संदर्भ
कीट्रूडा (Keytruda), एक इम्यूनोथेरेपी आधारित कैंसर-रोधी औषधि, भारत की आपूर्ति शृंखला में नकली/लीक हुई शीशियों (Vials) की रिपोर्टों के कारण चर्चा में है, जिससे सुरक्षा संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।
इम्यूनोथेरेपी के बारे में
- इम्यूनोथेरेपी उपचार की एक ऐसी विधि है, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ या संशोधित कर विशेष रूप से कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ने में सक्षम बनाती है।
- प्रकृति एवं कार्यविधि: इम्यूनोथेरेपी शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली को सशक्त बनाकर कार्य करती है।
- यह रोगग्रस्त कोशिकाओं के विरुद्ध लक्षित क्रिया प्रदान करती है और कुछ मामलों में दीर्घकालिक प्रतिरक्षा स्मृति विकसित करने में सहायता करती है, जिससे सतत संरक्षण सुनिश्चित होता है।
इम्यूनोथेरेपी के प्रकार
- मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (Monoclonal antibodies – mAbs)
- चेकपॉइंट इनहिबिटर्स (Checkpoint inhibitors)
- वैक्सीन (Vaccines)
- साइटोकाइन्स (Cytokines)
- CAR T-सेल थेरेपी।
|
संबंधित तथ्य
- इसे वर्ष 2014 में अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA) द्वारा पहली बार स्वीकृति प्रदान की गई।
कीट्रूडा (Keytruda) के बारे में
- यह एक इम्यूनोथेरेपी औषधि है—एक व्यापक शब्द जो ऐसी उपचार विधियों को संदर्भित करता है, जो प्रतिरक्षा प्रणाली को रोगों, विशेषकर कैंसर, से लड़ने के लिए प्रशिक्षित करती हैं।
- यह कैंसर उपचार का एक हिस्सा है, जिसमें रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी तथा आवश्यकता होने पर शल्य चिकित्सा भी शामिल होती है।
- निर्माता: यह अमेरिका स्थित वैश्विक फार्मा कंपनी Merck & Co (MSD) द्वारा निर्मित है।
- व्यावसायिक उपलब्धता: यह पेम्ब्रोलिजुमैब (pembrolizumab) नाम से व्यावसायिक रूप से उपलब्ध है।
- कार्यविधि: कीट्रूडा मोनोक्लोनल एंटीबॉडी की श्रेणी में आती है, जो प्रयोगशाला में निर्मित अणु होते हैं और विशिष्ट लक्ष्यों से जुड़कर प्रतिरक्षा प्रणाली को कैंसर कोशिकाओं की पहचान एवं विनाश में सक्षम बनाते हैं।
- चेकपॉइंट इनहिबिटर: यह “चेकपॉइंट इनहिबिटर्स” नामक वर्ग की औषधि है—ऐसी दवाएँ, जो शरीर की T-कोशिकाओं (प्रतिरक्षा प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण घटक) को कैंसर कोशिकाओं पर आक्रमण करने से रोकने वाली बाधाओं को हटाती हैं।
- भारतीय रोगियों के लिए उपलब्धता: यह कंपनी के पेशेंट एक्सेस प्रोग्राम के माध्यम से उपलब्ध है।
- इस कार्यक्रम के अंतर्गत प्रारंभ में लगभग 10 लाख रुपये की लागत पर 5 शीशियाँ खरीदने पर 30 शीशियाँ निःशुल्क प्रदान की जाती हैं।
- रोगी प्रारंभिक खुराक के लिए तृतीय-पक्ष स्वास्थ्य बीमा का उपयोग कर सकते हैं।
- इस कार्यक्रम का लाभ प्राप्त करने हेतु कुछ शर्तें हैं, जैसे- रोगी की बीमा राशि या आय 25 लाख रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए।
सीमाएँ
- उच्च लागत: Merck & Co. प्रत्येक तीन सप्ताह में 200 mg की खुराक की अनुशंसा करता है। प्रत्येक 100 mg शीशी की कीमत ₹1.5 लाख से अधिक होने के कारण, बिना बीमा के उपचार की लागत ₹3 लाख प्रति माह से अधिक हो सकती है।
- हालाँकि, वर्ष 2028 में पेटेंट समाप्ति के बाद सस्ते जेनेरिक संस्करण उपलब्ध हो सकते हैं, जिससे लागत में लगभग 70% तक कमी संभव है।
- सर्वत्र प्रभावी नहीं: यह केवल कुछ प्रकार के कैंसर और विशिष्ट रोगी प्रोफाइल में ही प्रभावी है।
- यह कुछ फेफड़ों के कैंसर के रोगियों में प्रभावी है, किंतु उन रोगियों में प्रभावी नहीं हो सकता, जिनमें विशिष्ट बायोमार्कर (जैसे PD-L1 एक्स्प्रेसन) अनुपस्थित हैं।
- प्रतिरक्षा-संबंधी दुष्प्रभाव: यह प्रतिरक्षा प्रणाली को स्वस्थ अंगों पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित कर सकता है।
- कुछ मामलों में रोगियों में फेफड़ों में सूजन (न्यूमोनाइटिस) या थायरॉयड विकार विकसित होने की सूचना मिली है।
- विलंबित प्रतिक्रिया: उपचारात्मक प्रभाव कीमोथेरेपी की तुलना में समय ले सकते हैं।
- प्रारंभ में ट्यूमर का आकार अपरिवर्तित रह सकता है या घटने से पहले बढ़ता हुआ प्रतीत हो सकता है (छद्म-प्रगति)।
आगे की राह
- सुलभता एवं वहनीयता में सुधार: वर्ष 2028 में कीट्रूडा के पेटेंट समाप्ति के पश्चात् जेनेरिक एवं बायोसिमिलर संस्करणों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, जिससे उपचार लागत में उल्लेखनीय कमी लाई जा सके तथा भारत जैसे देशों में इसकी उपलब्धता में सुधार हो।
- नियामकीय निगरानी को सुदृढ़ करना: आपूर्ति शृंखला में नकली दवाओं जैसी समस्याओं को रोकने हेतु सुदृढ़ निगरानी तंत्र स्थापित किया जाना आवश्यक है, ताकि रोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
- घरेलू अनुसंधान एवं विनिर्माण को प्रोत्साहन: स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास (R&D) तथा इम्यूनोथेरेपी औषधियों के उत्पादन को प्रोत्साहित करने से आयात पर निर्भरता कम होगी और उपचार अधिक किफायती बन सकेगा।
- व्यक्तिगत चिकित्सा को बढ़ावा: बायोमार्कर-आधारित उपचार (जैसे PD-L1 परीक्षण) पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है, जिससे उपयुक्त रोगियों की पहचान कर उपचार की प्रभावशीलता बढ़ाई जा सके तथा अनावश्यक लागत को कम किया जा सके।
कीमोथेरेपी बनाम इम्यूनोथेरेपी
| पहलू |
कीमोथेरेपी |
इम्यूनोथेरेपी |
| परिभाषा |
तीव्र गति से विभाजित होने वाली कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए औषधियों का उपयोग। |
रोग से लड़ने हेतु प्रतिरक्षा तंत्र को सुदृढ़ या संशोधित करता है। |
| लक्ष्य |
गैर-विशिष्ट (कैंसरग्रस्त तथा स्वस्थ तीव्र-विभाजित कोशिकाओं दोनों को प्रभावित करता है)। |
अत्यधिक विशिष्ट (प्रतिरक्षा तंत्र के माध्यम से कैंसर कोशिकाओं को लक्षित करता है)। |
| तंत्र |
कैंसर कोशिकाओं को प्रत्यक्ष रूप से नष्ट करता है। |
प्रतिरक्षा तंत्र (जैसे T-कोशिकाएँ) को कैंसर पर आक्रमण करने हेतु प्रेरित करता है। |
| दुष्प्रभाव |
गंभीर (बाल झड़ना, मतली, थकान, कम प्रतिरक्षा)। |
सामान्यतः कम, परंतु प्रतिरक्षा-संबंधी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर सकता है। |
| प्रभावशीलता |
अनेक कैंसरों में प्रभावी, परंतु पुनरावृत्ति हो सकती है। |
चयनित कैंसरों में प्रभावी; कुछ मामलों में दीर्घकालिक प्रतिक्रिया। |
| प्रभाव की अवधि |
सामान्यतः अल्पकालिक; बार-बार चक्रों की आवश्यकता |
दीर्घकालिक संरक्षण प्रदान कर सकता है (प्रतिरक्षा स्मृति)। |
| व्यक्तिकरण |
कम व्यक्तिगत |
व्यक्तिगत उपचार की अधिक संभावना |
| लागत |
अपेक्षाकृत सस्ती (विशेषकर जेनेरिक) |
महँगी तथा कम सुलभ |
| उदाहरण |
सिस्प्लैटिन, डॉक्सोरूबिसिन |
चेकपॉइंट इनहिबिटर्स (जैसे-कीट्रूडा ) |
भारत में कैंसर की घटनाएँ: एक अवलोकन
- यद्यपि भारत में कैंसर की घटना दर वर्तमान में वैश्विक औसत से कम है, फिर भी यह निरंतर बढ़ रही है।
- ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज एस्टिमेट्स: इसके अनुसार, कैंसर की दर वर्ष 1990 में 84.8 प्रति 100,000 जनसंख्या से बढ़कर वर्ष 2023 में 107.2 प्रति 1,00,000 हो गई है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन का ‘ग्लोबल कैंसर ऑब्जर्वेटरी’: इसके आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 में भारत में 14.13 लाख कैंसर के मामले दर्ज किए गए, जो वर्ष 2045 तक 73.8% बढ़कर 24.56 लाख मामलों तक पहुँचने का अनुमान है।
- ग्लोबोकैन डाटाबेस: इसके अनुसार, भारत की वर्तमान घटना दर 98.5 प्रति 1,00,000 है।

|