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17 Jun 2026

GRAPES-3 प्रयोग 

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शोधकर्ताओं ने GRAPES-3 टेलीस्कोप के 22 वर्षों के म्यूऑन (Muon) डेटा का उपयोग करके पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में होने वाले वास्तविक समय परिवर्तनों की निगरानी की है।

GRAPES-3 प्रयोग के प्रमुख निष्कर्ष

  • कॉस्मिक-रे प्रोटॉन स्पेक्ट्रम में “हार्डनिंग” की खोज: GRAPES-3 ने लगभग 166 टेरा इलेक्ट्रॉन वोल्ट (TeV) पर कॉस्मिक-रे प्रोटॉन स्पेक्ट्रम में एक स्पष्ट ‘बेंड’ (Bend/Knee) या सॉफ्टनिंग (Softening) का पता लगाया है।
    • यह खोज ब्रह्मांड में कॉस्मिक किरणों के स्रोतों तथा उनके त्वरण तंत्र को समझने में महत्त्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान करती है।
  • कॉस्मिक-रे एनीसोट्रॉपी का अवलोकन: प्रयोग ने टेरा इलेक्ट्रॉन वोल्ट (TeV) ऊर्जा स्तर पर कॉस्मिक किरणों के आगमन दिशाओं में छोटे पैमाने की असमान (Anisotropic) संरचनाओं की पहचान की।
    • यह संकेत देता है कि कॉस्मिक किरणें पूर्णतः समान रूप से नहीं आतीं, बल्कि स्थानीय चुंबकीय क्षेत्रों तथा निकटवर्ती खगोलीय स्रोतों से प्रभावित होती हैं।
  • ऊपरी वायुमंडल की वास्तविक समय निगरानी: भारतीय एवं जापानी शोधकर्ताओं द्वारा 22 वर्षों के म्यूऑन डेटा के विश्लेषण से पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल के तापमान एवं घनत्व में होने वाले परिवर्तनों की रियल-टाइम निगरानी संभव हुई।
    • यह दर्शाता है कि कॉस्मिक-रे म्यूऑन का उपयोग वायुमंडलीय एवं अंतरिक्ष मौसम अनुसंधान के लिए एक प्रभावी उपकरण के रूप में किया जा सकता है।

GRAPES-3 के बारे में

  • गामा रे एस्ट्रोनॉमी पेटा-इलेक्ट्रॉन वोल्ट एनर्जीज फेज-3 (Gamma Ray Astronomy Peta-electron volt (PeV) EnergieS Phase-3: GRAPES-3) एक कॉस्मिक-रे वेधशाला एवं म्यूऑन टेलीस्कोप है, जो तमिलनाडु के ऊटी में लगभग 2,200 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।
    • म्यूऑन (Muons): म्यूऑन उच्च-ऊर्जा उप-परमाण्विक कण हैं, जो तब उत्पन्न होते हैं, जब कॉस्मिक किरणें पृथ्वी के वायुमंडल में परमाणुओं से टकराती हैं।
      • म्यूऑन का विद्युत आवेश इलेक्ट्रॉन के समान नकारात्मक होता है, किंतु इसका द्रव्यमान लगभग 207 गुना अधिक होता है।
    • कॉस्मिक किरणें: ये अत्यंत उच्च-ऊर्जा युक्त आवेशित कण हैं, जो बाह्य अंतरिक्ष से आते हैं, जिनकी ऊर्जा लगभग 10 से 10² eV के बीच होती है।
  • संचालन: इस प्रयोग का संचालन टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान (TIFR) द्वारा किया जाता है।
  • उद्देश्य
    • आकाशगंगा एवं उससे परे कॉस्मिक किरणों के स्रोत, त्वरण एवं प्रसार का अध्ययन करना।
    • कॉस्मिक-रे ऊर्जा स्पेक्ट्रम में “नी (Knee)” (वक्रता बिंदु) का अध्ययन करना।
    • अत्यंत उच्च ऊर्जा कॉस्मिक किरणों के उत्पादन एवं त्वरण की प्रक्रिया को समझना।
    • न्यूट्रॉन तारे एवं अन्य सघन खगोलीय पिंडों से आने वाली मल्टी-टेरा इलेक्ट्रॉन वोल्ट (TeV) गामा किरणों का अध्ययन करना।
    • सूर्य को उच्च-ऊर्जा कणों के स्रोत के रूप में तथा पृथ्वी पर उनके प्रभावों का अध्ययन करना।
  • मुख्य घटक
    • एयर शावर डिटेक्टर एरे: कॉस्मिक किरणों के वायुमंडल से टकराने पर उत्पन्न व्यापक वायु-वृष्टि का पता लगाता है।
    • लार्ज एरिया म्यूऑन डिटेक्टर: कॉस्मिक किरणों से उत्पन्न उच्च-ऊर्जा म्यूऑन्स को मापता है।
    • प्रोपोर्शनल काउंटर: गैस-आधारित डिटेक्टर जो म्यूऑन से उत्पन्न विद्युत संकेतों को रिकॉर्ड करते हैं।
    • कंकरीट एब्जॉर्बर: निम्न-ऊर्जा कणों को रोकते हैं, जिससे केवल उच्च-ऊर्जा म्यूऑन ही डिटेक्टर तक पहुँच पाते हैं।

GRAPES का विकास

यह परियोजना ऊटी स्थित कॉस्मिक रे प्रयोगशाला में किए गए अग्रणी कॉस्मिक-रे अनुसंधान की निरंतरता है।

  • GRAPES-1: वर्ष 1992 में प्रारंभ हुआ। यह कॉस्मिक किरणों से उत्पन्न विस्तृत एयर शावर अध्ययन का प्रारंभिक प्रयोग था।
    • समय के साथ शोधकर्ताओं ने इसकी डिटेक्टर प्रणालियों को विभिन्न चरणों में उन्नत किया।
  • GRAPES-2: यह GRAPES-1 का उन्नत संस्करण है। इसमें डिटेक्टर प्रणाली को और अधिक उन्नत एवं विस्तारित किया गया, जिससे वैज्ञानिक क्षमताओं में वृद्धि हुई।
  • GRAPES-3: यह इस शृंखला का तीसरा एवं वर्तमान पीढ़ी का वेधशाला प्रयोग है। पुराने स्थल पर भौतिक एवं प्रशासनिक सीमाओं के कारण विस्तार संभव न होने पर इसे रेडियो एस्ट्रोनॉमी सेंटर (RAC) स्थल पर, लगभग 8 किमी. दूर स्थापित किया गया।
    • यह 1 जनवरी, 2000 से पूर्णतः कार्यरत है।

महत्त्व

GRAPES-3 वायुमंडल में होने वाले परिवर्तनों की वास्तविक समय निगरानी संभव बनाता है। यह कॉस्मिक-रे अनुसंधान को आगे बढ़ाता है तथा उच्च-ऊर्जा खगोल भौतिकी की समझ को गहरा करता है। यह अंतरिक्ष मौसम तथा सूर्य–पृथ्वी अंतःक्रियाओं के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।

श्वानजांग के कार्य पर भारत–चीन संयुक्त यूनेस्को नामांकन

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भारत और चीन 7वीं शताब्दी के चीनी बौद्ध भिक्षु-विद्वान श्वानजांग (ह्वेन त्सांग) की यात्रा-वृत्तांत “द ग्रेट तांग रिकॉर्ड्स ऑन द वेस्टर्न रीजन” के संयुक्त यूनेस्को नामांकन के लिए उन्नत वार्ताओं में हैं।

अन्य प्रस्तावित संयुक्त नामांकन

  • पंचतंत्र: भारत और ईरान।
    • पंचतंत्र फारसी साहित्य एवं लोककथाओं का अभिन्न अंग बन चुका है।
  • सत्याग्रह का दर्शन: भारत और दक्षिण अफ्रीका।
    • सत्याग्रह का विकास एवं प्रयोग सर्वप्रथम महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष के दौरान किया गया था।

श्वानजांग (ह्वेन त्सांग) के बारे में

  • श्वानजांग (लगभग 602–664 ई.) तांग राजवंश के एक चीनी बौद्ध भिक्षु, विद्वान एवं तीर्थयात्री थे।
  • भारत की यात्रा
    • वे 629 ई. में चीन से प्रामाणिक बौद्ध ग्रंथों की खोज एवं बौद्ध धर्म के मूल अध्ययन हेतु निकले।
    • उन्होंने मध्य एशिया से होकर यात्रा की और हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत पहुँचे।
    • उन्होंने 7वीं शताब्दी ई. में लगभग 19 वर्षों तक भारत का भ्रमण किया।
  • नालंदा से संबंध: उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय में प्रसिद्ध विद्वान शीलभद्र के अधीन बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया।
    • नालंदा उस समय एशिया का प्रमुख बौद्ध शिक्षा केंद्र था।
  • फासियांग संप्रदाय: फासियांग (Weishi) संप्रदाय चीनी बौद्ध धर्म का एक विद्यालय है, जो महायान बौद्ध धर्म की योगाचार (विज्ञानवाद) परंपरा पर आधारित है।
    • यह “केवल चेतना (Consciousness-Only/ Vijñaptimātratā)” सिद्धांत पर बल देता है, जिसके अनुसार वास्तविकता का अनुभव चेतना के माध्यम से होता है।
    • इस संप्रदाय के विकास में श्वानजांग का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा, जिन्होंने योगाचार शिक्षाओं को चीन में प्रस्तुत एवं व्यवस्थित किया।
  • साहित्यिक योगदान: उन्होंने “द ग्रेट तांग रिकॉर्ड्स ऑन द वेस्टर्न रीजन (Datang Xiyu Ji)” की रचना की, जो 7वीं शताब्दी में मध्यकालीन भारत की उनकी यात्रा का विस्तृत विवरण एवं यात्रा-वृत्तांत है।
  • उनके ग्रंथ में वर्णित विषय
    • राजनीतिक परिस्थितियाँ एवं प्रशासन
    • सामाजिक रीति-रिवाज एवं दैनिक जीवन
    • धार्मिक परंपराएँ, विशेषकर बौद्ध धर्म
    • भूगोल, जलवायु एवं व्यापार मार्ग
    • मध्य एवं दक्षिण एशिया के 100 से अधिक राज्यों का विवरण।
  • हर्षवर्धन से संबंध
    • ह्वेन त्सांग को हर्षवर्धन का संरक्षण प्राप्त था।
    • उन्होंने हर्षवर्धन द्वारा आयोजित धार्मिक सभाओं में भाग लिया।
  • उनके लेखन का महत्त्व: उनके विवरण 7वीं शताब्दी के भारत के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक इतिहास के पुनर्निर्माण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
    • हर्षवर्धन के शासनकाल के अध्ययन के लिए यह एक प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत माना जाता है।

संयुक्त नामांकन के कारण

  • प्रक्रिया में तेजी लाना: संयुक्त नामांकन से देश यूनेस्को नामांकन प्रक्रिया में होने वाली देरी से बच सकते हैं।
  • डॉजियर अवरोध को पार करना: प्रत्येक देश को यूनेस्को की दो वर्षीय विरासत चक्र में केवल दो डॉजियर जमा करने की अनुमति होती है।
  • बहु-देशीय भागीदारी को सुगम बनाना: संयुक्त नामांकन में भाग लेने वाले देशों की संख्या पर कोई सीमा नहीं होती है।
    • एक डॉजियर एक देश द्वारा नेतृत्व में तैयार किया जा सकता है और अन्य देशों द्वारा समर्थित किया जा सकता है।
  • साझा विरासत का उपयोग: ब्रिक्स (BRICS) देशों में साझा सांस्कृतिक विरासत पाई जाती है। उदाहरण:
    • भारत और इंडोनेशिया में रामायण परंपराएँ।
    • भारत और चीन के बीच बौद्ध धर्मग्रंथों की साझा परंपरा।
    • भारत और ईरान में पंचतंत्र की कथाएँ।
  • विरासत स्वामित्व विवादों से बचाव: संयुक्त नामांकन साझा सांस्कृतिक धरोहर पर प्रतिस्पर्द्धी दावों को रोक सकता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2017 में भारत और चीन दोनों ने सोवा-रिग्पा (तिब्बती चिकित्सा प्रणाली) पर अलग-अलग यूनेस्को नामांकन प्रस्तुत किए, जिसमें दोनों ने इसे अपनी विरासत बताया।

भारत–जापान संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र (JCM)

भारत और जापान ने पेरिस समझौते के अनुच्छेद-6.2 के अंतर्गत संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र (JCM) के कार्यान्वयन नियमों को अपनाया है।

भारत–जापान संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र (JCM) के बारे में

  • संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र (JCM) भारत और जापान के बीच एक द्विपक्षीय सहयोग ढाँचा है, जिसे पेरिस समझौते के अनुच्छेद-6.2 के अंतर्गत स्थापित किया गया है।
    • अनुच्छेद-6.2: यह देशों के बीच सहयोगात्मक दृष्टिकोणों की अनुमति देता है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थानांतरित शमन परिणाम (ITMOs) का उपयोग शामिल है।
  • उत्पत्ति: संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र (JCM) की शुरुआत 7 अगस्त, 2025 को हुई, जब दोनों देशों ने एक सहयोग ज्ञापन (MoC) पर हस्ताक्षर किए।
  • उद्देश्य: अग्रणी डी-कार्बोनाइजेशन तकनीकों, हरित निवेश एवं अवसंरचना के हस्तांतरण को सुगम बनाना।
  • मुख्य घटक
    • तकनीक हस्तांतरण: जापान की उन्नत कम-कार्बन एवं ऊर्जा-कुशल तकनीकों का भारत में उपयोग बढ़ाना।
    • जलवायु शमन: ऐसी परियोजनाओं का समर्थन करना, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम या समाप्त करें।
    • निवेश जुटाना: नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, सतत् विमान ईंधन (SAF) एवं ऊर्जा दक्षता जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक एवं निजी निवेश को प्रोत्साहित करना।
    • NDCs को समर्थन: पेरिस समझौते के अंतर्गत भारत एवं जापान की राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान (NDCs) की प्राप्ति में सहायता करना।
  • संरचना एवं प्रक्रिया
    • संयुक्त समिति: दोनों देशों के प्रतिनिधियों की एक संयुक्त समिति इस तंत्र के कार्यान्वयन की निगरानी करती है।
    • परियोजना अनुमोदन प्रक्रिया: पात्र जलवायु परियोजनाओं के पंजीकरण एवं अनुमोदन हेतु पारदर्शी प्रक्रिया निर्धारित की गई है।
    • सत्यापन एवं प्रमाणीकरण: उत्सर्जन में कमी की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने हेतु स्वतंत्र तृतीय-पक्ष द्वारा सत्यापन एवं प्रमाणीकरण अनिवार्य है।
    • राष्ट्रीय रजिस्ट्रियाँ: कार्बन क्रेडिट के जारी होने, स्थानांतरण एवं लेखांकन को ट्रैक करने हेतु अलग रजिस्ट्रियाँ रखी जाती हैं।
    • सतत् विकास सुरक्षा उपाय: यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी परियोजनाएँ भारत में सतत् विकास लक्ष्यों में योगदान दें।

महत्त्व: संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र (JCM) जलवायु वित्त, तकनीकी हस्तांतरण और कार्बन बाजार सहयोग को बढ़ावा देता है, साथ ही भारत के निम्न-कार्बन संक्रमण और सतत् विकास लक्ष्यों की प्राप्ति को तीव्र करता है।

सरकार ने बिना पर्ची (ओवर-द-काउंटर) कफ सिरप की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया

सरकार ने संदूषण-जनित बाल मृत्यु और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बाद कफ सिरप से संबंधित नियमों को कड़ा कर दिया है।

संबंधित तथ्य

  • यह कदम कफ सिरप में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकॉल (EG) के संदूषण से जुड़ी कई घटनाओं के बाद उठाया गया है।
    • डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकॉल (EG) विषैले औद्योगिक विलायक हैं। यदि ये गलती से दवाओं में मिल जाएँ, तो यह विशेषकर बच्चों में गंभीर स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न करते हैं। इसके प्रभाव में तीव्र किडनी विफलता, तंत्रिका क्षति और मृत्यु तक शामिल हैं।
  • वैश्विक सुरक्षा चिंताएँ: वर्ष 2022 के बाद से भारतीय निर्मित कफ सिरप को गांबिया, उज्बेकिस्तान और कैमरून जैसे देशों में बच्चों की मृत्यु से जोड़ा गया है। इसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने चेतावनी जारी की थी।

नियमों में परिवर्तन के बारे में

  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने औषधि नियम, 1945 में संशोधन किया है, जिसके तहत कफ सिरप और अन्य औषधीय सिरप की खरीद के लिए डॉक्टर का पर्चा अनिवार्य कर दिया गया है।
  • संशोधन: संशोधन के अनुसार औषधि नियम, 1945 की अनुसूची-K से “सिरप (Syrup)” शब्द को हटा दिया गया है।
  • पूर्व प्रावधान: पहले अनुसूची-K के अंतर्गत कुछ छूट दी गई थी, जिसके तहत विशेषकर 1,000 से कम जनसंख्या वाले गाँवों में कफ सिरप की बिक्री की अनुमति थी।
  • उद्देश्य: इस कदम का उद्देश्य देशभर में कफ सिरप की निगरानी, गुणवत्ता नियंत्रण और सुरक्षित वितरण को सुदृढ़ करना है।
    • इसका लक्ष्य उपभोक्ता सुरक्षा को बढ़ाना तथा सिरप-आधारित औषधीय फॉर्मूलेशनों के दुरुपयोग, संदूषण और अनियंत्रित बिक्री को रोकना है।
  • लाइसेंस प्राप्त फार्मेसी से बिक्री: अब औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के अनुसार कफ सिरप का विक्रय एवं वितरण केवल विधिवत लाइसेंस प्राप्त औषधि विक्रेताओं (फार्मेसियों) के माध्यम से ही किया जा सकेगा।
  • अनुसूची-K क्या है: अनुसूची-K, औषधि नियम, 1945, की वह सूची है, जिसमें कुछ दवाओं को विशेष परिस्थितियों में अधिनियम के कुछ प्रावधानों से छूट दी जाती है।
  • उपलब्ध OTC विकल्प: यह प्रतिबंध विशेष रूप से सिरप-आधारित औषधीय फॉर्मूलेशनों पर लागू है, जबकि कफ लोजेंज, टैबलेट और गोलियाँ अब भी बिना चिकित्सकीय पर्चे (ओवर-द-काउंटर) के उपलब्ध रहेंगी।

विंड टरबाइन मैटेरियल्स एंड रिसोर्सेज यूटिलिटी ट्रैकर (WT-MARUT)

भारत ने घरेलू पवन ऊर्जा विनिर्माण को सुदृढ़ करने के लिए विंड टरबाइन मैटेरियल्स एंड रिसोर्सेज यूटिलिटी ट्रैकर (WT-MARUT), देश का पहला समर्पित पवन टरबाइन आपूर्ति शृंखला प्रबंधन पोर्टल, लॉन्च किया है।

विंड टरबाइन मैटेरियल्स एंड रिसोर्सेज यूटिलिटी ट्रैकर (WT-MARUT) के बारे में

  • WT-MARUT भारत का पहला समर्पित डिजिटल मंच है, जिसे पवन टरबाइन आपूर्ति शृंखला पारिस्थितिकी तंत्र के प्रबंधन एवं सुदृढ़ीकरण के लिए विकसित किया गया है।
  • मंत्रालय: इस पोर्टल को नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) द्वारा लॉन्च किया गया है।
    • इसे MNRE के तत्त्वावधान में भारतीय पवन टरबाइन निर्माता संघ (IWTMA) के सहयोग से विकसित किया गया है।
  • उद्देश्य: WT-MARUT का उद्देश्य आपूर्ति शृंखला की दृश्यता में सुधार, स्थानीय स्रोतों को प्रोत्साहन, हितधारकों के बीच सहयोग को सुदृढ़ करने तथा निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने के माध्यम से भारत के घरेलू पवन ऊर्जा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाना है।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • आपूर्ति शृंखला दृश्यता: पवन टरबाइन विनिर्माण एवं घटक आपूर्ति शृंखला में प्रारंभ से अंत तक पूर्ण दृश्यता प्रदान करता है।
    • आपूर्तिकर्ता खोज एवं प्रमाणीकरण: घरेलू आपूर्तिकर्ताओं एवं निर्माताओं की पहचान, मूल्यांकन तथा ऑनबोर्डिंग को सक्षम बनाता है।
    • ALMM अनुपालन समर्थन: बेहतर ट्रेसबिलिटी एवं दस्तावेजीकरण के माध्यम से स्वीकृत मॉडल एवं निर्माता सूची (ALMM) ढाँचे के अनुपालन को सुगम बनाता है।
    • हितधारक सहयोग: निर्माताओं, घटक आपूर्तिकर्ताओं, परियोजना विकासकर्ताओं एवं सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय को बढ़ावा देता है।
    • निर्यात तत्परता: भारतीय निर्माताओं को वैश्विक मानकों को पूरा करने तथा अंतरराष्ट्रीय पवन ऊर्जा बाजारों में भागीदारी बढ़ाने में सहायता प्रदान करता है।

भारत में पवन ऊर्जा की स्थिति

  • भारत में 56 गीगावाट (GW) से अधिक स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता है, जिससे यह विश्व का चौथा सबसे बड़ा पवन ऊर्जा बाजार बन गया है।
  • भारत की अनुमानित पवन ऊर्जा क्षमता लगभग 1,164 GW है।
  • केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA), द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) तथा राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान (NIWE) ने अनुमान लगाया है कि सफल, किफायती एवं सतत् ऊर्जा संक्रमण सुनिश्चित करने के लिए भारत को वर्ष 2030 तक 100 GW से अधिक पवन ऊर्जा क्षमता की आवश्यकता होगी।
    • राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान (NIWE) भारत में पवन ऊर्जा अनुसंधान एवं संसाधन आकलन हेतु शीर्ष  संस्थान है।

महत्त्व: वित्त वर्ष 2025–26 में पवन ऊर्जा उपकरणों का निर्यात ₹12,000 करोड़ से अधिक होने के साथ, WT-MARUT से भारत के पवन ऊर्जा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने तथा वर्ष 2030 तक वैश्विक पवन टरबाइन निर्यात में 10% और वर्ष 2040 तक 20% हिस्सेदारी प्राप्त करने के लक्ष्य को समर्थन मिलने की अपेक्षा है।

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