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भारत में वायु गुणवत्ता संकट

7 Mar 2026

संदर्भ

ऊर्जा और स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र (CREA) द्वारा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आँकड़ों का उपयोग करते हुए किए गए एक हालिया विश्लेषण से यह पता चला कि शीतकाल 2025–26 के दौरान अधिकांश भारतीय शहरों में PM2.5 का स्तर राष्ट्रीय मानकों से ऊपर दर्ज किया गया, जो लगातार बने हुए वायु प्रदूषण संबंधी चिंताओं को उजागर करता है।

CREA विश्लेषण के प्रमुख निष्कर्ष

  • उच्च प्रदूषण स्तर: 238 भारतीय शहरों में से 204 शहरों में शीतकालीन मौसम के दौरान PM2.5 की औसत सांद्रता राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक (NAAQS) के 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक दर्ज की गई।
  • सबसे अधिक प्रदूषित शहर: गाजियाबाद में PM2.5 की सर्वाधिक सांद्रता (172 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) दर्ज की गई, इसके बाद नोएडा (166 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) और दिल्ली (163 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) रहे।
    • अन्य अत्यधिक प्रदूषित शहरों में ग्रेटर नोएडा, बहादुरगढ़, धारूहेड़ा, गुरुग्राम, भिवाड़ी, चरखी दादरी और बागपत शामिल थे।
  • प्रदूषण का क्षेत्रीय संकेंद्रण: उत्तर प्रदेश और हरियाणा के चार-चार शहर दस सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में शामिल थे। इसके साथ ही दिल्ली और राजस्थान का एक शहर भी शामिल था।
  • महानगरों में प्रदूषण प्रवृत्ति: प्रमुख महानगरों में दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में PM2.5 का औसत स्तर राष्ट्रीय मानक से ऊपर दर्ज किया गया, जबकि बंगलूरू में 39 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जो निर्धारित सीमा से थोड़ा कम था।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन का वायु गुणवत्ता मानक: विश्लेषित किसी भी शहर ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा अनुशंसित PM2.5 के 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के दिशा-निर्देश को पूरा नहीं किया।
  • शीतकाल के दौरान सबसे स्वच्छ शहर: कर्नाटक के चामराजनगर में PM2.5 की सबसे कम औसत सांद्रता (19 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) दर्ज की गई।
    • दस सबसे स्वच्छ शहरों में कर्नाटक के आठ शहर तथा मध्य प्रदेश और मेघालय के एक-एक शहर शामिल थे।

PM2.5 के बारे में

  • PM2.5 (2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम आकार के कणीय पदार्थ) ऐसे सूक्ष्म श्वसनयोग्य कणों को संदर्भित करता है, जो फेफड़ों और रक्त प्रवाह के भीतर गहराई तक प्रवेश करने में सक्षम होते हैं।
  • इसके संपर्क को श्वसन रोगों, हृदय एवं रक्तवाहिका संबंधी रोगों और मृत्यु जोखिम में वृद्धि से जोड़ा गया है।

CREA (ऊर्जा और स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र) के बारे में

  • प्रकृति: वायु प्रदूषण और ऊर्जा संक्रमण पर केंद्रित एक स्वतंत्र, गैर-लाभकारी अनुसंधान संगठन।
  • मुख्यालय: हेलसिंकी, फिनलैंड, तथा एशिया में सक्रिय अनुसंधान उपस्थिति, जिसमें भारत भी शामिल है।
  • उद्देश्य: आँकड़ा-आधारित अनुसंधान का उपयोग करते हुए वायु प्रदूषण के रुझानों, स्रोतों और स्वास्थ्य प्रभावों का विश्लेषण करना।
  • कार्य: नीति-निर्माताओं, मीडिया और नागरिक समाज को साक्ष्य-आधारित रिपोर्ट प्रदान करना, साथ ही वैश्विक जीवाश्म ईंधन उपभोग और उत्सर्जन रुझानों का अनुश्रवण करना।

निष्कर्षों के प्रमुख निहितार्थ

  • स्वास्थ्य जोखिम: PM2.5 कण इतने छोटे होते हैं कि वे फेफड़ों और रक्त प्रवाह में गहराई तक प्रवेश कर सकते हैं, जिससे दीर्घकालिक श्वसन रोग, हृदय एवं रक्तवाहिका संबंधी रोग तथा बच्चों में फेफड़ों के विकास में बाधा उत्पन्न होती है।
  • नीतिगत चिंताएँ: निष्कर्ष संकेत करते हैं कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) अपने प्रदूषण-न्यूनन लक्ष्यों को प्राप्त करने में संघर्ष कर रहा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वायु प्रदूषण केवल दिल्ली तक सीमित समस्या न रहकर एक राष्ट्रव्यापी संकट बन गया है।
  • वायु-क्षेत्र की संवेदनशीलता: इंडो-गंगा मैदान में प्रदूषण का संकेंद्रण वायु प्रदूषण की सीमा-पार प्रकृति को उजागर करता है, जहाँ एक शहर या राज्य से होने वाला उत्सर्जन पड़ोसी क्षेत्रों को प्रभावित करता है।
  • आर्थिक प्रभाव: उच्च प्रदूषण स्तर स्वास्थ्य देखभाल व्यय को बढ़ाते हैं, श्रम उत्पादकता को कम करते हैं तथा विशेष रूप से शीतकालीन महीनों के दौरान पर्यटन, खुदरा गतिविधियों और शहरी जीवन-योग्यता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं।

आगे की राह

  • स्रोत-आधारित प्रदूषण नियंत्रण: अस्थायी उपायों (जैसे- जल छिड़काव) से हटकर प्रमुख स्रोतों जैसे तापीय विद्युत संयंत्रों, औद्योगिक उत्सर्जन और वाहन प्रदूषण को दूर करने का लक्ष्य बनाना।
  • क्षेत्रीय “वायु-क्षेत्र” (Airshed) दृष्टिकोण: पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों के बीच अंतर-राज्यीय समन्वय को बढ़ावा देना, यह स्वीकार करते हुए कि वायु प्रदूषण प्रशासनिक सीमाओं के पार फैलता है।
  • निगरानी नेटवर्क का विस्तार: छोटे और मध्यम शहरों में वायु गुणवत्ता के आकलन और नीतिगत प्रतिक्रिया को बेहतर बनाने के लिए निरंतर परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों (CAAQMS) की संख्या बढ़ाना।
भारत में वायु गुणवत्ता संकट

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