भूजल में आर्सेनिक एवं फ्लोराइड प्रदूषण

25 Apr 2026

संदर्भ

हाल ही में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने सभी राज्य सरकारों को भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड प्रदूषण को कम करने हेतु तत्काल उपाय करने के निर्देश दिए हैं, साथ ही केंद्र सरकार को देशभर में इसके क्रियान्वयन की निगरानी करने के लिए कहा है। 

संबंधित तथ्य

  • ये निर्देश स्वप्रेरणा से लिए गए संज्ञान के दौरान जारी किए गए, जो मीडिया रिपोर्टों पर आधारित था, जिनमें प्रदूषण की गंभीरता को उजागर किया गया था। 
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव: संदूषित भू-जल के दीर्घकालिक संपर्क से प्रायः अपरिवर्तनीय स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जो विशेष रूप से उन ग्रामीण जनसंख्या को प्रभावित करती हैं जो अशोधित जल स्रोतों पर निर्भर रहती हैं, जिससे एक निष्क्रिय किंतु गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य भार उत्पन्न होता है। 

भूजल प्रदूषण शमन हेतु राष्ट्रीय हरित अधिकरण का वर्ष 2026 का प्रवर्तन ढाँचा

  • सूक्ष्म स्तर पर डेटा प्रतिवेदन: अधिकरण ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे जिला, प्रखंड तथा गाँव/वार्ड स्तर पर प्रदूषण से संबंधित विस्तृत डेटा प्रस्तुत करें, ताकि नीतिगत हस्तक्षेप सामान्यीकृत होने के बजाय लक्षित और साक्ष्य-आधारित हो सकें।
  • सुदृढ़ नियामकीय निगरानी: केंद्रीय भूजल प्राधिकरण को शमन प्रयासों की निकट निगरानी का दायित्व सौंपा गया है, ताकि सुधारात्मक उपायों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो तथा उनका समय-समय पर मूल्यांकन किया जा सके।
  • समयबद्ध शमन उपाय: राज्यों को निर्धारित समय-सीमा के भीतर उपयुक्त निस्पंदन और शुद्धिकरण प्रौद्योगिकियों को अपनाने का निर्देश दिया गया है, जो कठोर अनुपालन और परिणामोन्मुख शासन की दिशा में परिवर्तन को दर्शाता है।
  • विधिक उत्तरदायित्व ढाँचा: अधिकरण ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत ‘पॉल्यूटर पे’ सिद्धांत तथा सतत् विकास जैसे प्रमुख पर्यावरणीय सिद्धांतों का आह्वान किया है, ताकि संस्थागत निष्क्रियता या लापरवाही पर विधिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जा सके।

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आर्सेनिक बनाम फ्लोराइड प्रदूषण: तुलनात्मक अध्ययन

आयाम आर्सेनिक (As) फ्लोराइड (F)
स्वरूप एवं उपयोग एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला विषाक्त उपधातु, जिसका उपयोग कीटनाशकों, मिश्रधातुओं, इलेक्ट्रॉनिक्स और लकड़ी के संरक्षण में होता है, जो पेयजल में उपस्थित होने पर खतरनाक हो जाता है। एक प्रतिक्रियाशील तत्व, जिसका उपयोग टूथपेस्ट, एल्युमिनियम उत्पादन, उर्वरकों और नियंत्रित जल ‘फ्लोरिडेशन’ में होता है, किंतु अधिक मात्रा में हानिकारक होता है।
भू-उत्पत्ति स्रोत गंगा–ब्रह्मपुत्र बेसिन के जलोढ़ अवसादों से भू-रासायनिक अभिक्रियाओं (जैसे अपचयी विलयन) द्वारा उत्सर्जित होता है। फ्लोराइट जैसे फ्लोराइड युक्त खनिजों से शैल अपक्षय के कारण मुक्त होता है, विशेषकर कठोर चट्टानी क्षेत्रों में।
मानवजनित स्रोत औद्योगिक अपशिष्ट, खनन गतिविधियाँ तथा आर्सेनिक-आधारित कीटनाशकों के उपयोग से वृद्धि फॉस्फेट उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग, औद्योगिक अपशिष्ट तथा भूजल का अतिदोहन
जल-भूवैज्ञानिक स्थितियाँ अवायवीय एवं स्थिर जलभृत स्थितियों में गतिशील होता है, जिससे भूजल में आर्सेनिक में वृद्धि होती है क्षारीय परिस्थितियों एवं कम कैल्शियम स्तर में अधिक घुलनशील, प्रायः गहरे जलभृतों में पाया जाता है।
स्वास्थ्य प्रभाव आर्सेनिकोसिस, जिससे त्वचा के घाव, वर्णक विकार तथा कैंसर के  जोखिम में वृद्धि होती है। फ्लोरोसिस, जिसमें दाँतों का रंग बदलना तथा अस्थि विकृतियाँ शामिल हैं, जो दिव्यांगता का कारण बन सकती हैं।
भौगोलिक वितरण मुख्यतः पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में, जैसे बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश। व्यापक रूप से पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी भारत में, जैसे राजस्थान, गुजरात और कर्नाटक

समाधान किए जाने योग्य चुनौतियाँ

  • आर्थिक बोझ: दीर्घकालिक बीमारियाँ उच्च व्यक्तिगत स्वास्थ्य भार तथा आय अर्जन क्षमता में कमी का कारण बनती हैं, विशेषकर ग्रामीण कमजोर वर्गों के बीच।
  • सामाजिक परिणाम: त्वचा में घाव और दाँतों के रंग में परिवर्तन जैसे शारीरिक लक्षण प्रायः उपेक्षा, बहिष्कार तथा सामाजिक गतिशीलता में कमी का कारण बनते हैं।
  • शासन संबंधी समस्याएँ
    • निजी बोरवेल के माध्यम से अनियंत्रित भूजल दोहन निरंतर जारी है।
    • सिंचाई हेतु सब्सिडीयुक्त विद्युत अत्यधिक जल निकासी को प्रोत्साहित करती है, जिससे जल संदूषण और बढ़ता है।
    • संस्थागत विखंडन विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को कमजोर करता है।
  • क्रियान्वयन संबंधी बाधाएँ
    • शुद्धिकरण प्रणालियों की उच्च लागत तथा रखरखाव संबंधी चुनौतियाँ
    • उपचारित जल की कम सामुदायिक स्वीकृति
    • अंतिम चरण वितरण तथा निगरानी क्षमता की कमजोरी।

PWOnlyIAS विशेष

राष्ट्रीय हरित अधिकरण के बारे में

  • स्थापना एवं विधिक आधार: राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत एक विशेषीकृत न्यायिक निकाय के रूप में की गई, जिसका उद्देश्य पर्यावरणीय न्याय निर्णयन है।
  • शक्तियाँ एवं अधिकार: इस अधिकरण के पास सिविल न्यायालय के समकक्ष शक्तियाँ होती हैं, जिनमें क्षतिपूर्ति प्रदान करना, पुनर्स्थापन का आदेश देना तथा पर्यावरणीय दायित्व लागू करना शामिल है।
  • अधिकारिता: राष्ट्रीय हरित अधिकरण को प्रमुख पर्यावरणीय कानूनों पर अधिकारिता प्राप्त है, जिनमें जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 तथा वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 शामिल हैं।
  • कार्यात्मक भूमिका: अधिकरण समयबद्ध पर्यावरणीय न्याय सुनिश्चित करने, नियामकीय उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करने तथा सतत विकास और ‘पॉल्यूटर पे’ सिद्धांत सिद्धांत जैसे सिद्धांतों को लागू करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

केंद्रीय भूजल प्राधिकरण के बारे में

  • वैधानिक स्थिति: केंद्रीय भूजल प्राधिकरण एक वैधानिक निकाय है, जिसका गठन पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत भारत में भूजल के विकास और प्रबंधन के विनियमन एवं नियंत्रण हेतु किया गया है।
  • प्रशासनिक नियंत्रण: यह प्राधिकरण जल शक्ति मंत्रालय के अधीन कार्य करता है तथा देश में भूजल शासन के लिए प्रमुख नियामक संस्था है।
  • नियामकीय कार्य: प्राधिकरण दिशा-निर्देश जारी करने, भूजल दोहन हेतु अनुमति प्रदान करने तथा अतिदोहन को रोकने के लिए आवश्यक उपाय करने के लिए उत्तरदायी है।
  • क्षेत्रीय वर्गीकरण: केंद्रीय भूजल प्राधिकरण क्षेत्रों को अतिदोहन, संकटग्रस्त और अर्द्ध-संकटग्रस्त श्रेणियों में वर्गीकृत करता है तथा ऐसे क्षेत्रों में भूजल निकासी पर नियामकीय प्रतिबंध लागू करता है।
  • सतत् प्रबंधन में भूमिका: यह प्राधिकरण वर्षा जल संचयन और कृत्रिम पुनर्भरण तंत्र जैसे उपायों को बढ़ावा देता है, जिससे दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
  • वर्तमान संदर्भ में भूमिका: वर्तमान परिप्रेक्ष्य में केंद्रीय भूजल प्राधिकरण राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों के अनुपालन को सुनिश्चित करने, क्रियान्वयन की निगरानी करने तथा नीतिगत निर्णयों को प्रभावी जमीनी कार्रवाई में परिवर्तित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जल जीवन मिशन के बारे में

  • प्रारंभ एवं उद्देश्य: जल जीवन मिशन (2019) का उद्देश्य प्रत्येक ग्रामीण परिवार को कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन प्रदान करना है, जिससे सुरक्षित और पर्याप्त पेयजल उपलब्ध हो सके।
  • जल गुणवत्ता पर ध्यान: यह मिशन विशेष रूप से जल गुणवत्ता निगरानी पर बल देता है, विशेषतः आर्सेनिक और फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्रों में।
  • सामुदायिक भागीदारी: यह सामुदायिक-नेतृत्व वाले दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है, जिसमें ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों को योजना निर्माण और क्रियान्वयन में शामिल किया जाता है।
  • अवसंरचना विकास: यह योजना पाइप जल आपूर्ति प्रणालियों, जल शोधन संयंत्रों तथा स्रोत स्थिरता उपायों के निर्माण को समर्थन देती है।
  • वर्तमान प्रासंगिकता: संदूषित क्षेत्रों में यह मिशन असुरक्षित भूजल स्रोतों पर निर्भरता कम करने हेतु एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में कार्य करता है।

भारत में भूजल शासन संबंधी ढाँचा

  • विखंडित संस्थागत संरचना: भूजल शासन में केंद्रीय और राज्य स्तर पर अनेक एजेंसियाँ शामिल हैं, जिससे समन्वय की चुनौतियाँ और अतिव्यापन उत्पन्न होता है।
  • नियामकीय तंत्र: केंद्रीय भूजल प्राधिकरण भूजल दोहन का विनियमन करता है, जबकि राज्य स्थानीय जल कानूनों और नीतियों को लागू करते हैं।
  • विधिक ढाँचा: भूजल को प्रायः भूमि स्वामित्व से जुड़ा निजी संसाधन माना जाता है, जिससे प्रभावी नियमन और नियंत्रण सीमित हो जाता है।
  • नीतिगत पहलें: प्रमुख पहलों में अटल भूजल योजना, राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण कार्यक्रम, तथा जल जीवन मिशन शामिल हैं।
  • सतत उपाय: यह ढाँचा वर्षा जल संचयन, जलभृत पुनर्भरण, मांग-पक्ष प्रबंधन तथा जल उपयोग दक्षता पर बल देता है।
  • मुख्य चुनौतियाँ: इस प्रणाली को अतिदोहन, कमजोर प्रवर्तन, डेटा की कमी तथा सामुदायिक भागीदारी के अभाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जो सतत भूजल प्रबंधन में बाधा उत्पन्न करती हैं।

आगे की राह

  • डेटा-आधारित शासन को सुदृढ़ करना: वास्तविक समय आधारित, भौगोलिक सूचना प्रणाली आधारित भूजल गुणवत्ता निगरानी तंत्र विकसित किया जाए, जिसमें राज्यों और केंद्रीय एजेंसियों के डेटा का एकीकरण हो, ताकि शीघ्र पहचान और लक्षित हस्तक्षेप संभव हो सके।
  • प्रौद्योगिकी आधारित हस्तक्षेप: कम लागत वाली, विकेंद्रीकृत जल शुद्धिकरण प्रौद्योगिकियों जैसे सामुदायिक निस्पंदन संयंत्र तथा घरेलू स्तर के समाधान को बढ़ावा दिया जाए, विशेषकर ग्रामीण हॉटस्पॉट क्षेत्रों में।
  • भूजल दोहन का विनियमन: बोरवेल के सख्त विनियमन, विद्युत सब्सिडी का युक्तिकरण तथा सूक्ष्म सिंचाई जैसी जल-कुशल प्रथाओं को प्रोत्साहित किया जाए।
  • स्रोत प्रतिस्थापन एवं सुरक्षित आपूर्ति: जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं के अंतर्गत शोधित सतही जल की उपलब्धता का विस्तार किया जाए, जिससे संदूषित भूजल पर निर्भरता कम हो।
  • सामुदायिक भागीदारी एवं व्यवहार परिवर्तन: जन-जागरूकता अभियानों और स्थानीय शासन संस्थाओं को सुदृढ़ किया जाए, ताकि सुरक्षित पेयजल व्यवहार की स्वीकृति बढ़ सके।
  • अंतर-एजेंसी समन्वय: केंद्रीय भूजल प्राधिकरण और राज्य जल विभागों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जाए, जिसे स्पष्ट उत्तरदायित्व तंत्र द्वारा समर्थित किया जाए।

निष्कर्ष 

राष्ट्रीय हरित अधिकरण का हस्तक्षेप यह रेखांकित करता है कि भूजल प्रदूषण एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा शासन संबंधी चुनौती है, जिसके समाधान हेतु निगरानी, विनियमन, प्रौद्योगिकी तथा सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से समन्वित प्रयास आवश्यक हैं, ताकि सुरक्षित जल उपलब्धता और दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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