भारत में खाद्य अपशिष्ट संकट

15 Apr 2026

संदर्भ

‘अंतरराष्ट्रीय शून्य अपशिष्ट दिवस’ (2026) की थीम खाद्य अपशिष्ट के मुद्दे को प्रदर्शित करती है, जो अपशिष्ट वृद्धि, भुखमरी और प्रणालीगत अक्षमताओं की ओर ध्यान आकर्षित करता है।

भारत एवं विश्व में खाद्य अपशिष्ट की स्थिति

  • वैश्विक परिमाण: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के खाद्य अपशिष्ट सूचकांक, 2024 के अनुसार, विश्व स्तर पर प्रतिवर्ष लगभग 1.05 अरब टन खाद्य पदार्थ अपशिष्ट के रूप में नष्ट हो जाते हैं।
  • क्षेत्रीय वितरण: खाद्य अपशिष्ट का प्रमुख स्रोत घरेलू क्षेत्र (60%) है, इसके बाद खाद्य सेवा क्षेत्र (28%) तथा खुदरा क्षेत्र (12%) का स्थान है।
  • भारत की स्थिति: कुल खाद्य अपशिष्ट के संदर्भ में भारत वैश्विक स्तर पर द्वितीय सर्वाधिक योगदानकर्ता है।
  • भारत में परिमाण एवं आर्थिक लागत: भारत में प्रतिवर्ष लगभग 78–80 मिलियन टन खाद्य पदार्थ अपशिष्ट के रूप में नष्ट होते हैं, जिससे लगभग ₹1.55 लाख करोड़ की आर्थिक हानि होती है।
  • प्रति व्यक्ति अपशिष्ट: भारत में घरेलू स्तर पर खाद्य अपशिष्ट लगभग 55 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष है, जो विकसित देशों की तुलना में कम होने के बावजूद, कुल परिमाण के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

भुखमरी बनाम अपशिष्ट का विरोधाभास

  • वैश्विक विरोधाभास: लगभग 783 मिलियन लोग भुखमरी का सामना कर रहे हैं, जबकि प्रतिवर्ष 1.05 अरब टन खाद्य पदार्थ बर्बाद हो जाते हैं।
  • सुलभता संकट: लगभग 3.1 अरब लोग पर्याप्त वैश्विक खाद्य उत्पादन के बावजूद स्वस्थ आहार वहन करने में असमर्थ हैं।
  • भारत में स्थिति: भारत प्रतिवर्ष 78–80 मिलियन टन खाद्य पदार्थ बर्बाद करता है, जबकि लगभग 194 मिलियन लोग कुपोषित बने हुए हैं।

खाद्य अपशिष्ट के कारण

  • आपूर्ति शृंखला संबंधी समस्याएँ: अपर्याप्त भंडारण, कमजोर परिवहन व्यवस्था तथा शीत-शृंखला अवसंरचना की कमी के कारण खाद्य पदार्थ बाजार तक पहुँचने से पहले ही बड़े पैमाने पर नष्ट हो जाते हैं।
  • फसल कटाई के बाद समस्याएँ: यंत्रीकरण, ग्रेडिंग, मानकीकरण तथा वैज्ञानिक पैकेजिंग की कमी के कारण खेत पर ही उल्लेखनीय हानि होती है।
  • नीतिगत अंतराल: राष्ट्रीय खाद्य अपशिष्ट डाटाबेस का अभाव तथा कमजोर पुनर्वितरण तंत्र अतिरिक्त खाद्य के प्रभावी प्रबंधन में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • उपभोग संबंधी व्यवहार: अधिक भोजन तैयार करना, थोक खरीद तथा बचे हुए भोजन की उपेक्षा जैसी प्रवृत्तियाँ घरेलू और संस्थागत स्तर पर अपशिष्ट को सामान्य बनाती हैं।
  • क्षेत्रीय एवं जलवायु कारक: चरम मौसम घटनाएँ तथा कमजोर भंडारण प्रणाली, जैसे पंजाब जैसे राज्यों में, खाद्यान्न के खराब होने की समस्या में और वृद्धि करते हैं।

खाद्य अपशिष्ट के प्रभाव

  • खाद्य सुरक्षा: खाद्य अपशिष्ट का अर्थ सीधे तौर पर लाखों लोगों के भोजन का नुकसान है।
    • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के खाद्य अपशिष्ट सूचकांक, 2024 के अनुसार, अतिरिक्त उत्पादन के बावजूद वैश्विक स्तर पर लगभग 783 मिलियन लोग भूख का सामना कर रहे हैं।
  • आर्थिक हानि: भारत में खाद्य अपशिष्ट के कारण प्रतिवर्ष लगभग ₹1.55 लाख करोड़ की हानि होती है, जो आपूर्ति शृंखला और उपभोग प्रणाली की अक्षमताओं को दर्शाती है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: खाद्य हानि और अपशिष्ट वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के 8–10% के लिए उत्तरदायी हैं (खाद्य एवं कृषि संगठन)।
  • मेथेन उत्सर्जन: लैंडफिल में सड़ने वाला भोजन मेथेन गैस उत्सर्जित करता है, जो कार्बन डाइऑक्साइड से 25 गुना अधिक प्रभावी ग्रीनहाउस गैस है, जिससे वैश्विक तापन बढ़ता है।
  • संसाधनों की बर्बादी: खाद्य अपशिष्ट के कारण प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक नुकसान होता है। उदाहरणस्वरूप 1 किलोग्राम चावल के उत्पादन में लगभग 5,000 लीटर जल की आवश्यकता होती है।

खाद्य अपशिष्ट को कम करने के लिए आगे की राह

  • शीत-शृंखला विस्तार: शीत-शृंखला अवसंरचना को सुदृढ़ करने से फसल कटाई के पश्चात् हानियों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
    • भारत में केवल लगभग 8% कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण होता है, जबकि अमेरिका में 65% और चीन में 23% है।
  • पुनर्वितरण: अतिरिक्त खाद्य के अनिवार्य दान हेतु विधायी प्रावधान (जैसे यूरोप में) अपशिष्ट को कम करने के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा को भी सुदृढ़ कर सकते हैं।
  • किसान-स्तरीय हस्तक्षेप: किसानों को यंत्रीकरण के माध्यम से सुखाने की सुविधा, वायुरुद्ध भंडारण (हर्मेटिक स्टोरेज) तथा मोबाइल शीत इकाइयाँ उपलब्ध कराने से प्रारंभिक स्तर पर होने वाली हानियों को कम किया जा सकता है।
  • डाटा एवं निगरानी प्रणाली: खाद्य अपशिष्ट के अनिवार्य मापन और रिपोर्टिंग से जवाबदेही बढ़ेगी तथा नीति निर्माण अधिक प्रभावी होगा।
  • जलवायु नीतियाँ: खाद्य अपशिष्ट में कमी को जलवायु नीतियों में समाहित करना आवश्यक है, क्योंकि यह वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के 8–10% में योगदान देता है।

अंतरराष्ट्रीय शून्य अपशिष्ट दिवस

  • प्रतिवर्ष 30 मार्च को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य अपशिष्ट में कमी और सतत् उपभोग व्यवहार को बढ़ावा देना है।
  • स्थापना: इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्थापित किया गया तथा इसका नेतृत्व संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और संयुक्त राष्ट्र मानव अधिवास कार्यक्रम द्वारा किया जाता है।
  • उद्देश्य: अपशिष्ट उत्पादन को न्यूनतम करना तथा अत्यधिक अपशिष्ट से उत्पन्न पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान करना।
  • मुख्य क्षेत्र: पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण तथा चक्रीय अर्थव्यवस्था की अवधारणाओं को विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ावा देना।
  • महत्त्व: यह सतत् विकास लक्ष्य 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) को सुदृढ़ करता है।
  • थीम (2026): फोकसेज ऑन फूड वेस्ट (Focuses on food waste)

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