संदर्भ
अंग प्रत्यारोपण को सुविधाजनक बनाने के नाम पर हो रहे दुरुपयोग और मानकीकृत चिकित्सा परीक्षणों की कमी के आरोपों के बीच, भारत का सर्वोच्च न्यायालय ‘ब्रेन डेथ सर्टिफिकेशन’ (Brain Death Certification) की प्रक्रियाओं की समीक्षा कर रहा है।
संबंधित तथ्य
- सर्वोच्च न्यायालय, मस्तिष्क मृत्यु के प्रमाणीकरण हेतु इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राम (EEG) और एंजियोग्राम जैसे पुष्टिकरण परीक्षणों को अनिवार्य रूप से शामिल करने पर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) से विशेषज्ञ राय माँगी है।
ब्रेन डेथ (Brain Death) के बारे में
- ‘ब्रेन डेथ’ या ब्रेन स्टेम मृत्यु, श्वसन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यों सहित मस्तिष्क की सभी गतिविधियों का अपरिवर्तनीय रूप से समाप्त हो जाना है।
- स्थिति
- मस्तिष्क स्टेम की कोई प्रतिक्रिया नहीं (पुतली, उल्टी, दर्द की प्रतिक्रिया)
- स्वतःस्फूर्त श्वास नहीं (साँस रुकना)
- मरीज केवल वेंटिलेटर के सहारे जीवित है।
घोषणा की आवश्यकता
- मृत व्यक्ति के अंगदान (हृदय, फेफड़े, यकृत, गुर्दे) के लिए आवश्यक।
- जीवित दाताओं के लिए जोखिम से बचाता है।
- जीवन रक्षक प्रणाली हटाने के लिए कानूनी स्पष्टता प्रदान करता है।
इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राम (Electroencephalogram-EEG) के बारे में
- EEG एक गैर-आक्रामक (Non-invasive) नैदानिक परीक्षण है, जो मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि (Electrical activity) को रिकॉर्ड करके उसकी कार्यात्मक स्थिति का आकलन करता है और किसी भी असामान्यता का पता लगाता है।
- प्रयुक्त उपकरण
- सिर पर लगाए गए सतही इलेक्ट्रोड
- विद्युत संकेतों को बढ़ाने के लिए एंप्लीफायर
- रिकॉर्डिंग और व्याख्या के लिए कंप्यूटर सिस्टम
- प्रक्रिया: इलेक्ट्रोड मस्तिष्क की तंत्रिका संबंधी विद्युत गतिविधियों (Neural Impulses) को रिकॉर्ड करते हैं, जिससे नैदानिक विश्लेषण के लिए तरंग पैटर्न (जैसे अल्फा, बीटा, थीटा और डेल्टा) उत्पन्न होते हैं।
- मुख्य संकेत
- विद्युत गतिविधियों की अनुपस्थिति में ‘ब्रेन डेथ’ की पुष्टि
- मिर्गी और दौरे संबंधी विकारों का निदान
- कोमा, एन्सेफेलोपैथी और मस्तिष्क की चोटों का आकलन।
- सीमाएँ
- बाह्य हस्तक्षेप से प्रभावित हो सकता है।
- नैदानिक सहसंबंध के बिना ‘ब्रेन डेथ’ की निश्चित पुष्टि नहीं हो सकती।
एंजियोग्राम (Angiogram) के बारे में
- एंजियोग्राम एक नैदानिक इमेजिंग तकनीक है, जिसका उपयोग रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) को देखने और विशेष रूप से मस्तिष्क में रक्त प्रवाह (Blood Circulation) की स्थिति का आकलन करने के लिए किया जाता है।
- प्रयुक्त उपकरण
- कंट्रास्ट डाई (रेडियोअपारदर्शी पदार्थ)
- रक्त वाहिकाओं में डाली गई कैथेटर
- एक्स-रे या फ्लोरोस्कोपी इमेजिंग प्रणाली।
- प्रक्रिया: धमनियों में कंट्रास्ट डाई इंजेक्ट की जाती है और वास्तविक समय की इमेजिंग के माध्यम से रक्त प्रवाह पर नजर रखी जाती है ताकि रुकावटों या परिसंचरण की अनुपस्थिति का पता लगाया जा सके।
- मुख्य संकेत
- मस्तिष्क में रक्त प्रवाह न होने की स्थिति में ‘ब्रेन डेथ’ की पुष्टि।
- यह रक्त वाहिकाओं संबंधी असामान्यताओं, जैसे धमनी विस्फार (Aneurysm), स्ट्रोक और अवरोध (Blockage) का पता लगाने में सहायक है।
- तंत्रिका शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं से पहले मूल्यांकन।
- सीमाएँ
- जटिलताओं के जोखिम वाली आक्रामक प्रक्रिया।
- विशेषज्ञ बुनियादी ढाँचे और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
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भारत में ‘ब्रेन डेथ’ की घोषणा के लिए वर्तमान प्रोटोकॉल
- कानूनी आधार: मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम (THOTA), 1994 के अंतर्गत, ब्रेनस्टेम मृत्यु को कानूनी मृत्यु के रूप में मान्यता प्राप्त है।
- चिकित्सा बोर्ड: ‘ब्रेन डेथ’ की घोषणा केवल चार सदस्यीय पैनल द्वारा की जा सकती है, जिसमें प्रभारी चिकित्सक, न्यूरोलॉजिस्ट/न्यूरोसर्जन, उपचार करने वाला चिकित्सक और एक स्वतंत्र चिकित्सक शामिल होते हैं।
- पुनः प्रमाणीकरण: ‘ब्रेन डेथ’ की पुष्टि दो बार (6-12 घंटे के अंतराल पर) की जानी आवश्यक है।
- नैदानिक परीक्षण: वर्तमान में बेडसाइड टेस्ट (जैसे- एप्निया टेस्ट और ब्रेनस्टेम रिफ्लेक्स) तो किए जाते हैं, लेकिन EEG और एंजियोग्राम अभी अनिवार्य नहीं हैं।
‘ब्रेन डेथ’ की घोषणा में चुनौतियाँ
- प्रशिक्षण और जागरूकता का अभाव: कई डॉक्टरों के पास प्रमाणन के लिए औपचारिक प्रशिक्षण की कमी है और शिक्षण अस्पतालों में कोई एकसमान पाठ्यक्रम नहीं है।
- परीक्षण में व्यक्तिपरकता: एपनिया परीक्षण असंगत रूप से किया जा सकता है क्योंकि वीडियोग्राफी अनिवार्यता का अक्सर पालन नहीं किया जाता है।
- बुनियादी ढाँचे की बाधाएँ: छोटे अस्पतालों में उन्नत परीक्षण (EEG, एंजियोग्राम) उपलब्ध नहीं हैं।
- इससे पहले से ही कम अंगदान दर और भी कम हो सकती है।
- नैतिकता और विश्वास की कमी: अंग प्रत्यारोपण के लिए समय से पहले घोषणा करने के आरोप।
- जनता का अविश्वास दान के लिए सहमति को प्रभावित करता है।
निष्कर्ष
भारत के अंगदान तंत्र को बढ़ावा देने के साथ-साथ नैतिक रूप से ‘ब्रेन डेथ सर्टिफिकेशन’ सुनिश्चित करने के लिए पारदर्शिता, प्रशिक्षण और मानकीकृत प्रोटोकॉल को मजबूत करना आवश्यक है।