भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास द्वारा स्तन कैंसर जीनोमिक्स अध्ययन
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भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास के शोधकर्ताओं ने भारत में स्तन कैंसर जीनोमिक्स पर अब तक के सबसे बड़े अध्ययनों में से एक का संचालन किया है।
संबंधित तथ्य
- इस अध्ययन के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय ऑन्कोलॉजी जर्नल BMC कैंसर (BMC Cancer) में प्रकाशित किए गए हैं।
- इस शोध में IIT मद्रास के नेशनल कैंसर टिशू बायोबैंक से प्राप्त 479 स्तन कैंसर रोगियों के जर्मलाइन डीएनए नमूनों का विश्लेषण किया गया।
- यह डेटासेट अब भारत कैंसर जीनोम एटलस (Bharat Cancer Genome Atlas) में शामिल कर लिया गया है, जो भारत का पहला ओपन-सोर्स कैंसर जीनोम डेटाबेस है।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
- समग्र वंशानुगत जोखिम: 24.6% रोगियों में कम-से-कम एक पैथोजेनिक या संभावित पैथोजेनिक वैरिएंट (ऐसा आनुवंशिक परिवर्तन जो कैंसर के जोखिम को बढ़ाता है) पाया गया।
- BRCA जीन का योगदान: केवल 8.35% रोगियों में BRCA1 या BRCA2 जीन में वैरिएंट पाए गए, जो विश्व स्तर पर सबसे अधिक परीक्षण किए जाने वाले जीन हैं।
- BRCA से परे: एक बड़ा हिस्सा (11.9%) एचआरआर (Homologous Recombination Repair) मार्ग जीन में वैरिएंट से जुड़ा पाया गया।
- कुल मिलाकर, 67% सकारात्मक निष्कर्ष गैर-BRCA जीनों (जैसे MLH1, NF1, TP53, RB1) में पाए गए।
- जनसंख्या-विशिष्ट वैरिएंट: कई पैथोजेनिक वैरिएंट भारतीय/दक्षिण एशियाई आबादी में अधिक पाए गए।
- अन्य क्षेत्रों (जैसे- क्यूबेक, पोलैंड और चीन) में सामान्य कुछ वैरिएंट इस भारतीय समूह में अनुपस्थित थे, जो जातीय/आबादी आधारित भिन्नताओं को दर्शाता है।
- इन परिणामों से स्पष्ट होता है कि भारत में स्तन कैंसर का वंशानुगत आनुवंशिक परिदृश्य पहले की तुलना में अधिक विविध और जटिल है, तथा अधिकांश जोखिम पारंपरिक BRCA-केंद्रित दृष्टिकोण से परे पाए जाते हैं।
BRCA (BReast CAncer) जीन के बारे में
- BRCA1 और BRCA2 मानव जीन हैं, जो ट्यूमर-दमनकारी (Tumor suppressor) प्रोटीन का निर्माण करते हैं।
- ये प्रोटीन क्षतिग्रस्त DNA की मरम्मत में सहायता करते हैं और कोशिकाओं में आनुवंशिक स्थिरता बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- यदि इन जीनों में म्यूटेशन हो जाता है, तो DNA की मरम्मत सही ढंग से नहीं हो पाती, जिससे कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है।
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मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस 2026
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भारत के संचार मंत्री ने बार्सिलोना (स्पेन) में आयोजित मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस 2026 में भारत की भागीदारी का नेतृत्व किया और सस्ती तथा इंटेलिजेंस कनेक्टिविटी के लिए एक विजन प्रस्तुत किया।
मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस (MWC)
- उत्पत्ति एवं आयोजक: इसका आयोजन GSMA (Global System for Mobile Communications Association) द्वारा प्रतिवर्ष बार्सिलोना, स्पेन में किया जाता है।
- वर्ष 2026 की थीम: “The IQ Era”, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और कनेक्टिविटी के एकीकरण पर केंद्रित है।
- महत्त्व: यह मोबाइल उद्योग का विश्व का सबसे बड़ा सम्मेलन है, जिसमें लगभग 2,900 प्रदर्शक (exhibitors) भाग लेते हैं। इसमें स्मार्ट नेटवर्क और उनके सामाजिक प्रभाव पर चर्चा की जाती है।
- मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस 2026 के प्रमुख परिणाम
- मुख्य सत्र: “लागत बाधा को तोड़ना” और “भविष्य के लिए तैयार” जैसे विषयों पर सत्र आयोजित किए गए। इनमें एआई-संचालित, क्लाउड-नेटिव और मानव-केंद्रित नेटवर्क पर बल दिया गया।
- भारत पवेलियन: भारत की बढ़ती दूरसंचार विनिर्माण क्षमता और नवाचार पारितंत्र को प्रदर्शित करने के लिए इसका उद्घाटन किया गया।
- 5G, ऑप्टिकल ट्रांसपोर्ट, सैटकॉम और सेमीकंडक्टर क्षेत्र की 40 भारतीय कंपनियों ने भाग लिया।
- रणनीतिक लॉन्च: TJ1600-D3 हाइपर-स्केलेबल DCI प्लेटफॉर्म (तेजस नेटवर्क्स) का अनावरण और IMC 2026 का कर्टेन रेजर (नई दिल्ली, अक्टूबर 2026) आयोजित किया गया।
दूरसंचार उपकरण और सेवा निर्यात संवर्द्धन परिषद (TEPC)
- परिचय: इसे भारत सरकार द्वारा विदेश व्यापार नीति के अंतर्गत स्थापित किया गया है।
- उद्देश्य: स्वदेशी दूरसंचार उपकरणों और सेवाओं के निर्यात को प्रोत्साहित और विकसित करना।
- भूमिका
- यह सदस्य कंपनियों को सहयोग प्रदान करता है और दूरसंचार विभाग (DoT) के साथ मिलकर समग्र वैश्विक दूरसंचार समाधान विकसित करने में कार्य करता है।
- मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस 2026 में भारत के दूरसंचार नवप्रवर्तकों की भागीदारी का भी आयोजन किया।
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ऑपरेशन संकल्प

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पश्चिम एशिया में हालिया तनाव बढ़ने के बाद संभावित मानवीय सहायता अभियानों के लिए ऑपरेशन संकल्प के तहत भारतीय युद्धपोत अलर्ट स्थिति में हैं।
संबंधित तथ्य
- रणनीतिक तैनाती: भारतीय नौसेना के दो युद्धपोत (एक फ्रिगेट और एक डिस्ट्रॉयर) वर्तमान में अदन की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में तैनात हैं।
- उदाहरण के लिए आईएनएस सूरत वर्तमान में बहरीन में क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा सहभागिता के अंतर्गत मौजूद है।
- महत्त्व: इनकी तैनाती का उद्देश्य समुद्री डकैती विरोधी अभियान, व्यापारी जहाजों की सुरक्षा तथा मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) अभियानों के लिए तत्परता बनाए रखना है।
- CCS की समीक्षा: संघर्ष के प्रभाव का आकलन करने के लिए कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने हाल ही में उच्च स्तरीय बैठक की।
- ऑपरेशन संकल्प
- उद्गम: इसे जून 2019 में प्रारंभ किया गया था।
- उद्देश्य: भारतीय ध्वज वाले जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी और होर्मुज जलमडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों के सुरक्षित आवागमन को सुनिश्चित करना।
- महत्त्व: यह हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत की “नेट सुरक्षा प्रदाता” की भूमिका को दर्शाता है।
ओमान की खाड़ी
- ओमान की खाड़ी अरब सागर की उत्तर-पश्चिमी शाखा है, जो अरब प्रायद्वीप (ओमान) के पूर्वी भाग और ईरान के मध्य स्थित है।
- इसकी लंबाई लगभग 560 किमी. है और यह होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से फारस की खाड़ी से जुड़ती है।
- यह अरब सागर और हिंद महासागर से फारस की खाड़ी में प्रवेश का एकमात्र मार्ग प्रदान करती है।
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रक्षा मंत्रालय द्वारा ₹5,083 करोड़ का रक्षा अनुबंध
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रक्षा मंत्रालय ने उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर (ALH) Mk-III (भारतीय तटरक्षक बल) और श्टिल (Shtil) मिसाइलों (भारतीय नौसेना) की खरीद के लिए अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए हैं।
ALH Mk-III (समुद्री भूमिका)
- अधिग्रहण: रक्षा मंत्रालय ने ₹2,901 करोड़ के अनुबंध पर हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ हस्ताक्षर किए हैं। यह खरीद स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और निर्मित (Buy) श्रेणी के तहत की जा रही है।
- विशेषताएँ
- यह एक उन्नत ट्विन-इंजन, बहुउद्देश्यीय और नई पीढ़ी का हेलीकॉप्टर है।
- यह तटीय एयरफील्ड और समुद्र में जहाजों दोनों से मिशन संचालित करने में सक्षम है।
- महत्त्व
- इससे भारतीय तटरक्षक बल (ICG) की क्षमता कृत्रिम द्वीपों, अपतटीय प्रतिष्ठानों और समुद्री पर्यावरण की सुरक्षा के लिए मजबूत होगी।
- यह आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पहल के प्रति प्रतिबद्धता को भी सुदृढ़ करता है।
ऊर्ध्वाधर प्रक्षेपण – श्टिल मिसाइलें
- यह एक नौसैनिक, जहाज-आधारित मध्यम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली है।
- यह बक मिसाइल प्रणाली (Buk Missile System)से विकसित की गई है।
- उत्पत्ति: ₹2,182 करोड़ की लागत से रूसी संघ की जेसीसी रोसोनबोरोनएक्सपोर्ट (JSC Rosoboronexport) के साथ समझौता हुआ है।
- विशेषताएँ: सतह से वायु में ऊर्ध्वाधर प्रक्षेपण।
- महत्त्व
- यह भारतीय नौसेना के अग्रिम पंक्ति के युद्धपोतों की बहु-स्तरीय वायु रक्षा संरचना को मजबूत करेगी।
- साथ ही यह विभिन्न प्रकार के हवाई खतरों के विरुद्ध तेज प्रतिक्रिया और सभी मौसमों में कार्रवाई की क्षमता प्रदान करती है।
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थिरुमंगई अलवार कांस्य प्रतिमा

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मार्च 2026 में, ऑक्सफोर्ड स्थित एशमोलियन संग्रहालय (Ashmolean Museum) ने 16वीं शताब्दी की थिरुमंगई अलवार (Thirumangai Alvar) की कांस्य प्रतिमा भारत को लौटा दी, क्योंकि शोध से यह पुष्टि हुई कि यह प्रतिमा तमिलनाडु के एक मंदिर से संबंधित है।
थिरुमंगई अलवार कांस्य प्रतिमा के बारे में
- यह प्रतिमा 16वीं शताब्दी की चोल शैली (Chola-style) की कांस्य मूर्ति है, जो वैष्णव संत थिरुमंगई अलवार का प्रतिनिधित्व करती है। इसे मूल रूप से तमिलनाडु के सौंदराजा पेरुमल मंदिर में धार्मिक अनुष्ठानों के लिए स्थापित किया गया था।
- इस प्रतिमा को भारत को लौटाया गया ताकि इसे पुनः उसके धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व के साथ मंदिर में स्थापित किया जा सके।
- उत्पत्ति: वर्ष 1957 के अभिलेखीय फोटोग्राफ, जो इंस्टिट्यूट फ्राँसेस डी पॉण्डिचेरी और इकोले फ्राँसेस डी एक्सट्रीम-ओरिएंट (IFP-EFEO) में संरक्षित हैं, ने प्रतिमा के मूल स्थान की पुष्टि की।
- यह प्रतिमा वर्ष 1967 में जे.आर. बेलमोंट के निजी संग्रह से एशमोलियन संग्रहालय द्वारा प्राप्त की गई थी।
- विशेषताएँ
- सामग्री: दक्षिण भारतीय मंदिर कला में प्रचलित पारंपरिक लॉस्ट-वैक्स (cire perdue) तकनीक से कांस्य में ढाली गई।
- मुद्रा (Posture): सामान्यतः संत को भक्ति मुद्रा में खड़े हुए, प्रायः हाथ जोड़कर या प्रतीकात्मक चिह्नों के साथ दर्शाया जाता है।
- आइकनोग्राफी: इसमें आभूषण, पारंपरिक वस्त्र तथा मध्यकालीन तमिल वैष्णव मूर्तिकला के अनुरूप भावपूर्ण चेहरे की अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
- धार्मिक भूमिका: मंदिर उत्सवों और अनुष्ठानों में उत्सव मूर्ति (Processional deity) के रूप में प्रयोग की जाती थी।
थिरुमंगई अलवार के बारे में
- थिरुमंगई अलवार श्रीवैष्णव परंपरा के बारह अलवार (Alvars) संतों में से एक थे, जो भगवान विष्णु के प्रति भक्ति के लिए प्रसिद्ध तमिल कवि-संत थे।
- प्रारंभिक जीवन: माना जाता है कि वे 8वीं–9वीं शताब्दी ईसवी के मध्य तमिलनाडु में रहे।
- प्रारंभ में वे एक स्थानीय शासक या योद्धा थे, लेकिन बाद में वैष्णव भक्ति को अपनाकर एक महान संत बन गए।
- योगदान: उन्होंने अनेक भक्ति स्तोत्रों की रचना की, जो नालायिर दिव्य प्रबंधम् (Nalayira Divya Prabandham) — वैष्णव परंपरा का पवित्र तमिल भक्ति ग्रंथ — में संकलित हैं।
- उनकी कविताएँ दक्षिण भारत के विष्णु मंदिरों (Divya Desams) की महिमा का वर्णन करती हैं।
- महत्त्व: उन्होंने तमिल समाज में भक्ति आंदोलन (Bhakti tradition) के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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क्लाउड एआई सिस्टम

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अमेरिकी रक्षा विभाग और एआई कंपनी एंथ्रोपिक (Anthropic), जो क्लाउड एआई सिस्टम की डेवलपर है, के मध्य हाल ही में एक सार्वजनिक विवाद सामने आया है।
संबंधित तथ्य
- अमेरिकी रक्षा विभाग ने चेतावनी दी है कि वह एंथ्रोपिक को ‘आपूर्ति शृंखला जोखिम” के रूप में चिह्नित कर सकता है। यदि ऐसा होता है, तो अमेरिकी सरकार के साथ काम करने वाली कंपनियाँ एंथ्रोपिक के उत्पादों का उपयोग करने से हतोत्साहित हो सकती हैं।
क्लाउड (Claude) के बारे में
- क्लाउड एक उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) चैटबॉट है, जिसे एंथ्रोपिक कंपनी ने विकसित किया है।
- यह लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLMs) पर आधारित है और उपयोगकर्ताओं को टेक्स्ट जनरेशन, कोडिंग विश्लेषण और समस्या-समाधान जैसे कार्यों में सहायता प्रदान करता है।
प्रमुख विशेषताएँ
- AI कोडिंग सहायता: इसके टूल क्लाउड कोड के माध्यम से डेवलपर्स को सॉफ्टवेयर कोड बनाने, संपादित करने और अनुकूलित (Optimise) करने में सहायता मिलती है।
- लार्ज लैंग्वेज मॉडल आधारित: शक्तिशाली LLMs का उपयोग करके यह मानव जैसी भाषा को समझने और टेक्स्ट व प्रोग्रामिंग निर्देश उत्पन्न करने में सक्षम है।
- टूल डेवलपमेंट: संबंधित सॉफ्टवेयर लाइब्रेरी से जुड़ने पर यह सॉफ्टवेयर टूल्स के निर्माण और संशोधन में सहायता कर सकता है।
- संगठनों में उपयोग: कंपनियाँ और संस्थान इसे स्वचालन, शोध और सॉफ्टवेयर विकास से जुड़े कार्यों के लिए उपयोग करते हैं।
लाभ
- कोडिंग और सॉफ्टवेयर विकास से जुड़े कार्यों को स्वचालित करने में अत्यधिक सक्षम।
- उपयोगकर्ताओं को जटिल कोड को तेजी से तैयार करने, संशोधित करने और सुधारने में सहायता देता है।
अनुप्रयोग
- सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट: कोडिंग, डिबगिंग (Debugging) और दस्तावेजीकरण को स्वचालित करता है।
- अनुसंधान और डेटा विश्लेषण: शोधकर्ताओं को रिपोर्टों का विश्लेषण, साहित्य का सार तैयार करने और नए इनसाइट्स उत्पन्न करने में सहायता करता है।
- इंटरप्राइज और व्यावसायिक उपयोग: ग्राहक सहायता, कार्यप्रवाह संचालन और ज्ञान प्रबंधन में उपयोग।
- रक्षा और उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्र: क्लाउड जैसे एआई उपकरण जटिल तकनीकी प्रणालियों के लिए तेजी से सॉफ्टवेयर विकास और सुधार में सहायता कर सकते हैं, हालाँकि ऐसे उपयोग में कड़ी सुरक्षा और नियामकीय विचार आवश्यक होते हैं।
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पूर्ण चंद्र ग्रहण

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3 मार्च, 2026 को, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, भारत सहित विश्व के कई क्षेत्रों में पूर्ण चंद्र ग्रहण (Total Lunar Eclipse) दिखाई दिया।
चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) के बारे में
- चंद्र ग्रहण तब होता है, जब पूर्णिमा के समय सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीधी रेखा में आ जाते हैं। इस खगोलीय स्थिति को सिज्गी (Syzygy) कहा जाता है।
- इस स्थिति में पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है, जिससे पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है और सूर्य का सीधा प्रकाश चंद्रमा तक नहीं पहुँच पाता।
- पृथ्वी की छाया के दो भाग होते हैं:
- उंब्रा: छाया का गहरा आंतरिक भाग, जहाँ सूर्य का प्रकाश पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है।
- पेनुंब्रा: बाहरी भाग, जहाँ सूर्य का प्रकाश आंशिक रूप से अवरुद्ध होता है।
- जब चंद्रमा इन छाया क्षेत्रों से होकर गुजरता है, तब विभिन्न प्रकार के चंद्र ग्रहण दिखाई देते हैं।
चंद्र ग्रहण के प्रकार
- पेनुंब्रल चंद्र ग्रहण: जब चंद्रमा केवल पृथ्वी की पेनुंब्रा से होकर गुजरता है, तब चंद्रमा कम प्रकाशीय होता है, जिसे नग्न आँखों से देखना अक्सर कठिन होता है।
- आंशिक चंद्र ग्रहण: जब चंद्रमा का केवल कुछ भाग उंब्रा में प्रवेश करता है, तो चंद्रमा के एक हिस्से पर गहरी छाया दिखाई देती है।
- पूर्ण चंद्र ग्रहण: जब पूरा चंद्रमा पृथ्वी की उंब्रा में प्रवेश कर जाता है, तो चंद्रमा गहरा दिखाई देता है और अक्सर लाल रंग का हो जाता है, जिसे लोकप्रिय रूप से ब्लड मून कहा जाता है।
महत्त्व
- खगोलीय महत्त्व: वैज्ञानिकों को पृथ्वी के वायुमंडल और प्रकाश के प्रकीर्णन का अध्ययन करने में सहायता मिलती है।
- अवलोकन की सुरक्षा: सूर्य ग्रहण के विपरीत, चंद्र ग्रहण को नग्न आँखों से सुरक्षित रूप से देखा जा सकता है।
- ब्लड मून की घटना: चंद्रमा का लाल रंग रेले प्रकीर्णन (Rayleigh Scattering) के कारण दिखाई देता है, जिसमें पृथ्वी का वायुमंडल छोटी नीली तरंगदैर्ध्य (Blue wavelengths) को अधिक बिखेर देता है और लंबी लाल तरंगदैर्ध्य को मोड़कर चंद्रमा की ओर भेजता है।
- शैक्षिक महत्त्व: यह घटना लोगों को खगोलीय यांत्रिकी और पृथ्वी–चंद्रमा–सूर्य के संरेखण के बारे में जागरूक करने का उचित अवसर प्रदान करती है।
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