दुर्बलता (Frailty) एवं स्टेम सेल थेरेपी

15 Apr 2026

संदर्भ

हाल ही मेंसेल स्टेम सेल’ (Cell Stem Cell) में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन (CRATUS Phase IIb परीक्षण) में पाया गया कि मेसेंकाइमल स्टेम सेल थेरेपी वृद्ध व्यक्तियों में दुर्बलता की स्थिति में शारीरिक सहनशक्ति में उल्लेखनीय सुधार करती है।

संबंधित तथ्य

  • दुर्बलता से ग्रस्त वृद्ध व्यक्तियों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि मेसेंकाइमल स्टेम कोशिकाओं का ‘सिंगल इन्फ्यूजन’ उनकी शारीरिक सहनशक्ति को महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ाता है।
    • 70 से 85 वर्ष आयु वर्ग के प्रतिभागियों, जिन्हें उच्चतम खुराक दी गई, उन्होंने उपचार के नौ माह बाद छह मिनट के ‘वॉक’ परीक्षण में औसतन 60 मीटर अधिक दूरी तय की, जो उनके प्रारंभिक प्रदर्शन की तुलना में लगभग 20% की वृद्धि दर्शाता है।

मेसेंकाइमल स्टेम सेल’ के बारे में

  • मेसेंकाइमल स्टेम सेल स्वाभाविक रूप से अस्थि मज्जा और वसा ऊतक में पाई जाती हैं।
  • ये कोशिकाएँ जैविक रूप से बहु-क्षमतावान होती हैं, क्योंकि ये अस्थि, उपास्थि या मांसपेशी में विभेदित हो सकती हैं तथा रक्त प्रवाह में ऐसे अणु निष्कासित करती हैं, जो विकार को कम करते हैं और ऊतक मरम्मत को प्रोत्साहित करते हैं।
  • अन्य कई कोशिका उपचारों के विपरीत, मेसेंकाइमल स्टेम कोशिकाएँ प्राप्तकर्ता की प्रतिरक्षा प्रणाली को तीव्र रूप से सक्रिय नहीं करतीं, जिससे प्रतिरक्षादमनकारी दवाओं की आवश्यकता कम हो जाती है।

स्टेम सेल थेरेपी दुर्बलता में कैसे सहायक है?

  • पुनर्जनन क्षमता: स्टेम सेल शरीर की घटती मरम्मत क्षमता को पुनः सुदृढ़ करती हैं, जिससे मांसपेशियों और अस्थियों जैसे क्षतिग्रस्त ऊतकों का पुनर्जनन होता है।
  • दीर्घकालिक विकार में कमी: मेसेंकाइमल स्टेम कोशिकाएँ विकार-रोधी अणु स्रावित करती हैं, जिससे वृद्धावस्था में होने वाली निम्न-स्तरीय दीर्घकालिक विकार को नियंत्रित किया जाता है।
  • मांसपेशीय शक्ति और सहनशक्ति में सुधार: मांसपेशियों की मरम्मत और वृद्धि को प्रोत्साहित कर यह थेरेपी शारीरिक प्रदर्शन में वृद्धि करती है, जैसे वृद्ध व्यक्तियों में चलने की क्षमता में सुधार।
  • प्रतिरक्षा कार्य में सुधार: स्टेम कोशिकाएँ प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का नियमन करती हैं, जिससे संक्रमण के प्रति संवेदनशीलता कम होती है और समग्र सहिष्णुता बढ़ती है
  • ऊतक मरम्मत और उपचार को प्रोत्साहन: वृद्धि कारकों के स्राव के माध्यम से ये कोशिकाएँ चोटों के उपचार और रोग/शल्य चिकित्सा के बाद पुनर्प्राप्ति को तीव्र करती हैं।
  • रक्त वाहिका स्वास्थ्य में सुधार: ये रक्त वाहिकाओं की मरम्मत में सहायक होती हैं, जिससे रक्त परिसंचरण में सुधार होता है और आयु-संबंधी गिरावट कम होती है।
  • कार्यात्मक स्वायत्तता में वृद्धि: शक्ति, सहनशक्ति और पुनर्प्राप्ति में सुधार के माध्यम से यह थेरेपी वृद्ध व्यक्तियों को स्वतंत्र जीवन और बेहतर जीवन गुणवत्ता बनाए रखने में सहायता करती है।

दुर्बलता (Frailty) के बारे में

  • दुर्बलता तीव्र जैविक वृद्धावस्था की एक अवस्था है, जो कम सहनशक्ति और धीमी पुनर्प्राप्ति द्वारा चिह्नित होती है।
    • उदाहरण: यदि कोई वृद्ध व्यक्ति मामूली गिरावट या संक्रमण से असामान्य रूप से अधिक समय में ठीक होता है, तो यह केवल सामान्य वृद्धावस्था” नहीं बल्कि दुर्बलता का संकेत हो सकता है।
  • कारण: यह किसी एक कारण वाली एकल बीमारी नहीं है, बल्कि यह दीर्घकालिक विकार, मांसपेशियों की हानि, रक्त वाहिका वृद्धावस्था, प्रतिरक्षा तंत्र की विकृति तथा दीर्घकालिक तनाव के संचयी प्रभावों से उत्पन्न होती है।
  • प्रभाव: विश्व स्तर पर 50 वर्ष से अधिक आयु के लगभग प्रत्येक चार में से एक व्यक्ति को दुर्बलता प्रभावित करती है।
    • भारत में, जहाँ वर्ष 2050 तक 60 वर्ष से अधिक आयु की जनसंख्या लगभग 20% तक पहुँचने का अनुमान है, यह स्थिति व्यापक रूप से विद्यमान होने की संभावना है, किंतु इसका अक्सर निदान नहीं हो पाता है।

दुर्बलता (Frailty) से संबंधित चुनौतियाँ

  • क्रियाविधि पूर्णतः स्पष्ट नहीं: मधुमेह या उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों के विपरीत, दुर्बलता के लिए कोई मानक उपचार प्रोटोकॉल उपलब्ध नहीं है तथा यह नीति-निर्माण में अपर्याप्त रूप से दृष्टिगोचर रहती है।
  • स्वास्थ्य प्रणाली का तीव्र रोगों पर केंद्रित होना: भारत की स्वास्थ्य प्रणाली अभी भी मुख्यतः तीव्र रोगों के उपचार पर केंद्रित है, न कि दीर्घकालिक वृद्धावस्था संबंधी स्थितियों पर।
    • दुर्बलता अस्पताल में भर्ती और मृत्यु दर का एक प्रमुख पूर्वानुमानक है, फिर भी यह प्रायः चिकित्सीय अभिलेखों या बीमा दावों में परिलक्षित नहीं होती।
  • लोक स्वास्थ्य योजनाओं में अंतराल: आयुष्मान भारत जैसी प्रमुख योजनाएँ मुख्यतः द्वितीयक और तृतीयक देखभाल पर केंद्रित हैं।
    • जेरियाट्रिक मूल्यांकन, कार्यात्मक स्क्रीनिंग तथा प्रारंभिक हस्तक्षेपों को सीमित महत्त्व मिलता है तथा दुर्बलता को प्रतिपूर्ति योग्य स्थिति के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है।
  • वृद्धजन संबंधी कार्यक्रमों की सीमित पहुँच: यद्यपि राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम जैसी पहलें उपस्थित हैं, परंतु उनका क्रियान्वयन अपर्याप्त है।
    • जिला स्तर पर जेरियाट्रिक क्लीनिकों की कमी है और स्वास्थ्यकर्मी प्रायः मानकीकृत दुर्बलता आकलन उपकरणों का उपयोग नहीं करते है।
  • चिकित्सीय प्रशिक्षण और जागरूकता की कमी: भारत में चिकित्सा शिक्षा प्रायः वृद्धावस्था से संबंधित दुर्बलता को अनिवार्य मानती है, जिससे इसका कम निदान और उपेक्षा होती है, जबकि यह एक प्रबंधनीय स्थिति है।
  • बहु-कारक प्रकृति: दुर्बलता संबंधी विकार, मांसपेशियों की हानि, प्रतिरक्षा तंत्र की विकृति तथा रक्त वाहिका वृद्धावस्था जैसे कई कारकों के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है, जिससे इसका निदान और प्रबंधन जटिल हो जाता है।

आगे की राह

  • दुर्बलता को लोक स्वास्थ्य नीति में समाहित करना: दुर्बलता को स्वास्थ्य प्रणाली में एक स्वतंत्र नैदानिक स्थिति के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
    • इसे नियमित स्क्रीनिंग कार्यक्रमों में सम्मिलित किया जाना चाहिए तथा बीमा कवरेज के अंतर्गत लाया जाना चाहिए, ताकि वृद्धजन के लिए प्रारंभिक निदान और वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
  • वृद्धावस्था संबंधी देखभाल सुविधा को सुदृढ़ करना: जिला स्तर पर समर्पित जेरियाट्रिक क्लीनिकों की स्थापना के माध्यम से अवसंरचना का विस्तार आवश्यक है।
    • इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्यकर्मियों को मानकीकृत दुर्बलता आकलन उपकरणों के उपयोग हेतु प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, जिससे समय पर पहचान और प्रबंधन संभव हो सके।
  • नैतिक अनुसंधान को प्रोत्साहन: विशेषकर भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद जैसे संस्थानों के माध्यम से साक्ष्य-आधारित और नैतिक अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
    • स्टेम-सेल थेरेपी से संबंधित क्लिनिकल परीक्षणों में व्यापक स्तर पर अपनाने से पूर्व सुरक्षा, वहनीयता और सुलभता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
  • निवारक वृद्धावस्था देखभाल की ओर परिवर्तन: स्वास्थ्य नीति को उपचारात्मक से निवारक दृष्टिकोण की ओर स्थानांतरित किया जाना चाहिए, जिसमें प्रारंभिक पहचान, जीवनशैली हस्तक्षेप और सामुदायिक आधारित देखभाल पर बल दिया जाए।
    • इससे अस्पताल में भर्ती दर तथा स्वास्थ्य प्रणाली पर समग्र भार में कमी आएगी।

वृद्धावस्था संबंधी समस्याओं के समाधान हेतु भारत सरकार की पहलें

  • आयुष्मान भारत: यह योजना प्रति परिवार ₹5 लाख तक का स्वास्थ्य बीमा कवरेज प्रदान करती है, जिससे अस्पताल में भर्ती की आवश्यकता वाले वृद्धजनों को लाभ मिलता है और व्यक्तिगत व्यय में कमी आती है।
  • राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम (NPHCE): यह वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुलभ, किफायती और समर्पित स्वास्थ्य सेवाओं पर केंद्रित है, जिसमें जेरियाट्रिक क्लीनिक, पुनर्वास इकाइयाँ तथा सामुदायिक आधारित देखभाल शामिल हैं।
  • अटल पेंशन योजना (APY): यह असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को निश्चित पेंशन प्रदान कर वृद्धावस्था में आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
  • माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007: यह अधिनियम संतानों और उत्तराधिकारियों को वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी प्रदान करता है तथा उनके जीवन और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
  • राष्ट्रीय वयोश्री योजना: यह आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के वरिष्ठ नागरिकों को सहायक उपकरण (जैसे-चलने की छड़ी, श्रवण यंत्र, व्हीलचेयर) प्रदान करती है।

दुर्बलता (Frailty) से निपटने हेतु वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ

देश / संगठन दृष्टिकोण मुख्य उपाय
जापान सामुदायिक-आधारित निवारक मॉडल नियमित स्क्रीनिंग, पोषण, व्यायाम और सामाजिक सहभागिता पर ध्यान
यूनाइटेड किंगडम प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल एकीकरण बहु-विषयक देखभाल, प्रारंभिक निदान
यूरोपीय संघ नीतिगत स्तर पर एकीकरण एडवांटेज ऑन फ्रेल्टी’ नामक संयुक्त कार्रवाई, रोकथाम और विकलांगता में कमी पर ध्यान
संयुक्त राज्य अमेरिका नैदानिक एवं अनुसंधान-आधारित मॉडल अस्पतालों में दुर्बलता (Frailty) सूचकांकों का उपयोग, परीक्षणों (जैसे-स्टेम सेल थेरेपी) में निवेश
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) वैश्विक स्वस्थ वृद्धावस्था ढाँचा वृद्ध व्यक्तियों के लिए एकीकृत देखभाल (ICOPE), आंतरिक क्षमता पर ध्यान
दक्षिण कोरिया प्रौद्योगिकी-सक्षम वृद्ध देखभाल डिजिटल स्वास्थ्य निगरानी, निवारक स्क्रीनिंग
सिंगापुर एकीकृत सामुदायिक देखभाल सक्रिय वृद्धावस्था कार्यक्रम, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र।

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