संदर्भ
पंजाब में कृषि वैज्ञानिकों ने वर्ष 2026 के धान रोपाई मौसम से पूर्व किसानों को ‘पैडी ड्वार्फिंग डिजीज’ (Paddy Dwarfing Disease) के बार-बार फैलने को लेकर चेतावनी दी है।
‘पैडी ड्वार्फिंग डिजीज’ (Paddy Dwarfing Disease)
- पैडी ड्वार्फिंग डिजीज धान में होने वाला एक विषाणुजनित रोग है, जो सदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस (SRBSDV) से संबंधित है और पंजाब में पहली बार वर्ष 2022 में रिपोर्ट किया गया था।
- विषाणु कारण: यह रोग सदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस के कारण होता है, जो धान के पौधों को प्रभावित करता है और उनकी वृद्धि तथा दाना निर्माण प्रक्रिया को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
- कीट वाहक: यह वायरस व्हाइट-बैक्ड प्लांट हॉपर नामक कीट के माध्यम से फैलता है, जो संक्रमित पौधों से स्वस्थ पौधों में संक्रमण का प्रसार करता है।
- स्थायी संचरण: एक बार कीट इस वायरस को प्राप्त कर लेता है, तो वह अपने पूरे जीवन चक्र के दौरान संक्रामक बना रहता है, जिससे व्यापक प्रसार की संभावना बढ़ जाती है।
- वैकल्पिक आश्रय: यह कीट खेतों और जल मार्गों के पास मौजूद खरपतवार और घास आधारित पौधों पर जीवित रहता है, जिससे यह रोग हर मौसम में पुनः उभरने में सक्षम होता है।
धान की कृषि पर प्रभाव
- गंभीर उपज हानि: सामान्यतः पंजाब में धान की उपज 30–32 क्विंटल प्रति एकड़ होती है, लेकिन गंभीर रूप से प्रभावित खेतों में कुछ मामलों में केवल 1–2 क्विंटल ही उत्पादन हुआ।
- फसल की वृद्धि अवरुद्ध होना: संक्रमित पौधे छोटे और कमजोर हो जाते हैं, जिनकी पत्तियाँ सँकरी और जड़ें उथली होती हैं; पौधों की ऊँचाई स्वस्थ पौधों की तुलना में एक-तिहाई तक रह जाती है।
- दाने की गुणवत्ता में कमी: गंभीर रूप से संक्रमित फसलें दाने का निर्माण नहीं कर पातीं या दाने की गुणवत्ता में कमी आती है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान होता है।
- पंजाब में प्रसार: यह रोग पटियाला, फतेहगढ़ साहिब, रूपनगर, होशियारपुर, पठानकोट और शहीद भगत सिंह नगर जैसे जिलों में हजारों हेक्टेयर क्षेत्र को प्रभावित कर चुका है।
- आजीविका पर प्रभाव: लक्षण रोपाई के लगभग एक महीने बाद दिखाई देते हैं, जिससे किसानों के पास पुनः रोपाई के लिए बहुत कम समय बचता है और उन्हें भारी वित्तीय हानि का सामना करना पड़ता है।
धान की कृषि
- धान की कृषि (Paddy Farming) का अर्थ चावल की खेती से है, जो एक मुख्य खाद्य फसल है और मुख्यतः उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाई जाती है।
- भारत विश्व का सबसे बड़ा चावल उत्पादक है, जिसमें प्रमुख उत्पादक राज्य शामिल हैं: उत्तर प्रदेश (सर्वाधिक), तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु।
- अनुकूल परिस्थितियाँ
- जलवायु: गर्म और आर्द्र जलवायु, धान की कृषि के लिए उपयुक्त होती है।
- तापमान: वृद्धि अवधि के दौरान लगभग 20°C–35°C तापमान आवश्यक होता है।
- वर्षा: लगभग 100–200 सेमी. वार्षिक वर्षा या सुनिश्चित सिंचाई आवश्यक है।
- मृदा का प्रकार: उपजाऊ जलोढ़ या चिकनी मृदा, जिसमें उच्च जल धारण क्षमता हो, सबसे उपयुक्त होती है।
- जल आवश्यकता: खेतों में स्थिर जल आवश्यक होता है, विशेषकर रोपाई और वृद्धि चरणों के दौरान।
- पारंपरिक धान खेती के चरण
- नर्सरी बुवाई: धान के बीज पहले नर्सरी में उगाए जाते हैं।
- रोपाई: 3–4 सप्ताह बाद पौधों को पानी से भरे खेतों में प्रत्यारोपित किया जाता है।
- सिंचाई और निराई: खेतों को जलभराव की स्थिति में रखा जाता है तथा खरपतवारों को समय-समय पर हटाया जाता है।
- कटाई: परिपक्व फसल को हँसिया (sickle) से हाथ से काटा जाता है।
- थ्रेशिंग: दानों को तनों से अलग कर साफ किया जाता है और भंडारण से पहले तैयार किया जाता है।
|
रोकथाम के उपाय
- प्रारंभिक निगरानी: विशेषज्ञों ने नर्सरी और प्रारंभिक अवस्था के खेतों का नियमित निरीक्षण करने की सलाह दी है, क्योंकि संक्रमण नर्सरी चरण से ही शुरू हो जाता है।
- कीट नियंत्रण: किसानों को व्हाइट-बैक्ड प्लांट हॉपर के प्रकोप की निगरानी करनी चाहिए, इसके लिए पौधों को पानी की सतह पर तैरते कीटों का अवलोकन किया जाता है।
- लाइट ट्रैप: रात के समय नर्सरी और खेतों के पास पीली रोशनी वाले बल्ब लगाने से कीटों की संख्या का प्रारंभिक पता लगाने और नियंत्रण में सहायता मिलती है।
- खेत की स्वच्छता: मेड़ों और सिंचाई की नालियों से खरपतवार और वैकल्पिक घासीय पौधों को हटाना कीटों के प्रजनन और रोग के प्रसार को कम करता है।
- समय पर रोपाई: कृषि वैज्ञानिकों ने 20 से 25 जून के बीच अनुशंसित रोपाई कार्यक्रम का पालन करने की सलाह दी है, ताकि कीटों की वृद्धि के संपर्क को कम किया जा सके।
- वैज्ञानिक कीटनाशक उपयोग: पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) द्वारा अनुशंसित कीटनाशकों का उपयोग कीट के पता चलते ही करना चाहिए, ताकि रोग के प्रसार को सीमित किया जा सके।
निष्कर्ष
प्रारंभिक निगरानी, कीट नियंत्रण और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ धान के ड्वार्फिंग डिजीज की रोकथाम और पंजाब की चावल उत्पादकता की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।