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जलियाँवाला बाग हत्याकांड

13 Apr 2026

संदर्भ

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 13 अप्रैल, 1919 को जलियाँवाला बाग में शहीद हुए स्वतंत्रता सेनानियों को उनके 107वीं शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित की।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बारे में

  • 13 अप्रैल 1919 को, बैसाखी के अवसर पर रॉलेट एक्ट के विरोध में अमृतसर स्थित जलियाँवाला बाग में एक विशाल शांतिपूर्ण सभा आयोजित की गई थी।
    • पंजाब में तैनात ब्रिटिश अधिकारी रेजिनाल्ड डायर ने अमृतसर में तैनात लगभग 50 सैनिकों को नागरिकों, जिसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे, पर गोली चलाने का आदेश दिया।

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  • मानव जीवन पर प्रभाव: इस नरसंहार में कम-से-कम 379 लोगों की मृत्यु हुई तथा 1,500 से अधिक लोग घायल हुए।
    • इस त्रासदी ने एक राष्ट्रवादी आंदोलन को जन्म दिया, जिसका उद्देश्य स्वतंत्रता प्राप्त करना था तथा जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्त्वपूर्ण ध्यान आकर्षित किया।
  • राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा विरोध: रबींद्रनाथ टैगोर ने जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में अपनी नाइटहुड उपाधि त्याग दी।
    • महात्मा गांधी ने ब्रिटिश द्वारा प्रदान की गई ‘कैसर-ए-हिंद’ उपाधि त्याग दी।
    • जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बाद असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड की पृष्ठभूमि: घटनाक्रम

  • रॉलेट एक्ट की स्वीकृति: वर्ष 1918 के अंत में इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल द्वारा रॉलेट एक्ट की स्वीकृति ने पूरे देश में तीव्र आक्रोश उत्पन्न किया था।
  • सत्याग्रह की शपथ: महात्मा गांधी द्वारा 24 फरवरी, 1919 को अहमदाबाद में सत्याग्रह की शपथ ली गई, जिसमें यह वादा किया गया कि प्रस्तावित रॉलेट कानून वापस लिए जाने तक एक ‘समिति’ द्वारा निर्धारित विशिष्ट नियमों की अवज्ञा (Disobey) की जाएगी।
  • राष्ट्रीय हड़ताल का आह्वान: 6 अप्रैल को राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया गया, जिसे अभूतपूर्व सफलता मिली।
  • ब्रिटिश दमन और नेताओं का निर्वासन: महात्मा गांधी अमृतसर जाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) वापस भेज दिया।
    • पंजाब के दो सत्याग्रह नेताओं को जबरन निर्वासित किया गया, जिसके बाद अमृतसर में जनता में तत्काल आक्रोश फैल गया।
  • जनरल डायर द्वारा क्रूर दमन: प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर माइकल ओ’ड्वायर ने शहर को सेना के हवाले कर दिया, जिसका नेतृत्व ब्रिगेडियर जनरल डायर ने किया।
    •  13 अप्रैल को लगभग 20,000 लोग स्थल पर एकत्र हुए थे। जनरल डायर सशस्त्र सैनिकों के साथ पहुँचा और बिना किसी पूर्व चेतावनी के गोली चलाने का आदेश दिया।
  • हंटर आयोग: वर्ष 1919 में गठित जाँच आयोग, जिसे हंटर आयोग कहा गया, की अध्यक्षता स्कॉटलैंड के पूर्व सॉलिसिटर-जनरल और कॉलेज ऑफ जस्टिस के सीनेटर लॉर्ड विलियम हंटर ने की।
    • आयोग और डायर के बीच हुई बातचीत का विस्तृत विवरण निगेल कोलेट की वर्ष 2006 में प्रकाशित पुस्तक द बुचर ऑफ अमृतसर: जनरल रेजिनाल्ड डायर’ (The Butcher of Amritsar: General Reginald Dyer) में मिलता है।
  • प्रभाव: कई इतिहासकारों के अनुसार, यह घटना भारतीयों और ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के संबंधों में एक निर्णायक मोड़ थी तथा भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण क्षण सिद्ध हुई।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड से मिले सबक

  • मानवाधिकारों को बनाए रखने का महत्त्व: यह हत्याकांड हमें यह स्मरण कराता है कि मौलिक मानवाधिकारों—विशेषकर शांतिपूर्ण सभा का अधिकार और जीवन का अधिकार—का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। यह इस बात का दुखद उदाहरण है कि जब सत्ता में बैठे लोग इन अधिकारों की अवहेलना करते हैं और असहमति को दबाने के लिए हिंसा का प्रयोग करते हैं, तो क्या परिणाम हो सकते हैं।
  • अहिंसक प्रतिरोध की शक्ति: कई भारतीय नेताओं, जिनमें महात्मा गांधी भी शामिल थे, ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष के लिए अहिंसक प्रतिरोध का समर्थन किया। यह दृष्टिकोण अंततः भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुआ।
  • ऐतिहासिक स्मृति का महत्त्व: जलियाँवाला बाग हत्याकांड, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और मानवाधिकार एवं न्याय की निरंतर लड़ाई का एक शक्तिशाली प्रतीक है। यह हमें यह स्मरण कराता है कि हमें अपने इतिहास को याद रखना और उससे सीखना चाहिए, ताकि हम एक बेहतर भविष्य की ओर अग्रसर हो सकें।
जलियाँवाला बाग हत्याकांड

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