UNCITRAL: 60वीं वर्षगाँठ सम्मेलन
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भारत ने संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार कानून आयोग (UNCITRAL) की 60वीं वर्षगाँठ सम्मेलन की मेजबानी की, जहाँ विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए समावेशी एवं अनुमानित वैश्विक व्यापार कानून निर्माण का आह्वान किया।
संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार कानून आयोग (UNCITRAL) के बारे में
- यह संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख कानूनी संस्था है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक कानूनों से जुड़े विषयों पर कार्य करती है।
- स्थापना: UNCITRAL की स्थापना वर्ष 1966 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इसकी स्थापना अंतरराष्ट्रीय व्यापार कानूनों में सामंजस्य और एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।
- मुख्य भूमिका: यह अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक कानून को आधुनिक और सामंजस्यपूर्ण बनाने कार्य करता है।
- सदस्यता: आयोग में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा छह वर्ष के कार्यकाल के लिए चुने गए 60 सदस्य देश शामिल हैं, जिनमें से आधे सदस्यों को प्रत्येक तीन वर्ष में नवीनीकृत किया जाता है।
- क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व: इसकी सदस्यता में 14 अफ्रीकी, 14 एशियाई, 8 पूर्वी यूरोपीय, 10 लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई, तथा 14 पश्चिमी यूरोपीय और अन्य राज्य शामिल हैं।
- महत्त्व: UNCITRAL अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश को सुगम बनाते हुए अनुमानित कानूनी ढाँचे, सीमा पार वाणिज्यिक सहयोग और कुशल विवाद समाधान को बढ़ावा देता है।
भारत और UNCITRAL
- दीर्घकालिक जुड़ाव: UNCITRAL की विभिन्न गतिविधियों में भारत की निरंतर भागीदारी रही है और साथ ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार कानून के विकास में सक्रिय रूप से योगदान दिया है।
- भारत वर्ष 1968 में संस्थापक सदस्य के रूप में UNCITRAL में शामिल हुआ।
- कानूनी सुधार: मध्यस्थता, वाणिज्यिक विवाद समाधान और दिवालियापन में भारत के सुधार एक आधुनिक, पारदर्शी और अंतरराष्ट्रीय रूप से अनुकूल कानूनी माहौल बनाने के उसके प्रयासों को दर्शाते हैं।
- वैश्विक दक्षिण: भारत अंतरराष्ट्रीय विधि निर्माण में विकासशील देशों के अधिक प्रतिनिधित्व की वकालत करता है और ऐसे व्यापार कानूनों का आह्वान करता है, जो वैश्विक दक्षिण की विकासात्मक प्राथमिकताओं को संबोधित करते हैं।
- विकसित भारत 2047: भारत निर्माण, तकनीकी नवाचार, वैश्विक एकीकरण और एक लचीली अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए अनुमानित और सामंजस्यपूर्ण अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढाँचे को आवश्यक मानता है।
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काला सागर

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हाल ही में काला सागर में रूसी प्रादेशिक जलक्षेत्र में वाणिज्यिक पोत MV ओमोरफी (MV Omorfi) पर हुए हमले के बाद एक भारतीय नाविक की मौत हो गई।
काला सागर (Black Sea) के बारे में
- परिचय: काला सागर दक्षिण-पूर्वी यूरोप और पश्चिमी एशिया के मध्य स्थित एक बड़ा अंतर्देशीय सागर है, जो इस क्षेत्र को वैश्विक व्यापार मार्गों से जोड़ने वाले एक महत्त्वपूर्ण समुद्री गलियारे के रूप में कार्य करता है।
- सीमावर्ती देश: काला सागर की सीमाएँ तुर्किए, बुल्गारिया, रोमानिया, यूक्रेन, रूस और जॉर्जिया से लगती हैं।
- प्रमुख भौगोलिक विशेषताएँ
- क्षेत्रफल: काला सागर लगभग 4,36,000 वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत है, जो इसे दुनिया के प्रमुख अंतर्देशीय समुद्रों में से एक बनाता है।
- अनॉक्सीकृत गहरा जल (Anoxic Deep Waters): इसका गहरा जल मुख्य रूप से ऑक्सीजन-रहित है, जिससे ऐसी परिस्थितियों का निर्माण होता है, जो प्राचीन जहाजों के मलबे और जैविक अवशेषों को असाधारण रूप से संरक्षण सुनिश्चित करता है।
- प्रमुख नदियाँ: काला सागर में गिरने वाली महत्त्वपूर्ण नदियों में डेन्यूब, नीपर (Dnieper) और नीस्टर (Dniester) शामिल हैं, जो इसके मीठे जल के प्रवाह में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं।
- संबंधित पर्वत शृंखलाएँ : यह समुद्र दक्षिण में पोंटिक पर्वत शृंखला, पूर्व में काकेशस पर्वत शृंखला और उत्तर की ओर क्रीमियाई पर्वत शृंखला से घिरा हुआ है।
- जलडमरूमध्य और समुद्री मार्ग
- बोस्फोरस जलडमरूमध्य (Bosporus Strait): काला सागर को मरमारा सागर से जोड़ता है और एक महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्ग के रूप में कार्य करता है।
- डार्डानेल्स जलडमरूमध्य (Dardanelles Strait): मरमारा सागर को एजियन सागर से जोड़ता है, जिससे भूमध्य सागर और अटलांटिक महासागर तक पहुँच प्राप्त होती है।
- केर्च जलडमरूमध्य (Kerch Strait): उत्तर-पूर्व में काला सागर को अजोव सागर से जोड़ता है।
- रणनीतिक महत्त्व
- समुद्री व्यापार: काला सागर पूर्वी यूरोप, काकेशस और वैश्विक बाजारों के बीच ऊर्जा संसाधनों, कृषि वस्तुओं और अन्य सामानों के परिवहन के लिए रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण है।
- भू-राजनीतिक महत्त्व: तुर्किए जलडमरूमध्य के माध्यम से इसकी स्थिति और पहुँच इसे यूरोपीय सुरक्षा, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय भू-राजनीति के लिए एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बनाती है।
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भव्य रसायन योजना (BHAVYA Rasayan Scheme)

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आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने भारत औद्योगिक विकास योजना रसायन (Bharat Audyogik Vikas Yojana Rasayan) या भव्या- रसायन योजना (BHAVYA-Rasayan Scheme) को मंजूरी दे दी है।
योजना के बारे में
- यह देश में तीन विश्व स्तरीय रासायनिक और पेट्रोकेमिकल औद्योगिक पार्कों को विकसित करने के लिए एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना है।
- इस योजना की घोषणा केंद्रीय बजट 2026-27 में की गई थी।
- कार्यान्वयन एजेंसी: रसायन एवं पेट्रोरसायन विभाग, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय।
- कार्यान्वयन अवधि: वित्तीय वर्ष 2026–27 से वित्तीय वर्ष 2030–31 तक (5 वर्ष)।
- उद्देश्य
- एक एकीकृत, पर्यावरण-अनुकूल और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्द्धी रासायनिक विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना।
- लॉजिस्टिक्स लागत और आयात निर्भरता को कम करना।
- घरेलू और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करना।
- वैश्विक मूल्य शृंखला (GVCs) में भारत की भागीदारी को मजबूत करना।
योजना की प्रमुख विशेषताएँ
- वित्तीय परिव्यय: ₹3,030 करोड़ का कुल आवंटन:-
- साझा बुनियादी ढाँचे और बुनियादी सुविधाओं के लिए ₹3,000 करोड़।
- प्रशासनिक व्यय के लिए ₹30 करोड़।
- केंद्र–राज्य फंडिंग पैटर्न: प्रति पार्क ₹1,000 करोड़ तक की केंद्रीय सहायता।
- राज्यों को न्यूनतम ₹500 करोड़ का समान अनुदान प्रदान करना होगा।
- भूमि की आवश्यकता: राज्यों को प्रत्येक पार्क के लिए न्यूनतम 8 वर्ग किमी. (2,000 एकड़) आसन्न और बाधा-मुक्त भूमि प्रदान करनी होगी।
- प्लग-एंड-प्ले इन्फ्रास्ट्रक्चर: पार्क साझा औद्योगिक बुनियादी ढाँचा प्रदान करेंगे, जिसमें शामिल हैं:-
- सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र (CETPs)।
- खतरनाक कचरे के लिए उपचार, भंडारण और निपटान सुविधाएँ (TSDFs)।
- विलायक पुनर्प्राप्ति और आसवन संयंत्र।
- भाप उत्पादन और वितरण प्रणालियाँ।
- औद्योगिक पाइपलाइन नेटवर्क, लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग सुविधाएँ।
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फास्ट-ट्रैक कोर्ट (FTC)
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रश्न-पत्र लीक (पेपर लीक) को लेकर जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट (FTCs) स्थापित करने के प्रस्ताव की घोषणा की।
फास्ट-ट्रैक कोर्ट (FTCs) के बारे में
- ये विशिष्ट श्रेणियों के मामलों की सुनवाई में तेजी लाने और न्यायिक देरी को कम करने के लिए स्थापित विशेष अदालतें हैं।
- कानूनी स्थिति: FTCs को विनियमित करने वाला कोई एकल केंद्रीय कानून नहीं है।
- गठन प्रक्रिया: ये सरकारी योजनाओं, न्यायिक निर्देशों या राज्य की पहलों के माध्यम से गठित किए जाते हैं।
विकासक्रम
- 14वाँ वित्त आयोग (2015–20): जघन्य अपराधों, लंबे समय से लंबित संपत्ति विवादों और संवेदनशील समूहों से जुड़े मामलों के लिए 1,800 FTCs स्थापित करने की अनुशंसा की गई थी।
- वर्ष 2019: केंद्र सरकार ने दुष्कर्म और पॉक्सो (POCSO) मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स (FTSCs) योजना शुरू की, जिसे आंशिक रूप से निर्भया फंड के माध्यम से वित्तपोषित किया गया था।
फास्ट-ट्रैक कोर्ट (FTCs) द्वारा मामलों के निपटारे की समय-सीमा
- कोई वैधानिक समय-सीमा नहीं: याचिकाकर्ताओं के पास मुकदमों के पूरा होने की एक निश्चित समय-सीमा का वैधानिक अधिकार नहीं है।
- BNSS सिफारिश: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) सिफारिश करती है:-
- आपराधिक मुकदमे: आदर्श रूप से 2 वर्ष के भीतर पूरे किए जाने चाहिए।
- यौन अपराध के मुकदमे: आदर्श रूप से 2 महीने के भीतर पूरे किए जाने चाहिए।
- FTSC योजना के तहत निपटान लक्ष्य: केंद्र प्रायोजित फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) योजना के अंतर्गत, प्रत्येक FTSC से प्रति तिमाही 41–42 मामलों (वार्षिक रूप से लगभग 165 मामलों) का निपटारा करने की आशा की जाती है।
फास्ट-ट्रैक कोर्ट के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपाय:
- कानून के समक्ष समानता: कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करते हुए, विशेष अदालतों को संविधान के अनुच्छेद-14 का पालन करना चाहिए।
- युक्तियुक्त वर्गीकरण का सिद्धांत: ‘पश्चिम बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार (1952)’ मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय सुनाया कि केवल ‘त्वरित सुनवाई का उद्देश्य’ एक विशेष अदालत बनाने को सही नहीं ठहरा सकता है।
- संवैधानिक जाँच में स्पष्टता लाने के लिए, तेजी से सुनवाई (फास्ट-ट्रैकिंग) के लिए चुने गए मामलों के वर्गीकरण का एक तर्कसंगत, वस्तुनिष्ठ आधार होना चाहिए, जैसे कि अपराध की विशिष्ट प्रकृति या पीड़ितों की संवेदनशीलता।
- अपवादजन्य मामलों के लिए विशेष अदालतें: इसके बाद त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए 2G स्पेक्ट्रम घोटाले और सत्यम घोटाले जैसे प्रमुख जनहित मामलों के लिए विशेष अदालतों का गठन किया गया है।
FTC का प्रदर्शन:
- जनवरी 2026 तक:
- 21 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 862 नियमित FTCs कार्यरत हैं।
- 29 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 398 विशेष पॉक्सो (POCSO) न्यायालय सहित 774 FTSCs सक्रिय हैं।
- वर्ष 2024: FTSCs में 88,902 नए मामले दायर हुए और उन्होंने 85,595 मामलों का निपटारा किया।
- औसत निपटान: नियमित सत्र न्यायालयों द्वारा 3.3 मामलों की तुलना में 9.5 मामले प्रति माह।
- उच्च निपटान दरों के बावजूद, वर्ष 2023 के अंत तक 2.4 लाख से अधिक मामले लंबित थे।
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