संदर्भ
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायालय की लाइवस्ट्रीम की गई कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग, संपादन, प्रसार एवं मुद्रीकरण पर रोक लगाने के लिए एक अंतरिम आदेश पारित किया है, ताकि इसके दुरुपयोग को रोका जा सके और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा एवं अखंडता को सुरक्षित रखा जा सके।
सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश की प्रमुख विशेषताएँ
- इस आदेश का उद्देश्य न्यायालयीय कार्यवाही की लाइवस्ट्रीमिंग के अनुचित उपयोग, भ्रामक प्रस्तुतीकरण और व्यावसायिक दुरुपयोग पर रोक लगाना है, ताकि न्यायिक गरिमा और न्याय वितरण प्रणाली में जनता का विश्वास बना रहे।
- प्रतिबंधित गतिविधियाँ: सर्वोच्च न्यायालय के महासचिव या संबंधित उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल की पूर्व अनुमति के बिना कोई भी व्यक्ति निम्नलिखित कार्य नहीं कर सकेगा:
- न्यायिक कार्यवाही के ऑडियो-वीडियो क्लिप निकालना या रिकॉर्ड करना।
- ऐसी रिकॉर्डिंग का संपादन या उसमें परिवर्तन करना।
- उन्हें सोशल मीडिया या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड, पुनः पोस्ट या प्रसारित करना।
- ऐसी रिकॉर्डिंग का मुद्रीकरण या व्यावसायिक उपयोग करना।
- क्षेत्र: यह प्रतिबंध केवल आधिकारिक न्यायालयीय रिकॉर्डिंग के अनधिकृत उपयोग पर लागू होता है और न्यायालयीय कार्यवाही की वैध रिपोर्टिंग को प्रतिबंधित नहीं करता है।
- आदेश की प्रकृति: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह आदेश मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला आदेश नहीं है, बल्कि न्यायालय की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग एवं रिकॉर्डिंग के लिए मॉडल नियम, 2022 के प्रवर्तन का एक उपाय है।
अंतरिम आदेश की आवश्यकता
- चयनात्मक संपादन: संदर्भहीन और छोटे वीडियो अंशों के प्रसार से न्यायालय की टिप्पणियों एवं कार्यवाही की गलत व्याख्या होने की संभावना बढ़ जाती है।
संबंधित संवैधानिक एवं कानूनी ढाँचा
- अनुच्छेद-21: न्याय तक पहुँच के अधिकार की व्याख्या में न्यायालय की कार्यवाही तक उचित सार्वजनिक पहुँच को शामिल माना गया है।
- अनुच्छेद-19(1)(a): यह वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करता है, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है, जो अनुच्छेद-19(2) के अंतर्गत युक्तिसंगत प्रतिबंधों के अधीन है।
- अनुच्छेद-129: सर्वोच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय (Court of Record) घोषित करता है, जिससे उसे अभिलेखों को संरक्षित रखने एवं अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति प्राप्त होती है।
- अनुच्छेद-215: प्रत्येक उच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय (Court of Record) घोषित करता है तथा उसे समान शक्तियाँ प्रदान करता है।
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- व्यावसायिक शोषण: न्यायालयीन कार्यवाही को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर व्यावसायिक लाभ के लिए तेजी से मुद्रीकृत किया जा रहा है।
- भ्रामक सूचना: संपादित रिकॉर्डिंग न्यायिक कार्यवाही को विकृत कर सकती हैं, जिससे जनता के मध्य भ्रामक धारणाएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से संबंधित जोखिम: कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उपकरण ऑडियो एवं वीडियो रिकॉर्डिंग में हेर-फेर कर सकते हैं, जिससे भ्रामक या झूठी सामग्री तैयार की जा सकती है।
- न्यायिक स्वतंत्रता का संरक्षण: न्यायालयीन संवादों के चयनात्मक प्रसार से न्यायाधीशों एवं वकीलों को ट्रोलिंग, उत्पीड़न एवं अनुचित सार्वजनिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है, जिससे न्याय प्रशासन प्रभावित हो सकता है।

भारत में लाइव स्ट्रीमिंग का विकास
- स्वप्निल त्रिपाठी बनाम भारत संघ (2018): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि न्यायालय की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग खुली न्याय प्रणाली (Open Justice) के संवैधानिक सिद्धांत का विस्तार है तथा यह अनुच्छेद-21 के अंतर्गत न्याय तक पहुँच के अधिकार को आगे बढ़ाती है।
- संवैधानिक पीठ की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग (2022): सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर 2022 में संवैधानिक पीठ की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग प्रारंभ की।
- न्यायालय की कार्यवाही के लाइव स्ट्रीमिंग एवं रिकॉर्डिंग के लिए मॉडल नियम, 2022: सर्वोच्च न्यायालय की ई-समिति द्वारा तैयार किए गए इन नियमों में लाइव स्ट्रीम की गई कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग, पुनरुत्पादन, साझा करने या प्रसार पर प्रतिबंध लगाया गया है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित लाइव प्रतिलेखन (2023): सर्वोच्च न्यायालय कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित लाइव प्रतिलेखन शुरू करने वाला भारत का पहला न्यायालय बना, जिससे न्यायालयीन कार्यवाही का एक सटीक डिजिटल अभिलेख तैयार किया जा सके।
लाइव स्ट्रीमिंग का महत्त्व
- पारदर्शिता को बढ़ावा: यह न्यायिक प्रक्रिया में खुलेपन एवं जवाबदेही को सुदृढ़ करती है।
- न्याय तक पहुँच को बढ़ावा: यह नागरिकों, वकीलों, शोधकर्ताओं एवं छात्रों को दूरस्थ रूप से न्यायालयीन कार्यवाही देखने में सक्षम बनाती है।
- जन जागरूकता में वृद्धि: यह कानूनी साक्षरता तथा संवैधानिक एवं कानूनी मुद्दों की सार्वजनिक समझ को बढ़ाती है।
- आधिकारिक अभिलेखों का निर्माण: डिजिटल रिकॉर्डिंग एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रतिलेखन न्यायालयीन कार्यवाही के प्रामाणिक अभिलेखों को संरक्षित करने में सहायता करते हैं।
- न्यायिक जवाबदेही को सुदृढ़ करना: सार्वजनिक दृश्यता न्याय वितरण प्रणाली में विश्वास को बढ़ाती है।
लाइव स्ट्रीमिंग से संबंधित चिंताएँ
- चयनात्मक प्रस्तुतीकरण: आंशिक वीडियो क्लिप न्यायिक तर्कों को गलत रूप में प्रस्तुत कर सकती हैं और जन धारणा को प्रभावित कर सकती हैं।
- सोशल मीडिया ट्रायल: संपादित सामग्री के वायरल प्रसार से न्यायिक निर्णय आने से पूर्व ही जनमत प्रभावित हो सकता है।
- न्यायिक स्वतंत्रता के लिए खतरा: विकृत ऑनलाइन सामग्री के कारण न्यायाधीशों एवं वकीलों को ट्रोलिंग, धमकी या प्रतिष्ठा को नुकसान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
- गोपनीयता संबंधी चिंताएँ: पीड़ितों, बच्चों या संवेदनशील मामलों से संबंधित कार्यवाहियों को अधिक सुरक्षा की आवश्यकता होती है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित हेरफेर: डीपफेक एवं सिंथेटिक मीडिया न्यायालयीन रिकॉर्डिंग में परिवर्तन कर सकते हैं, जिससे न्यायिक कार्यवाही की प्रामाणिकता प्रभावित हो सकती है।
आगे की राह
- नियामक ढाँचे को सुदृढ़ करना: न्यायालयीन रिकॉर्डिंग के उपयोग, भंडारण एवं प्रसार को नियंत्रित करने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश विकसित किए जाने चाहिए।
- आधिकारिक डिजिटल अभिलेखागार: न्यायालयीन कार्यवाही के प्रमाणित अभिलेखों को नियंत्रित सार्वजनिक पहुँच के साथ संरक्षित किया जाना चाहिए।
- प्लेटफॉर्म की जवाबदेही: डिजिटल मध्यस्थों को सूचना मिलने पर हेरफेर की गई या अनधिकृत न्यायालयीन सामग्री को तत्काल हटाने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए।
- वॉटरमार्किंग एवं प्रमाणीकरण का उपयोग: छेड़छाड़ को रोकने के लिए डिजिटल वॉटरमार्किंग एवं सामग्री सत्यापन तंत्र लागू किए जाने चाहिए।
- संतुलित दृष्टिकोण: यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि न्यायपालिका की गरिमा, स्वतंत्रता एवं अखंडता की रक्षा करते हुए न्यायिक पारदर्शिता को बनाए रखा जाए।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय का अंतरिम आदेश न्यायिक पारदर्शिता और न्याय वितरण प्रणाली की अखंडता एवं गरिमा के मध्य संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है, ताकि तकनीकी प्रगति न्यायपालिका में जनता की पहुँच को मजबूत करे, लेकिन न्यायपालिका के प्रति सार्वजनिक विश्वास को कमजोर न करे।