संदर्भ
केंद्र ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि उत्तराखंड के ऊपरी गंगा बेसिन में किसी भी नई जलविद्युत परियोजना की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मुद्दा
- ऊपरी गंगा बेसिन में जलविद्युत परियोजनाओं की समीक्षा: सर्वोच्च न्यायालय वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद से अलकनंदा और भागीरथी बेसिन में जलविद्युत परियोजनाओं के पारिस्थितिकी प्रभाव की समीक्षा कर रहा है।
- केंद्र का रुख: केंद्र सरकार ने कहा कि पहले से चालू हो चुकीं या उन्नत चरणों में पहुँच चुकी सात परियोजनाओं को छोड़कर किसी भी नई जलविद्युत परियोजना की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
पर्यावरणीय प्रवाह (E-Flows) के बारे में
पर्यावरणीय प्रवाह से तात्पर्य जल के प्रवाह की उस मात्रा, गुणवत्ता और समय से है जो नदी पारिस्थितिकी तंत्र, जैव विविधता और उस पर निर्भर मानव आजीविका को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
पर्यावरणीय प्रवाह के घटक
- अंतःप्रवाह (Instream Flows): अंतःप्रवाह, नदियों और धाराओं के भीतर बनाए रखे जाने वाले जल प्रवाह हैं, जो जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और प्रक्रियाओं का समर्थन करते हैं।
- मीठे जल का अंतर्वाह (Freshwater Inflows): मीठे जल के अंतर्वाह वे प्रवाह हैं, जो ज्वारनदमुख (Estuaries) और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र तक पहुँचते हैं, जिससे लवणता संतुलन और समुद्री जैव विविधता को बनाए रखने में मदद मिलती है।
- निर्वाह प्रवाह (Subsistence Flows): निर्वाह प्रवाह सूखे की स्थिति के दौरान होने वाले बहुत कम प्रवाह होते हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र के न्यूनतम अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं।
- पल्स प्रवाह (Pulse Flows): पल्स प्रवाह भारी बारिश के कारण होने वाली अल्पकालिक उच्च-प्रवाह घटनाएँ हैं, जो पोषक तत्त्वों के परिवहन और तलछट के संचलन में सहायता करती हैं।
- आधार प्रवाह (Base Flows): आधार प्रवाह नियमित प्रवाह स्तर होते हैं, जो वर्ष के अधिकांश समय बने रहते हैं, जिससे सामान्य नदीय पारिस्थितिकी को बनाए रखा जाता है।
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केंद्र के निर्णय के पीछे के कारण
- हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिकी संवेदनशीलता: केंद्र ने रेखांकित किया कि ऊपरी गंगा बेसिन भू-गर्भीय रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में स्थित है, जो भूस्खलन, भूकंप और अचानक आने वाली बाढ़ (फ्लैश फ्लड) के प्रति संवेदनशील है।
- गंगा की शीर्षधाराओं (Headstreams) का महत्त्व: अलकनंदा और भागीरथी नदियाँ महत्त्वपूर्ण शीर्षधाराएँ हैं, जो गंगा नदी प्रणाली में जैव विविधता, पोषक तत्त्वों के प्रवाह और पारिस्थितिकी संतुलन का समर्थन करती हैं।
- पर्यावरणीय प्रवाह (e-flow) बनाए रखने की आवश्यकता: सरकार ने इस बात पर जोर दिया कि जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और नदी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए नदी का निर्बाध प्रवाह आवश्यक है।
- गंगा का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व: गंगा अत्यधिक धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व रखती है, जिसके लिए विशेष पारिस्थितिकी सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है।
- संचयी पर्यावरणीय प्रभाव: केंद्र ने तर्क दिया कि पिछली विशेषज्ञ रिपोर्टों ने कई जलविद्युत परियोजनाओं के संयुक्त पारिस्थितिकी प्रभाव को कम करके आँका था।
ऊपरी गंगा बेसिन में जलविद्युत परियोजनाओं के बारे में
- मौजूदा स्वीकृत परियोजनाएँ: टिहरी चरण-II और तपोवन विष्णुगाड सहित सात परियोजनाओं को पर्याप्त भौतिक और वित्तीय प्रगति के कारण अनुमति दी गई थी।
- पर्यावरण संबंधी चिंताएँ: बड़ी जलविद्युत परियोजनाएँ नदी के प्रवाह को बदल सकती हैं, वनों को नुकसान पहुँचा सकती हैं, आवासों को खंडित कर सकती हैं और पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र में आपदा के खतरों को बढ़ा सकती हैं।
- क्षेत्र की भूकंपीय संवेदनशीलता: ऊपरी गंगा बेसिन भूकंपीय क्षेत्र IV और V के अंतर्गत आता है, जो इसे भूकंप और भूगर्भीय अस्थिरता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाता है।
ऊपरी गंगा बेसिन के बारे में
- ऊपरी गंगा बेसिन से तात्पर्य गंगा नदी प्रणाली के हिमालयी उद्गम क्षेत्र (Headwater Region) से है, जिसमें मुख्य रूप से उत्तराखंड में अलकनंदा और भागीरथी बेसिन शामिल हैं।
- गंगा नदी का उद्गम: गंगा नदी का उद्गम देवप्रयाग में होता है, जहाँ अलकनंदा और भागीरथी नदियाँ मिलकर मुख्य गंगा नदी का निर्माण करती हैं।
ऊपरी गंगा बेसिन की महत्त्वपूर्ण सहायक नदियाँ
- भागीरथी नदी: भागीरथी का उद्गम गोमुख के पास गंगोत्री ग्लेशियर (हिमनद) से होता है और इसे गंगा की प्रमुख शीर्षधाराओं में से एक माना जाता है।
- अलकनंदा नदी: अलकनंदा का उद्गम सतोपंथ ग्लेशियर के पास से होता है और यह देवप्रयाग में भागीरथी से मिलती है।
- मंदाकिनी नदी: मंदाकिनी नदी का उद्गम केदारनाथ के पास चोराबाड़ी ग्लेशियर से होता है और यह रुद्रप्रयाग में अलकनंदा से मिलती है।
- पिंडार नदी: पिंडार नदी का उद्गम पिंडारी ग्लेशियर से होता है और यह कर्णप्रयाग में अलकनंदा में मिल जाती है।
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पिछली सिफारिशें और निर्णय
- रवि चोपड़ा समिति (2014): समिति ने निष्कर्ष निकाला कि जलविद्युत परियोजनाओं ने वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा को और अधिक गंभीर बना दिया था तथा कई परियोजनाओं को रद्द करने की सिफारिश की।
- विनोद तारे समिति (2015): समिति ने यह पाया कि पूर्व मंजूरी प्राप्त कुछ परियोजनाएँ भी गंभीर पारिस्थितिकी खतरे उत्पन्न कर सकती हैं।
- बी.पी. दास समिति (2020): समिति ने अलकनंदा और भागीरथी बेसिन में 28 जलविद्युत परियोजनाओं को अनुमति देने की सिफारिश की थी।
- सरकार का संशोधित रुख: अंतर-मंत्रालयी परामर्श और विशेषज्ञ समीक्षा के बाद केंद्र ने बाद में केवल सात परियोजनाओं तक ही अपनी स्वीकृति को सीमित कर दिया।
निर्णय का महत्त्व
- हिमालयी पारिस्थितिकी संरक्षण: यह निर्णय हिमालयी नदी प्रणालियों की पारिस्थितिकी संवेदनशीलता की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।
- सतत् नदी-बेसिन प्रबंधन को बढ़ावा: यह कदम अल्पकालिक बुनियादी ढाँचे के विस्तार की तुलना में दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता को प्राथमिकता देता है।
- जलवायु और आपदा लचीलेपन संबंधी चिंताओं को रेखांकित करना: यह नीति संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिकी प्रणालियों में जलवायु-प्रेरित आपदाओं में वृद्धि को संबोधित करती है।
- विकास और पारिस्थितिकी के मध्य संतुलन: यह मामला जैव विविधता और पारिस्थितिकी संरक्षण के साथ नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों के बीच सामंजस्य बिठाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
निष्कर्ष
केंद्र का यह रुख पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील विकास और संवेदनशील ऊपरी गंगा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के अधिक मजबूत संरक्षण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक है।