आक्रामक प्रजातियों के विरुद्ध बदलता संघर्ष

7 May 2026

संदर्भ

भारत के पारिस्थितिकी तंत्र जलवायु परिवर्तन, परिवर्तित भूमि उपयोग और मानवीय दखल से तेजी से प्रभावित हो रहे हैं, जिससे आक्रामक प्रजातियाँ जंगलों, आर्द्रभूमियों और घास के मैदानों में तेजी से फैल रही हैं।

आक्रामक प्रजातियों के बारे में

  • आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ (Invasive Alien Species): ये वे गैर-देशीय जीव हैं, जो नए पारिस्थितिकी तंत्र में आक्रामक रूप से फैलते हैं, देशज प्रजातियों को प्रतिस्पर्द्धा में पीछे छोड़ देते हैं और पारिस्थितिकी संतुलन को विकृत करते हैं।
  • उदाहरण
    • लैंटाना कैमारा (Lantana camara): (मध्य और दक्षिण अमेरिका का मूल निवासी) यह भारतीय जंगलों में व्यापक रूप से प्रसारित हो गया है, जिससे देशज वनस्पतियाँ प्रभावित होती हैं।
    • प्रोसोपिस जूलिफ्लोरा (Prosopis juliflora): (मध्य और दक्षिण अमेरिका/मैक्सिको का मूल निवासी) यह शुष्क परिदृश्यों पर प्रभावी हो जाता है और घास के मैदानों में जैव विविधता को कम करता है।
    • जलकुंभी (Water Hyacinth): (अमेजन बेसिन, दक्षिण अमेरिका की मूल निवासी) यह झीलों और आर्द्रभूमियों को अवरुद्ध कर देती है, जिससे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।
    • पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस (Parthenium hysterophorus – गाजर घास): (उष्णकटिबंधीय अमेरिका की मूल प्रजाति) यह कृषि क्षेत्रों को नुकसान पहुँचाती है और स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करती है।

पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव

  • जैव विविधता की हानि: आक्रामक प्रजातियाँ पोषक तत्त्वों, जल, धूप और आवास के लिए देशज वनस्पतियों और जीवों के साथ प्रतिस्पर्द्धा करती हैं, जिससे स्वदेशी प्रजातियों की आबादी में गिरावट आती है।
  • मृदा रसायन में परिवर्तन: नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले आक्रामक पेड़ और झाड़ियाँ मृदा पोषक तत्त्वों की संरचना को बदल देते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र उन देशज पौधों के लिए अनुपयुक्त हो जाता है जो कम पोषक तत्त्वों वाली परिस्थितियों के अनुकूल होते हैं।
  • जल संकट: सघन आक्रामक वनस्पतियाँ भूजल निकासी और वाष्पोत्सर्जन को बढ़ाती हैं, जिससे शुष्क पारिस्थितिकी तंत्र और संवेदनशील आर्द्रभूमियों में जल की कमी और गंभीर हो जाती है।
  • अग्नि जोखिम में वृद्धि: सूखी आक्रामक घास और झाड़ियों जैसी प्रजातियाँ अत्यधिक दहनशील परिदृश्य का निर्माण करती हैं, जिससे वनाग्नि की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ जाती है।

पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण के लिए उत्तरदायी अन्य कारक

  • जलवायु परिवर्तन पारिस्थितिक तनाव को बढ़ाता है: तापमान वृद्धि, अनियमित वर्षा और दीर्घकालीन सूखा देशज पारिस्थितिकी तंत्र को कमजोर करते हैं, जिससे आक्रामक प्रजातियों के प्रसार के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं।
    • भारतीय वनों में आर्द्रता के बदलते स्वरूप ने पहले से स्थिर पारिस्थितिकी तंत्र में वानस्पतिक आक्रामक प्रजातियों के तेजी से प्रसार को सक्षम बनाया है।
  • अस्थिर कृषि पद्धतियाँ मृदा को खराब करती हैं: रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग मृदा स्वास्थ्य को विकृत करता है, सूक्ष्मजीवी विविधता को बदलता है और जैविक आक्रमणों के विरुद्ध पारिस्थितिकी तंत्र की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करता है।
    • भारत वार्षिक रूप से लगभग 35-40 मिलियन टन यूरिया की खपत करता है, जो पोषक तत्त्वों के असंतुलन और पारिस्थितिकी क्षरण में योगदान देता है।
  • आवास विखंडन देशज प्रजातियों को कमजोर करता है: सड़कें, खनन, शहरीकरण और वनोन्मूलन प्राकृतिक आवासों को विभाजित कर देते हैं, जिससे देशज प्रजातियों की उत्तरजीविता क्षमता कम हो जाती है।
    • मध्य भारत में खंडित वन गलियारों ने मानवीय हस्तक्षेप को बढ़ाया है और आक्रामक पौधों के उपनिवेशीकरण (Colonisation) को सुलभ बना दिया है।
  • आर्द्रभूमि और नदी संशोधन पारिस्थितिकी तंत्र को बाधित करते हैं: अतिक्रमण, बाँध निर्माण और प्रदूषण जल विज्ञान चक्र (Hydrological cycles) को बदल देते हैं, जिससे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र अस्थिर हो जाता है और आक्रामक जलीय प्रजातियों की वृद्धि संभव हो पाती है।
    • पोषक तत्त्वों से भरपूर प्रदूषित जल के कारण भारतीय शहरों की शहरी झीलें तेजी से आक्रामक जलकुंभी से ढकती जा रही हैं।

संरक्षण दृष्टिकोण में परिवर्तन की आवश्यकता

  • प्रजातियों के संबंध में भविष्य का दृष्टिकोण: संरक्षण प्रयासों को न केवल आक्रामक प्रजातियों को हटाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, बल्कि उन पारिस्थितिकी स्थितियों को बहाल करने पर भी ध्यान देना चाहिए, जिन्होंने उनके प्रसार को बढ़ावा दिया।
  • पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित बहाली को बढ़ावा देना: बहाली की रणनीतियों को अलग-थलग वृक्षारोपण अभियानों पर निर्भर रहने के बजाय मृदा गुणवत्ता, जल चक्र और देशज जैव विविधता को एक साथ पुनर्जीवित करना चाहिए।
  • जलवायु अनुकूलन उपायों को एकीकृत करना: संरक्षण योजना में बदलते वर्षा पैटर्न, गर्मी के तनाव और सूखे के स्वरूपों को ध्यान में रखा जाना चाहिए, जो पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता को प्रभावित करते हैं।
  • सामुदायिक भागीदारी को सुदृढ़ करना: आक्रामक प्रजातियों की निगरानी और पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के स्थायी प्रबंधन में स्थानीय समुदायों, वनवासियों और स्वदेशी समूहों को शामिल किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

प्रभावी संरक्षण के लिए केवल आक्रामक प्रजातियों को हटाने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय जलवायु-संवेदनशील, समुदाय-संचालित और वैज्ञानिक रूप से सूचित दृष्टिकोणों के माध्यम से पारिस्थितिकी तंत्र के अनुकूलन को बहाल करना आवश्यक है।

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