संदर्भ
भारत में समय से पूर्व (अप्रैल 2026 में) ही चरम हीटवेव का प्रभाव देखा जा रहा है, जिसमें कई राज्यों में तापमान 40°C के पार पहुँच गया है।
संबंधित तथ्य
- भारत मौसम विज्ञान विभाग ने मध्य और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में, जिनमें विदर्भ, छत्तीसगढ़, ओडिशा, तेलंगाना और केरल शामिल हैं, गर्मी को लेकर अलर्ट जारी किया है।
- भारत में हीटवेव की स्थिति
- नवंबर 2022 में विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि वर्ष 2030 तक, पूरे भारत में 160-200 मिलियन से अधिक लोग प्रत्येक वर्ष जानलेवा हीटवेव की चपेट में आ सकते हैं।

हीटवेव (Heat Wave) के बारे में
- परिचय: हीटवेव असामान्य रूप से ऊँचे तापमान की वह अवधि है, जो सामान्य अधिकतम तापमान से कहीं अधिक होती है। यह आमतौर पर भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में, गर्मियों के महीनों (मार्च से जुलाई) के दौरान देखने को मिलती है।
- भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा निर्धारित मानदंड
- अधिकतम तापमान की शर्त: किसी भी स्टेशन पर मैदानी इलाकों के लिए कम-से-कम 40°C और पहाड़ी क्षेत्रों के लिए न्यूनतम 30°C तापमान दर्ज होना चाहिए।
- सामान्य तापमान से अंतर के आधार पर
- हीटवेव (Heat Wave): सामान्य तापमान से अंतर 4.5°C से 6.4°C के बीच हो।
- चरम हीटवेव (Severe Heat Wave): स्टेशन के सामान्य तापमान से अंतर 6.4°C से अधिक हो।
- वास्तविक अधिकतम तापमान के आधार पर
- हीटवेव (Heat Wave): जब वास्तविक अधिकतम तापमान ≥ 45°C हो।
- चरम हीटवेव (Severe Heat Wave): जब वास्तविक अधिकतम तापमान ≥ 47°C हो।
- यदि उपर्युक्त मानदंड किसी मौसम विज्ञान उप-मंडल के कम-से-कम मौसम निगरानी करने वाले 2 स्टेशनों पर लगातार दो दिनों तक मौजूद होते हैं, तो दूसरे दिन इसे ‘हीटवेव’ घोषित कर दिया जाता है।
हीटवेव से संबंधित सरकारी पहल
- भारत का जलवायु जोखिम और संवेदनशीलता एटलस: यह एटलस भारत के प्रत्येक जिले के लिए, मौसम की प्रमुख घटनाओं के संबंध में, संवेदनशीलता और जोखिमों की एक विस्तृत शृंखला प्रदान करता है, जिसमें ‘शून्य’, ‘कम’, ‘मध्यम’, ‘अधिक’ और ‘बहुत अधिक’ जैसी श्रेणियाँ शामिल हैं।
- भारत का ‘कूलिंग एक्शन प्लान’: यह विभिन्न क्षेत्रों की कूलिंग (शीतलन) संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक दीर्घकालिक दृष्टिकोण प्रदान करती है।
- मॉडल हीट एक्शन प्लान: इसे राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा अति-स्थानीय चेतावनी प्रणालियाँ, शहरों की संवेदनशीलता की मैपिंग और जलवायु-अनुकूल आवास नीतियाँ उपलब्ध कराने के लिए जारी किया गया है।
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हीटवेव की स्थिति कैसे उत्पन्न होती है?
- निरंतर उच्च दाब प्रणाली: वायु आरोहित होने के बाद संपीडित और गर्म होती है, जिससे बादलों का निर्माण नहीं हो पाता है।
- स्वच्छ आकाश: अधिकतम सौर विकिरण पृथ्वी की सतह तक पहुँचता है, जिससे निरंतर तापन होता है।
- शुष्क मृदा जैसी स्थिति: वाष्पीकरण में कमी प्राकृतिक शीतलन को कम करती है और जमीन का तापमान बढ़ा देती है।
- गर्म और शुष्क हवाएँ: लू जैसी हवाएँ पहले से ही उच्च तापमान को और बढ़ा देती हैं।
- शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव: कंकरीट की सतहें और शहरों में कम हरियाली आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म बना देती हैं।
- जलवायु परिवर्तन: बढ़ते वैश्विक तापमान से हीटवेव की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ जाती है।
मौजूदा हीटवेव /चरम तापमान के कारण (2026): मौजूदा भीषण गर्मी के पीछे ये मुख्य कारण हैं:
- मानसून-पूर्व हीटवेव की तीव्रता और विस्तार में वृद्धि: मानसून से पहले आने वाली हीटवेव भारत में एक सामान्य स्थिति है, लेकिन इसकी बारंबारता, अवधि और भौगोलिक विस्तार बढ़ रहा है।
- अब ये स्थिति समय से पहले (मई-जून के बजाय अप्रैल में) ही उत्पन्न हो जाती हैं और एक ही समय में बड़े क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लेती हैं।
- यह रुझान जलवायु परिवर्तन के व्यापक पैटर्न को दर्शाता है, जिससे लोगों को लंबे समय तक भीषण गर्मी का सामना करना पड़ता है और स्वास्थ्य, कृषि और आजीविका पर जोखिम बढ़ जाता है।
- अल नीनो प्रभाव: प्रशांत महासागर में बढ़ते तापमान से भारतीय मानसून कमजोर पड़ जाता है, जिससे तापमान बढ़ जाता है।
- पश्चिमी विक्षोभ का कमजोर होना: सर्दियों और वसंत में वर्षा न होने से प्राकृतिक शीतलन प्रभाव समाप्त हो गया है।
- संवहनी धाराओं का कमजोर होना: स्थानीय हवा के ऊपर उठकर बादलों में संघनित न होने के कारण, दोपहर के समय होने वाली प्राकृतिक ठंडक उत्पन्न नहीं हो पाती है।
- शहरी ऊष्मा द्वीप (Urban Heat Islands): शहरों में कंकरीट और डामर, दिन के समय गर्मी को अवशोषित कर लेते हैं और रात में उसे बाहर नहीं निकाल पाते हैं, जिससे शहरी इलाके अपने आस-पास के इलाकों की तुलना में अधिक गर्म रहते हैं।
- वेट बल्ब तापमान: तीव्र गर्मी और अधिक नमी का संयुग्मन, जो पसीने को भाप बनकर उड़ने से रोकता है, जिसके कारण 35°C का तापमान भी जानलेवा बन जाता है।
हीट एक्शन प्लान (HAPs) क्या हैं?
- हीट एक्शन प्लान (Heat Action Plans) ऐसी शुरुआती चेतावनी और प्रतिक्रिया रणनीतियाँ हैं, जिन्हें मानव के स्वास्थ्य और आजीविका पर अत्यधिक गर्मी के असर को कम करने के लिए बनाया गया है।
- इन्हें शहर, जिला और राज्य स्तर पर लागू किया जाता है।
- इनका मार्गदर्शन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण जैसी एजेंसियाँ करती हैं, और इनमें भारत मौसम विज्ञान विभाग से मिले इनपुट भी शामिल होते हैं।
- HAPs के मुख्य घटक
- शुरुआती चेतावनी प्रणालियाँ: गर्मी से जुड़ी चेतावनियाँ और पूर्वानुमान
- जन जागरूकता अभियान: शरीर में जल की कमी न होने देने और सबसे अधिक गर्मी के समय बाहर न निकलने से जुड़ी सलाह दी जाती है।
- स्वास्थ्य प्रणाली की तैयारी: कूलिंग सेंटर और अस्पतालों की तैयारी
- एजेंसियों के बीच समन्वय: स्वास्थ्य, श्रम और आपदा विभागों के बीच समन्वय।
वर्तमान हीट एक्शन प्लान (HAPs) से जुड़ी समस्याएँ
- प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण: हीट एक्शन प्लान (HAPs) अधिकतर एक प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं, जो लंबे समय तक रोकथाम के बजाय अलर्ट और सलाह जैसे कम समय के आपातकालीन उपायों पर अधिक ध्यान देते हैं।
- उदाहरण के लिए: भारत के चुनाव आयोग ने चुनावों के दौरान गर्मी के असर से निपटने के लिए वोट डालने का समय बढ़ा दिया था; यह एक अस्थायी बदलाव था, न कि कोई ढाँचागत योजना।
- अपर्याप्त फंडिंग: HAPs को अपर्याप्त और गैर-समर्पित फंडिंग की समस्या का सामना करना पड़ता है, जिससे दीर्घकालिक अनुकूलन पहलों में बाधा आती है।
- कई शहरों के पास ‘कूल रूफ’, वाटर स्टेशन और शहरी हरियाली जैसी पहलों के लिए फंड की कमी है।
- अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूरों की उपेक्षा: अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य करने वाले मजदूरों के लिए गर्मी से सुरक्षा के ऐसे नियमों की कमी है, जिन्हें सख्ती से लागू किया जा सके, जिससे उनकी जोखिम की संभावना बढ़ जाती है।
- निर्माण और कृषि क्षेत्र के मजदूर, बिना किसी कानूनी सुरक्षा या अनिवार्य आराम के समय के, भीषण गर्मी के घंटों में भी कार्य करते रहते हैं।
- शहरी हरियाली की कमी: दिल्ली जैसे शहरों में हरियाली (ग्रीन कवर) में काफी कमी आई है, जिससे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ (शहरी ऊष्मा द्वीप) का असर और भी बढ़ गया है।
- पेड़ों और हरियाली वाली जगहों की कमी के कारण शहरी इलाके, आस-पास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में 4–7°C अधिक गर्म हो सकते हैं।
- कमजोर संस्थागत समन्वय: कई एजेंसियाँ (स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन, शहरी निकाय) अलग-अलग होकर कार्य करती हैं, जिससे HAPs को लागू करने में बाधाएँ आती है।
- उदाहरण के लिए, नगर निकायों और स्वास्थ्य विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण, हीटवेव के दौरान समय पर प्रतिक्रिया देने में देरी होती है।
- सीमित डेटा और शुरुआती चेतावनी प्रणालियाँ: कई शहरों में स्थानीय, वास्तविक समय के ताप डेटा और वार्ड-स्तरीय जोखिम मानचित्रण का अभाव है।
- इसके परिणामस्वरूप उच्च जोखिम वाले समूहों और क्षेत्रों के लिए लक्षित हस्तक्षेपों के बजाय सामान्यीकृत सलाह जारी की जाती है।
भारत में बढ़ती हीटवेव के प्रभाव
- रात के समय हीट स्ट्रेस और स्वास्थ्य सेवा पर बोझ: रातें गर्म होने से शारीरिक रिकवरी में भी देरी होती है, जिससे स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ बढ़ जाता है।
- तटीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता और ‘शहरी ऊष्मा द्वीप’ प्रभाव: तटीय क्षेत्रों में स्थानीय स्थिति, विशेषकर नमी और ‘शहरी ऊष्मा द्वीप’ प्रभाव के कारण और भी खराब हो सकते हैं।
- हृदय संबंधी कारणों से मृत्यु का बढ़ता जोखिम: लगातार बनी रहने वाली तेज गर्मी का संबंध हृदय संबंधी कारणों से होने वाली मृत्यु के काफी अधिक जोखिम से है।
- श्रम उत्पादकता में कमी: ‘द लैंसेट काउंटडाउन ग्लोबल रिपोर्ट’ के अनुसार, वर्ष 2024 में गर्मी के कारण लगभग 247 अरब कार्य के घंटे बर्बाद हुए; इससे निर्माण और कृषि क्षेत्रों में कार्य करने वाले मजदूर सबसे अधिक प्रभावित हुए।
- कृषि पर तनाव और खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: रबी की कटाई के दौरान किसानों के लिए हीत स्ट्रेस एक लगातार बनी रहने वाली चिंता है। गर्म मौसम फसलों के पकने की प्रक्रिया को तेज कर देता है, जिससे खाद्य सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता है और महंगाई का दबाव बढ़ता है।
आगे की राह
- कोलंबिया गठबंधन: भारत को 50 से अधिक देशों के इस समूह में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, ताकि वह जलवायु अनुकूलन वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और जीवाश्म ईंधनों के विकल्प के लिए सहायता प्राप्त कर सके।
- मोबाइल हेल्थ यूनिट: हीटवेव की चपेट में आने वाले इलाकों में मोबाइल क्लिनिक तैनात करना, ताकि लू लगने, डिहाइड्रेशन और उससे जुड़ी बीमारियों का त्वरित इलाज किया जा सके।
- अहमदाबाद जैसे शहरों ने बहुत अधिक गर्मी के दौरान आउटरीच वैन का उपयोग किया है, ताकि अस्पतालों पर बोझ कम हो और कमजोर तबके के लोगों को लंबी यात्रा न करनी पड़े।
- शहरी हरियाली बढ़ाना: शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव और सतही तापमान को कम करने के लिए अनिवार्य वृक्षारोपण, ग्रीन रूफ, ठंडी छतें और पारगम्य फुटपाथों को बढ़ावा देना।
- हैदराबाद में ‘कूल रूफ’ कार्यक्रम लागू किए गए हैं, जिससे कम आय वाले आवासों में आंतरिक तापमान 2-5 डिग्री सेल्सियस तक कम हो गया है।
- हीटवेव से सुरक्षा के लिए कानून: चरम गर्मी के दौरान विश्राम अवकाश, छायादार कार्यस्थल, पेयजल की उपलब्धता और कार्य घंटों के पुनर्निर्धारण को अनिवार्य बनाने वाले कानून बनाना।
- ओडिशा जैसे राज्य दोपहर के चरम घंटों के दौरान बाहरी कार्य को प्रतिबंधित करते हैं, जिससे श्रमिकों में गर्मी से संबंधित बीमारियों में कमी आती है।
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली एवं लू लगने की सूचनाएँ: लोगों को पहले से चेतावनी देने के लिए वार्ड स्तर पर अलर्ट के साथ स्थानीय, वास्तविक समय की लू का पूर्वानुमान जैसी प्रणालियाँ विकसित करना।
- प्रकृति-आधारित समाधानों का समावेश: अत्यधिक लू के प्रभावों को कम करने के लिए हरित क्षेत्रों की रणनीतिक स्थापना और ब्लू इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास जैसे प्रकृति-आधारित समाधानों को लू प्रबंधन योजनाओं में एकीकृत करने पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
- जवाबदेही और पारदर्शिता: हीटवेव के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए नियमित रूप से अद्यतन और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप बनाई गई हीटवेव प्रबंधन योजनाओं का एक ऑनलाइन राष्ट्रीय भंडार बनाना।