पावोना क्लावस कॉलोनी (पोटैटो पैच) [Pavona clavus Colony (“Potato Patch”)]
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शोधकर्ताओं ने लक्षद्वीप के कदमत द्वीप के निकट पावोना क्लावस प्रजाति की एक विशाल प्रवाल (कोरल) कॉलोनी का दस्तावेजीकरण किया है, जो दुनिया की सबसे बड़ी जीवित प्रवाल कॉलोनियों में से एक हो सकती है।
पावोना क्लावस कॉलोनी (पोटैटो पैच) के बारे में
- पोटैटो पैच पावोना क्लावस (Potato Coral) प्रजाति की एक विशाल एवं सतत् कठोर प्रवाल (हार्ड कोरल) कॉलोनी है, जो अपनी विशिष्ट स्तंभाकार (Columnar) और गदा-आकार (Club-shaped) वृद्धि संरचनाओं के लिए जानी जाती है।
- स्थान: यह लक्षद्वीप द्वीपसमूह में स्थित कदमत द्वीप के दक्षिण-पूर्वी तटीय जल क्षेत्र में पाया गया है। लक्षद्वीप भारत की एकमात्र ऍटाल (Atoll) द्वीप शृंखला है।
- उत्पत्ति एवं निर्माण: यह प्रवाल कॉलोनी प्रवाल पॉलीप्स द्वारा कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO₃) के सदियों तक निरंतर निक्षेपण से निर्मित हुई है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी अनुमानित आयु 700 से 1,800 वर्ष के मध्य हो सकती है, हालाँकि इसकी सटीक आयु का वैज्ञानिक सत्यापन अभी किया जाना शेष है।
- मुख्य बिंदु
- विशाल आकार: यह कॉलोनी लगभग 4,250 वर्ग मीटर (1.05 एकड़) क्षेत्र में विस्तृत है, जो विश्वभर में पहले दर्ज की गई कई विशाल प्रवाल कॉलोनियों से भी बड़ी है।
- असाधारण दीर्घायु: प्रारंभिक अनुमान बताते हैं कि यह प्रवाल कई शताब्दियों से जीवित है, जिससे यह हिंद महासागर क्षेत्र की सबसे प्राचीन ज्ञात जीवित प्रवाल संरचनाओं में से एक बन जाती है।
- उच्च जीवितता दर: क्षेत्रीय सर्वेक्षणों के अनुसार, बार-बार होने वाले प्रवाल विरंजन (कोरल ब्लीचिंग), चक्रवातों और समुद्री ऊष्मा तरंगों के बावजूद कोरल कॉलोनी के लगभग 58.47% ऊतक अभी भी जीवंत अवस्था में हैं।
- समृद्ध समुद्री आवास: इसका विशाल सतही क्षेत्र विभिन्न मछली प्रजातियों को आश्रय प्रदान करता है तथा लक्षद्वीप के प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी तंत्र में एक महत्त्वपूर्ण प्रजनन (Nursery) एवं पोषण क्षेत्र (Feeding Ground) के रूप में कार्य करता है।
- महत्त्व
- जलवायु सहनशीलता पर अनुसंधान: यह प्रवाल कॉलोनी कई प्रवाल विरंजन (कोरल ब्लीचिंग) घटनाओं और समुद्र के अत्यधिक गर्म होने की अवस्थाओं से जीवंत रहती है। इससे वैज्ञानिकों को प्रवालों के अनुकूलन, तापीय सहनशीलता तथा प्रवाल भित्तियों की सहनशीलता को समझने में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
- प्राचीन जलवायु अभिलेख (पैलियो-क्लाइमेट आर्काइव): इसका प्राचीन कैल्सियमयुक्त कंकाल अतीत के समुद्री तापमान, समुद्र-जलस्तर में परिवर्तन तथा समुद्री पर्यावरणीय परिस्थितियों के अभिलेख सुरक्षित रखता है, जिससे वैज्ञानिक दीर्घकालिक जलवायु इतिहास का पुनर्निर्माण कर सकते हैं।
- संरक्षण की दृष्टि से महत्त्व: यह खोज लक्षद्वीप की प्रवाल भित्तियों के पारिस्थितिकी महत्त्व को रेखांकित करती है और भारत की ब्लू इकोनॉमी तथा जैव विविधता संरक्षण पहलों के अंतर्गत समुद्री संरक्षण को और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता को बल प्रदान करती है।
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येलो-थ्रोटेड मार्टेन के बारे में Yellow-Throated Marten
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नियमित कैमरा-ट्रैप निगरानी के दौरान काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और बाघ अभयारण्य में पहली बार येलो-थ्रोटेड मार्टेन (Yellow-throated Marten) की उपस्थिति दर्ज की गई।
येलो-थ्रोटेड मार्टेन के बारे में
- वैज्ञानिक नाम: येलो-थ्रोटेड मार्टेन का वैज्ञानिक नाम मार्टेस फ्लैविगुला (Martes Flavigula) है। यह मस्टेलिडी परिवार का सदस्य है, जिसमें नेवले, ऊदबिलाव और बिज्जू शामिल होते हैं।
- वितरण: यह प्रजाति दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाई जाती है। भारत में यह हिमालयी क्षेत्र और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों, विशेष रूप से असम में पाया जाता है।
- आवास: यह उष्णकटिबंधीय, उपोष्णकटिबंधीय, शीतोष्ण और पर्वतीय वनों में पाया जाता है, जिसमें सदाबहार और अर्द्ध-सदाबहार वन शामिल हैं।
- मेसोप्रिडेटर (Mesopredator): यह खाद्य शृंखला में एक मध्यम स्तर का शिकारी है, इसका स्थान शीर्ष शिकारी जैसे बाघ और भालू के बाद आता है।
- व्यवहार: यह दिन में सक्रिय और वृक्षों पर रहने वाला मांसाहारी है, जो अपनी निडर और अत्यंत आक्रामक प्रकृति के लिए जाना जाता है।
- पारिस्थितिकी भूमिका: यह बीज प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे वनों का पुनर्जनन और पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहता है।
- संरक्षण स्थिति: इसे IUCN रेड लिस्ट में कम चिंताजनक श्रेणी में रखा गया है और भारत के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची II के अंतर्गत संरक्षित किया गया है।
- महत्त्व: काजीरंगा में पहली बार इसकी उपस्थिति दर्ज होना पार्क की बढ़ती जैव विविधता और स्वस्थ वन पारिस्थितिकी तंत्र को दर्शाता है।
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nations Security Council- UNSC)
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ऑस्ट्रिया, किर्गिजस्तान, पुर्तगाल, त्रिनिदाद और टोबैगो, तथा जिम्बाब्वे को वर्ष 2027–2028 कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के अस्थायी (गैर-स्थायी) सदस्यों के रूप में चुना गया है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के बारे में
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख अंग है, जो अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है और इसकी स्थापना वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत की गई थी।
- यह संयुक्त राष्ट्र का एकमात्र ऐसा अंग है, जिसके निर्णय सदस्य देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं।
- मुख्यालय: न्यूयॉर्क (संयुक्त राज्य अमेरिका)।
- संरचना: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में कुल 15 सदस्य होते हैं, जिनमें 5 स्थायी सदस्य (P5) तथा 10 अस्थायी सदस्य शामिल होते हैं। अस्थायी सदस्यों का चुनाव संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा किया जाता है।
- पाँच स्थायी सदस्य हैं—चीन, फ्राँस, रूस, यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) तथा संयुक्त राज्य अमेरिका। इन सभी के पास वीटो शक्ति (Veto Power) होती है।
- भारत अब तक आठ बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का अस्थायी सदस्य रह चुका है। इसका नवीनतम कार्यकाल वर्ष 2021–2022 रहा।
- अस्थायी सीटों का क्षेत्रीय वितरण: अफ्रीका (3), एशिया-प्रशांत (2), लैटिन अमेरिका और कैरेबियन (2), पश्चिमी यूरोप एवं अन्य (2), तथा पूर्वी यूरोप (1)।
- चुनाव प्रक्रिया
- संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा चुनाव: अस्थायी सदस्यों का चुनाव संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) द्वारा गुप्त मतदान के माध्यम से किया जाता है।
- मतदान की आवश्यकता: निर्वाचित होने के लिए किसी उम्मीदवार को महासभा में डाले गए मतों का दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करना आवश्यक होता है।
- वार्षिक रोटेशन: प्रत्येक वर्ष पाँच अस्थायी सदस्यों का चुनाव किया जाता है, जिससे परिषद के क्रियाकलापों में निरंतरता बनी रहती है।
- सदस्यों का कार्यकाल
- स्थायी सदस्य: पाँचों स्थायी सदस्य अपने पद पर अनिश्चितकाल (स्थायी रूप से) बने रहते हैं।
- अस्थायी सदस्य: अस्थायी सदस्य दो वर्ष के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं और सामान्यतः तत्काल पुनर्निर्वाचन के पात्र नहीं होते हैं।
- मतदान प्रणाली
- सामान्य निर्णय-निर्माण: किसी महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव को पारित करने के लिए 15 सदस्यों में से कम-से-कम 9 सदस्यों के मत पक्ष में होना आवश्यक होते हैं।
- वीटो शक्ति: किसी भी स्थायी सदस्य द्वारा दिया गया नकारात्मक मत वीटो माना जाता है, जो बहुमत का समर्थन होने के बावजूद प्रस्ताव को पारित होने से रोक सकता है।
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भारत–नेपाल विवादित सीमा क्षेत्र
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नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने कहा कि नेपाल ने भी भारत के कुछ क्षेत्रों पर अतिक्रमण किया है, जिससे नेपाल के भीतर राजनीतिक विवाद और बहस छिड़ गई है।
भारत का रुख
- द्विपक्षीय समाधान: भारत का मानना है कि नेपाल के साथ सभी सीमा-संबंधी मुद्दों का समाधान किसी भी तीसरे पक्ष की भागीदारी के बिना स्थापित द्विपक्षीय तंत्रों के माध्यम से किया जाना चाहिए।
- मौजूदा तंत्र: भारत और नेपाल के मध्य सीमा विवादों, अतिक्रमण तथा सीमा प्रबंधन से जुड़े मुद्दों के समाधान हेतु तकनीकी और कूटनीतिक माध्यमों सहित संस्थागत व्यवस्थाएँ मौजूद हैं।
भारत–नेपाल सीमा के बारे में
- भारत–नेपाल सीमा एक खुली और अधिकांशतः अप्रतिबंधित अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जो दोनों देशों के लोगों के मध्य गहन, सांस्कृतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को सुगम बनाती है।
- उत्पत्ति: आधुनिक भारत–नेपाल सीमा का आधार मुख्यतः वर्ष 1816 की सुगौली संधि है, जिस पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल साम्राज्य के बीच आँग्ल-नेपाल युद्ध के बाद हस्ताक्षर किए गए थे।
- लंबाई: भारत–नेपाल सीमा की कुल लंबाई लगभग 1,751 किमी. है।
- नेपाल के साथ सीमा साझा करने वाले भारतीय राज्य: उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम।
- सीमा की प्रमुख विशेषताएँ
- यह सीमा खुली सीमा व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होती है, जिसके तहत दोनों देशों के नागरिक बिना पासपोर्ट या वीजा के स्वतंत्र रूप से आवागमन कर सकते हैं।
- सीमा प्रबंधन भारत के सशस्त्र सीमा बल (SSB) तथा नेपाल की सुरक्षा एजेंसियों के मध्य समन्वित तंत्रों के माध्यम से किया जाता है।
- नदियों के प्रवाह मार्ग में परिवर्तन, सीमापार अतिक्रमण तथा ऐतिहासिक मानचित्रों की भिन्न व्याख्याएँ समय-समय पर सीमा-संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न करती हैं।
भारत–नेपाल के प्रमुख सीमा विवाद
- पश्चिमी क्षेत्र
- कालापानी: कालापानी उतराखंड में भारत–नेपाल–चीन ट्राई-जंक्शन के निकट स्थित है और हिमालय तथा तिब्बत से निकटता के कारण अत्यधिक सामरिक महत्त्व रखता है।
- लिंपियाधुरा: नेपाल सुगौली संधि का हवाला देते हुए लिंपियाधुरा को काली (महाकाली) नदी का वास्तविक उद्गम स्थल मानता है और इसलिए इसके पूर्व स्थित क्षेत्र को नेपाल का हिस्सा मानता है।
- लिपुलेख दर्रा: लिपुलेख एक सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हिमालयी दर्रा है, जो भारत को तिब्बत से जोड़ता है तथा कैलाश मानसरोवर यात्रा और सीमावर्ती व्यापार के लिए एक प्रमुख मार्ग के रूप में कार्य करता है।
- पूर्वी क्षेत्र: सुस्ता विवाद
- सुस्ता क्षेत्र: बिहार–नेपाल सीमा पर स्थित सुस्ता क्षेत्र गंडक (नारायणी) नदी के प्रवाह मार्ग में हुए परिवर्तनों के कारण विवादित बना हुआ है। नदी की धारा में परिवर्तन से समय के साथ सीमा की व्याख्या और निर्धारण को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद उत्पन्न हुए हैं।
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NPCI इंटरनेशनल ने कंबोडिया में सीमा-पार UPI भुगतान सेवा शुरू की
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भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) की अंतरराष्ट्रीय शाखा, NPCI इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (NIPL), ने कंबोडिया में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) शुरू करने के लिए एसीएलईडीए बैंक पीएलसी. (ACLEDA Bank Plc.) के साथ आधिकारिक साझेदारी की है।
मुख्य बिंदु
- चरण 1 की पूर्णता: यह शुरुआत भारत–कंबोडिया सीमा-पार QR भुगतान लिंकेज के प्रथम चरण की पूर्णता को दर्शाता है।
- KHQR के माध्यम से लिंकेज: यह लिंकेज बाकोंग के KHQR, जो कंबोडिया की राष्ट्रीय QR कोड प्रणाली है, के माध्यम से स्थापित किया गया है।
- कंबोडिया में UPI की स्वीकृति: भारतीय यात्री अब UPI-सक्षम ऐप्स का उपयोग करके निर्बाध रूप से QR-आधारित भुगतान कर सकते हैं।
- व्यापक उपलब्धता: यह सुविधा कंबोडिया के 45 लाख से अधिक व्यापारी प्रतिष्ठानों पर उपलब्ध है।
- टू-वे पेमेंट कॉरिडोर: अगले चरण में यह भुगतान व्यवस्था पूरी तरह टू-वे (Two-Way) बन जाएगी।
- कंबोडियाई उपयोगकर्ताओं के लिए सुविधा: कंबोडियाई उपयोगकर्ता अपने घरेलू बैंकिंग और डिजिटल भुगतान अनुप्रयोगों के माध्यम से भारत में UPI QR कोड स्कैन कर भुगतान कर सकेंगे।
- UPI का वैश्विक विस्तार: कंबोडिया UPI भुगतान स्वीकार करने वाला 9वाँ देश बन गया है।
- अन्य देश: UPI पहले से ही सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, फ्राँस, मॉरीशस, नेपाल, भूटान, कतर और श्रीलंका में संचालित है।
भारत–कंबोडिया UPI लिंकेज का महत्त्व
- यात्रियों के लिए अधिक सुविधा: निर्बाध डिजिटल भुगतान की सुविधा मिलती है, जिससे नकद, मुद्रा विनिमय और विदेशी मुद्रा से संबधित निर्भरता कम होती है।
- स्थानीय व्यवसायों को लाभ: कंबोडियाई व्यापारियों को भारतीय पर्यटकों तक पहुँच प्राप्त होती है, जिससे लेन-देन की मात्रा बढ़ती है और भुगतान दक्षता में सुधार होता है।
- कुशल एवं सुरक्षित लेन-देन: वास्तविक समय में सुरक्षित निपटान संभव होता है तथा नकदी के भौतिक प्रबंधन से जुड़ी लागत घटती है।
- सीमा-पार भुगतान इंटरऑपरेबिलिटी को बढ़ावा: इंटरऑपरेबल QR-आधारित लेन-देन के माध्यम से राष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों के सफल एकीकरण का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
- डिजिटल वित्तीय कनेक्टिविटी मजबूत होना: डिजिटल भुगतान और फिनटेक के क्षेत्र में भारत–कंबोडिया सहयोग को बढ़ा सकता है।
- भारत के डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) का विस्तार: UPI की बढ़ती वैश्विक उपस्थिति को मजबूत करता है और भारत के डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करता है।
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नवाचार मंत्र पहल (Navachar Mantra Initiative)
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कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय ने भारत भर के जमीनी स्तर के नवप्रवर्तकों, स्टार्ट-अप्स और उद्यमियों को समर्थन प्रदान करने के लिए ‘नवाचार मंत्र‘ पहल की शुरुआत की है।
नवाचार मंत्र (Navachar Mantra) पहल के बारे में
- नवाचार मंत्र एक राष्ट्रीय नवाचार, इनक्यूबेशन एवं त्वरण कार्यक्रम है, जिसे जमीनी स्तर के नवाचारों और प्रारंभिक चरण के उद्यमों की पहचान, पोषण तथा विस्तार के लिए तैयार किया गया है।
- नोडल मंत्रालय: कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय (MSDE)।
- कार्यान्वयन एजेंसी: इस कार्यक्रम का कार्यान्वयन राष्ट्रीय उद्यमिता एवं लघु व्यवसाय विकास संस्थान (NIESBUD) द्वारा किया जा रहा है, जबकि फाउंडेशन फॉर इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (FITT), IIT दिल्ली तकनीकी ज्ञान साझेदार के रूप में कार्य कर रहा है।
- उद्देश्य: स्थानीय नवप्रवर्तकों को मेंटर्स, निवेशकों, नीति-निर्माताओं, उद्योग जगत के नेताओं तथा शैक्षणिक संस्थानों से जोड़कर नवाचारी विचारों को सतत् उद्यमों में परिवर्तित करना।
- प्रमुख विशेषताएँ
- जमीनी स्तर के नवाचार पर फोकस: यह कार्यक्रम विशेष रूप से टियर-II और टियर-III शहरों, आकांक्षी जिलों, ग्रामीण क्षेत्रों तथा देश के वंचित क्षेत्रों के नवप्रवर्तकों को लक्षित करता है।
- समावेशी पात्रता ढाँचा: आवेदकों के लिए पंजीकृत कंपनी या बाजार-तैयार उत्पाद का होना आवश्यक नहीं है, जिससे विचार, प्रोटोटाइप या सत्यापन चरण के नवप्रवर्तकों को भी भागीदारी का अवसर मिलता है।
- प्राथमिकता वाले क्षेत्र: यह पहल निम्नलिखित उच्च-प्रभाव वाले क्षेत्रों पर केंद्रित है:
- कृषि प्रौद्योगिकी एवं खाद्य प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी एवं कल्याण, शिक्षा प्रौद्योगिकी एवं कौशल विकास, जलवायु एवं सततता, ग्रामीण वाणिज्य एवं एमएसएमई सशक्तीकरण।
- एक-वर्षीय संरचित सहायता: चयनित नवप्रवर्तकों को एक वर्ष तक मेंटरशिप, व्यवसाय विकास मार्गदर्शन, बौद्धिक संपदा सहायता, नियामकीय सहयोग, धन जुटाने संबंधी परामर्श तथा बाजार से जुड़ाव के अवसर प्रदान किए जाते हैं।
- राष्ट्रीय दृश्यता मंच: प्रतिभागियों को नवाचार प्रदर्शनों, डिजिटल अभियानों, निवेशकों के साथ संवाद तथा राष्ट्रीय उद्यमिता आयोजनों के माध्यम से व्यापक पहचान और अवसर प्राप्त होते हैं।
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