संदर्भ
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (IWD) प्रतिवर्ष 8 मार्च को विश्वभर में मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में महिलाओं की उपलब्धियों तथा योगदान को मान्यता देना है।

संबंधित तथ्य
- यह दिवस लैंगिक असमानताओं को प्रदर्शित करने, महिलाओं के अधिकारों का समर्थन करने तथा लैंगिक समानता के लिए वैश्विक कार्रवाई को प्रोत्साहित करने का मंच भी प्रदान करता है।
- वर्ष 2026 की थीम: “अधिकार। न्याय। कार्रवाई। सभी महिलाओं और बालिकाओं के लिए।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस
- उत्पत्ति: यह उत्तर अमेरिका और यूरोप में 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक श्रमिक आंदोलनों से उभरा, जिनका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के अधिकार, बेहतर कार्य परिस्थितियाँ और राजनीतिक भागीदारी था।
- दिवस का प्रस्ताव (1910): अंतरराष्ट्रीय आयोजन का विचार क्लारा जेटकिन द्वारा कोपेनहेगन में आयोजित कार्यरत महिलाओं के द्वितीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया था।
- इस प्रस्ताव को 17 देशों का प्रतिनिधित्व करने वाली 100 से अधिक महिलाओं का सर्वसम्मत समर्थन प्राप्त हुआ।

- पहला आयोजन (1911) पहला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 19 मार्च, 1911 को मनाया गया, जिसमें यूरोप भर में बड़े पैमाने पर सभाएँ और प्रदर्शन हुए।
- इनमें लगभग 30,000 महिलाओं की भागीदारी वाला एक विशाल सम्मेलन भी शामिल था।
- 8 मार्च को अपनाना: वर्ष 1913 में इस दिवस को 8 मार्च को मनाया जाने लगा, जो आज भी विश्वभर में आधिकारिक तिथि के रूप में मान्य है।

- महत्त्व
- अतीत का सम्मान: यह दिन उन महिलाओं के साहस और दृढ़ संकल्प का सम्मान करने का अवसर है, जिन्होंने इतिहास को बदल दिया और अन्य लोगों के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
- प्रगति का मूल्यांकन: यह समानता, शांति और विकास के लिए हुए संघर्ष में प्राप्त प्रगति की समीक्षा करने का अवसर प्रदान करता है।
- परिवर्तन का निर्माण: सबसे महत्त्वपूर्ण रूप से, यह दिन लोगों को एकजुट होने और नेटवर्क बनाने का अवसर देता है, ताकि वे भविष्य के लिए सार्थक परिवर्तन ला सकें।
महिला सशक्तीकरण के बारे में
- महिला सशक्तीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से महिलाएँ लैंगिक रूप से असमान शक्ति संबंधों के प्रति जागरूक होती हैं और घर, कार्यस्थल तथा समुदाय में विद्यमान असमानताओं के विरुद्ध अपनी आवाज उठाने के लिए अधिक अधिकार प्राप्त करती हैं।

- प्रमुख उद्देश्य
- क्षमता निर्माण: महिला सशक्तीकरण का एक प्रमुख उद्देश्य महिलाओं को समाज की गतिविधियों तथा सभी स्तरों पर निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं में समान भागीदारी के लिए सक्षम बनाना है।
- संसाधनों तक समान पहुँच: इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महिलाओं को संसाधनों और लाभों तक समान पहुँच और नियंत्रण प्राप्त हो।
- सुरक्षित और समान कार्य परिस्थितियाँ: महिला सशक्तीकरण सुरक्षित, सम्मानजनक और समान कार्य वातावरण सुनिश्चित करने पर भी बल देता है।

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- संगठनों को सुदृढ़ बनाना: महिला एवं विकास संगठनों को सशक्त बनाकर लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण के लिए वकालत को मजबूत किया जाता है।
- सामाजिक-आर्थिक सुधार: महिला सशक्तीकरण उन संरचनात्मक समस्याओं को दूर करने का प्रयास करता है, जो महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से अधीनस्थ बनाती हैं।
- पुरुषों में जागरूकता: समाज की प्रगति के लिए पुरुषों में लैंगिक समानता के महत्त्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना भी आवश्यक माना जाता है।
विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति
- आर्थिक भागीदारी और कार्यबल वृद्धि
- महिला कार्यबल भागीदारी में वृद्धि: भारत में महिलाओं की श्रम बाजार में भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, जो आर्थिक सशक्तीकरण का महत्त्वपूर्ण संकेतक है।
- राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार, महिलाओं का कार्यकर्ता जनसंख्या अनुपात वर्ष 2017–18 में 22% से बढ़कर 2023–24 में 40.3% हो गया है।

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- महिला बेरोजगारी में कमी: इसी अवधि में महिला बेरोजगारी दर 5.6% से घटकर 3.2% हो गई है, जो श्रम बाजार में बेहतर अवसरों को दर्शाती है।
- ग्रामीण-शहरी रोजगार विस्तार: महिलाओं के रोजगार में वृद्धि विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक रही है, जहाँ महिला रोजगार में 96% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि शहरी क्षेत्रों में 43% की वृद्धि हुई।
- यह विभिन्न क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं में महिलाओं की बढ़ती आर्थिक भूमिका को उजागर करता है।
- रोजगारपरक योग्यता में सुधार: महिला स्नातकों की रोजगार योग्यता वर्ष 2013 में 42% से बढ़कर 2024 में 47.53% हो गई है, जो कौशल और शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति को दर्शाती है।
- औपचारिक क्षेत्र में भागीदारी में वृद्धि: कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के अनुसार, पिछले सात वर्षों में 1.56 करोड़ से अधिक महिलाएँ औपचारिक कार्यबल में शामिल हुई हैं, जबकि 16.69 करोड़ से अधिक महिला श्रमिक ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत हैं।

- उद्यमिता और महिला-नेतृत्वित आर्थिक विकास
- महिला-नेतृत्वित विकास की ओर परिवर्तन: भारत “महिला विकास” से “महिला-नेतृत्वित विकास” की ओर एक प्रतिमान परिवर्तन (Paradigm shift) देख रहा है, जिसमें महिलाओं को आर्थिक विकास, नवाचार और उद्यमिता के प्रेरक के रूप में सशक्त बनाने पर नीतिगत ध्यान बढ़ रहा है।
- नीतिगत समर्थन पारितंत्र का विस्तार: वर्तमान में 15 मंत्रालयों के अंतर्गत 70 से अधिक केंद्रीय योजनाएँ और 400 से अधिक राज्य-स्तरीय योजनाएँ वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और बाजार तक पहुँच प्रदान कर महिला उद्यमियों का समर्थन कर रही हैं तथा आर्थिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी को मजबूत कर रही हैं।
- महिला स्व-रोजगार में वृद्धि: महिला स्व-रोजगार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो वर्ष 2017–18 में 51.9% से बढ़कर वर्ष 2023–24 में 67.4% हो गया है, जो यह संकेत देता है कि महिलाएँ अपने स्वयं के उद्यम और आजीविका गतिविधियाँ स्थापित करने की बढ़ती प्रवृत्ति दर्शा रही हैं।
- प्रधानमंत्री मुद्रा योजना जैसी योजनाओं ने महिला उद्यमियों को समर्थन देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसमें महिलाओं को कुल मुद्रा ऋणों का लगभग 68% प्राप्त हुआ है, जो 35.38 करोड़ से अधिक ऋणों के बराबर है और जिनका कुल मूल्य ₹14.72 लाख करोड़ है।
- महिला स्ट्रीट वेंडरों को समर्थन: पीएम स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि (PM SVANidhi) के अंतर्गत लगभग 44% लाभार्थी महिलाएँ हैं, जिससे उन्हें सस्ती कार्यशील पूँजी ऋणों के माध्यम से अपनी आजीविका को पुनः स्थापित और बनाए रखने में सहायता मिलती है।
- विकास के प्रेरक के रूप में महिला-नेतृत्वित MSME: महिला स्वामित्व वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) रोजगार सृजन और आर्थिक विस्तार में महत्त्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में उभरे हैं।
- महिला स्वामित्व वाले स्वामित्व प्रतिष्ठानों की हिस्सेदारी वर्ष 2010–11 में 17.4% से बढ़कर 2023–24 में 26.2% हो गई है।
- महिला-नेतृत्वित MSME की संख्या में वृद्धि: महिला-नेतृत्वित MSME की संख्या लगभग दोगुनी होकर 1 करोड़ से बढ़कर 1.92 करोड़ हो गई है, जिसने वित्तीय वर्ष 2021 से 2023 के बीच महिलाओं के लिए 89 लाख से अधिक अतिरिक्त रोजगार सृजित किए हैं।
- स्टार्ट-अप में महिलाओं की बढ़ती उपस्थिति: स्टार्ट-अप इंडिया के अंतर्गत लगभग 50% DPIIT-मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप में न्यूनतम एक महिला निदेशक है, जो नवाचार-प्रेरित क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती भूमिका को प्रदर्शित करता है।
- जमीनी स्तर पर आर्थिक सशक्तीकरण: दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और नमो ड्रोन दीदी योजना जैसे कार्यक्रम महिलाओं की आजीविका के अवसरों और तकनीकी क्षमताओं को मजबूत कर रहे हैं, जबकि लगभग 2 करोड़ महिलाएँ “लखपति दीदी” बन चुकी हैं, जिन्होंने स्वयं सहायता समूह पहलों के माध्यम से ₹1 लाख से अधिक वार्षिक आय प्राप्त की है।
- स्वास्थ्य, पोषण और मानव पूँजी विकास
- पोषण और स्वास्थ्य सेवाएँ आधारभूत स्तंभ के रूप में: महिला सशक्तीकरण पोषण, मातृ स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में सुधार से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है, जो मजबूत मानव पूँजी और दीर्घकालिक आर्थिक विकास में योगदान देता है।
- एकीकृत पोषण कार्यक्रम: सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 पहल बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पूरक पोषण, प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा और स्वास्थ्य निगरानी जैसी एकीकृत सेवाएँ प्रदान करती है।
- कुपोषण से मुकाबला: प्रमुख योजना पोषण अभियान विभिन्न मंत्रालयों के मध्य समन्वय के माध्यम से बहु-क्षेत्रीय और प्रौद्योगिकी-आधारित दृष्टिकोण अपनाकर कुपोषण को कम करने और स्वास्थ्य परिणामों में सुधार करने का प्रयास करती है।
- मातृ स्वास्थ्य और कल्याण योजनाएँ: प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, जननी सुरक्षा योजना और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम जैसे कार्यक्रम सुरक्षित संस्थागत प्रसव, मातृत्व लाभ और माताओं तथा नवजात शिशुओं के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देते हैं।
- स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार: निरंतर हस्तक्षेपों के परिणामस्वरूप भारत का मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) 2014–16 में प्रति 1,00,000 जीवित जन्म पर 130 से घटकर वर्ष 2019–21 में 93 हो गया है, जबकि पाँच वर्ष से कम आयु मृत्यु दर वर्ष 2015 में 48 से घटकर वर्ष 2023 में प्रति 1,000 जीवित जन्म पर 28 हो गई है, जो मातृ और बाल स्वास्थ्य परिणामों में सुधार को दर्शाती है।

- शिक्षा, कौशल और ज्ञान सशक्तीकरण
- महिला सशक्तीकरण के लिए शिक्षा एक उत्प्रेरक के रूप में: शिक्षा तक पहुँच महिलाओं की निर्णय-निर्माण क्षमता, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक गतिशीलता को बढ़ाती है, जिससे वे राष्ट्रीय विकास में सक्रिय रूप से भाग लेने में सक्षम होती हैं।
- बालिका शिक्षा का संवर्द्धन: बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पहल लैंगिक समानता में सुधार, बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने और घटते बाल लिंगानुपात की समस्या का समाधान करने पर केंद्रित है।
- इसके परिणामस्वरूप जन्म के समय लिंगानुपात वर्ष 2014–15 में 918 से बढ़कर वर्ष 2024–25 में 929 हो गया है।
- समावेशी विद्यालयी अवसर: कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समुदायों की बालिकाओं के लिए, विशेषकर शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में, आवासीय विद्यालयी सुविधाएँ प्रदान करता है।
- उच्च शिक्षा में भागीदारी में वृद्धि: उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, जहाँ महिलाओं के बीच पीएचडी नामांकन वर्ष 2014–15 से 2022–23 के बीच 135.6% बढ़ा है, जबकि महिला स्नातकोत्तर नामांकन में 61.3% की वृद्धि हुई है, जो बढ़ती शैक्षणिक प्रगति को दर्शाता है।
- STEM में महिलाओं को प्रोत्साहन: विज्ञान ज्योति योजना जैसी पहलें बालिकाओं को विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित (STEM) में कॅरियर अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं, जबकि आईआईटी और एनआईटी में अधिसंख्य (Supernumerary) सीटों के प्रावधान ने अभियांत्रिकी में महिलाओं की भागीदारी को 10% से कम से बढ़ाकर 20% से अधिक कर दिया है।
- उभरते क्षेत्रों के लिए कौशल विकास: नव्या (NAVYA) कार्यक्रम किशोरियों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, डिजिटल विपणन और हरित रोजगार जैसे उभरते क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करता है, जिससे उनकी रोजगारपरक योग्यता सुदृढ़ होती है।
- सुरक्षा, संरक्षा और संस्थागत संरक्षण
- महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण का निर्माण: महिला सशक्तीकरण के लिए सुरक्षित घर, कार्यस्थल और समुदाय आवश्यक हैं, जिससे महिलाएँ हिंसा या भेदभाव के भय के बिना शिक्षा और रोजगार का अनुसरण कर सकें।
- महिला सुरक्षा के लिए एकीकृत ढाँचा: मिशन शक्ति पहल महिलाओं और बालिकाओं के लिए सुरक्षा, संरक्षण और सशक्तीकरण योजनाओं को एकीकृत करने वाला एक अंब्रेला कार्यक्रम (Umbrella programme) है।
- हिंसा से प्रभावित महिलाओं के लिए सहायता सेवाएँ: वन स्टॉप सेंटर (सखी केंद्र) हिंसा से प्रभावित महिलाओं के लिए चिकित्सीय सहायता, विधिक सहायता, मनोवैज्ञानिक परामर्श और आश्रय सेवाएँ प्रदान करते हैं।
- आपातकालीन हेल्पलाइन और सामुदायिक समर्थन: महिला हेल्पलाइन (181) 24×7 आपातकालीन सहायता और परामर्श प्रदान करती है, जबकि नारी अदालतें समुदाय-आधारित विवाद समाधान तंत्र को सुगम बनाती हैं।
- सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करना: SHe-Box पोर्टल महिलाओं को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने की सुविधा प्रदान करता है, जिससे कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 के प्रभावी क्रियान्वयन को सुदृढ़ किया जाता है।
- बाल संरक्षण और कल्याण: मिशन वात्सल्य कमजोर बच्चों की सुरक्षा और बाल कल्याण प्रणालियों को मजबूत करने पर केंद्रित है, जिससे महिलाओं और बालिकाओं को प्रभावित करने वाली पीढ़ीगत असुरक्षाओं का समाधान किया जा सके।
- समावेशी राष्ट्रीय विकास में योगदान
- लैंगिक उत्तरदायी बजट को सुदृढ़ बनाना: पिछले एक दशक में जेंडर बजट में 429% की वृद्धि हुई है, जो वित्तीय वर्ष 2013–14 में ₹0.85 लाख करोड़ से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2025–26 में ₹4.49 लाख करोड़ हो गया है, जो महिला-केंद्रित विकास के प्रति सरकार की बढ़ती प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
- सशक्तीकरण के लिए जीवन-चक्र दृष्टिकोण: भारत ने महिला सशक्तीकरण के संदर्भ में जीवन-चक्र दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें प्रारंभिक बाल्यावस्था के पोषण और शिक्षा से लेकर वयस्कता में रोजगार, उद्यमिता और सुरक्षा तक की आवश्यकताओं को संबोधित किया जाता है।
- सतत् विकास के प्रेरक के रूप में महिलाएँ: आर्थिक, शैक्षिक, प्रौद्योगिकी और सामाजिक क्षेत्रों में महिलाओं की अधिक भागीदारी मानव पूँजी निर्माण, समावेशी विकास और सामाजिक न्याय को सुदृढ़ करती है, जिससे महिलाएँ भारत की दीर्घकालिक विकास यात्रा के केंद्र में स्थापित होती हैं।
- खेलों में उपलब्धियाँ
- पहला क्रिकेट विश्व कप (2025): भारतीय महिला टीम ने नवंबर 2025 में अपना पहला ICC एकदिवसीय विश्व कप खिताब जीतकर इतिहास रचा, जहाँ उन्होंने घरेलू मैदान पर फाइनल में दक्षिण अफ्रीका को हराकर 47 वर्षों के इंतजार को समाप्त किया।
- ऐतिहासिक ओलंपिक दोहरा पदक: पेरिस 2024 ओलंपिक में मनु भाकर ओलंपिक निशानेबाजी पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं और स्वतंत्रता के बाद के युग में एक ही ओलंपिक खेलों में दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय भी बनीं।
- शतरंज में विश्व वर्चस्व: जुलाई 2025 में 19 वर्षीय दिव्या देशमुख ने FIDE महिला विश्व कप चैंपियन का खिताब जीता, जहाँ उन्होंने एक सर्व-भारतीय फाइनल में अनुभवी कोनेरू हंपी को हराकर भारत की नवीनतम ग्रैंडमास्टर बनने का गौरव प्राप्त किया।
- पैरा-गेम्स में क्रांति: “आर्मलेस तीरंदाज” के रूप में प्रसिद्ध शीतल देवी ने वर्ष 2025 विश्व पैरा तीरंदाजी चैंपियनशिप का खिताब जीता और इतिहास रचते हुए एशिया कप के लिए भारत की सक्षम (Able-bodied) राष्ट्रीय टीम में चयनित होने वाली पहली पैरा-एथलीट बनीं।
- मुक्केबाजी में स्वर्ण सफलता: भारत ने लिवरपूल में आयोजित वर्ष 2025 विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन किया, जहाँ जैस्मीन लांबोरिया (57 किग्रा) और मीनाक्षी हुड्डा (48 किग्रा) दोनों विश्व चैंपियन बनीं।
- हॉकी में पुनरुत्थान: भारतीय महिला हॉकी टीम ने वर्ष 2024 एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी में स्वर्ण पदक जीता और इसके बाद वर्ष 2025 एशिया कप में रजत पदक हासिल किया, जिससे महाद्वीपीय स्तर पर उनकी शीर्ष शक्ति के रूप में स्थिति बनी रही।
- पेशेवर विकास (WPL): वर्ष 2026 तक महिला प्रीमियर लीग (WPL) विश्व की दूसरी सबसे मूल्यवान महिला खेल लीग बन चुकी है, जिसने भारतीय महिला खिलाड़ियों को अभूतपूर्व वित्तीय स्वतंत्रता और पेशेवर कॅरियर के अवसर प्रदान किए हैं।
महिला सशक्तीकरण की आवश्यकता क्यों है?
- संरचनात्मक लैंगिक असमानता का उन्मूलन: संवैधानिक समानता की गारंटी के बावजूद महिलाएँ शिक्षा, रोजगार, उत्तराधिकार और संसाधनों तक पहुँच में अभी भी संरचनात्मक बाधाओं का सामना करती हैं।
- सशक्तीकरण समान अधिकार, अवसर और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी सुनिश्चित करने में सहायता करता है, जिससे लोकतांत्रिक और सामाजिक न्याय के सिद्धांत सुदृढ़ होते हैं।
- आर्थिक भागीदारी और विकास में सुधार: कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में अभी भी काफी कम है, जिससे देश की उत्पादक क्षमता सीमित होती है।
- महिला उद्यमिता, कौशल विकास और रोजगार को बढ़ावा देने से पारिवारिक आय बढ़ सकती है और आर्थिक विकास को गति मिल सकती है।
- उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना और स्टैंड-अप इंडिया जैसी योजनाओं ने कई महिलाओं को लघु और मध्यम उद्यम स्थापित करने में सक्षम बनाया है।
- वित्तीय स्वतंत्रता और आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करना: आर्थिक सशक्तीकरण महिलाओं को आय, बचत और संपत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करने की अनुमति देता है, जिससे उनकी निर्भरता और असुरक्षा कम होती है।
- नमो ड्रोन दीदी योजना जैसी पहलें स्वयं सहायता समूहों (SHG) से जुड़ी महिलाओं को कृषि सेवाओं के लिए ड्रोन संचालन का प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखती हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में नई आय के अवसर सृजित होते हैं।
- शासन में प्रतिनिधित्व को सुदृढ़ बनाना: राजनीतिक निर्णय-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी नीतिगत समावेशन और जमीनी स्तर के शासन को बेहतर बनाती है।
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम का पारित होना लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के अधिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने का प्रयास है, जो लैंगिक संतुलित राजनीतिक संस्थानों की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
- विज्ञान और नवाचार में महिलाओं की क्षमता का उपयोग: महिला सशक्तीकरण समाज की बौद्धिक और रचनात्मक क्षमता का पूर्ण उपयोग करने में सहायक होता है, विशेष रूप से विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अनुसंधान क्षेत्रों में।
- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के मिशनों—जैसे चंद्रयान-3 और आदित्य-L1—में महिला वैज्ञानिकों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जो उच्च प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती उपस्थिति को दर्शाता है।
- सामाजिक विकास और मानव कल्याण को बढ़ावा देना: सशक्त महिलाएँ परिवारों और समुदायों के बेहतर स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा परिणामों में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं।
- अधिक स्वायत्तता महिलाओं को बाल स्वास्थ्य, शिक्षा और घरेलू कल्याण के संबंध में सूचित निर्णय लेने में सक्षम बनाती है, जिससे मानव विकास संकेतक सुदृढ़ होते हैं।
- वैश्विक लैंगिक समानता प्रतिबद्धताओं की प्राप्ति: महिला सशक्तीकरण सतत् विकास लक्ष्य-5 की प्राप्ति के लिए केंद्रीय महत्त्व रखता है, जिसका उद्देश्य भेदभाव को समाप्त करना, समान अवसर सुनिश्चित करना और विश्वभर में महिलाओं के नेतृत्व को बढ़ावा देना है।
- इस प्रकार लैंगिक समानता को आगे बढ़ाना केवल सामाजिक न्याय के लिए ही नहीं बल्कि सतत् और समावेशी विकास के लिए भी आवश्यक है।
महिलाओं के विरुद्ध दंडमुक्ति और न्याय तक पहुँच
- दंडमुक्ति का अर्थ: दंडमुक्ति उन स्थितियों को दर्शाता है, जहाँ महिलाओं के विरुद्ध अपराध बिना किसी जवाबदेही या दंड के घटित होते हैं, जिससे विधि का शासन और निवारक तंत्र कमजोर हो जाते हैं।
- वैश्विक स्तर पर स्थायी विधिक असमानता: प्रगति के बावजूद अभी तक कोई भी देश महिलाओं के लिए पूर्ण कानूनी समानता प्राप्त नहीं कर पाया है, और उत्तराधिकार, रोजगार, संपत्ति तथा पारिवारिक अधिकारों जैसे क्षेत्रों में विधिक अंतर अभी भी संरचनात्मक भेदभाव को बनाए रखते हैं।
- न्याय प्राप्त करने में बाधाएँ: महिलाएँ न्याय की माँग करते समय कई बाधाओं का सामना करती हैं, जिनमें सामाजिक कलंक या प्रतिशोध का भय, वित्तीय लागत, कानूनी सहायता की कमी, संस्थागत पक्षपात और जटिल न्यायिक प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
- आपराधिक न्यायालयों से परे न्याय: कई महिलाओं के लिए अन्याय मुख्य रूप से दीवानी और प्रशासनिक प्रणालियों—जैसे पारिवारिक कानून, रोजगार विवाद, आवास अधिकार और सामाजिक कल्याण तक पहुँच—के भीतर होता है, जो उनकी आर्थिक सुरक्षा तथा स्वायत्तता को निर्धारित करते हैं।
- न्याय प्रणाली में लैंगिक पक्षपात: न्यायिक संस्थाएँ प्रायः मौजूदा सामाजिक असमानताओं को प्रतिबिंबित करती हैं, जहाँ पीड़िता को दोष देना, पीड़िताओं के चरित्र की जाँच और निर्णय-निर्माण भूमिकाओं में महिलाओं का सीमित प्रतिनिधित्व निष्पक्ष परिणामों में बाधा उत्पन्न करता है।
- संघर्ष और संकट का प्रभाव: संघर्ष या अस्थिर परिस्थितियों में कमजोर संस्थाएँ महिलाओं को यौन और लैंगिक-आधारित हिंसा के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती हैं, जहाँ अपराधियों के लिए प्रायः बहुत कम या कोई जवाबदेही नहीं होती हैं।
- लैंगिक-संवेदनशील न्याय प्रणाली के तत्त्व: प्रभावी न्याय प्रणाली के लिए स्पष्ट सुरक्षात्मक कानून, सुलभ कानूनी सहायता, विभिन्न संस्थानों (पुलिस, न्यायालय और सहायता सेवाएँ) के बीच समन्वय, लैंगिक-विभेदित आँकड़े तथा पीड़ित-केंद्रित न्याय तंत्र के लिए सतत् वित्तपोषण आवश्यक होता है।
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भारत में महिला सशक्तीकरण को प्रभावित करने वाले कारक
- सामाजिक-सांस्कृतिक मानदंड और पितृसत्तात्मक संरचनाएँ: गहराई से जमे हुए पितृसत्तात्मक मूल्य, लैंगिक रूढ़ियाँ और पुत्र-प्राथमिकता महिलाओं की गतिशीलता, शिक्षा और निर्णय लेने की शक्ति को सीमित करते हैं।
- इसके साथ ही बाल विवाह, दहेज और लैंगिक भेदभाव जैसी प्रथाएँ आज भी महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता को बाधित करती रहती हैं।
- शैक्षिक बाधाएँ: यद्यपि लड़कियों के नामांकन में सुधार हुआ है, फिर भी विशेष रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में लड़कियों की विद्यालय छोड़ने की दर अभी भी अधिक बनी हुई है।
- गरीबी, सुरक्षा संबंधी चिंताएँ, स्वच्छता सुविधाओं की कमी तथा घरेलू जिम्मेदारियाँ लड़कियों की शिक्षा को प्रभावित करती हैं, जिससे उनके दीर्घकालिक सशक्तीकरण के अवसर कम हो जाते हैं।
- आर्थिक असमानता और कम श्रमबल भागीदारी: महिलाओं को सीमित रोजगार अवसर, वेतन असमानता और बिना भुगतान वाले देखभाल कार्य का भारी बोझ झेलना पड़ता है।
- आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण, 2022-23 के अनुसार, महिलाओं की श्रमबल भागीदारी लगभग 37 प्रतिशत है, जबकि पुरुषों के लिए यह 78 प्रतिशत से अधिक है।
- बाल देखभाल सुविधाओं की कमी, सुरक्षित कार्यस्थलों का अभाव और लचीली कार्य व्यवस्था का न होना भी महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी को हतोत्साहित करता है।
- संसाधनों और वित्तीय परिसंपत्तियों तक सीमित पहुँच: अनेक महिलाओं के पास भूमि, संपत्ति और वित्तीय परिसंपत्तियों का स्वामित्व नहीं होता, जिससे उनकी आर्थिक स्वतंत्रता कम हो जाती है।
- ऋण, बाजार, प्रौद्योगिकी और उद्यमिता नेटवर्क तक सीमित पहुँच भी महिलाओं की व्यवसाय शुरू करने और उसका विस्तार करने की क्षमता को सीमित कर देती है।
- लैंगिक आधारित हिंसा और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, मानव तस्करी और सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा की कमी, महिलाओं की स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी को सीमित करती है।
- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 और आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 जैसे कानून कानूनी सुरक्षा प्रदान करते हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी एक चुनौती बना हुआ है।
- छिपा हुआ बाजार भेदभाव और आर्थिक बोझ: महिलाओं को उपभोक्ता बाजारों में लैंगिक मूल्य भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिसे सामान्यतः “पिंक टैक्स” कहा जाता है।
- महिलाओं के लिए विपणन किए जाने वाले रोजमर्रा के उत्पाद जैसे व्यक्तिगत देखभाल की वस्तुएँ और कपड़े प्रायः पुरुषों के समान उत्पादों की तुलना में अधिक कीमत पर बेचे जाते हैं, जिससे जीवनयापन की कुल लागत बढ़ जाती है।
- व्यवहारिक अर्थशास्त्र में वर्णित “एंकरिंग प्रभाव” जैसे कारक भी इस प्रकार के मूल्य भेद को बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं, क्योंकि उपभोक्ता धीरे-धीरे इन कीमतों को सामान्य मानकर स्वीकार कर लेते हैं।
- स्वास्थ्य, मासिक धर्म स्वच्छता संबंधी सुविधाओं में कमी: सस्ती मासिक धर्म स्वच्छता सामग्री और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा तथा शिक्षा और रोजगार में उनकी भागीदारी को प्रभावित करती है।
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, केवल लगभग 64 प्रतिशत युवा महिलाएँ स्वच्छ मासिक धर्म सुरक्षा के साधनों का उपयोग करती हैं, जो इस क्षेत्र में मौजूद निरंतर बाधाओं को दर्शाता है।
- डिजिटल विभाजन, राजनीतिक अल्प-प्रतिनिधित्व और अंतर्संबंधित असमानताएँ: महिलाओं की डिजिटल प्रौद्योगिकी, इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल साक्षरता तक पहुँच अपेक्षाकृत कम है, जिससे डिजिटल अर्थव्यवस्था और ई-शासन में उनकी भागीदारी सीमित रहती है।
- वे राजनीति, कॉरपोरेट नेतृत्व और निर्णय-निर्माण के पदों में भी कम प्रतिनिधित्व रखती हैं, यद्यपि नारी शक्ति वंदन अधिनियम जैसे सुधार इस असंतुलन को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं।
- साथ ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक समुदायों और गरीब परिवारों से आने वाली महिलाओं को कई परस्पर जुड़ी हुई सामाजिक और आर्थिक असमानताओं का सामना करना पड़ता है।
AI डीपफेक का दुरुपयोग और लैंगिक न्याय
- डीपफेक दुरुपयोग का अर्थ: डीपफेक ऐसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा बनाए गए या परिवर्तित चित्र, ऑडियो या वीडियो होते हैं, जो किसी व्यक्ति को झूठे रूप में ऐसा करते या कहते हुए दिखाते हैं, जो उन्होंने वास्तव में कभी किया या कहा ही नहीं। इनका उपयोग अक्सर महिलाओं को लक्ष्य बनाकर उनकी सहमति के बिना अश्लील सामग्री तैयार करने के लिए किया जाता है।
- डीपफेक सामग्री की लैंगिक प्रकृति: अध्ययनों से पता चलता है कि इंटरनेट पर उपलब्ध लगभग 98 प्रतिशत डीपफेक वीडियो अश्लील प्रकृति के होते हैं और उनमें से लगभग 99 प्रतिशत में महिलाओं को दिखाया जाता है, जो यह दर्शाता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीक का दुरुपयोग विशेष रूप से महिलाओं के विरुद्ध किया जा रहा है।
- खतरे का तीव्र विस्तार: वर्ष 2019 से 2023 के बीच डीपफेक वीडियो की संख्या में लगभग 550 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि ऐसे एआई उपकरण अब नि:शुल्क और आसानी से उपलब्ध हैं तथा उन्हें उपयोग करने के लिए बहुत अधिक तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं होती है।
- कानूनी और नियामकीय अंतराल: अधिकांश देशों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा निर्मित निजी या अंतरंग छवियों से संबंधित विशेष कानून नहीं हैं। साथ ही मौजूदा “प्रतिशोधात्मक अश्लील सामग्री” संबंधी कानून अक्सर डीपफेक को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं करते, जिससे अपराधियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने में अस्पष्टता और कठिनाई उत्पन्न होती है।
- कानून के प्रवर्तन से जुड़ी चुनौतियाँ: डीपफेक से जुड़े मामलों की जाँच के लिए डिजिटल फॉरेंसिक तकनीक, विभिन्न देशों के बीच सहयोग तथा ऑनलाइन मंचों से डेटा तक पहुँच आवश्यक होती है, लेकिन अनेक न्याय प्रणालियाँ अभी भी संसाधनों और तकनीकी क्षमता के मामले में पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हैं।
- पीड़ितों के सामने आने वाली बाधाएँ: कई पीड़ित सामाजिक कलंक, पीड़िता को दोष देने की प्रवृत्ति, प्रतिशोध के डर और न्यायिक प्रक्रियाओं के दौरान दोबारा मानसिक आघात झेलने की आशंका के कारण शिकायत दर्ज कराने से बचते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अनेक मामलों की रिपोर्ट नहीं हो पाती और अपराधियों को दंड से मुक्ति मिल जाती है।
- समग्र प्रतिक्रिया की आवश्यकता: डीपफेक दुरुपयोग से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए स्पष्ट और मजबूत कानूनी ढाँचा, डिजिटल मंचों की जवाबदेही, प्रशिक्षित कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ, पीड़ित-केंद्रित कानूनी सहायता तथा सहमति एवं ऑनलाइन सुरक्षा पर आधारित डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम आवश्यक हैं।
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PWOnlyIAS विशेष
समग्र विकास के सक्षमकर्ता और सहायक के रूप में महिलाएँ
- आर्थिक विकास की प्रेरक शक्ति: महिलाओं द्वारा संचालित उद्यम रोजगार के अवसर उत्पन्न करते हैं, अर्थव्यवस्था के आधार को विविध बनाते हैं और सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों तथा स्टार्ट-अप क्षेत्र को मजबूत करते हैं।
- सामाजिक परिवर्तन की वाहक: महिलाएँ अपनी आय का बड़ा हिस्सा परिवार पर पुनः निवेश करती हैं, जिससे स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण में सुधार होता है और गरीबी के चक्र को तोड़ने में सहायता मिलती है।
- समावेशी शासन: पंचायती राज संस्थाओं और स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और योजनाओं की अंतिम स्तर तक प्रभावी पहुँच सुनिश्चित करती है।
- जमीनी स्तर पर सशक्तीकरण: स्वयं सहायता समूह वित्तीय समावेशन, सूक्ष्म उद्यमिता और ग्रामीण आजीविका में परिवर्तन को बढ़ावा देते हैं तथा महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाते हैं।
- समानता और न्याय को बढ़ावा: महिला नेतृत्व, लैंगिक रूप से संवेदनशील नीतियों को प्रोत्साहित करता है और समाज के हाशिये पर रहने वाले समुदायों की आवाज को नीति-निर्माण तक पहुँचाने में सहायता करता है।
- स्थायित्व की आधारशिला: महिलाएँ जलवायु सहनशीलता, सतत् कृषि और नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने में अग्रणी भूमिका निभाती हैं, जो लैंगिक समानता और जलवायु कार्रवाई जैसे वैश्विक सतत् विकास लक्ष्यों के अनुरूप है।
- सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण: परंपराओं और मूल्यों की संरक्षक के रूप में महिलाएँ सामाजिक एकता, सहानुभूति और सहयोग की भावना को बढ़ावा देती हैं, जिससे संतुलित और समावेशी विकास संभव होता है।
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भारत में महिला सशक्तीकरण के लिए की गई पहल और कार्य
- संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपाय: भारत का संविधान विधि के समक्ष समानता (अनुच्छेद-14), भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद-15) और अवसर की समानता (अनुच्छेद-16) की गारंटी देता है।
- अनुच्छेद-39(a) और अनुच्छेद-39(d) जैसे निर्देशक सिद्धांत समान आजीविका के अवसरों और समान कार्य के लिए समान वेतन पर जोर देते हैं।
- कई कानून महिलाओं के अधिकारों और संरक्षण को मजबूत करते हैं, जिनमें शामिल हैं:
- घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005
- कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013
- लैंगिक रूप से चयनात्मक प्रथाओं पर अंकुश लगाने के लिए गर्भाधान पूर्व और प्रसव-पूर्व निदान तकनीक (PCPNDT) अधिनियम, 1994।
- राजनीतिक सशक्तीकरण और प्रतिनिधित्व: वर्ष 1992 के 73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम और 1992 के 74वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के अंतर्गत स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में आरक्षण के माध्यम से शासन में महिलाओं की भागीदारी को मजबूत किया गया है, जिनमें कम-से-कम एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।
- हाल ही में, नारी शक्ति वंदन अधिनियम का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण प्रदान करना है।
- शिक्षा और सामाजिक विकास पहल: बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना घटते बाल लिंग अनुपात को संबोधित करती है और लड़कियों की शिक्षा और जीवन रक्षा को बढ़ावा देती है।
- सुकन्या समृद्धि योजना बालिकाओं की शिक्षा और भविष्य की सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक बचत को प्रोत्साहित करती है।
- आर्थिक सशक्तीकरण और वित्तीय समावेशन: प्रधानमंत्री मुद्रा योजना और स्टैंड-अप इंडिया योजना जैसे कार्यक्रम महिला उद्यमियों को ऋण सहायता प्रदान करते हैं।
- दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को बढ़ावा देते है, जिससे लाखों ग्रामीण महिलाओं को आय सृजन गतिविधियों और सामूहिक उद्यमों में संलग्न होने में सहायता मिलती है।
- स्वास्थ्य, पोषण और कल्याणकारी उपाय: प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना जैसी योजनाएँ गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को मातृ स्वास्थ्य में सुधार के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं।
- पोषण अभियान का उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के पोषण स्तर में सुधार करना है।
- कौशल विकास और तकनीकी सशक्तीकरण: नमो ड्रोन दीदी योजना जैसी पहल स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को कृषि ड्रोन चलाने का प्रशिक्षण देती हैं, जिससे वे आधुनिक कृषि सेवाओं और प्रौद्योगिकी आधारित आजीविका से जुड़ सकें।
- स्किल इंडिया मिशन के अंतर्गत कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम भी विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देते हैं।
- संस्थागत सहायता और जागरूकता तंत्र: राष्ट्रीय महिला आयोग जैसी संस्थाएँ महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और उनकी शिकायतों के निवारण के लिए कार्य करती हैं।
- सरकारी अभियान, नागरिक समाज की पहल और जागरूकता कार्यक्रम कानूनी साक्षरता, लैंगिक समानता और सामाजिक सशक्तीकरण को बढ़ावा देने में सहायक हैं।
महिला सशक्तीकरण के लिए वैश्विक पहल
- लैंगिक समानता पर संयुक्त राष्ट्र ढाँचा: संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय अभिसमयों, नीतियों और विकास कार्यक्रमों के माध्यम से लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने में केंद्रीय भूमिका निभाई है।
- यह महिलाओं के अधिकारों को मौलिक मानवाधिकार के रूप में मान्यता देता है और सदस्य देशों को लैंगिक-संवेदनशील नीतियाँ अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।
- महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर अभिसमय (CEDAW): वर्ष 1979 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाया गया यह अभिसमय अक्सर महिलाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय अधिकार-पत्र के रूप में वर्णित किया जाता है।
- यह देशों को राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव समाप्त करने के लिए बाध्य करता है।
- बीजिंग घोषणा और कार्ययोजना (1995): महिलाओं पर चौथे विश्व सम्मेलन के दौरान अपनाई गई यह घोषणा महिलाओं के अधिकारों, भागीदारी और सशक्तीकरण को आगे बढ़ाने के लिए एक व्यापक रोडमैप प्रदान करती है।
- इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और आर्थिक भागीदारी सहित 12 महत्त्वपूर्ण चिंताओं के क्षेत्रों की पहचान की गई है।
- सतत् विकास लक्ष्य (SDGs): संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2015 में वैश्विक विकास प्रयासों को दिशा देने के लिए सतत् विकास लक्ष्यों को अपनाया।
- सतत् विकास लक्ष्य 5 विशेष रूप से लैंगिक समानता प्राप्त करने और सभी महिलाओं तथा लड़कियों को सशक्त बनाने पर केंद्रित है, जिसमें हिंसा का उन्मूलन, नेतृत्व में समान भागीदारी सुनिश्चित करना और आर्थिक संसाधनों तक बेहतर पहुँच शामिल है।
- यूएन वुमेन और वैश्विक लैंगिक कार्यक्रम: यूएन वुमेन वैश्विक स्तर पर महिलाओं के नेतृत्व, आर्थिक सशक्तीकरण और लैंगिक आधारित हिंसा से सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए कार्य करता है।
- यह सरकारों को लैंगिक-उत्तरदायी नीतियों और विकास कार्यक्रमों को लागू करने में सहयोग प्रदान करता है।
- अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक वैश्विक मंच के रूप में: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विश्वभर में महिलाओं की उपलब्धियों को मान्यता देने और लैंगिक समानता की वकालत करने के लिए मनाया जाता है।
- यह महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई को प्रोत्साहित करने के लिए एक वैश्विक मंच प्रदान करता है।
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भारत में महिला सशक्तीकरण के लिए आगे की राह
- शिक्षा और कौशल विकास को सुदृढ़ करना: लड़कियों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिए, विशेष रूप से ग्रामीण और हाशिये पर स्थित समुदायों में, तथा माध्यमिक शिक्षा के बाद होने वाली ड्रॉपआउट दर को कम करने पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
- इसके साथ ही महिलाओं में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित के क्षेत्रों में भागीदारी तथा डिजिटल साक्षरता को बढ़ाया जाना चाहिए।
- उद्योग से संबंधित कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि महिलाएँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवीकरणीय ऊर्जा और डिजिटल सेवाओं जैसे उभरते क्षेत्रों में अधिक भागीदारी कर सकें।
- महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को बढ़ाना: महिलाओं की श्रमबल भागीदारी को बढ़ाने के लिए लचीली कार्य व्यवस्था, बाल देखभाल सहायता और सुरक्षित कार्यस्थल उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
- महिलाओं द्वारा संचालित उद्यमों को बढ़ावा देने के लिए ऋण की उपलब्धता, वित्तीय साक्षरता और बाजार से जुड़ाव को मजबूत किया जाना चाहिए।
- साथ ही हरित अर्थव्यवस्था, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल मंचों जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करना आवश्यक है।
- राजनीतिक और नेतृत्व में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना: संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023 का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है।
- इसके साथ ही पंचायती राज संस्थाओं सहित जमीनी स्तर पर महिला नेताओं के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को मजबूत किया जाना चाहिए।
- कॉरपोरेट शासन और सार्वजनिक प्रशासन में भी महिलाओं के नेतृत्व को बढ़ावा देना चाहिए।
- कानूनी संरक्षण और सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना: महिलाओं की सुरक्षा के लिए घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 तथा कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 जैसे कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए फास्ट ट्रैक न्यायालयों, फॉरेंसिक अवसंरचना और पीड़ित सहायता तंत्र का विस्तार किया जाना चाहिए।
- साथ ही ऑनलाइन उत्पीड़न और डिजिटल शोषण जैसे उभरते खतरों से निपटने के लिए साइबर सुरक्षा ढाँचे को भी मजबूत करना आवश्यक है।
- सामाजिक मान्यताओं और लैंगिक रूढ़ियों को बदलना: समाज में गहराई से मौजूद पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती देने के लिए लैंगिक संवेदनशील शिक्षा और मीडिया प्रतिनिधित्व को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- पुत्र-प्राथमिकता, बाल विवाह और लैंगिक भेदभाव जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए सामाजिक जागरूकता अभियानों का विस्तार किया जाना चाहिए।
- इसके साथ ही नागरिक समाज और स्थानीय संस्थाओं की भागीदारी के माध्यम से समुदाय आधारित पहल को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- स्वास्थ्य और पोषण संबंधी परिणामों में सुधार: मातृ स्वास्थ्य सेवाओं, प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल और पोषण सहायता कार्यक्रमों को मजबूत किया जाना चाहिए।
- महिलाओं में एनीमिया, किशोरियों के स्वास्थ्य और मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
- साथ ही मानसिक स्वास्थ्य सहायता और लैंगिक रूप से संवेदनशील स्वास्थ्य अवसंरचना को भी स्वास्थ्य प्रणाली में एकीकृत किया जाना चाहिए।
- प्रौद्योगिकी और डिजिटल समावेशन का उपयोग: विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए डिजिटल पहुँच का विस्तार किया जाना चाहिए, ताकि वे सूचना, सेवाओं और आर्थिक अवसरों तक बेहतर पहुँच प्राप्त कर सकें।
- महिलाओं की डिजिटल उद्यमिता, ई-कॉमर्स और वित्तीय प्रौद्योगिकी से जुड़ी गतिविधियों में भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए।
- इसके साथ ही लैंगिक डिजिटल विभाजन को कम करने के लिए लक्षित नीतियाँ आवश्यक हैं।
- संस्थागत और वैश्विक प्रतिबद्धताओं को मजबूत करना: महिलाओं के सशक्तीकरण से संबंधित राष्ट्रीय नीतियों को वैश्विक ढाँचों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
- जेंडर बजटिंग को और मजबूत किया जाना चाहिए तथा नीति निर्माण में डेटा आधारित दृष्टिकोण अपनाकर प्रगति की नियमित निगरानी की जानी चाहिए।
- साथ ही लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और ज्ञान के आदान-प्रदान को भी प्रोत्साहित करना आवश्यक है।
निष्कर्ष
महिला सशक्तीकरण केवल एक सामाजिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह समावेशी विकास, लोकतांत्रिक शासन और सतत् विकास का एक महत्त्वपूर्ण प्रेरक है। महिलाओं के लिए शिक्षा, आर्थिक भागीदारी, कानूनी संरक्षण और डिजिटल सुरक्षा को सुदृढ़ बनाना भारत के लिए अत्यंत आवश्यक होगा, ताकि देश अपनी जनसांख्यिकीय क्षमता का पूर्ण उपयोग कर सके और महिला-नेतृत्व वाले विकास की परिकल्पना को साकार कर सके।