता विश्वास बढ़ाएगा और बड़े पैमाने पर अपनाने को सुगम बनाएगा।
    • इसी प्रकार के ढाँचे फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों के लिए पहले से मौजूद हैं।
  • आपूर्ति शृंखला और अवसंरचना को सुदृढ़ करना: टूटे हुए चावल की प्रभावी खरीद, प्रसंस्करण इकाइयाँ, भंडारण तथा वितरण नेटवर्क विकसित किए जाने चाहिए, ताकि निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित हो सके।
    • आधुनिक खाद्य प्रसंस्करण अवसंरचना में निवेश राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार के लिए आवश्यक है।
    • चावल उत्पादक क्षेत्रों के निकट एक्सट्रूजन इकाइयों की स्थापना से लॉजिस्टिक लागत कम होगी और दक्षता बढ़ेगी।
  • पायलट परियोजनाएँ और साक्ष्य-आधारित विस्तार: राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने से पहले चयनित क्षेत्रों में पायलट परियोजनाएँ संचालित की जानी चाहिए, ताकि प्रभावशीलता, स्वीकार्यता और स्वास्थ्य प्रभाव का मूल्यांकन किया जा सके।
    • इनसे प्राप्त आँकड़े नीतिगत निर्णयों और विस्तार रणनीतियों को दिशा देंगे।
    • मध्याह्न भोजन योजनाओं के अंतर्गत चयनित जिलों में डिजाइनर राइस’ का उपयोग कर पोषण स्तर में सुधार का आकलन किया जा सकता है।

डिजाइनर राइस’ बनाम ‘फोर्टिफाइड राइस’

गुण डिजाइनर राइस’ फोर्टिफाइड राइस’
प्रकृति पुनर्निर्मित दाना पोषक तत्त्वों से युक्त सामान्य चावल
पोषक तत्त्व का प्रकार गौण + सूक्ष्म पोषक तत्त्व मुख्यतः सूक्ष्म पोषक तत्त्व
प्रोटीन की मात्रा अधिक (~20%) सामान्य
ग्लाइसेमिक सूचकांक कम सामान्यतः अधिक
प्रक्रिया पूर्ण दाना पुनर्गठन फोर्टिफाइड दानों का मिश्रण है
उद्देश्य समग्र पोषण सूक्ष्म पोषक तत्त्व की पूरकता।

धान की खेती के लिए कृषि-जलवायवीय परिस्थितियाँ

  • जलवायु आवश्यकताएँ: धान के उचित विकास और वृद्धि के लिए गर्म एवं आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है।
    • 20°C से 37.5°C का तापमान उत्तम उत्पादन के लिए आदर्श माना जाता है।

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  • जल उपलब्धता: यह फसल प्रचुर जल आपूर्ति की माँग करती है, इसलिए यह अधिक वर्षा या सुनिश्चित सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।
    • विकास और पुष्पन चरण के दौरान निरंतर जल उपलब्धता अत्यंत आवश्यक होती है।
  • मृदा परिस्थितियाँ: धान जलोढ़ मृदा में सर्वाधिक अच्छी तरह से विकसित होता है, जो पोषक तत्त्वों से समृद्ध होती है और नदियों द्वारा लाई गई गाद द्वारा निर्मित होती है।
    • नदीय बाढ़ के मैदान, उर्वर मृदा और जल उपलब्धता के कारण धान उत्पादन के लिए अत्यंत उपयुक्त क्षेत्र हैं।
  • फसल ऋतुएँ: धान मुख्यतः खरीफ ऋतु (दक्षिण-पश्चिम मानसून) में उगाया जाता है।
    • यह रबी ऋतु (शीत-बसंत) में भी उन क्षेत्रों में उगाया जाता है, जहाँ पर्याप्त सिंचाई सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं।
  • मौसम के आधार पर धान की किस्में
    • औस (शरद फसल)
      • मानसून से पहले बोई जाती है और जल्दी कटाई की जाती है।
      • मुख्यतः पूर्वी भारत में उगाई जाती है।
    • अमन (शीतकालीन फसल)
      • यह मुख्य धान फसल है, जो मानसून ऋतु में उगाई जाती है।
      • यह वर्षा पर अत्यधिक निर्भर होती है।
    • बोरो (ग्रीष्मकालीन फसल)
      • शीत ऋतु में उगाई जाती है और ग्रीष्म ऋतु में कटाई होती है।
      • इसके लिए सिंचाई सुविधा आवश्यक होती है।
  • धान उत्पादन के अनुमान: जनवरी 2026 तक लगभग 150 मिलियन मीट्रिक टन धान उत्पादन के साथ, भारत 145.28 मिलियन टन उत्पादन करने वाले चीन को पीछे छोड़ते हुए वर्ष 2024-25 में विश्व का सबसे बड़ा धान उत्पादक देश बन गया है।

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