संदर्भ
NEET प्रश्न-पत्र लीक विवाद ने भारत में भ्रष्टाचार एवं जवाबदेही से संबंधित चिंताओं को पुनः उजागर किया है। डिजिटलीकरण, सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 तथा लोकपाल जैसी संस्थाओं के माध्यम से किए गए सुधारों के बावजूद यह बहस जारी है कि क्या वास्तव में भ्रष्टाचार में कमी आई है या केवल इसके स्वरूप में परिवर्तन हुआ है।
संबंधित तथ्य
- भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक, 2025 में भारत 39 अंक के स्कोर के साथ 91वें स्थान पर है।
भ्रष्टाचार क्या है?
- भ्रष्टाचार सार्वजनिक पद या अधिकार का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग है।
- यह सेवा वितरण में होने वाली छोटी रिश्वतखोरी से लेकर सार्वजनिक अनुबंधों, नीतिगत निर्णयों तथा राजनीतिक वित्तपोषण से संबंधित बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार तक विस्तृत होता है।
भारत में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए कानूनी एवं विनियामक ढाँचे
कानूनी ढाँचा
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (2018 में संशोधित): यह लोक सेवकों द्वारा किए जाने वाले भ्रष्टाचार को दंडित करने वाला प्रमुख भ्रष्टाचार-विरोधी कानून है। वर्ष 2018 के संशोधन के अंतर्गत लोक सेवक अधिकारियों द्वारा रिश्वत लेने तथा व्यक्तियों या संस्थाओं द्वारा रिश्वत देने, दोनों को अपराध घोषित किया गया।
- धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002: इसका उद्देश्य अपराध से प्राप्त आय, जिसमें भ्रष्ट आचरण से अर्जित संपत्तियाँ भी शामिल हैं, को जब्त कर तथा उनके उपयोग को प्रतिबंधित कर धन शोधन को प्रतिबंधित करना है।
- कंपनी अधिनियम, 2013: यह कॉरपोरेट प्रशासन, पारदर्शिता एवं जवाबदेही को बढ़ावा देता है। इसमें धोखाधड़ी की व्यापक परिभाषा प्रदान की गई है तथा धोखाधड़ीपूर्ण एवं भ्रष्ट कॉरपोरेट गतिविधियों के लिए आपराधिक दंड का प्रावधान किया गया है।
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 द्वारा प्रतिस्थापित): पूर्व में इसमें आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, जालसाजी एवं ठगी से संबंधित प्रावधान शामिल थे, जिनका भ्रष्टाचार के मामलों में अक्सर उपयोग किया जाता था। वर्तमान में ऐसे अपराधों को भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत सम्मिलित किया गया है।
- बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध अधिनियम, 1988: यह किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर संपत्ति रखने की प्रक्रिया को प्रतिबंधित करता है, जिसके माध्यम से वास्तविक स्वामित्व को छिपाया जाता है। इसका उद्देश्य अवैध संपत्ति को बेनामी परिसंपत्तियों के माध्यम से छिपाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना है।
विनियामक एवं संस्थागत ढाँचा
- लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013: यह केंद्र स्तर पर लोकपाल तथा राज्यों में लोकायुक्तों की स्थापना का प्रावधान करता है, जो सार्वजनिक पदाधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच करने वाले स्वतंत्र भ्रष्टाचार-रोधी लोकपाल संस्थान हैं।
- केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC): यह शीर्ष सतर्कता निकाय है, जो केंद्र सरकार के संगठनों में सतर्कता तंत्र को मजबूत करने तथा भ्रष्टाचार की रोकथाम से संबंधित मामलों में सरकार को परामर्श प्रदान करती है।
- आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 1952: इसने भारतीय दंड संहिता (IPC) के अंतर्गत भ्रष्टाचार से संबंधित अपराधों के लिए दंड में वृद्धि कर तथा त्वरित सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना को सुगम बनाकर भ्रष्टाचार-रोधी प्रवर्तन को सुदृढ़ किया।
- वर्ष 1964 के भ्रष्टाचार-रोधी संशोधन: इन संशोधनों के तहत लोक सेवकों से जुड़े अपराधों की परिभाषा कद व्यापक बनाया तथा आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने को दंडनीय अपराध बनाया।
भारत में भ्रष्टाचार के निहित कारण
- पारदर्शिता का अभाव: सरकार के निर्णय लेने की प्रक्रिया, प्रशासन एवं सार्वजनिक प्रक्रियाओं में सीमित पारदर्शिता भ्रष्टाचार के अवसर उत्पन्न करती है। पारदर्शिता के अभाव में भ्रष्ट गतिविधियों को छिपाने और बढ़ावा मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
- कमजोर संस्थाएँ एवं अप्रभावी कानूनी ढाँचा: पुलिस, न्यायपालिका एवं निगरानी एजेंसियों जैसी न्यायिक संस्थाएँ की बार संसाधनों की कमी एवं बाहरी दबाव के कारण प्रभावी रूप से कार्य नहीं कर पाती हैं। कमजोर प्रवर्तन एवं विलंबित न्याय जवाबदेही को कम करते हैं जिससे भ्रष्ट गतिविधियों में बढोतरी होती है।
- दंडमुक्ति की धारणा: अपर्याप्त प्रवर्तन, लंबित मुकदमों और प्रभावहीन दंड व्यवस्था से जवाबदेही कमजोर होती है तथा भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति बढ़ती है।
- अल्प वेतन एवं कमजोर प्रोत्साहन: अपर्याप्त पारिश्रमिक, विशेष रूप से निम्न स्तर के सार्वजनिक अधिकारियों के लिए, रिश्वत स्वीकार करने या आय बढ़ाने के साधन के रूप में सार्वजनिक पद के दुरुपयोग की प्रवृत्ति को बढ़ा सकता है।
- नौकरशाही लालफीताशाही: जटिल प्रक्रियाएँ, अनावश्यक नियम एवं प्रशासनिक विलंब अक्सर नागरिकों तथा व्यवसायों को अनुमोदन शीघ्र प्राप्त करने या प्रक्रियागत बाधाओं से बचने के लिए रिश्वत का सहारा लेने के लिए प्रेरित करते हैं।
- लाइसेंस-परमिट आधारित नियामक प्रणाली: लाइसेंस, परमिट एवं नियामक स्वीकृतियों की जटिल व्यवस्था अधिकारियों के विवेकाधीन अधिकारों को बढ़ाती है, जिससे भ्रष्टाचार अवसर उत्पन्न होते हैं।
- राजनीतिक हस्तक्षेप: प्रशासनिक निर्णयों पर बार-बार राजनीतिक प्रभाव संस्थागत स्वतंत्रता को कमजोर करता है। अधिकारियों पर राजनीतिक या व्यक्तिगत हितों के लिए विशेष व्यक्तियों या समूहों को लाभ पहुँचाने का दबाव डाला जा सकता है।
- सामाजिक-सांस्कृतिक स्वीकृति: समाज के कुछ वर्गों में भ्रष्टाचार को सामान्य या अपरिहार्य प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। ऐसी सामाजिक स्वीकृति नैतिक मानकों को क्षीण करती है तथा भ्रष्ट व्यवहार को एक सामान्य प्रवृत्ति के रूप में परिवर्तित कर देती है।
भ्रष्टाचार को समाप्त करने में निहित चुनौतियाँ
- RTI ढाँचे का कमजोर होना: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 ने RTI के अंतर्गत व्यक्तिगत सूचना से संबंधित प्रावधानों में संशोधन किया गया, जिसके कारण निजता के अधिकार की व्याख्या व्यापक हुई तथा कई मामलों में सूचना उपलब्ध कराने से इनकार के मामलों में वृद्धि हुई, जिससे भ्रष्टाचार संबंधी जाँचों में पारदर्शिता कम हुई।
- निजता के पक्ष में न्यायिक व्याख्याएँ: गिरीश रामचंद्र देशपांडे बनाम CIC (2012) तथा न्यायमूर्ति के. एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) जैसे निर्णयों ने निजता के अधिकार को सुदृढ़ किया है। आलोचकों का तर्क है कि कुछ परिस्थितियों में यह पारदर्शिता एवं सार्वजनिक जवाबदेही को सीमित कर सकता है।
- भ्रष्टाचार-रोधी कमजोर संस्थाएँ: लोकपाल, लोकायुक्त, CBI, ED तथा सतर्कता संस्थाओं जैसी संस्थाओं को अक्सर धीमी जाँच, असमान प्रदर्शन, चयनात्मक कार्रवाई के आरोपों तथा सीमित परिचालन स्वतंत्रता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
- कानूनी एवं प्रक्रियागत बाधाएँ: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (2018 संशोधन) की धारा 17A के अंतर्गत लोक सेवकों के कुछ निर्णयों की जाँच से पहले सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होती है, जिससे जाँच में विलंब हो सकता है तथा स्वतंत्र जाँच कमजोर हो सकती है।
- न्यायिक विलंब एवं दोषसिद्धि की न्यूनतम दर: भ्रष्टाचार संबंधी मामले लंबी जाँच एवं मुकदमों की प्रक्रिया के कारण अक्सर वर्षों तक लंबित रहते हैं, जिससे दंड की निश्चितता कम हो जाती है तथा भ्रष्टाचार एक अधिक लाभ एवं कम जोखिम वाली गतिविधि बन जाता है।
भ्रष्टाचार एक प्रमुख खतरा क्यों बना हुआ है?
- आर्थिक प्रभाव
- निवेश को कम करता है, क्योंकि यह अनिश्चित एवं अनुचित व्यापारिक वातावरण उत्पन्न करता है।
- रिश्वतखोरी, विलंब तथा लागत वृद्धि के माध्यम से परियोजनाओं की लागत बढ़ाता है।
- राजनीतिक रूप से जुड़े व्यवसायों को लाभ पहुँचाकर साँठगाँठ वाले पूँजीवाद (Crony Capitalism) को बढ़ावा देता है।
- योग्यता एवं दक्षता को कमजोर कर बाजार प्रतिस्पर्द्धा को विकृत करता है।
- सामाजिक प्रभाव
- सार्वजनिक धन के दुरुपयोग एवं कमजोर जवाबदेही के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करता है।
- स्वास्थ्य सेवाओं एवं खरीद प्रक्रियाओं में अनियमितताओं को बढ़ावा देता है।
- कल्याणकारी योजनाओं के लाभों को पात्र लाभार्थियों तक पहुँचने से रोकता है।
- कमजोर वर्गों को असमान रूप से प्रभावित कर असमानता को बढ़ाता है।
- राजनीतिक प्रभाव
- स्वतंत्र एवं निष्पक्ष शासन व्यवस्था को प्रभावित कर लोकतंत्र को कमजोर करता है।
- सरकारी संस्थाओं में जनता के विश्वास को कम करता है।
- राजनीतिक या व्यक्तिगत लाभ के लिए सार्वजनिक संस्थाओं के दुरुपयोग को बढ़ावा देता है।
- अवैध वित्तपोषण एवं मत खरीद के माध्यम से चुनावी अखंडता को प्रभावित करता है।
- शासन संबंधी प्रभाव
- दंडमुक्ति को बढ़ावा देकर विधि के शासन को कमजोर करता है।
- जाँच एवं न्यायिक प्रक्रियाओं में भ्रष्टाचार के कारण न्याय में विलंब करता है।
- लालफीताशाही को बढ़ावा देकर प्रशासनिक दक्षता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।
| पहलू |
डिजिटलीकरण किस प्रकार भ्रष्टाचार को कम करता है |
सीमाएँ |
| सेवा प्रदाय |
मानवीय संपर्क को कम करके रिश्वतखोरी एवं विवेकाधीन निर्णयों की संभावना घटाता है। |
डिजिटल विभाजन के कारण सीमित इंटरनेट सुविधा अथवा कम डिजिटल साक्षरता वाले नागरिक वंचित रह सकते हैं। |
| पारदर्शिता |
डिजिटल अभिलेख, ऑनलाइन ट्रैकिंग एवं सरकारी सेवाओं की वास्तविक समय में निगरानी सुनिश्चित करता है। |
एल्गोरिदम की अपारदर्शिता एवं अपर्याप्त निगरानी उत्तरदायित्व को कम कर सकती है। |
| कल्याणकारी योजनाओं का वितरण |
प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से धन का प्रत्यक्ष हस्तांतरण होता है तथा फर्जी लाभार्थियों की पहचान करता है। |
प्रामाणीकरण संबंधी त्रुटियाँ अथवा बहिष्करण के कारण वास्तविक लाभार्थी लाभ से वंचित हो सकते हैं। |
| सार्वजनिक खरीद |
ई-प्रोक्योरमेंट एवं ई-निविदा प्रणाली प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ाती है तथा हेरफेर की संभावना कम करती है। |
यदि निगरानी कमजोर हो तो मिलीभगत एवं हेरफेर की संभावना बनी रहती है। |
| वित्तीय लेन-देन |
जैम (जनधन–आधार–मोबाइल) त्रयी के माध्यम से पारदर्शी एवं प्रत्यक्ष धन अंतरण को बढ़ावा देता है। |
साइबर धोखाधड़ी, पहचान की चोरी एवं डिजिटल ठगी जैसी नई चुनौतियाँ उभरकर सामने आई हैं। |
| उत्तरदायित्व |
डिजिटल लेखा-परीक्षण पथ (Audit Trail) एवं ऑनलाइन शिकायत निवारण पोर्टल निगरानी एवं अनुरेखण को सुदृढ़ करते हैं। |
अनेक क्षेत्रों में बिचौलियों पर निर्भरता बनी रहने से भ्रष्टाचार की संभावना समाप्त नहीं होती। |
| समग्र आकलन |
डिजिटलीकरण ने छोटे स्तर एवं प्रक्रियागत भ्रष्टाचार में उल्लेखनीय कमी लाते हुए प्रशासनिक दक्षता में वृद्धि की है। |
सुदृढ़ संस्थानों, न्यायिक सुधारों एवं प्रभावी प्रवर्तन के बिना यह व्यवस्थागत भ्रष्टाचार का पूर्णतः उन्मूलन नहीं कर सकता। |
आगे की राह
- सूचना का अधिकार (RTI) को सुदृढ़ करना
- पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने के लिए नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के अधिकार की रक्षा करना।
- पारदर्शिता एवं निजता संबंधी चिंताओं के मध्य संतुलन बनाए रखना।
- भ्रष्टाचार-रोधी संस्थाओं को सुदृढ़ करना
- प्रमुख जवाबदेही संस्थाओं के स्वतंत्र कार्यप्रणाली को सुनिश्चित करना:
- लोकपाल
- लोकायुक्त
- केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI)
- सूचना आयोग
- केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) एवं अन्य सतर्कता निकाय
- भ्रष्टाचार के मामलों का त्वरित निपटारा सुनिश्चित करना
- भ्रष्टाचार से संबंधित अपराधों के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना करना।
- जाँच एवं मुकदमे की प्रक्रिया के लिए समय-सीमा निर्धारित करना।
- प्रभावी अभियोजन के माध्यम से दोषसिद्धि दर में सुधार करना।
- पारदर्शी नियुक्तियाँ सुनिश्चित करना
- जवाबदेही संस्थाओं के लिए योग्यता-आधारित चयन प्रक्रिया अपनाना।
- नियुक्तियों को पारदर्शी एवं राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त बनाना।
- विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए संस्थागत स्वतंत्रता की रक्षा करना।
- शिकायत निवारण को सुदृढ़ करना
- व्यापक शिकायत निवारण कानून बनाना।
- सार्वजनिक शिकायतों का समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित करना।
- डिजिटल शासन में सुधार करना
- सेवाओं तक समावेशी पहुँच सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल विभाजन को कम करना`
- नागरिकों में डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना।
- सरकारी सेवाओं तक आसान पहुँच के लिए सहायता प्राप्त सेवा केंद्रों का विस्तार करना।
- एंड-टू-एंड डिजिटल व्यवस्था के माध्यम से सेवाओं की सीधी पहुँच सुनिश्चित करना और बिचौलियों की आवश्यकता को कम करना।
- नागरिक भागीदारी को बढ़ावा देना
- RTI कार्यकर्ताओं एवं व्हिसलब्लोअर को उत्पीड़न एवं धमकियों से सुरक्षा प्रदान करना।
- सार्वजनिक कार्यक्रमों में जवाबदेही सुधारने के लिए सामाजिक अंकेक्षण को प्रोत्साहित करना।
- पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सरकारी विभागों द्वारा सूचनाओं के स्वैच्छिक प्रकटीकरण को बढ़ावा देना।
निष्कर्ष
डिजिटल शासन एवं पारदर्शिता संबंधी कानूनों ने भ्रष्टाचार की संभावनाओं को सीमित किया है, किंतु केवल प्रौद्योगिकी के माध्यम से भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता है। प्रभावी संस्थाएँ, स्वतंत्र जाँच, त्वरित न्याय, मजबूत शिकायत निवारण तंत्र तथा सशक्त नागरिक, विधि के शासन को बनाए रखने और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं।