संदर्भ
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनल ने अपने भारत दौरे के दौरान भारत–नेपाल सीमा विवाद को कूटनीतिक संवाद तथा मौजूदा द्विपक्षीय तंत्रों के माध्यम से सुलझाने पर बल दिया।

संबंधित तथ्य
- यह यात्रा कालापानी–लिपुलेख–लिंपियाधुरा सीमा विवाद तथा नेपाल के बदलते राजनीतिक परिदृश्य पर पुनः चर्चा के बीच हुई है।
| क्षेत्र |
मुद्दा |
| कालापानी |
भारत इस क्षेत्र का प्रशासन करता है; नेपाल इसे अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है। |
| लिपुलेख दर्रा |
नेपाल इस क्षेत्र के माध्यम से भारत-चीन व्यापार और कैलाश मानसरोवर मार्ग पर आपत्ति जताता है। |
| लिंपियाधुरा |
नेपाल इसे काली नदी का उद्गम मानता है और इसे अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है। |
हालिया यात्रा के प्रमुख परिणाम
- डिजिटल भुगतान एकीकरण: भारत और नेपाल ने भारत के UPI तथा नेपाल के NPI के बीच ‘पीयर-टू-पीयर’ (P2P) लिंकिंग की शुरुआत की, जिससे सीमा-पार व्यक्तिगत प्रेषण को तीव्र और सुगम बनाया जा सके।
- डिजिटल प्रौद्योगिकी सहयोग: डिजिटल इंडिया ‘भाषिणी’ और काठमांडू विश्वविद्यालय ने मिलकर डिजिटल समावेशन हेतु एक “वॉइस फर्स्ट” भाषा अनुवाद प्लेटफॉर्म विकसित करने के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।

भारत–नेपाल संबंधों के विभिन्न आयाम
- आर्थिक: नेपाल भारत को जलविद्युत ऊर्जा, रेज़िन, कृषि उत्पाद, यार्न, पश्मीना शॉल, चमड़ा एवं खाल, हस्तशिल्प वस्तुएँ, चाँदी एवं सोने के आभूषण तथा अन्य वस्तुओं का निर्यात करता है।
- जबकि नेपाल भारत से पेट्रोलियम उत्पाद, रासायनिक उर्वरक, नमक, चीनी, चावल, वाहन, ताँबा, कपास एवं अन्य वस्तुओं का आयात करता है।
- व्यक्ति आधारित संबंध: लगभग 80 लाख नेपाली नागरिक भारत में रहते और कार्य करते हैं तथा लगभग 6 लाख भारतीय नागरिक नेपाल में निवास करते हैं।
- प्रेषण: द्विपक्षीय प्रेषण प्रवाह लगभग 3 अरब अमेरिकी डॉलर (नेपाल से भारत) तथा 1 अरब अमेरिकी डॉलर (भारत से नेपाल) अनुमानित है।
- ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंध: भारत और नेपाल सदियों पुराने सभ्यतागत संबंध साझा करते हैं, जो समान धर्म, संस्कृति और परंपराओं पर आधारित हैं। यह संबंध पशुपतिनाथ–काशी जैसी तीर्थयात्राओं तथा सीमापार लोगों की मुक्त आवाजाही में प्रदर्शित होता है।
- प्रवास एवं श्रम संबंध: लगभग 80 लाख नेपाली नागरिक भारत में रहते और कार्य करते हैं, जबकि लगभग 6 लाख भारतीय नेपाल में रहते हैं। यह व्यवस्था वर्ष 1950 की भारत–नेपाल शांति एवं मैत्री संधि के तहत खुली सीमा व्यवस्था द्वारा समर्थित है।
- पर्यटन सहयोग: भारत नेपाल में पर्यटकों का प्रमुख स्रोत है, जहाँ भारतीय पर्यटकों की हिस्सेदारी लगभग 30% विदेशी पर्यटकों की होती है, विशेषकर पशुपतिनाथ मंदिर और लुंबिनी के कारण।
- ऊर्जा सहयोग: भारत और नेपाल जलविद्युत और बिजली व्यापार में सहयोग बढ़ा रहे हैं, जहाँ भारत नेपाल से बिजली आयात करता है और नेपाल को क्षेत्रीय ऊर्जा केंद्र बनाने में सहायता देता है।
- रणनीतिक एवं सुरक्षा सहयोग: लगभग 1,800 किमी. लंबी खुली सीमा सुरक्षा सहयोग को मजबूत बनाती है, साथ ही तस्करी, अवैध गतिविधियों और सीमा प्रबंधन जैसे मुद्दों पर समन्वय की आवश्यकता भी होती है।
- संपर्क एवं अवसंरचना सहयोग: भारत ने नेपाल को रेलवे लिंक, एकीकृत चेक पोस्ट, पेट्रोलियम पाइपलाइन और सड़क संपर्क जैसी परियोजनाओं में सहायता दी है, जिससे क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ावा मिला है।
- रक्षा सहयोग: भारत और नेपाल के बीच दीर्घकालिक सैन्य संबंध हैं, जिनमें एक-दूसरे के सेना प्रमुखों को मानद उपाधि देना तथा भारतीय सेना के गोरखा रेजिमेंट में नेपाली नागरिकों की भर्ती जैसी परंपराएँ शामिल हैं।
चुनौतियाँ
- रणनीतिक और भू-राजनीतिक चुनौतियाँ
- भारत–चीन प्रतिस्पर्द्धा: नेपाल की स्थिति भारत और चीन के बीच होने के कारण काठमांडू के लिए भू-राजनीतिक संतुलन की चुनौती उत्पन्न करती है।
- चीन कारक: नेपाल ने अवसंरचना और संपर्क परियोजनाओं के माध्यम से चीन के साथ अपने संबंध बढ़ाए हैं तथा कभी-कभी भारत के साथ संबंधों में चीन के समर्थन का उपयोग करता है।
- बाह्य प्रभाव में वृद्धि: अमेरिका और अन्य शक्तियों की बढ़ती भागीदारी ने नेपाल के रणनीतिक वातावरण को और अधिक जटिल बना दिया है।
- सीमा विवाद और क्षेत्रीय दावे: भारत–नेपाल सीमा का निर्धारण वर्ष 1816 की सुगौली की संधि द्वारा किया गया था, जिसमें भारत ने स्वतंत्रता के बाद ब्रिटिश-प्रशासित क्षेत्रों को विरासत में प्राप्त किया; हालाँकि कालापानी और सुस्ता को लेकर विवाद अब भी बने हुए हैं, जबकि लगभग 98% सीमा का सीमांकन हो चुका है।
- वर्ष 2019 में नेपाल ने एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया, जिसमें कालापानी, लिंपियाधुरा, लिपुलेख और सुस्ता को अपने क्षेत्र के रूप में दावा किया गया, जिससे भारत के साथ कूटनीतिक तनाव उत्पन्न हुआ।
- वर्ष 1950 की शांति एवं मैत्री संधि पर चिंताएँ: वर्ष 1950 की संधि नेपाल के नागरिकों को भारत में मुक्त आवागमन एवं रोजगार के अधिकार प्रदान करती है, लेकिन नेपाल में इसे बढ़ते हुए असमान समझौते के रूप में देखा जाता है और इसके संशोधन की माँग की जाती है।
- 1990 के दशक के मध्य से दोनों देशों ने द्विपक्षीय तंत्रों के माध्यम से इस संधि को अद्यतन करने पर चर्चा की है, लेकिन अब तक कोई बड़ा संशोधन नहीं हुआ है।
- सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: भारत–नेपाल की छिद्रयुक्त और कम निगरानी वाली सीमा का उपयोग उग्रवादी एवं आतंकवादी समूह हथियारों, प्रशिक्षित कैडरों और नकली मुद्रा की आवाजाही के लिए करते हैं।
- ऐसी सीमा-पार गतिविधियाँ, विशेषकर भारत के पूर्वोत्तर में सक्रिय समूहों से जुड़ी हुई हैं, जो भारत के लिए गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौतियाँ उत्पन्न करती हैं और दोनों देशों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता को दर्शाती हैं।
नेपाल की चीन के साथ बढ़ती निकटता के कारण
- भारतीय नीतिगत दृष्टिकोण संबंधी अवधारणा: नेपाल में यह धारणा रही है कि भारत का दृष्टिकोण कुछ मामलों में हस्तक्षेपकारी या असमान है, जो नदी संधियों, सीमा विवादों, व्यापार अवरोधों, जलभराव संबंधी चिंताओं तथा सीमा सुरक्षा बलों के व्यवहार से जुड़ी है।
- खुली सीमा संबंधी चिंताएँ: यद्यपि खुली सीमा ने ‘जन-से-जन’ संबंधों को बढ़ावा दिया है, लेकिन इसके कारण नेपाल में सुरक्षा, प्रवास एवं आर्थिक असंतुलन से संबंधित चिंताएँ भी उत्पन्न हुई हैं।
- भारत पर आर्थिक निर्भरता: नेपाल की भारत पर अत्यधिक व्यापार एवं पारगमन निर्भरता ने उसके आर्थिक विविधीकरण को सीमित किया है, जबकि सस्ते भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्द्धा ने नेपाल के घरेलू उद्योगों को प्रभावित किया है।
- भारतीय परियोजनाओं में देरी: नेपाल में भारत समर्थित कुछ परियोजनाओं, जैसे महाकाली संधि से संबंधित परियोजनाएँ, के धीमे क्रियान्वयन ने असंतोष बढ़ाया है, जबकि चीन की अवसंरचना परियोजनाएँ अपेक्षाकृत तेज मानी जाती हैं।
- चीनी निवेश का आकर्षण: नेपाल चीन की संपर्क परियोजनाओं, जैसे रेल संपर्क, को पर्यटन, व्यापार एवं अवसंरचना विकास के अवसर के रूप में देखता है, जिससे लुंबिनी जैसे स्थलों पर पर्यटकों की वृद्धि संभव हो सकती है।
- राजनीतिक एवं वैचारिक कारक: नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियाँ पारंपरिक रूप से चीन के साथ घनिष्ठ संबंधों का समर्थन करती रही हैं और भारतीय प्रभाव की आलोचना करती रही हैं, जबकि अन्य राजनीतिक समूहों के कुछ हिस्से भी बीजिंग के साथ अधिक जुड़ाव के पक्ष में रहे हैं।
आगे की राह
- कूटनीतिक समाधान: भारत और नेपाल को विदेश सचिव स्तर की वार्ता तथा सीमा कार्य समूह जैसे स्थापित तंत्रों के माध्यम से निरंतर संवाद जारी रखना चाहिए ताकि पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान निकाला जा सके।
- साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण: सीमा मुद्दे का समाधान ऐतिहासिक दस्तावेजों, संधि अभिलेखों तथा आधुनिक सर्वेक्षण तकनीकों के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि राजनीतिक कथनों के आधार पर।
- विशेष संबंधों का संरक्षण: दोनों देशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सीमा संबंधी मतभेद व्यापक सहयोग जैसे व्यापार, सुरक्षा एवं जन-से-जन संबंधों पर प्रभाव न डालें।
- विश्वास निर्माण उपाय: भारत और नेपाल को सीमा पार सहयोग, व्यापार संपर्क तथा संयुक्त विकास परियोजनाओं को सुदृढ़ कर आपसी विश्वास बढ़ाना चाहिए।
- राष्ट्रवादी उग्रता से बचाव: क्षेत्रीय विवादों को घरेलू राजनीतिक लामबंदी का उपकरण नहीं बनाया जाना चाहिए, क्योंकि इससे दीर्घकालिक द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुँच सकता है।
- संस्थागत तंत्रों को मजबूत करना: भारत और नेपाल को मौजूदा द्विपक्षीय संस्थानों को सुदृढ़ करना चाहिए ताकि विवादों का समाधान समय पर संरचित संवाद के माध्यम से हो सके, न कि राजनीतिक तनाव के माध्यम से।
- संपर्क एवं ऊर्जा सहयोग: दोनों देशों को सीमा-पार अवसंरचना, जलविद्युत परियोजनाओं और परिवहन नेटवर्क का विस्तार करना चाहिए, ताकि आर्थिक परस्पर निर्भरता बढ़े और साझा लाभ उत्पन्न हों।
- संप्रभुता एवं पारस्परिक संवेदनशीलता का सम्मान: भारत और नेपाल को एक-दूसरे की सुरक्षा चिंताओं और संप्रभु हितों का सम्मान करना चाहिए तथा ऐसे कार्यों से बचना चाहिए जो अविश्वास उत्पन्न करें और पारंपरिक रूप से घनिष्ठ संबंधों पर दबाव डालें।
भारत–नेपाल शांति एवं मैत्री संधि (1950)
- वर्ष 1950 में 31 जुलाई को हस्ताक्षरित यह संधि आधुनिक भारत–नेपाल संबंधों की आधारशिला है, जो शांति, मैत्री और सहयोग को बढ़ावा देती है।
- यह संधि लोगों और वस्तुओं की मुक्त आवाजाही, पारस्परिक सुरक्षा परामर्श तथा दोनों देशों के बीच घनिष्ठ आर्थिक एवं सामाजिक संबंधों को सक्षम बनाती है।
- महत्त्व: यह संधि भारत और नेपाल के बीच गहरे ऐतिहासिक संबंधों को दर्शाती है, लेकिन नेपाल में कुछ समूहों द्वारा इसे अधिक समानता और संप्रभुता सुनिश्चित करने हेतु संशोधन योग्य माना जाता है।
नेपाल में बदलते राजनीतिक परिदृश्य
उभरती प्रवृत्तियाँ
नेपाल का नया नेतृत्व अधिक ध्यान केंद्रित कर रहा है:
- विकास
- आर्थिक वृद्धि
- शासन संबंधी सुधार
- भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता में कमी।
भारत–नेपाल संबंधों में परिवर्तन
नेपाल अब अधिकाधिक रूप से चाहता है:-
- भारत के साथ समान व्यवहार
- पारंपरिक निर्भरता के बजाय पारस्परिक सम्मान आधारित संबंध
यह परिवर्तन नेपाल की उस इच्छा को दर्शाता है, जिसमें वह एक अधिक संतुलित विदेश नीति अपनाते हुए कई साझेदारों के साथ संबंध विकसित करना चाहता है। |