संदर्भ
वर्तमान एलपीजी आपूर्ति संकट के बीच, कई परिवार पुनः जलाऊ लकड़ी के प्रयोग की ओर लौट रहे हैं, जिससे बायोमास कुकस्टोव एक स्वच्छ, किंतु संक्रमणकालीन विकल्प के रूप में पुनः चर्चा में आए हैं।
संबंधित तथ्य
- राष्ट्रीय उन्नत चूल्हा कार्यक्रम (NPIC) को वर्ष 1985 में भारत सरकार द्वारा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अंतर्गत प्रारंभ किया गया था।
- यह कार्यक्रम 2000 के प्रारंभिक दशक में समाप्त कर दिया गया, किंतु इसने बाद की स्वच्छ खाना पकाने की पहलों जैसे राष्ट्रीय बायोमास कुकस्टोव पहल (NBCI) तथा प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) की नींव रखी।
उन्नत चूल्हों (ICS) के बारे में
- उन्नत कुकस्टोव (ICS) उन्नत बायोमास-आधारित खाना पकाने के उपकरण हैं, जिन्हें ऊष्मा दक्षता बढ़ाने तथा हानिकारक उत्सर्जन को कम करने के लिए डिजाइन किया गया है।
- इनमें जलाऊ लकड़ी, फसल अवशेष, गोबर के उपले, पेलेट्स तथा ब्रिकेट्स जैसे ईंधनों का उपयोग किया जाता है।
- पारंपरिक चूल्हों के विपरीत, इनमें बेहतर वायु प्रवाह, इन्सुलेशन तथा द्वितीयक दहन जैसी विशेषताएँ होती हैं, जिससे अधिक स्वच्छ दहन सुनिश्चित होता है।
मुख्य लाभ
- उच्च दक्षता: पारंपरिक “चूल्हे” खराब वायु प्रवाह के कारण अधिकांश ऊष्मा व्यर्थ कर देते हैं और उनकी दक्षता मात्र 10% के आस-पास होती है।
- इसके विपरीत, आधुनिक उन्नत कुकस्टोव 38% से 45% तक तापीय दक्षता प्राप्त करते हैं, क्योंकि इनमें द्वितीयक वायु प्रवाह (Secondary aeration) जैसी तकनीकों का उपयोग होता है, जो धुएँ में परिवर्तित होने से पहले कार्बन और हानिकारक गैसों को प्रग्राहित करने में सहायता करती हैं।
- कार्बन क्रेडिट अर्जित करने की क्षमता: उन्नत कुकस्टोव द्वारा उत्सर्जन में कमी को मापा जा सकता है और उसे कार्बन क्रेडिट में परिवर्तित किया जा सकता है, जिससे एक वित्तीय स्रोत उत्पन्न होता है तथा निम्न-आय वर्ग के परिवारों के लिए चूल्हे अधिक सुलभ बनते हैं।
- वैकल्पिक जैव-ईंधनों का उपयोग: आधुनिक कुकस्टोव पेलेट्स और ब्रिकेट्स जैसे वैकल्पिक बायोमास ईंधनों पर भी कार्य कर सकते हैं, जो लकड़ी के चूर्ण या कृषि अपशिष्ट से बनाए जाते हैं।
- स्वास्थ्य लाभ: उन्नत कुकस्टोव हानिकारक कणों और धुएँ के संपर्क को कम करते हैं, जिससे श्वसन तथा नेत्र संबंधी रोगों में कमी आती है।
- उदाहरण: ग्रामीण परिवारों में ICS का उपयोग करने वाली महिलाओं और बच्चों में पारंपरिक चूल्हा उपयोगकर्ताओं की तुलना में दीर्घकालिक खाँसी और श्वसन समस्याओं के कम मामले देखे गए हैं।
- महिला सशक्तीकरण: ईंधन की आवश्यकता में कमी से महिलाओं द्वारा जलाऊ लकड़ी एकत्र करने में लगने वाला समय और शारीरिक श्रम घटता है, जिससे वे शिक्षा या आय-सृजन गतिविधियों में भाग ले सकती हैं।
- कई ग्रामीण क्षेत्रों में ICS के अपनाने से महिलाओं के लिए प्रतिदिन कई घंटे मुक्त हुए हैं, जिससे वे स्व-सहायता समूहों (SHGs) और आजीविका गतिविधियों में भागीदारी कर रही हैं।
- विकेंद्रीकृत एवं कम-निवेश ईंधन आपूर्ति लाभ: बड़े पैमाने पर बायोमास कुकस्टोव अपनाने के लिए ईंधन आपूर्ति शृंखला में भारी निवेश की आवश्यकता नहीं होती है।
- क्योंकि प्रमुख ईंधन—जैसे जलाऊ लकड़ी, फसल अपशिष्ट और गोबर के उपले—ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में पहले से ही उपलब्ध हैं, इसलिए महँगी केंद्रीकृत अवसंरचना की आवश्यकता कम होती है।
उन्नत कुकस्टोव के बड़े पैमाने पर अपनाने में चुनौतियाँ
- कमजोर वितरण एवं अंतिम छोर तक पहुँच: कमजोर लॉजिस्टिक्स तथा ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित पहुँच के कारण दूरस्थ क्षेत्रों में ICS की समय पर उपलब्धता बाधित होती है।
- पर्वतीय या जनजातीय क्षेत्रों के गाँवों में प्रायः विश्वसनीय डीलरों या सेवा केंद्रों तक पहुँच नहीं होती है।
- सस्ती वित्तीय व्यवस्था का अभाव: प्रारंभिक लागत में काफी भिन्नता होती है। घरेलू मॉडल ₹2,000 से कम से प्रारंभ होते हैं, जबकि व्यावसायिक प्रणालियाँ ₹20,000 से अधिक तक हो सकती हैं, जो निर्माता और खरीद चैनल (प्रत्यक्ष, ई-कॉमर्स या वितरक) पर निर्भर करती हैं, जिससे मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए वहन करना कठिन हो जाता है।
- सीमित जागरूकता एवं व्यवहारगत बाधाएँ: अनेक परिवार ICS के दीर्घकालिक लाभों से अनभिज्ञ हैं या पारंपरिक खाना पकाने की विधियों को बदलने में संकोच करते हैं।
- परिचितता और भोजन के स्वाद की धारणा के कारण पारंपरिक चूल्हों को प्राथमिकता दी जाती है।
- रखरखाव एवं विक्रयोत्तर सेवा संबंधी समस्याएँ: मरम्मत सेवाओं और स्पेयर पार्ट्स की कमी से दीर्घकालिक उपयोगिता और प्रौद्योगिकी पर विश्वास प्रभावित होता है।
- स्थानीय तकनीशियनों के अभाव में खराब चूल्हों को प्रायः त्याग दिया जाता है।
- असंगत ईंधन आपूर्ति शृंखला (प्रसंस्कृत बायोमास हेतु): यद्यपि कच्चा बायोमास उपलब्ध है, किंतु पेलेट्स या ब्रिकेट्स की आपूर्ति अनियमित हो सकती है।
- कुछ क्षेत्रों में मानकीकृत बायोमास ईंधनों की अनुपलब्धता के कारण उपयोगकर्ता पुनः पारंपरिक ईंधनों की ओर लौट जाते हैं।
आगे की राह
- वितरण नेटवर्क को सुदृढ़ करना: मजबूत आपूर्ति शृंखलाओं के माध्यम से पहुँच का विस्तार कर ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- स्थानीय डीलरों तथा स्व-सहायता समूहों (SHGs) के साथ साझेदारी कर व्यापक प्रसार किया जा सकता है।
- लॉजिस्टिक्स एवं अंतिम छोर तक पहुँच में सुधार: कुशल परिवहन एवं वितरण प्रणालियों का विकास कर अविकसित क्षेत्रों तक पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- ग्रामीण उद्यमियों या ग्राम-स्तरीय वितरकों का उपयोग कर डोरस्टेप डिलीवरी सुनिश्चित की जा सकती है।
- स्थानीय साझेदारी को बढ़ावा: NGOs, सामुदायिक संगठनों तथा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) के साथ सहयोग कर प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सकता है।
- NGOs द्वारा गाँव स्तर पर जागरूकता अभियान एवं प्रदर्शन आयोजित किए जा सकते हैं।
- विश्वसनीय विक्रयोत्तर समर्थन सुनिश्चित करना: रखरखाव सेवाओं एवं फीडबैक तंत्र की स्थापना कर दीर्घकालिक उपयोग को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- स्थानीय तकनीशियनों का प्रशिक्षण तथा सेवा केंद्रों की स्थापना के माध्यम से मरम्मत एवं स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है।
बायोमास स्टोव्स बनाम इलेक्ट्रिक स्टोव्स
| पैरामीटर |
बायोमास स्टोव्स (ICS) |
इलेक्ट्रिक स्टोव्स |
| ऊर्जा स्रोत |
लकड़ी, उपले, फसल अवशेष, पेलेट्स |
विद्युत |
| उपलब्धता |
ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक रूप से उपलब्ध |
विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति पर निर्भर |
| दक्षता |
मध्यम (≈38–45%) |
उच्च (≈70–90%+) |
| पर्यावरणीय प्रभाव |
उत्सर्जन में कमी, परंतु अभी भी धुआँ/ब्लैक कार्बन उत्पन्न होता है। |
घरेलू स्तर पर शून्य उत्सर्जन; ऊर्जा स्रोत पर निर्भर। |
| स्वास्थ्य प्रभाव |
पारंपरिक चूल्हों की तुलना में कम प्रदूषण, पर कुछ जोखिम बने रहते हैं। |
सबसे स्वच्छ विकल्प; कोई घरेलू वायु प्रदूषण नहीं। |
| लागत |
प्रारंभिक लागत कम से मध्यम; ईंधन सस्ता |
प्रारंभिक लागत मध्यम; विद्युत की आवर्ती लागत। |
| सुविधा |
ईंधन संग्रह एवं मैनुअल संचालन की आवश्यकता। |
उपयोग में आसान, त्वरित हीटिंग, कम रखरखाव। |
| स्थायित्व |
यदि जैवमास का पुनर्जनन हो तो स्थायी होता है। |
नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित होने पर अत्यधिक स्थायी होता है। |
| उपयुक्तता |
ग्रामीण एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्र |
शहरी एवं विद्युतीकृत क्षेत्र। |