विश्व पर्यावरण दिवस, 2026

5 Jun 2026

संदर्भ

भारत ने विश्व पर्यावरण दिवस, 2026 (5 जून) के अवसर पर, जो बाकू, अजरबैजान में मनाया गया, पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन, जलवायु कार्रवाई और सतत् विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः पुष्टि की।

विश्व पर्यावरण दिवस के बारे में

  • प्रारंभ: विश्व पर्यावरण दिवस की स्थापना संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा वर्ष 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन (मानव पर्यावरण पर) के दौरान की गई थी।
    • यह आधुनिक वैश्विक जलवायु कूटनीति की शुरुआत का प्रतीक था और इसे प्रत्येक वर्ष 5 जून को मनाया जाता है।

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  • वर्ष 2026 के लिए मेजबान देश: अजरबैजान गणराज्य ने बाकू में विश्व पर्यावरण दिवस, 2026 के वैश्विक आयोजन की मेजबानी की, जिससे आधुनिक पारिस्थितिकी आपदाओं पर त्वरित कार्रवाई की दिशा में अंतरराष्ट्रीय ध्यान केंद्रित हुआ।
    • यह बाकू में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP-29) की मेजबानी में अजरबैजान की महत्त्वपूर्ण भूमिका के बाद आया।
  • वर्ष 2026 का फोकस: आधिकारिक थीम इंस्पायर्ड बाय नेचर, फॉर क्लाइमेट, फॉर आवर फ्यूचर” है, जिसे वैश्विक अभियान संदेश #नाउ फॉर क्लाइमेट के साथ प्रस्तुत किया गया है।

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प्रमुख वैश्विक पर्यावरणीय खतरे एवं उभरते जोखिम

हाल के वैज्ञानिक आँकड़े ऐसे आपस में जुड़े वैश्विक संकटों को दर्शाते हैं, जो सीधे पारिस्थितिकी तंत्र, वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं और मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं:

  • समुद्री धाराओं का कमजोर होना (AMOC): अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) समुद्री धाराओं का एक विशाल तंत्र है।
    • यह एक विशाल कन्वेयर बेल्ट की तरह कार्य करता है, जो उष्ण कटिबंध से गर्म सतही जल को उत्तर की ओर ले जाता है, जहाँ यह ठंडा होकर सघन बनता है और गहरे महासागर में डूब जाता है, फिर ठंडी धारा के रूप में दक्षिण की ओर लौटता है, जिससे वैश्विक तापमान संतुलन बना रहता है।
    • खतरा: आर्कटिक बर्फ के पिघलने से उत्पन्न विशाल मात्रा में मीठा जल महासागर में मिल रहा है, जिससे लवणता घट रही है और यह प्रणाली कमजोर हो रही है।
      • अंतरसरकारी पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की छठी आकलन रिपोर्ट के अनुसार, इस सदी में इसके कमजोर होने की उच्च संभावना है।
      • नए अनुसंधान संकेत देते हैं कि वर्ष 2100 तक AMOC में 59% तक कमी आ सकती है, जो एक जलवायु उत्प्रेरण सीमा के निकट है।
    • सामाजिक-आर्थिक प्रभाव: AMOC के बाधित होने से उत्तरी अमेरिका में समुद्र-स्तर में अत्यधिक वृद्धि होगी और वैश्विक मौसम प्रणालियाँ परिवर्तित हो जाएँगी।
      • इसका भारतीय मानसून पर गहरा प्रभाव पड़ेगा, जिससे कृषि, खाद्य सुरक्षा और जल आपूर्ति पर गंभीर खतरे उत्पन्न होंगे।
  • महासागरीय ऊष्मा में वृद्धि एवं स्तरीकरण: वर्ष 2024–2025 के दौरान महासागरों ने रिकॉर्ड स्तर की ऊष्मा (23 जेटाजूल ऊर्जा) अवशोषित की।
    • इससे महासागरीय स्तरीकरण उत्पन्न होता है, जहाँ गर्म, पोषक तत्त्व-विहीन जल ऊपर और ठंडा, पोषक तत्त्व-समृद्ध जल नीचे रहता है।
    • क्षति: उच्च तापमान के कारण इन परतों का मिश्रण कठिन हो जाता है।
    • परिणामस्वरूप, महासागर कम कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं और ऑक्सीजन का संचार बाधित होता है, जिससे समुद्री जैव विविधता प्रभावित होती है।
    • मौसम से संबंध: यह स्थिति समुद्री हीटवेव (MHWs) उत्पन्न करती है, जिसमें सतही तापमान 3–4°C तक बढ़ जाता है।
      • इससे प्रवाल भित्तियों का विरंजन, मत्स्य संसाधनों में व्यवधान तथा अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों की तीव्रता और आवृत्ति में वृद्धि होती है।
  • आर्कटिक समुद्री बर्फ के पिघलने का भ्रम: एक अध्ययन के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में आर्कटिक समुद्री बर्फ के पिघलने की गति अस्थायी रूप से धीमी हुई है।
    • मूल समस्या: यह कोई वास्तविक सुधार नहीं है।
    • 1980 के दशक से अब तक 10,000 घन किलोमीटर से अधिक बर्फ समाप्त हो चुकी है।
    • मानव-जनित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है और यह अस्थायी मंदी आगे चलकर बर्फ को तेजी से पिघला सकती है।

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  • स्वच्छ ऊर्जा की चुनौती: वर्ष 2024 में वैश्विक रूप से 582 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई, जिससे कुल क्षमता 4,442 गीगावाट से अधिक हो गई।
    • अब स्वच्छ ऊर्जा वैश्विक विद्युत उत्पादन का लगभग 30% प्रदान करती है।
    • संरचनात्मक समस्या: यह वृद्धि COP28 (दुबई) के लक्ष्य—वर्ष 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा को तीन गुना करने—के अनुरूप है, फिर भी जीवाश्म ईंधनों का पूर्ण प्रतिस्थापन अभी नहीं हुआ है।
    • COP30 (बेलेम, ब्राजील) में भी देशों के मध्य सहमति नहीं बन सकी, जिससे जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध समाप्त करने के लिए बाध्यकारी समय-सीमा निर्धारित नहीं हो पाई।

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भारत की पर्यावरणीय संबंधी विजन और पहलें

भारत वर्ष 2026 के विषय को संबोधित करते हुए प्राचीन पारिस्थितिकी परंपराओं को वृहद घरेलू नीतियों और अद्यतन जलवायु लक्ष्यों के साथ जोड़ रहा है।

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  • दार्शनिक आधार
    • सामंजस्य में जीवन: भारत का दृष्टिकोण प्रकृति को शोषण योग्य आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि संरक्षित करने योग्य साझा विरासत के रूप में देखता है।
    • सांस्कृतिक आधार: प्राचीन ग्रंथों जैसे तिरुक्कुरल में सभी जीवों के प्रति करुणा और प्राकृतिक संसाधनों के सतत् उपयोग की शिक्षा दी गई है।
  • समग्र पारितंत्र पुनर्स्थापन
    • वन्यजीव संरक्षण: मानव बस्ती रहित संरक्षित क्षेत्रों से आगे बढ़ते हुए, भारत वैज्ञानिक प्रबंधन और आवास पुनर्स्थापन के माध्यम से ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, हिम तेंदुआ, स्लॉथ बीयर और चीता जैसी महत्त्वपूर्ण प्रजातियों की रक्षा कर रहा है।
    • पारितंत्र स्तर पर संरक्षण: प्रमुख प्रजातियों से आगे, प्रयास महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों जैसे आर्द्रभूमि (उदाहरण: चिल्का झील) पर केंद्रित हैं, जो क्षेत्रीय कार्बन सिंक के रूप में कार्य करती हैं, तथा मैंग्रोव, जो प्राकृतिक अवरोध बनकर चक्रवातों और तटीय क्षरण से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
    • एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान: यह लोकप्रिय वृक्षारोपण अभियान जन भागीदारी (Jan Bhagidari) पर आधारित है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की रिपोर्टों के अनुसार, इन प्रयासों के कारण भारत में प्रतिवर्ष लगभग 119,000 हेक्टेयर वन क्षेत्र में वृद्धि हो रही है।

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  • मिशन LiFE और चक्रीय अर्थव्यवस्था: मिशन ‘लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट’ (LiFE) राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों को व्यक्तिगत व्यवहार परिवर्तन में परिवर्तित करता है और अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित क्षेत्रों के माध्यम से पुनर्गठित करने का प्रयास करता है:
    • सतत् कृषि: जैविक और पुनर्योजी कृषि को बढ़ावा देकर मृदा उर्वरता संरक्षण और जल संरक्षण सुनिश्चित करना।
    • प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन: एकल-उपयोग प्लास्टिक प्रतिबंध लागू करना तथा विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के माध्यम से निर्माताओं को पैकेजिंग अपशिष्ट के लिए उत्तरदायी बनाना।
    • व्यवहार परिवर्तन: नागरिकों को पर्यावरण-अनुकूल परिवहन, जल संरक्षण उपायों और खाद्य अपशिष्ट में कमी जैसे कार्यों के लिए प्रेरित करना, जिससे हरित रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलता है।
  • वर्ष 2035 के लिए भारत की जलवायु प्रतिबद्धताएँ: हालिया सम्मेलनों में पुनः बल दिए गए पेरिस समझौते की समयरेखा के अनुरूप, भारत ने वर्ष 2035 चक्र के लिए अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (NDCs) को अद्यतन करते हुए अपने लक्ष्यों को स्वतंत्र रूप से और अधिक महत्त्वाकांक्षी बनाया है।

अंतरराष्ट्रीय पहलें और वैश्विक सहयोग

वैश्विक जलवायु मंच, उच्च-स्तरीय कूटनीतिक मतभेदों के बावजूद, ग्रहीय संकट से निपटने के लिए व्यावहारिक सहयोग ढाँचे विकसित कर रहे हैं:

  • न्यू कलेक्टिव क्वांटिफाइड गोल’ (NCQG): COP29, बाकू में कठिन वार्ताओं के दौरान औपचारिक रूप से स्थापित, NCQG वैश्विक जलवायु वित्त का आधुनिक आधार स्तंभ है।
    • यह वर्ष 2035 तक विकासशील देशों के लिए प्रति वर्ष कम-से-कम 1.3 ट्रिलियन डॉलर के जलवायु वित्त को सार्वजनिक और निजी दोनों स्रोतों से बढ़ाने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करता है।
    • इसमें से विकसित देशों ने वर्ष 2035 तक प्रति वर्ष कम-से-कम 300 बिलियन डॉलर जुटाने में अग्रणी भूमिका निभाने पर सहमति दी है।
  • बाकू–बेलेम रोडमैप टू 1.3T”: यह एक संस्थागत तंत्र है, जिसे अजरबैजान से ब्राजील की अध्यक्षता के संक्रमण काल के दौरान तैयार किया गया, ताकि सार्वजनिक, निजी और रियायती अनुदान आधारित वित्त प्रवाह को तीव्रता से बढ़ाने का स्पष्ट मार्ग सुनिश्चित किया जा सके।
  • ट्रॉपिकल फॉरेस्ट फॉरएवर फैसिलिटी (TFFF): COP30, बेलेम (ब्राजील) में आधिकारिक रूप से प्रारंभ हुई, यह पहल वनों की कटाई के आर्थिक कारणों को प्रत्यक्ष रूप से संबोधित करती है। इसका उद्देश्य उष्णकटिबंधीय वनों को कटे हुए भूमि से अधिक आर्थिक मूल्यवान बनाना है।
    • ढाँचा: यह सुविधा 125 बिलियन डॉलर के कोष को लक्षित करती है, जिसमें सार्वभौमिक योगदान और निजी पूँजी शामिल होगी। इस कोष के वार्षिक प्रतिफल का उपयोग विकासशील उष्णकटिबंधीय देशों को सीधे भुगतान करने के लिए किया जाएगा, ताकि वे वन आच्छादन को बनाए रखें।
    • सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा: COP-30 के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि TFFF से मिलने वाले कम-से-कम 20% भुगतान सीधे आदिवासी एवं स्थानीय समुदायों (IPLCs) को किए जाएँ, जो इन पारितंत्रों के प्रमुख संरक्षक हैं।
  • वैश्विक कार्बन बाजारों का सुदृढ़ीकरण: एक दशक से अधिक समय तक संचालित तकनीकी और कूटनीतिक गतिरोध के बाद, COP-29 ने पेरिस समझौते के अनुच्छेद-6 (विशेषकर 6.4) के लिए अंतरराष्ट्रीय ढाँचे को अंतिम रूप दिया। यह उपलब्धि संयुक्त राष्ट्र के एकीकृत कार्बन बाजारों को पूर्णतः कार्यान्वित करती है, जिससे वर्ष 2050 तक प्रति वर्ष लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर को वैश्विक दक्षिण में प्रमाणित हरित परियोजनाओं में प्रवाहित करने का मार्ग प्रशस्त होता है।

जलवायु वित्त की चुनौती

पूर्वानुमेय और कम-लागत पूँजी सुनिश्चित करना, जलवायु नीतियों को वास्तविकता में बदलने की सबसे कठिन चुनौती बना हुआ है।

  • वित्तीय अंतराल और भू-राजनीतिक असंतोष: हालाँकि COP-29 में विकसित देशों द्वारा 300 बिलियन डॉलर की प्रतिज्ञा को औपचारिक रूप दिया गया, फिर भी सम्मेलन तीव्र मतभेदों के बीच समाप्त हुआ।
    • भारत, नाइजीरिया और बोलिविया जैसे विकासशील देशों ने इस लक्ष्य का कड़ा विरोध करते हुए इसे अपर्याप्त बताया, क्योंकि स्वच्छ प्रौद्योगिकी परिवर्तन, अनुकूलन, तथा ‘लॉस एंड डैमेज’ के लिए वास्तविक आवश्यकता ट्रिलियन डॉलर स्तर पर है।
    • घरेलू आकलनों के अनुसार, भारत को अकेले वर्ष 2030 तक लगभग 2.5 ट्रिलियन डॉलर की आवश्यकता है, और वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्य प्राप्त करने हेतु लगभग 10.1 ट्रिलियन डॉलर की आवश्यकता होगी।
    • उच्च-उत्सर्जन क्षेत्रों जैसे इस्पात, सीमेंट, परिवहन और तापीय ऊर्जा का डीकार्बोनाइजेशन अत्यधिक प्रारंभिक निवेश की माँग करता है, क्योंकि हरित विकल्प (जैसे हरित हाइड्रोजन) अभी व्यापक स्तर पर व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य नहीं हैं।
  • संरचनात्मक बाधाएँ
    • वर्गीकरण संबंधी अंतराल: भारत के पास अभी तक जलवायु वित्त वर्गीकरण नामक एक मानकीकृत आधिकारिक ढाँचा है, जो यह निर्धारित करता है कि कौन-सा निवेश “हरित” माना जाएगा या कौन-सा पूर्ण रूप से विकसित नहीं है।
      • इसके अभाव में, ग्रीनवॉशिंग के जोखिम के कारण अंतरराष्ट्रीय निवेशक सतर्क बने रहते हैं।
    • स्थानीय राजकोषीय कमजोरी: यद्यपि प्रमुख जलवायु अनुकूलन नीतियाँ केंद्रीय स्तर पर बनाई जाती हैं, उनका क्रियान्वयन राज्य और स्थानीय सरकारों पर निर्भर होता है।
      • इन संस्थाओं के पास प्रायः पर्याप्त वित्तीय क्षमता और अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त तक प्रत्यक्ष पहुँच का अभाव होता है।

आगे की राह

पर्यावरणीय लक्ष्यों को मापनीय और न्यायसंगत प्रगति में बदलने के लिए, वैश्विक समुदाय और घरेलू नीति-निर्माताओं को निम्नलिखित पाँच कदमों को प्राथमिकता देनी चाहिए:

  • हरित वर्गीकरण को अंतिम रूप देना: एक स्पष्ट और पारदर्शी जलवायु वित्त वर्गीकरण स्थापित किया जाए, ताकि वैश्विक पूँजी प्रवाह को आकर्षित किया जा सके और ग्रीनवॉशिंग के जोखिम समाप्त हों।
  • मिश्रित वित्त (Blended Finance) का उपयोग: सार्वजनिक और बहुपक्षीय वित्त को प्रारंभिक जोखिम वहन करने हेतु उपयोग किया जाए, जिससे निजी निवेशकों के लिए जोखिम कम हो और ऑफशोर’ पवन ऊर्जा, ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण तथा हरित हाइड्रोजन परियोजनाओं में निवेश बढ़े।
  • केंद्रीय बैंक विनियमन को सुदृढ़ करना: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को अनिवार्य जलवायु तनाव परीक्षण (Climate Stress Testing) लागू करना चाहिए, प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) में हरित परियोजनाओं के लिए आवंटन बढ़ाना चाहिए तथा कार्बन-गहन निवेशों पर अधिक पूँजी आवश्यकताएँ निर्धारित करनी चाहिए।
  • उप-राष्ट्रीय वित्तीय तंत्र (Sub-national Financial Mechanism) की स्थापना: केंद्र सरकार, नाबार्ड (NABARD) और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों को मिलाकर एक समन्वित वित्तीय चैनल बनाया जाए, जिससे राज्य और स्थानीय निकायों को सीधे अनुकूलन वित्त उपलब्ध कराया जा सके।
  • बौद्धिक संपदा बाधाओं को दूर करना: विकसित देशों को हरित इस्पात, कार्बन कैप्चर और स्मार्ट ग्रिड तकनीकों से संबंधित पेटेंट और औद्योगिक विशेषज्ञता साझा करनी चाहिए।
    • जिससे विकासशील देश प्रदूषण-गहन विकास चरणों को पार कर सकें।

निष्कर्ष

विश्व पर्यावरण दिवस, 2026 ने यह रेखांकित किया कि पर्यावरण संरक्षण सतत् विकास के लिए अनिवार्य है। COP-29 से COP-30 तक, वैश्विक जलवायु नीति प्रकृति-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर अग्रसर हो रही है। भारत यह प्रदर्शित करता है कि स्वच्छ ऊर्जा, हरित वित्त, नवाचार और जलवायु-सहिष्णु जीवनशैली के माध्यम से आर्थिक विकास और संधारणीयता दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा सकता है।

विश्व पर्यावरण दिवस, 2026

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