संदर्भ
18 फरवरी 2026, 1946 के शाही नौसेना विद्रोह की 80वीं वर्षगाँठ है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम चरण के दौरान एक महत्त्वपूर्ण औपनिवेशिक-विरोधी विद्रोह था।
शाही नौसेना विद्रोह
- शाही नौसेना विद्रोह (18–23 फरवरी, 1946) ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध नौसैनिक रेटिंग्स द्वारा किया गया पाँच दिवसीय सशस्त्र विद्रोह था, जिसकी शुरुआत बंबई से हुई और जो देशभर में फैल गया।
- ‘रेटिंग्स’ वे कनिष्ठ सूचीबद्ध नाविक होते हैं, जो वारंट अधिकारी के सैन्य पद से नीचे के पद पर होते हैं।
विद्रोह के कारण
- दुर्बल सेवा परिस्थितियाँ: भारतीय ‘रेटिंग्स’ को निम्नस्तरीय भोजन, कम वेतन, भीड़भाड़ तथा ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा भेदभावपूर्ण व्यवहार का सामना करना पड़ता था।
- द्वितीय विश्वयुद्ध तथा ब्रिटिश क्राउन के लिए अन्य युद्धों का हिस्सा होने के बावजूद, भारतीय ‘रेटिंग्स’ को कभी भी उचित पारिश्रमिक नहीं दिया गया।

- तात्कालिक कारण: ‘HMIS तलवार’ में कमांडर आर्थर फ्रेडरिक किंग की नियुक्ति तथा अपमानजनक टिप्पणियों ने असंतोष को तीव्र किया, जिससे भूख हड़ताल प्रारंभ हुई।
- राष्ट्रवादी प्रभाव: वर्ष 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन तथा वर्ष 1945 में भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) के मुकदमों ने नाविकों के बीच औपनिवेशिक-विरोधी भावना को प्रेरित किया।
- युद्धोत्तर आर्थिक कठिनाई: बढ़ती कीमतों, बेरोजगारी तथा युद्धकालीन असंतोष ने साधारण पृष्ठभूमि से आए भर्ती सैनिकों के बीच असंतोष को गहरा किया।
विद्रोह की घटनाएँ
- HMIS तलवार (बंबई) में प्रारंभ: विद्रोह 18 फरवरी, 1946 को भोजन की गुणवत्ता और भेदभाव के विरोध में भूख हड़ताल के साथ प्रारंभ हुआ।
- रेटिंग्स ने “नो फूड, नो वर्क” का नारा अपनाया।
- नौसैनिक केंद्रीय हड़ताल समिति का गठन: एम. एस. खान, बी. सी. दत्त, मदन सिंह तथा अन्य नेताओं ने एक केंद्रीय समिति के माध्यम से माँगों का समन्वय किया।
- राष्ट्रव्यापी प्रसार और जन समर्थन: यह विद्रोह 78 जहाजों और 20 प्रतिष्ठानों तक विस्तृत हो गया, जिसमें लगभग 20,000 ‘रेटिंग्स’ सम्मिलित हुए तथा कराची, कलकत्ता एवं कोचीन सहित अन्य स्थानों पर श्रमिकों और छात्रों ने भी विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया।
- सशस्त्र टकराव और दमन: बंबई के मिल क्षेत्रों में सड़क संघर्ष भड़क उठे, जहाँ ब्रिटिश बलों ने भारी शक्ति का प्रयोग किया, जिससे लगभग 200 नागरिकों की मृत्यु हुई।
- विद्रोह का अंत: महात्मा गांधी ने इस विद्रोह को असमय और अनुशासित राजनीतिक मार्गदर्शन के अभाव वाला बताते हुए इसकी निंदा की, जबकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं ने संवैधानिक वार्ताओं की रक्षा हेतु संयम बरतने का आग्रह किया।
- सीमित राजनीतिक समर्थन और बढ़ते सैन्य दबाव के बीच, नौसैनिक रेटिंग्स ने 23 फरवरी, 1946 को आत्मसमर्पण कर दिया, जिससे विद्रोह का अंत हो गया।
विद्रोह के प्रभाव
- ब्रिटिश सैन्य विश्वास का क्षरण: इस विद्रोह ने संकेत दिया कि औपनिवेशिक प्राधिकरण अब भारतीय सशस्त्र बलों पर पूर्णतः निर्भर नहीं रह सकते थे।
- उपनिवेश-उन्मूलन की प्रक्रिया में तीव्रता: इसने वर्ष 1947 में सत्ता के शीघ्र हस्तांतरण के ब्रिटेन के निर्णय में योगदान दिया।
- सांप्रदायिक एकता का क्षण: हिंदू–मुस्लिम एकजुटता दृष्टिगोचर हुई, क्योंकि इंडियन नेशनल कांग्रेस, ऑल-इंडिया मुस्लिम लीग तथा कम्युनिस्ट ध्वज संयुक्त रूप से प्रदर्शित किए गए।
निष्कर्ष
वर्ष 1946 का शाही नौसेना विद्रोह अपनी अल्पावधि के उपरांत उग्र औपनिवेशिक-विरोधी एकजुटता तथा भारत की स्वतंत्रता को तीव्र करने में उसकी भूमिका का एक सशक्त स्मरण बना हुआ है।