चिकित्सा प्रशिक्षण में समानुभूति

17 Jun 2026

संदर्भ

हाल ही में एक चिकित्सा छात्रा द्वारा स्टैंड-अप कॉमेडी शो के दौरान की गई टिप्पणियों को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ है, जिसने चिकित्सा नैतिकता (Medical Ethics), कैडेवर (शव) के प्रति सम्मान, तथा चिकित्सा शिक्षा में घटती समानुभूति पर व्यापक बहस को जन्म दिया है।

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संबंधित तथ्य

  • छात्रा पर आरोप है कि उसने कैडेवर (शव) के संबंध में असंवेदनशील टिप्पणियाँ एवं हास्य प्रस्तुत किया, जो शरीर रचना विज्ञान (Anatomy) के अध्ययन हेतु उपयोग किए जाने वाले मृत देहों की गरिमा के विपरीत है।
  • इस घटना ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या चिकित्सा शिक्षा प्रणाली भावी चिकित्सकों में मानवीय मूल्य, करुणा, सहानुभूति एवं मानवीय गरिमा के प्रति सम्मान का पर्याप्त विकास कर पा रही है।

चिकित्सा प्रशिक्षण और नैतिक आयाम

  • चिकित्सा प्रशिक्षण केवल वैज्ञानिक ज्ञान एवं नैदानिक कौशल अर्जित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यावसायिक मूल्यों, समानुभूति तथा नैतिक उत्तरदायित्व के विकास की एक सतत् प्रक्रिया भी है।
  • एक चिकित्सक की भूमिका केवल रोग का निदान और उपचार करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह मानवीय गरिमा, रोगी की स्वायत्तता, गोपनीयता तथा करुणा के सम्मान से भी जुड़ी होती है।
  • शरीर रचना विज्ञान (Anatomy) की शिक्षा में कैडेवर का उपयोग यह दर्शाता है कि चिकित्सा का आधार मानव जीवन एवं मानवीय गरिमा के मूल्य को पहचानने से प्रारंभ होता है।
  • बढ़ते व्यावसायीकरण, तीव्र तकनीकी प्रगति तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित स्वास्थ्य सेवाओं के इस दौर में, चिकित्सकों और समाज के मध्य विश्वास बनाए रखने के लिए चिकित्सा शिक्षा में नैतिक मूल्यों एवं मानवीय संवेदनाओं को सुदृढ़ करना अत्यंत आवश्यक है।

कैडेवर (शव) के बारे में

  • कैडेवर (शव) ऐसे मृत मानव शरीर होते हैं, जिनका उपयोग चिकित्सा शिक्षा, शरीर रचना विज्ञान (Anatomy) के अध्ययन तथा वैज्ञानिक अनुसंधान में किया जाता है। इनके माध्यम से चिकित्सा विद्यार्थियों को मानव शरीर की संरचना एवं कार्यप्रणाली का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है।
  • चिकित्सा महाविद्यालयों में कैडेवर मुख्यतः स्वैच्छिक देहदान अथवा लावारिस शवों से प्राप्त किए जाते हैं, जिससे भावी चिकित्सक शरीर रचना विज्ञान का अध्ययन कर अपने नैदानिक कौशल विकसित कर सकें।
  • कैडेवर को प्रायः ‘चिकित्सा के प्रथम शिक्षक’ (First Teachers of Medicine) कहा जाता है।
  • कैडेवर केवल एक जैविक नमूना नहीं होता, बल्कि वह ऐसे व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जिसका अपना जीवन, पहचान, संबंध और अनुभव रहे हैं। इसलिए उसके साथ गरिमापूर्ण एवं सम्मानजनक व्यवहार करना चिकित्सा नैतिकता का एक महत्त्वपूर्ण अंग माना जाता है।

चिकित्सा प्रशिक्षण में निहित नैतिक आयाम

  • मानवीय गरिमा का सम्मान
    • रोगियों एवं शवों की गरिमा: चिकित्सा प्रशिक्षण में जीवित अथवा मृत प्रत्येक मानव शरीर के प्रति सम्मान, करुणा एवं गरिमा का भाव बनाए रखना आवश्यक है।
    • नैतिक उत्तरदायित्व: विद्यार्थियों को यह समझना चाहिए कि शव केवल अध्ययन की वस्तु नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने चिकित्सा शिक्षा के लिए अपना योगदान दिया है।
  • समनुभूति एवं करुणा
    • मानव-केंद्रित चिकित्सा: चिकित्सा शिक्षा का उद्देश्य ऐसे चिकित्सकों का निर्माण करना है, जो रोगियों को केवल रोग या प्रकरण के रूप में नहीं, बल्कि एक मानव के रूप में देखें।
    • भावनात्मक संवेदनशीलता: पीड़ा एवं मृत्यु के अनुभव से सहानुभूति सुदृढ़ होनी चाहिए, न कि भावनात्मक असंवेदनशीलता विकसित होनी चाहिए।
  • व्यावसायिकता एवं आचरण
    • चिकित्सकीय नैतिकता: चिकित्सकों एवं विद्यार्थियों को सम्मान, गोपनीयता, सत्यनिष्ठा तथा जवाबदेही के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।
    • उत्तरदायी व्यवहार: व्यावसायिक पहचान का प्रतिबिंब ऑफलाइन एवं ऑनलाइन दोनों प्रकार के आचरण में दिखाई देना चाहिए।
  • सूचित सहमति एवं स्वायत्तता
    • चयन के अधिकार का सम्मान: चिकित्सा अभ्यास में रोगी की स्वायत्तता एवं सूचित निर्णय लेने के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए।
    • शरीर दान की नैतिकता: शवों का उपयोग दाता की सहमति एवं समाज के विश्वास का सम्मान करते हुए किया जाना चाहिए।
  • अहित न करना एवं कल्याणकारी दृष्टिकोण
    • अहित न करना: चिकित्सा पेशेवरों को ऐसे कार्यों से बचना चाहिए जो शारीरिक, मानसिक या नैतिक क्षति पहुँचाएँ।
    • कल्याण को बढ़ावा देना: प्रशिक्षण से प्राप्त चिकित्सकीय ज्ञान का अंतिम उद्देश्य रोगी कल्याण एवं जनस्वास्थ्य की उन्नति होना चाहिए।
  • विज्ञान और मानवता के मध्य संतुलन
    • समग्र चिकित्सा शिक्षा: प्रशिक्षण में नैदानिक कौशलों के साथ सहानुभूति, नैतिकता एवं सामाजिक उत्तरदायित्व के मूल्यों का समावेश होना चाहिए।
    • चिकित्सा का भविष्य: कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं उन्नत स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों के युग में चिकित्सा के मानवीय पक्ष को बनाए रखना और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
  • जवाबदेही एवं उत्तरदायित्व
    • व्यावसायिक जवाबदेही: चिकित्सा विद्यार्थियों एवं चिकित्सकों को अपने कार्यों, निर्णयों एवं व्यवहार के लिए उत्तरदायित्व स्वीकार करना चाहिए।
    • जनविश्वास: चिकित्सा पेशे में समाज का विश्वास बनाए रखने के लिए नैतिक आचरण अनिवार्य है।
  • समानता एवं सामाजिक न्याय
    • निष्पक्ष व्यवहार: चिकित्सा शिक्षा को सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना सभी रोगियों के प्रति समानता, गैर-भेदभाव एवं सम्मान को बढ़ावा देना चाहिए।
    • वंचित वर्गों का संरक्षण: चिकित्सकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हाशिए पर स्थित एवं वंचित समुदायों के साथ गरिमापूर्ण एवं संवेदनशील व्यवहार किया जाए।

समानुभूति के अभाव के कारण

  • सोशल मीडिया संस्कृति का प्रभाव
    • ध्यान आकर्षित करने की प्रतिस्पर्द्धा: डिजिटल मंच प्रायः विवाद, सनसनीखेज सामग्री एवं उकसावे वाली प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करते हैं।
    • ऑनलाइन पहचान: चिकित्सा पेशेवरों पर कंटेंट क्रिएशन, लोकप्रियता एवं व्यक्तिगत छवि निर्माण का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
    • नैतिक चिंताएँ: अधिक दृश्यता एवं लोकप्रियता प्राप्त करने की प्रवृत्ति कभी-कभी पेशेवर नैतिकता एवं गरिमा के साथ टकराव उत्पन्न कर सकती है।
  • चिकित्सा शिक्षा का व्यावसायीकरण एवं तनाव
    • शैक्षणिक दबाव: चिकित्सा विद्यार्थियों को प्रतिस्पर्द्धी परीक्षाओं, अत्यधिक कार्यभार तथा दीर्घ प्रशिक्षण अवधि का सामना करना पड़ता है।
    • मूल्यों की उपेक्षा: शैक्षणिक दबावों के कारण नैतिक शिक्षा एवं समानुभूति-आधारित प्रशिक्षण को अपेक्षित महत्त्व नहीं मिल पाता है।
    • संतुलन की आवश्यकता: चिकित्सा शिक्षा में वैज्ञानिक उत्कृष्टता के साथ मानवीय मूल्यों एवं नैतिक उत्तरदायित्व का समुचित समन्वय होना चाहिए।

चिकित्सा विद्यार्थियों में समानुभूति को बढ़ावा देने हेतु विद्यमान संस्थागत उपाय

पहल उद्देश्य एवं नैतिक फोकस
1. फाउंडेशन कोर्स राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा प्रारंभ किया गया यह पाठ्यक्रम चिकित्सा विद्यार्थियों को प्रशिक्षण के प्रारंभिक चरण में व्यावसायिक मूल्यों, संचार कौशल तथा नैतिक सिद्धांतों से परिचित कराता है। यह वैज्ञानिक शिक्षा के साथ मानव-केंद्रित स्वास्थ्य सेवा को प्रोत्साहित करता है।
2. कैडेवरिक शपथ यह विद्यार्थियों को शवों को अपने प्रथम शिक्षक के रूप में स्वीकार करने तथा चिकित्सा शिक्षा में उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए प्रेरित करती है। इससे मानव अवशेषों के प्रति सम्मान, आभार एवं गरिमा का भाव विकसित होता है।
3. चिकित्सकीय नैतिकता प्रशिक्षण यह भावी चिकित्सकों में व्यावसायिक आचरण, रोगी की गरिमा तथा नैतिक निर्णय-निर्माण पर बल देता है। साथ ही, सहानुभूति, गोपनीयता एवं विश्वास के माध्यम से चिकित्सक–रोगी संबंधों को सुदृढ़ बनाता है।

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नैतिक चिकित्सा शिक्षा के क्रियान्वयन में चुनौतियाँ

  • नैतिकता संबंधी पाठ्यक्रमों को औपचारिकता के रूप में देखना
    • सीमित सहभागिता: नैतिक शिक्षा को अक्सर चिकित्सा प्रशिक्षण के अभिन्न अंग के बजाय केवल एक सैद्धांतिक आवश्यकता के रूप में पढ़ाया जाता है।
    • व्यावहारिक अनुप्रयोग का अभाव: विद्यार्थी कक्षा में नैतिक सिद्धांतों का अध्ययन तो करते हैं, किंतु वास्तविक नैदानिक परिस्थितियों एवं नैतिक दुविधाओं में उन्हें लागू करने के अवसर अपेक्षाकृत कम मिलते हैं।
    • एकीकरण की आवश्यकता: नैतिकता को चिकित्सा शिक्षा के प्रत्येक चरण में समाहित किया जाना चाहिए, न कि इसे एक पृथक या वैकल्पिक घटक के रूप में देखा जाए।
  • परीक्षा-केंद्रित अधिगम
    • तथ्यात्मक ज्ञान पर अत्यधिक बल: चिकित्सा परीक्षाएँ प्रायः नैदानिक ज्ञान, स्मरण-शक्ति एवं तकनीकी कौशलों को प्राथमिकता देती हैं, जबकि समानुभूति एवं व्यावसायिक मूल्यों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है।
    • सॉफ्ट स्किल्स की उपेक्षा: संचार कौशल, करुणा, भावनात्मक बुद्धिमत्ता एवं रोगियों के साथ संवाद जैसी क्षमताओं का सीमित मूल्यांकन किया जाता है।
    • प्रभाव: विद्यार्थी शैक्षणिक सफलता को प्राथमिकता देने लगते हैं, जिससे चिकित्सा के नैतिक एवं मानवीय पक्ष गौण हो जाते हैं।
  • नैतिक व्यवहार का मूल्यांकन करने में कठिनाई
    • मूल्यांकन की चुनौती: समानुभूति, सत्यनिष्ठा एवं करुणा जैसे नैतिक गुण जटिल होते हैं और इन्हें पारंपरिक लिखित परीक्षाओं के माध्यम से आसानी से नहीं मापा जा सकता।
    • बेहतर मूल्यांकन की आवश्यकता: चिकित्सा शिक्षा में रोगी प्रतिक्रिया, चिंतनात्मक अभ्यास, नैदानिक अवलोकन एवं संचार कौशल आधारित मूल्यांकन जैसी विधियों को अपनाने की आवश्यकता है।
    • उद्देश्य: मूल्यांकन केवल यह न मापे कि चिकित्सक क्या जानते हैं, बल्कि यह भी आँके कि वे चिकित्सा का अभ्यास कितनी जिम्मेदारी एवं मानवीय संवेदनशीलता के साथ करते हैं।
  • भावनात्मक असंवेदनशीलता
    • लगातार मृत्यु एवं पीड़ा का सामना: यदि उचित आत्मचिंतन एवं मार्गदर्शन का अभाव हो, तो मृत्यु एवं कष्ट के निरंतर संपर्क से भावनात्मक दूरी एवं असंवेदनशीलता विकसित हो सकती है।
  • मानविकी विषयों के प्रशिक्षण का अभाव
    • असंतुलित पाठ्यक्रम: चिकित्सा शिक्षा में जीवविज्ञान, रोग-निदान एवं उपचार पर अधिक बल दिया जाता है, जबकि दर्शनशास्त्र, नैतिकता, समाजशास्त्र एवं रोगियों के अनुभवों से संबंधित अध्ययन को अपेक्षाकृत कम महत्त्व मिलता है।

आगे की राह

  • नैतिक शिक्षा को सुदृढ़ बनाना
    • व्याख्यानों से आगे बढ़ना: नैतिक शिक्षा को केवल सैद्धांतिक शिक्षण तक सीमित न रखकर व्यावहारिक एवं अनुभवात्मक अधिगम से जोड़ा जाना चाहिए।
    • प्रकरण-आधारित अधिगम: नैदानिक मामलों एवं नैतिक दुविधाओं पर आधारित चर्चाओं के माध्यम से विद्यार्थियों को वास्तविक जीवन की चुनौतियों को समझने का अवसर दिया जाए।
    • चिंतनात्मक अभ्यास: समानुभूति एवं आत्म-जागरूकता विकसित करने हेतु चिंतनात्मक लेखन तथा रोगियों के साथ संवाद को प्रोत्साहित किया जाए।
  • सम्मान की संस्कृति को बढ़ावा देना
    • कृतज्ञता की संस्कृति: शव विच्छेदन कक्षों में शवों के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता की भावना विकसित करने वाली सार्थक परंपराओं को प्रोत्साहित किया जाए।
    • स्मृति एवं सम्मान कार्यक्रम: शरीर दाताओं के योगदान को स्वीकार करने हेतु स्मृति समारोह एवं कृतज्ञता कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।
    • नैतिक वातावरण: ऐसे शिक्षण वातावरण का निर्माण किया जाए, जो गरिमा एवं नैतिक आचरण को सुदृढ़ करे।
  • सहानुभूति एवं व्यावसायिक मूल्यों का मूल्यांकन
    • समग्र मूल्यांकन: चिकित्सा मूल्यांकन में शैक्षणिक ज्ञान के साथ संचार कौशल, व्यावसायिक व्यवहार एवं करुणा को भी शामिल किया जाए।
    • अंकों से परे मूल्यांकन: यह आकलन किया जाए कि विद्यार्थी केवल कितना जानते हैं, बल्कि रोगियों के साथ उनका व्यवहार और देखभाल का दृष्टिकोण कैसा है।
  • चिकित्सा मानविकी का समावेशन
    • मानव-केंद्रित प्रशिक्षण: चिकित्सा शिक्षा में साहित्य, दर्शनशास्त्र, चिकित्सा का इतिहास एवं रोगियों के अनुभवों को शामिल किया जाए।
    • मानवीय संवेदनाओं का संरक्षण: चिकित्सा मानविकी चिकित्सकों को मानवीय अनुभवों, पीड़ा एवं भावनाओं को समझने में सहायता करती है, जिससे स्वास्थ्य सेवा का मानवीय पक्ष सुदृढ़ होता है।
  • मार्गदर्शन एवं आदर्श प्रस्तुत करने की संस्कृति
    • शिक्षकों का प्रभाव: वरिष्ठ चिकित्सकों एवं संकाय सदस्यों को विद्यार्थियों के लिए नैतिक आचरण, समानुभूति एवं व्यावसायिकता के आदर्श के रूप में कार्य करना चाहिए।
    • मार्गदर्शित अधिगम: मार्गदर्शन कार्यक्रम विद्यार्थियों को नैतिक चुनौतियों एवं व्यावसायिक उत्तरदायित्वों का सामना करने में सहायता कर सकते हैं।
  • रोगी-केंद्रित नैदानिक प्रशिक्षण को सुदृढ़ बनाना
    • वास्तविक जीवन का अनुभव: रोगियों के साथ अधिक संवाद विद्यार्थियों को पीड़ा, सामाजिक वास्तविकताओं एवं भावनात्मक आवश्यकताओं को समझने में मदद कर सकता है।
    • समग्र देखभाल: प्रशिक्षण में रोगी की गरिमा, सूचित सहमति एवं साझा निर्णय-निर्माण को विशेष महत्त्व दिया जाना चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी का उत्तरदायी उपयोग
    • डिजिटल स्वास्थ्य में नैतिकता: चिकित्सा शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल स्वास्थ्य अभिलेखों एवं उभरती प्रौद्योगिकियों से जुड़े नैतिक प्रश्नों को शामिल किया जाए।
    • मानवीय संबंधों का संरक्षण: प्रौद्योगिकी का उपयोग स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने के लिए हो, किंतु समानुभूति, विश्वास एवं चिकित्सक–रोगी संबंधों को बनाए रखते हुए।

निष्कर्ष

कैडेवर विवाद केवल तकनीकी दक्षता तक सीमित चिकित्सा शिक्षा के बजाय नैतिक, संवेदनशील और मानवीय चिकित्सा प्रशिक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता है। एक चिकित्सक केवल रोगों और अंगों का नहीं, बल्कि गरिमा, भावनाओं और अधिकारों से युक्त व्यक्तियों का उपचार करता है। अतः चिकित्सा शिक्षा में वैज्ञानिक उत्कृष्टता के साथ समानुभूति, नैतिकता और मानवीय मूल्यों का संतुलन स्थापित करना आवश्यक है, तथा चिकित्सा के प्रथम शिक्षकों—कैडेवरों (शवों)—के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना बनाए रखनी चाहिए।

चिकित्सा प्रशिक्षण में समानुभूति

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