अरावली पहाड़ियों की परिभाषा की समीक्षा हेतु सर्वोच्च न्यायालय का पैनल

3 Jun 2026

संदर्भ

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने खनन से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर चिंताओं के बीच अरावली पर्वतमाला की वैज्ञानिक परिभाषा की स्वतंत्र समीक्षा हेतु एक उच्चस्तरीय समिति (HPC) का गठन किया है, जिसकी अध्यक्षता भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) के प्रमुख कर रहे हैं।

अरावली परिभाषा को लेकर प्रमुख विवाद 

  • 100 मीटर ऊँचाई मानदंड: पूर्व समिति ने प्रस्ताव दिया था कि केवल 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली का हिस्सा माना जाए।
    • भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) ने चेतावनी दी कि इससे लगभग 90% अरावली पहाड़ियाँ संरक्षण से बाहर हो सकती हैं।
  • वैज्ञानिक निष्कर्षों के दमन का आरोप: सर्वोच्च न्यायालय के ‘एमिकस क्यूरी’ ने कहा कि पूर्व रिपोर्ट में FSI की चेतावनियों और केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) की आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया।
  • बड़े पैमाने पर पहाड़ियों का शामिल न होना: प्रस्तावित नियम के तहत राजस्थान की 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही संरक्षण के दायरे में आती हैं।
    • शेष पहाड़ियाँ खनन और रियल एस्टेट गतिविधियों के प्रति संवेदनशील हो सकती हैं।

उच्चस्तरीय समिति (HPC) के बारे में 

  • सर्वोच्च न्यायालय ने इस समिति को कानूनी, वैज्ञानिक और भौगोलिक अस्पष्टताओं को दूर करने तथा 31 अगस्त, 2026 तक स्वतंत्र रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
  • समिति अध्यक्ष: HPC की अध्यक्ष कंचन देवी हैं, जो ICFRE की महानिदेशक हैं और यह संस्था पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के अंतर्गत कार्य करती है।
  • विशेषज्ञ-आधारित संरचना: समिति में निम्नलिखित संस्थानों के पूर्व अधिकारी एवं विशेषज्ञ शामिल हैं:
    • भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI)
    • भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI)
    • पर्यावरण मंत्रालय
    • दिल्ली विश्वविद्यालय।

1 4

  • शैक्षणिक भागीदारी: विशेषज्ञों को भारतीय मानव अधिवास संस्थान (IIHS) तथा हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय से भी शामिल किया गया है।
  • संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर चिंताएँ: कुछ संरक्षणवादियों ने संभावित हितों के टकराव पर चिंता व्यक्त की है, क्योंकि समिति की अध्यक्षता ऐसे संस्थागत ढाँचे से जुड़ी है, जिसका संबंध पूर्व रिपोर्ट से रहा है।

जाँच के तहत प्रमुख पारिस्थितिकी मुद्दे

  • ‘500-मीटर दूरी’ का नियम: सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा कि क्या अरावली वर्गीकरण को केवल उन पहाड़ियों तक सीमित करना, जो 500 मीटर के भीतर स्थित हैं, अवैध खनन के लिए कानूनी त्रुटियाँ (loopholes) उत्पन्न करता है।
  • पारिस्थितिकी निरंतरता: HPC यह जाँच करेगी कि क्या अलग-अलग स्थित पर्वतीय संरचनाएँ अभी भी एक सतत् पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में कार्य करती हैं, जिसे सामूहिक संरक्षण की आवश्यकता है।
  • पहाड़ी वर्गीकरण की वैज्ञानिक वैधता: समिति यह आकलन करेगी कि यह दावा कि राजस्थान की 10% से कम पहाड़ियाँ ही संरक्षण योग्य हैं, क्या वास्तव में वैज्ञानिक रूप से उचित है या नहीं।
  • नियामकीय और कानूनी खामियाँ: न्यायालय ने समिति से यह भी जाँच करने को कहा है कि क्या कमजोर कानूनी परिभाषाओं ने अरावली क्षेत्र में पर्यावरणीय दोहन को बढ़ावा दिया है।

ऐतिहासिक विकास और न्यायिक हस्तक्षेप

  • प्रारंभिक और आधुनिक दोहन: खनन गतिविधियों की शुरुआत खेत्री ताँबा खदानों (5वीं शताब्दी ईसा पूर्व) से मानी जाती है।
    • हालाँकि बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय क्षरण 1960–80 के दशक में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के शहरी विस्तार के दौरान तेजी से बढ़ा, जो निर्माण माँग से प्रेरित था।
  • न्यायिक समयरेखा: वर्ष 1992 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने अलवर और गुरुग्राम में खनन पर प्रतिबंध लगाया, जबकि फरीदाबाद अपेक्षाकृत असुरक्षित रहा।
    • 1990 के दशक में हिल होम्स” के मुद्रीकरण ने दबाव और बढ़ा दिया।
    • वर्ष 2009 में सर्वोच्च न्यायालय ने फरीदाबाद, गुरुग्राम और मेवात में व्यापक खनन प्रतिबंध लगाया और यह टिप्पणी की: पहाड़ियों को बचाओ, परिभाषा की चिंता मत करो”
    • इसके बावजूद, वर्ष 2018 के आकलन में बताया गया कि अवैध खनन के कारण राजस्थान में 31 पहाड़ियों का अस्तित्व समाप्त हो गया।

अरावली पहाड़ियाँ 

अरावली पर्वतमाला पृथ्वी की सबसे प्राचीन भू-वैज्ञानिक संरचनाओं में से एक है, जिसका निर्माण प्रोटेरोजोइक युग में हुआ था, अर्थात् हिमालय से भी बहुत पहले। यह उत्तर-पश्चिम भारत की पारिस्थितिकी आधार मानी जाती है।

  • भू-वैज्ञानिक और मानव विकास: यह लगभग 3.2 अरब वर्ष पूर्व निर्मित हुई थी और एक समय में एक सुदृढ़ पारिस्थितिकी अवरोध थी, लेकिन लगातार मानव हस्तक्षेप के कारण यह अब एक खंडित भू-दृश्य बन चुकी है।
    • यह एक प्राचीन वलित पर्वतमाला का अवशेष है और भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे पुरानी स्थिर भू-आकृतियों में से एक का प्रतिनिधित्व करती है।

2 3

  • विस्तार और दिशा: यह लगभग 670 किमी. तक उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में विस्तृत है।
  • भौगोलिक विस्तार: यह हिम्मतनगर (गुजरात) के पास से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा से गुजरती हुई दिल्ली रिज तक समाप्त होती है।
  • स्थलाकृति
    • दक्षिणी अरावली: खड़ी, ऊबड़-खाबड़ और अपेक्षाकृत वनाच्छादित, जिसमें माउंट आबू शामिल है।
    • उत्तरी अरावली: निम्न, पथरीली पहाड़ियाँ, जिनमें झाड़ीदार वनस्पतियाँ पाई जाती हैं।
  • सबसे ऊँची चोटी: गुरु शिखर (1,722 मीटर), जो राजस्थान के माउंट आबू में स्थित है।
  • जल विज्ञान: यह कई महत्त्वपूर्ण नदियों जैसे बनास, लूनी, साबरमती और साखी का उद्गम क्षेत्र है।
  • पारिस्थितिकी एवं सांस्कृतिक महत्त्व: यह सरिस्का टाइगर रिजर्व, कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य और दिल्ली रिज जैसे महत्त्वपूर्ण संरक्षण एवं विरासत स्थलों का आवास है, जहाँ प्राचीन भूगोल शहरी परिदृश्य के साथ जुड़ता है।

अरावली पहाड़ियों का महत्त्व — उत्तर भारत का पारिस्थितिकी “कवच”

अरावली पर्वतमाला एक बहु-कार्यात्मक पारिस्थितिकी “कवच” के रूप में कार्य करती है, जो उत्तर भारत की पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है।

  • मरुस्थलीकरण एवं प्रदूषण के विरुद्ध अवरोध: अरावली पर्वतमाला थार मरुस्थल के पूर्व की ओर विस्तार को रोकने वाली एक प्राकृतिक दीवार के रूप में कार्य करती है, क्योंकि यह पवन प्रवाह को प्रभावित करती है और राजस्थान–पंजाब–हरियाणा क्षेत्र में रेत एवं धूल के प्रवेश को सीमित करती है।
    • यह पर्वतमाला मानसूनी वर्षा पैटर्न और भूजल पुनर्भरण को भी प्रभावित करती है, जिससे लगभग 2 मिलियन लीटर प्रति हेक्टेयर जल पुनर्भरण में योगदान होता है। इसके अभाव में अरब सागर से आने वाली अधिकांश वर्षा राजस्थान में ठहरने के स्थान पर पाकिस्तान की ओर चली जाती हैं।
    • भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के अध्ययन बताते हैं कि इस शृंखला में मौजूद अंतराल के कारण धूल भरी आँधियाँ आती हैं, जिससे दिल्ली-एनसीआर में PM2.5 और PM10 स्तर 4–6 गुना तक बढ़ जाते हैं, जो वायु गुणवत्ता नियंत्रण में इसकी भूमिका को स्पष्ट करता है।
  • जल-आधारित जीवनरेखा: अरावली क्षेत्र अपनी विशिष्ट भू-रचना के कारण क्षेत्रीय जल सुरक्षा का आधार है। यहाँ की ‘फ्रैक्चर्ड अलवर क्वार्टजाइट’ और संगमरमर संरचनाएँ वर्षा जल के उच्च अवशोषण को संभव बनाती हैं।
    • केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के अनुसार, अरावली पर्वतमाला राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के 20–30% भूजल पुनर्भरण में योगदान देती है और लूनी, साबरमती, बनास तथा चंबल जैसी प्रमुख नदियों के उद्गम क्षेत्र के रूप में कार्य करती है।
  • जैव विविधता भंडार एवं वन्यजीव गलियारे: अरावली क्षेत्र में 22 वन्यजीव अभयारण्य और 4 टाइगर रिजर्व स्थित हैं। यह भारतीय तेंदुआ और धारीदार लकड़बग्घा (Striped Hyena) जैसी प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण पारिस्थितिक गलियारे प्रदान करता है, जिससे सरिस्का और रणथंभौर जैसे आवासों के बीच संपर्क बना रहता है।
  • जलवायु नियमन कार्य: यह पर्वतमाला एक विशाल ‘ग्रीन लंग’ (हरित फेफड़े) की तरह कार्य करती है, जो क्षेत्रीय तापमान को नियंत्रित करती है, धूल को रोकती है और एक महत्वपूर्ण कार्बन सिंक के रूप में काम करती है। यह भारत की जलवायु परिवर्तन शमन रणनीति और पेरिस समझौते के लक्ष्यों में प्रत्यक्ष योगदान देती है।
अरावली पहाड़ियों की परिभाषा की समीक्षा हेतु सर्वोच्च न्यायालय का पैनल

Explore UPSC Foundation Course

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.