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वैश्विक तापमान वृद्धि पर विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की रिपोर्ट

30 May 2026

संदर्भ

हाल ही में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने यूनाइटेड किंगडम मेट ऑफिस  (UK Met Office) के सहयोग से ग्लोबल एनुअल-टू-डिकेडल क्लाइमेट अपडेट (Global Annual-to-Decadal Climate Update), 2026–2030 जारी किया।

संबंधित तथ्य

  • रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि आगामी पाँच वर्षों के दौरान वैश्विक औसत सतही तापमान रिकॉर्ड-स्तर के आसपास या उसके निकट बना रहेगा। इसके प्रमुख कारण मानवजनित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों में तीव्र वृद्धि तथा निकट भविष्य में संभावित चक्रीय एल-नीनो (El Niño) प्रणाली का प्रभाव हैं।

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प्रमुख सांख्यिकीय अनुमान (2026–2030)

रिपोर्ट निकट भविष्य में वैश्विक तापमान विचलनों से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण मात्रात्मक सीमाओं को रेखांकित करती है:

  • तापमान सीमा: वर्ष 2026 से 2030 के बीच वार्षिक वैश्विक औसत निकट-सतही तापमान के पूर्व-औद्योगिक आधाररेखा (1850–1900 के औसत) के 1.3°C से 1.9°C अधिक रहने का अनुमान है।
  • वर्ष 2024 के रिकॉर्ड को पार करने की संभावना: इस पाँच-वर्षीय अवधि के दौरान वर्ष 2024 को अब तक के सर्वाधिक गर्म वर्ष के रूप में दर्ज रिकॉर्ड को पार करने की 86% संभावना है।
  • 1.5°C सीमा का अस्थायी उल्लंघन: कम-से-कम एक वर्ष के लिए वैश्विक औसत निकट-सतही तापमान के पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5°C से अधिक पहुँचने की 91% संभावना व्यक्त की गई है।
  • पाँच-वर्षीय औसत सीमा: रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026–2030 की संपूर्ण पाँच-वर्षीय औसत तापमान वृद्धि के 1.5°C सीमा से अधिक होने की 75% संभावना है।
  • 2°C अवरोध: वर्ष 2030 से पहले किसी भी एकल वर्ष में तापमान वृद्धि के 2.0°C से अधिक पहुँचने की संभावना अत्यंत कम (1% से भी कम) बताई गई है।

जलवायु प्रेरक कारक – एल-नीनो का प्रभाव

निकट भविष्य में तीव्र तापमान वृद्धि का संबंध मुख्यतः प्रशांत महासागर की व्यापक महासागरीय गतिशीलताओं से है।

  • चक्रीय संक्रमण: रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 के अंत तक एल-नीनो (El Niño) परिस्थितियों के विकसित होने की प्रबल प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। इसके वर्ष 2027 एवं 2028 के दौरान मध्य उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 क्षेत्र (Niño 3.4 Region) पर प्रभावी बने रहने की संभावना है।
  • संयुक्त प्रभाव तंत्र: जहाँ ग्रीनहाउस गैसों का संचय दीर्घकालिक तापमान वृद्धि का आधार तैयार करता है, वहीं एल-नीनो महासागर में संचित विशाल मात्रा की ऊष्मा को वायुमंडल में मुक्त कर देता है। परिणामस्वरूप, वर्ष 2027 के अब तक के सभी रिकॉर्ड तोड़ने वाले तापमानों का सबसे संभावित वर्ष बनने की आशंका व्यक्त की गई है।

IPCC का 1.5°C लक्ष्य

  • पेरिस जलवायु समझौते का लक्ष्य: वर्ष 2015 के पेरिस जलवायु समझौते के अंतर्गत दीर्घकालिक वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर (1850–1900) से 1.5°C तक सीमित रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, ताकि जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों से बचा जा सके।
  • जलवायु प्रतिबद्धताएँ: देशों को वर्ष 2031–2035 की अवधि के लिए अपने अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (Nationally Determined Contributions-NDCs) प्रस्तुत करने हैं, जिनका उद्देश्य 1.5°C लक्ष्य की प्राप्ति सुनिश्चित करना है।

1.5°C सीमा के उल्लंघन के निहितार्थ

  • चरम मौसमी घटनाओं में वृद्धि: 1.5°C सीमा के उल्लंघन से हीटवेव, सूखा, चक्रवात एवं बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाओं की तीव्रता एवं आवृत्ति बढ़ेगी। इसका गंभीर प्रभाव संवेदनशील आबादी, कृषि क्षेत्र तथा अवसंरचना पर पड़ेगा।
  • जैव विविधता का ह्रास: प्रवाल भित्तियों एवं आर्कटिक पारिस्थितिक तंत्रों को अपरिवर्तनीय क्षति पहुँच सकती है। आवासीय क्षेत्रों के विनाश एवं तापमान तनाव के कारण प्रजातियों के विलुप्त होने की दर में वृद्धि होगी।
  • समुद्र-जलस्तर में वृद्धि एवं हिमनदों का पिघलना: ध्रुवीय हिमचादरों (Polar Ice Sheets) एवं हिमनदों के तीव्रता से पिघलने के कारण समुद्र-जलस्तर वृद्धि की गति तेज होगी। इससे तटीय समुदायों एवं लघु द्वीपीय राष्ट्रों के अस्तित्व पर गंभीर खतरा उत्पन्न होगा।
  • खाद्य एवं जल असुरक्षा: मानसून पैटर्न में व्यवधान, कृषि उत्पादकता में कमी तथा मीठे जल की उपलब्धता में गिरावट वैश्विक खाद्य संकट को बढ़ा सकती है। इससे संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष की संभावना भी बढ़ेगी।

क्षेत्रीय विविधताएँ एवं जल-मौसमी विसंगतियाँ

ग्लोबल वार्मिंग सभी क्षेत्रों में समान रूप से नहीं है। रिपोर्ट विभिन्न क्षेत्रों में गंभीर असमानताओं को रेखांकित करती है।

  • आर्कटिक प्रवर्धन: आगामी पाँच विस्तारित उत्तरी गोलार्द्धीय शीत ऋतुओं के दौरान आर्कटिक में तापमान विचलन के वर्ष 1991–2020 आधाररेखा से औसतन 2.8°C अधिक रहने का अनुमान है। यह वैश्विक औसत की तुलना में लगभग 3.5 गुना अधिक तेजी से तापमान वृद्धि को दर्शाता है।
  • ‘अल्बीडो’ तंत्र: ध्रुवीय क्षेत्रों में तीव्र तापवृद्धि के कारण बैरेंट्स सागर (Barents Sea), बेरिंग सागर (Bering Sea) एवं ओखोत्स्क सागर (Okhotsk Sea) में ग्रीष्मकालीन समुद्री बर्फ की मात्रा में उल्लेखनीय कमी आने की संभावना है। इससे पृथ्वी के अल्बीडो प्रभाव (Albedo Effect) अर्थात सूर्य के विकिरण को परावर्तित करने की क्षमता में कमी आएगी। परिणामस्वरूप पृथ्वी अधिक ऊष्मा अवशोषित करेगी, जिससे वैश्विक तापवृद्धि और तेज हो जाएगी।
  • वर्षा पैटर्न में परिवर्तन:
    • आर्द्र विसंगतियाँ: साहेल क्षेत्र, उत्तरी यूरोप, अलास्का तथा साइबेरिया में सामान्य से अधिक वर्षा होने का पूर्वानुमान है।
    • शुष्क विसंगतियाँ: अमेजन बेसिन में लगातार शुष्क परिस्थितियों की उच्च संभावना व्यक्त की गई है, जिससे विनाशकारी वनाग्नियों की घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।

विधिक ढाँचे की समझ

WMO द्वारा रेखांकित एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा यह है कि तापमान में अस्थायी वृद्धि (Temporary Spike) और औपचारिक संधि-उल्लंघन (Formal Treaty Violation) में स्पष्ट अंतर होता है।

  • 1.5°C लक्ष्य: पेरिस जलवायु समझौते, COP-21 (2015) के अंतर्गत हस्ताक्षरकर्ता देशों ने वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से अत्यधिक कम रखने तथा इसे 1.5°C तक सीमित करने के प्रयास करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी।
  • दीर्घकालिक मानक: तापमान में अस्थायी वृद्धि, जैसे वर्ष 2024 में 1.55°C अथवा वर्ष 2026–2030 के बीच अनुमानित अस्थायी वृद्धि, पेरिस समझौते का विधिक उल्लंघन नहीं मानी जाती।
  • उल्लंघन की परिभाषा: अंतरराष्ट्रीय जलवायु व्यवस्था में तापवृद्धि का आकलन लगभग 20–30 वर्षों तक बने रहने वाले दीर्घकालिक जलवायवीय औसत के आधार पर किया जाता है। अतः किसी एक वर्ष या कुछ वर्षों के लिए सीमा का पार होना संधि-उल्लंघन नहीं माना जाता।
  • जलवायु कार्रवाई के लिए निहितार्थ: यद्यपि अस्थायी रूप से 1.5°C सीमा का पार होना औपचारिक संधि-उल्लंघन नहीं है, फिर भी यह संकेत देता है कि विश्व अपना शेष कार्बन बजट (Carbon Budget) तेजी से समाप्त कर रहा है।
    • तापमान वृद्धि का प्रत्येक अतिरिक्त 0.1°C क्षेत्रीय जलवायु अनुकूलन क्षमता को कमजोर करता है तथा चरम एवं बहु-जोखिमीय मौसमीय घटनाओं की आवृत्ति एवं तीव्रता को बढ़ाता है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के बारे में

  • उत्पत्ति एवं स्थिति: 23 मार्च 1950 को स्थापित विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organization – WMO) का उद्भव वर्ष 1873 में स्थापित अंतरराष्ट्रीय मौसम विज्ञान संगठन (International Meteorological Organization – IMO) के प्रतिस्थापन स्वरुप हुआ था। वर्तमान में यह संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक विशिष्ट एजेंसी है, जिसका मुख्यालय जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड में स्थित है। 23 मार्च को प्रतिवर्ष विश्व मौसम विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है।
  • मुख्य दायित्व: WMO पृथ्वी के वायुमंडल, भूमि एवं महासागरों के साथ उसकी अंतःक्रिया, उससे उत्पन्न जलवायु तथा जल संसाधनों के वितरण से संबंधित वैश्विक स्तर की प्रमुख संस्था के रूप में कार्य करता है।
  • डेटा नीति: यह अपने 193 सदस्य देशों एवं क्षेत्रों के बीच वास्तविक समय के मौसमीय आँकड़ों, उपग्रह प्रेक्षण तथा जल-मौसम विज्ञान संबंधी उत्पादों के मुक्त एवं निर्बाध आदान-प्रदान का समन्वय एवं प्रोत्साहन करता है।
  • प्रमुख संस्थागत संबंध: वर्ष 1988 में WMO ने संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के साथ मिलकर अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) की स्थापना की। IPCC का उद्देश्य वैश्विक जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न जोखिमों का वैज्ञानिक मूल्यांकन करना है।
  • प्रमुख प्रकाशन: WMO विश्वसनीय एवं प्रामाणिक वैश्विक जलवायु रिपोर्टें प्रकाशित करता है, जिनमें स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट (State of the Global Climate Report) और ‘ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन’ (Greenhouse Gas Bulletin)  प्रमुख हैं।
  • भारत से संबंध: भारत WMO का संस्थापक सदस्य है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD), नई दिल्ली को WMO द्वारा क्षेत्रीय विशिष्ट मौसम विज्ञान केंद्र (RSMC) के रूप में नामित किया गया है। यह उत्तरी हिंद महासागर में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की निगरानी, पूर्वानुमान एवं नामकरण के लिए उत्तरदायी संस्था है।

वैश्विक तापमान वृद्धि पर विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की रिपोर्ट

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