संदर्भ
‘एनवायरनमेंटल रिसर्च: क्लाइमेट’ (Environmental Research: Climate) जर्नल में प्रकाशित एक हालिया मॉडलिंग अध्ययन से पता चलता है कि मौजूदा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन प्रवृत्तियों के तहत वर्ष 2100 तक भारत के वनों की कार्बन भंडारण क्षमता लगभग दोगुनी हो सकती है।
- यह अध्ययन भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के अनुमानों से भिन्न नए दृष्टिकोण प्रदान करता है।
संबंधित तथ्य
कई भारतीय संस्थानों के शोधकर्ताओं से जुड़े ये निष्कर्ष एक विस्तृत पूर्वानुमान प्रस्तुत करते हैं कि जलवायु परिवर्तन किस प्रकार देश के वन कार्बन स्टॉक को नया आकार देगा।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष
- वन कार्बन स्टॉक में अनुमानित वृद्धि: भारत में वनस्पति कार्बन (ग्रीन कार्बन) बायोमास में, उत्सर्जन के विभिन्न परिदृश्यों के तहत, उल्लेखनीय वृद्धि होने का अनुमान है।
- कम उत्सर्जन वाले पथ के तहत 35%
- मध्यम उत्सर्जन वाले पथ के तहत 62%
- वर्ष 2100 तक उच्च-उत्सर्जन, जीवाश्म-ईंधन-गहन परिदृश्य के तहत 97%
- सभी परिदृश्य लगभग वर्ष 2030 तक वृद्धि के समान रुझान दर्शाते हैं, जिसके बाद वे तेजी से बदल जाते हैं, और सबसे तीव्र वृद्धि वर्ष 2050 के बाद होती है।
- कार्बन भंडारण में वृद्धि के चालक: वन कार्बन में अनुमानित वृद्धि मुख्य रूप से दो कारकों द्वारा संचालित है:
- वर्षा में वृद्धि: वर्षा के बढ़ते स्तर से मृदा में नमी की उपलब्धता बढ़ती है, जो उच्च वनस्पति विकास और बायोमास संचय का समर्थन करती है।
- वायुमंडलीय CO₂ का बढ़ा हुआ स्तर: उच्च CO₂ सांद्रता प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) दक्षता और जल-उपयोग दक्षता में सुधार करती है, जिससे पौधों के विकास में वृद्धि होती है।
- समय अंतराल प्रभाव: वन पारिस्थितिकी तंत्र, जलवायु परिवर्तनों के प्रति तत्काल प्रतिक्रिया नहीं देते हैं:
- कम और मध्यम उत्सर्जन परिदृश्यों के तहत लगभग 2 वर्ष का विलंब
- उच्च उत्सर्जन परिदृश्यों के तहत लगभग 4 वर्ष का विलंब
- कार्बन वृद्धि में क्षेत्रीय भिन्नता: वनस्पति कार्बन (ग्रीन कार्बन) की मात्रा में वृद्धि पूरे भारत में स्थानिक रूप से असमान है:
- उच्चतम सापेक्ष वृद्धि:
- राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश जैसे शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में देखी गई।
- इन क्षेत्रों में वनस्पति कार्बन (ग्रीन कार्बन) में 60% से अधिक की वृद्धि देखी जा सकती है।
- मध्यम वृद्धि: ट्रांस-हिमालय, गंगा के मैदानी इलाकों और दक्कन के पठार जैसे क्षेत्रों में अपेक्षित है।
- कम सापेक्ष वृद्धि: पश्चिमी घाट और हिमालयी वनों जैसे पारिस्थितिकी रूप से संतृप्त और जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्रों में देखी गई। पारिस्थितिकी बाधाओं और जलवायु दबावों के कारण यहाँ सीमित वृद्धि होगी।
- आधिकारिक अनुमानों से भिन्नता: मॉडल-आधारित अनुमानों और अवलोकन संबंधी डेटा के बीच एक उल्लेखनीय अंतर है:
- भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) का अनुमान: कार्बन स्टॉक 6.94 बिलियन टन (2013) से बढ़कर 7.29 बिलियन टन (2023) हो गया। क्षेत्रीय डेटा और रिमोट सेंसिंग के आधार पर वर्ष 2030 तक इसके 8.65 बिलियन टन तक पहुँचने का अनुमान है।
- अध्ययन-आधारित अनुमान: कार्बन भंडारण में काफी उच्च दीर्घकालिक वृद्धि का सुझाव देते हैं। यह पद्धतिगत अंतर को उजागर करता है, क्योंकि अध्ययन भविष्य कहने वाले मॉडलिंग (Predictive modelling) का उपयोग करता है जबकि FSI प्रेक्षित (observed) डेटा पर निर्भर करता है।
अध्ययन की चिंताएँ/सीमाएँ
- जलवायु परिवर्तन का सकारात्मक संकेत नहीं: वन कार्बन स्टॉक में वृद्धि का यह अर्थ आवश्यक नहीं है कि पारिस्थितिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ है। यह कुछ अंतर्निहित समस्याओं को छिपा सकती है, जैसे कि:-
- वनों का क्षरण (Forest Degradation)
- जैव विविधता की हानि।
- मॉडल में लुप्त कारक: अध्ययन का मॉडल कई महत्त्वपूर्ण वास्तविक दुनिया के चरों को शामिल नहीं करता है, जिनमें शामिल हैं:
- वनों की कटाई और भूमि उपयोग परिवर्तन
- वनाग्नि और अत्यधिक व्यवधान
- कीट और बीमारी का प्रकोप
- मृदा के पोषक तत्त्वों की सीमाएँ।
भारत के लिए नीतिगत प्रासंगिकता
- जलवायु प्रतिबद्धताएँ: भारत के अद्यतन ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (NDCs) वन कार्बन सिंक को बढ़ाने के लिए एक स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करते हैं। देश का लक्ष्य वर्ष 2035 तक 3.5–4 बिलियन टन CO₂ के बराबर अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाना है।
- वन और बायोइकोनॉमी: निम्नलिखित में वन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं:
- कार्बन पृथक्करण (Carbon sequestration), जो जलवायु परिवर्तन को कम करने में सहायता करता है।
- वनों पर निर्भर समुदायों की आजीविका का समर्थन करना।
- वन-आधारित संसाधनों के माध्यम से एक सतत् जैव अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना।
- क्षेत्र-विशिष्ट योजना की आवश्यकता: जलवायु और पारिस्थितिकी में क्षेत्रीय विविधताओं के कारण एक ही दृष्टिकोण (One-size-fits-all) अप्रभावी है। वन नीतियाँ इस प्रकार होनी चाहिए:
- जलवायु-संवेदनशील: भविष्य के जलवायु जोखिमों को ध्यान में रखते हुए।
- क्षेत्र-विशिष्ट: स्थानीय पारिस्थितिकी स्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप।