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तीसरा भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन

Lokesh Pal May 21, 2026 04:49 6 0

संदर्भ

हाल ही मे, नॉर्वे के ऑस्लो` में तीसरा भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें भारत तथा डेनमार्क, नॉर्वे, फिनलैंड, आइसलैंड और स्वीडन के नेताओं ने भाग लिया।

संबंधित तथ्य

  • यह शिखर सम्मेलन वर्ष 2022 में कोपेनहेगन और वर्ष 2018 में स्टॉकहोम में आयोजित पिछले दो शिखर सम्मेलनों की अगली कड़ी है।
    • चौथे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन की मेजबानी फिनलैंड करेगा।

  • इस शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री की उपस्थिति 43 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की नॉर्वे की पहली यात्रा भी है; इससे पहले वर्ष 1983 में इंदिरा गांधी ने नॉर्वे का दौरा किया था।
  • सांस्कृतिक जुड़ावों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि “संबंध” शब्द, जिसका अर्थ ‘रिश्ते’ होता है, भारतीय और नॉर्डिक भाषाओं में समान रूप से प्रचलित है।

शिखर सम्मेलन की मुख्य बिंदु

  • हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी: भू-राजनीतिक अनिश्चितता, आर्थिक परिवर्तन और तकनीकी परिवर्तनों के जवाब में, नेताओं ने भारत-नॉर्डिक संबंधों को विश्वसनीय हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी’ (Trusted Green Technology and Innovation Strategic Partnership) के रूप में उन्नत करने पर सहमति व्यक्त की।
    • यह डेनमार्क और नॉर्वे के साथ भारत की इसी तरह की साझेदारियों को और मजबूत करेगा, ब्लू इकोनॉमी और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर में सहयोग को बढ़ावा देगा और जलवायु कार्रवाई, ऊर्जा सुरक्षा तथा जल प्रबंधन के क्षेत्र में सहयोग के नए रास्ते खोलेगा।
  • संयुक्त राष्ट्र सुधारों का समर्थन: नेताओं ने बहुपक्षवाद को मजबूत करने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार करने पर जोर दिया, ताकि इसे अधिक प्रतिनिधि, समावेशी और वर्तमान भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने वाला बनाया जा सके।
  • UNSC और NSG में भारत के लिए नॉर्डिक समर्थन: नॉर्डिक देशों ने एक संशोधित UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए अपना समर्थन दोहराया और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) में भारत के आवेदन का स्वागत किया।
  • WTO-आधारित व्यापार प्रणाली के प्रति प्रतिबद्धता: शिखर सम्मेलन ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के महत्त्व को रेखांकित किया और एक निष्पक्ष, पारदर्शी, समावेशी और नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली का समर्थन किया।
  • भारत-EFTA TEPA और भारत-EU FTA: नेताओं ने भारत-EFTA व्यापार और आर्थिक भागीदारी समझौते (TEPA) के कार्यान्वयन और भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के निष्कर्ष का स्वागत किया।
    • विशेष: EFTA देश भारत में $100 बिलियन  का निवेश करने और सीधे 1 मिलियन रोजगार उत्पन्न करने का लक्ष्य रखते हैं।
  • संपर्क को मजबूत करना: नेताओं ने नॉर्डिक क्षेत्र और हिंद-प्रशांत के बीच संपर्क सुधारने पर जोर दिया, जिसमें भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) भी शामिल है।
  • समुद्री सुरक्षा सहयोग: नेताओं ने समुद्री सुरक्षा में सहयोग को गहरा करने, एक स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र का समर्थन करने तथा समुद्री डकैती, तस्करी, IUU (अवैध, असूचित और अनियंत्रित) अवैध मत्स्यन और समुद्री प्रदूषण जैसी चुनौतियों से निपटने पर सहमति जताई।
    • महासागर (MAHASAGAR) (विभिन्न क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक एवं समग्र प्रगति) और भारत-प्रशांत महासागर पहल (IPOI) जैसे कार्यक्रमों के तहत सहयोग को मजबूत किया जाएगा।
  • जलवायु कार्रवाई और सतत् विकास: नेताओं ने पेरिस समझौते, UNFCCC और सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) के तहत जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के नुकसान और प्रदूषण से निपटने के लिए अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की।
    • नॉर्डिक देशों ने भारत की नवीकरणीय ऊर्जा प्रतिबद्धताओं की सराहना की और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लिए जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा क्षमता निर्माण पर जोर दिया।
  • हरित प्रौद्योगिकियों में सहयोग: नेताओं ने ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर, कम उत्सर्जन वाली प्रौद्योगिकियों और महत्त्वपूर्ण खनिजों में सहयोग को तेज करने पर सहमति व्यक्त की।
  • LeadIT 2.0 का विस्तार: नेताओं ने LeadIT 2.0 (उद्योग संक्रमण के लिए नेतृत्व समूह) के विस्तार का स्वागत किया, जिसमें आइसलैंड भी इस पहल में शामिल हुआ है।
  • ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा देना: भारत और नॉर्डिक देश एक सतत् ब्लू इकोनॉमी विकसित करने में सहयोग करने पर सहमत हुए, जिसमें कम कार्बन वाली शिपिंग, जहाज निर्माण और जहाज पुनर्चक्रण शामिल हैं।
  • हांगकांग कन्वेंशन का समर्थन: नेताओं ने जहाजों के सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल पुनर्चक्रण के लिए हांगकांग कन्वेंशन के तहत सहयोग का समर्थन किया।
  • AI और डिजिटलीकरण: नेताओं ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तक समावेशी और लोकतांत्रिक पहुँच, विश्वसनीय कंप्यूटिंग बुनियादी ढाँचे और मानव-केंद्रित AI अनुप्रयोगों पर जोर दिया।
    • शिखर सम्मेलन ने समावेशी, पारदर्शी, अधिकार-आधारित और सुरक्षित AI प्रशासन ढाँचे के विकास का समर्थन किया और नई दिल्ली में भारत द्वारा AI इंपैक्ट समिट, 2026 की मेजबानी करने का स्वागत किया।
  • विज्ञान और प्रौद्योगिकी: नेताओं ने STEM अनुसंधान, स्टार्ट-अप इकोसिस्टम, नवाचार केंद्रों (इनोवेशन हब्स) और 5G व 6G प्रौद्योगिकियों की तैनाती में संयुक्त सहयोग को प्रोत्साहित किया।
    • शिखर सम्मेलन ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और नार्वेजियन स्पेस एजेंसी के बीच समझौते का स्वागत किया और भारत के वीनस ऑर्बिटर मिशन (Venus Orbiter Mission) में स्वीडिश पेलोड का समर्थन किया।
  • आर्कटिक सहयोग (Arctic Cooperation): नेताओं ने आर्कटिक और भारत-प्रशांत के बीच बढ़ते संबंधों को स्वीकार किया और ध्रुवीय अनुसंधान, जलवायु अध्ययन तथा पर्यावरण संरक्षण में सहयोग का समर्थन किया।
  • आर्कटिक परिषद में भारत की भूमिका: नॉर्डिक नेताओं ने आर्कटिक परिषद में एक पर्यवेक्षक के रूप में भारत की सकारात्मक और रचनात्मक भागीदारी की सराहना की।
  • रक्षा औद्योगिक सहयोग: नेताओं ने रक्षा सहयोग में बढ़ती गति पर प्रकाश डाला, जिसमें रक्षा विनिर्माण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और 100% FDI (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) प्रावधानों के साथ भारत के रक्षा औद्योगिक गलियारों (Defence Industrial Corridors) में निवेश के अवसर शामिल हैं।

चुनौती

  • भौगोलिक दूरी और कनेक्टिविटी की सीमाएँ: अधिक भौगोलिक दूरी और प्रत्यक्ष परिवहन कनेक्टिविटी के सीमित होने के कारण लॉजिस्टिक्स (परिवहन और आपूर्ति) की लागत बढ़ जाती है, जिससे भारत और नॉर्डिक देशों के बीच व्यापारिक तथा पारस्परिक (लोगों के बीच) संपर्क कम हो जाता है।
  • सीमित व्यापार मात्रा और आर्थिक जुड़ाव: बढ़ते सहयोग के बावजूद, भारत और नॉर्डिक देशों के बीच समग्र व्यापार तथा निवेश का स्तर अन्य बड़ी यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ भारत के जुड़ाव की तुलना में अपेक्षाकृत कम बना हुआ है।
  • नियामक और बाजार पहुँच संबंधी बाधाएँ: दोनों पक्षों के नियमों, कराधान प्रणालियों, श्रम कानूनों और गुणवत्ता मानकों में अंतर व्यवसायों और निवेशकों के लिए बाधाएँ उत्पन्न करता है।
  • भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते में धीमी प्रगति: भारत-EU FTA (मुक्त व्यापार समझौते) को अंतिम रूप देने में होने वाली देरी परोक्ष रूप से नॉर्डिक देशों के साथ भारत के आर्थिक जुड़ाव को प्रभावित करती है, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, डिजिटल व्यापार और बाजार पहुँच के क्षेत्र में।
  • जलवायु और स्थिरता मानकों पर मतभेद: नॉर्डिक देश बहुत उच्च पर्यावरणीय, श्रम और स्थिरता मानक बनाए रखते हैं, जो कुछ भारतीय उद्योगों और निर्यातकों के लिए अनुपालन (नियमों के पालन) की चुनौतियाँ उत्पन्न करते हैं।
  • सीमित सार्वजनिक और रणनीतिक जागरूकता: भारत-नॉर्डिक संबंधों को अभी भी कम सार्वजनिक मौजूदगी, सीमित शैक्षणिक जुड़ाव और आपसी अवसरों के बारे में व्यावसायिक जागरूकता की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
  • अन्य वैश्विक शक्तियों से प्रतिस्पर्द्धा: नॉर्डिक देश संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और प्रमुख यूरोपीय संघ (EU) की अर्थव्यवस्थाओं जैसी बड़ी शक्तियों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखते हैं, जिससे भारत को अधिक रणनीतिक ध्यान और निवेश प्रवाह आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्द्धा करनी पड़ती है।

तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन का महत्त्व

  • गहरे भारत-नॉर्डिक जुड़ाव की आवश्यकता: वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल, तीव्र आर्थिक परिवर्तन और तेजी से बदलते तकनीकी बदलावों के बीच, भारत और नॉर्डिक देश साझा हितों, साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और वैश्विक चुनौतियों से निपटने में सहयोग के आधार पर अपने संबंधों को गहरा करने पर सहमत हुए हैं।
  • व्यावहारिक और विश्वास-आधारित संबंध: नॉर्डिक देशों के साथ भारत का कोई ऐतिहासिक विवाद या पुराना मतभेद नहीं रहा है। उनकी यह साझेदारी लोकतंत्र, बहुपक्षवाद और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति साझा प्रतिबद्धता पर टिकी है, जो इस रिश्ते को वैचारिक के बजाय काफी सीमा तक व्यावहारिक बनाती है।
  • रणनीतिक संबंधों का संस्थागतकरण: यह शिखर सम्मेलन गहरी वैश्विक अनिश्चितता के दौर में, भारत और दुनिया के कुछ सबसे अधिक नवाचार-संचालित और तकनीकी रूप से उन्नत लोकतंत्रों के बीच साझेदारी के बढ़ते संस्थागतकरण को दर्शाता है।
  • वर्तमान में रणनीतिक विविधीकरण: वैश्विक विखंडन, आपूर्ति-शृंखला के व्यवधानों और महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के इस दौर में, भारत ऐसे सहज और व्यावहारिक गठबंधनों के माध्यम से अपने रणनीतिक विकल्पों का विस्तार कर रहा है, जो आर्थिक और तकनीकी लाभ प्रदान करने में सक्षम हैं।
  • भारतीय विदेश नीति का विकास: यह शिखर सम्मेलन भारतीय विदेश नीति के बड़े बदलाव को रेखांकित करता है, जहाँ भारत काफी हद तक केवल प्रतिक्रिया देने वाली विदेश नीति से आगे बढ़कर अब तेजी से चुनिंदा, हित-संचालित और रणनीतिक रूप से विविधीकृत नीति अपना रहा है।
  • बहु-संरेखण रणनीति का विस्तार: नॉर्डिक देशों के साथ भारत का जुड़ाव यह दर्शाता है कि उसकी बहु-संरेखण रणनीति अब केवल महाशक्तियों को संतुलित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका फोकस अब प्रौद्योगिकी, हरित विकास, नवाचार और लचीली आपूर्ति-शृंखलाओं जैसे क्षेत्रों में मुद्दा-आधारित गठबंधन बनाने पर तेजी से केंद्रित हो रहा है।
  • नॉर्डिक क्षेत्र के साथ सामूहिक जुड़ाव: सभी पाँच नॉर्डिक देशों (डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन) को एक साथ लाकर, भारत अलग-अलग द्विपक्षीय तंत्रों के बजाय पूरे नॉर्डिक उप-क्षेत्र के साथ सामूहिक रूप से जुड़ सकता है।

आर्कटिक में भारत की भागीदारी

  • आर्कटिक के साथ भारत का जुड़ाव: भारत आर्कटिक देशों के साथ कोई भी भूमि या समुद्री सीमा साझा नहीं करता है, फिर भी उसने आर्कटिक क्षेत्र के साथ एक दीर्घकालिक जुड़ाव बनाए रखा है।
  • स्वालबार्ड संधि, 1920 (Svalbard Treaty, 1920): भारत ने फरवरी 1920 में स्वालबार्ड संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के तहत, स्वालबार्ड पर नॉर्वे की संप्रभुता है, जबकि हस्ताक्षरकर्ता देशों को मछली पकड़ने, शिकार करने, खनन, व्यावसायिक गतिविधियों और संपत्ति के स्वामित्व (जिसमें खनिज अधिकार भी शामिल हैं) से जुड़े अधिकार प्राप्त होते हैं।
    • भारत के लिए लाभ: इस संधि ने भारत को आर्कटिक क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान गतिविधियों को संचालित करने में सक्षम बनाया है।
  • प्रथम भारतीय आर्कटिक अभियान (2007): वर्ष 2007 में, भारत ने आर्कटिक क्षेत्र का अध्ययन करने के लिए अपना पहला वैज्ञानिक अभियान शुरू किया था।
  • हिमाद्री अनुसंधान केंद्र की स्थापना (2008): वर्ष 2008 में, भारत ने आर्कटिक में ‘हिमाद्री’ नाम से अपने अनुसंधान केंद्र की स्थापना की।
  • IndARC वेधशाला की तैनाती (2014): वर्ष 2014 में, भारत ने कांग्सफजॉर्डन (Kongsfjorden) में लगभग 180–192 मीटर की गहराई पर अपनी वेधशाला ‘IndARC’ को तैनात किया।
    • IndARC का उद्देश्य: IndARC आर्कटिक क्षेत्र की जलवायु प्रणाली, बर्फ पिघलने के पैटर्न और भारतीय मानसून पर उनके प्रभाव का अध्ययन करता है।
  • आर्कटिक में भारत का रणनीतिक हित: वैज्ञानिक अनुसंधान से परे, भारत ने आर्कटिक क्षेत्र में अपने रणनीतिक और आर्थिक फुटप्रिंट का विस्तार करने का लगातार प्रयास किया है।
  • आर्कटिक संसाधनों का महत्त्व: आर्कटिक क्षेत्र प्राकृतिक गैस, हाइड्रोकार्बन और प्रमुख खनिजों से समृद्ध है, जो इसे भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण बनाता है।

आर्कटिक परिषद (Arctic Council)

  • आर्कटिक परिषद एक अंतर-सरकारी मंच है, जिसकी स्थापना वर्ष 1996 में आर्कटिक देशों के बीच सहयोग, समन्वय और बातचीत को बढ़ावा देने तथा वहाँ के स्वदेशी समुदायों की रक्षा करने के लिए की गई थी।
  • वर्ष 2013 में, भारत को आर्कटिक परिषद में पर्यवेक्षक का दर्जा दिया गया था, जिसने देश को आर्कटिक नीति वार्ताओं में भाग लेने की अनुमति दी।

  • महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में नॉर्डिक देशों की क्षमता: नॉर्डिक अर्थव्यवस्थाओं के पास उच्च स्तर का तकनीकी परिष्कार, राजनीतिक स्थिरता और नियामक विश्वसनीयता है। इसके साथ ही वे उन क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखते हैं, जो भारत के परिवर्तन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, जिनमें हरित प्रौद्योगिकियाँ, डिजिटलीकरण, उन्नत विनिर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल और समुद्री नवाचार शामिल हैं।
  • भारत के हरित संक्रमण (ग्रीन ट्रांजिशन) का समर्थन: भारतीय नीति निर्माता तेजी से यह स्वीकार कर रहे हैं कि हरित अर्थव्यवस्था में परिवर्तन हासिल करने के लिए विश्वसनीय पूँजी, उन्नत प्रौद्योगिकियों और मजबूत नवाचार पारिस्थितिकी प्रणालियों तक पहुँच आवश्यक है।
    • इस संदर्भ में, नॉर्डिक पेंशन फंड और प्रौद्योगिकी साझेदारियाँ अत्यधिक रणनीतिक मूल्य रखती हैं।
  • आर्कटिक सहयोग और रणनीतिक प्रासंगिकता: जैसे-जैसे आर्कटिक शिपिंग मार्गों, ऊर्जा संसाधनों और महत्त्वपूर्ण खनिजों को लेकर भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा तीव्र हो रही है, आर्कटिक परिषद में एक पर्यवेक्षक के रूप में भारत की भूमिका का महत्त्व बढ़ता जा रहा है।
    • नॉर्डिक देशों के साथ सहयोग से उभरते हुए आर्कटिक शासन ढाँचे को आकार देने में तकनीकी विशेषज्ञता और प्रभाव, दोनों मिलते हैं।
  • भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण में यूरोप और नॉर्डिक क्षेत्र: संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन की नीतियों में अनिश्चितताओं के बीच, भारत की रणनीतिक सोच में यूरोप प्रौद्योगिकी, निवेश पूँजी और नियामक प्रभाव के एक बड़े स्रोत के रूप में उभर रहा है।
    • इस ढाँचे के भीतर, भारत के विकसित भारत दृष्टिकोण को प्राप्त करने के लिए नॉर्डिक देशों को प्रमुख भागीदारों के रूप में देखा जाता है।

भारत के लिए नॉर्डिक देशों से लाभ

  • नॉर्वे – डीप-सी माइनिंग और समुद्री विशेषज्ञता: नॉर्वे के पास अपतटीय इंजीनियरिंग (ऑफशोर इंजीनियरिंग), डीप-सी माइनिंग (गहरे समुद्र में खनन), शिपिंग और महासागर संसाधन प्रबंधन में उन्नत विशेषज्ञता है। यह महत्त्वपूर्ण खनिजों की खोज और ब्लू इकोनॉमी (समुद्री अर्थव्यवस्था) में भारत की आकांक्षाओं का समर्थन कर सकता है।
  • डेनमार्क–महत्त्वपूर्ण खनिज और ग्रीन शिपिंग: डेनमार्क, ग्रीनलैंड के साथ अपने संबंधों के माध्यम से दुर्लभ खनिजों और महत्त्वपूर्ण खनिज संसाधनों तक अप्रत्यक्ष पहुँच प्रदान करता है।
    • इसके अलावा, डेनमार्क पवन ऊर्जा, ग्रीन पोर्ट्स (हरित बंदरगाहों) और टिकाऊ समुद्री प्रौद्योगिकियों में एक वैश्विक अग्रणी देश है।
  • स्वीडन – नवाचार, रक्षा और उन्नत विनिर्माण: स्वीडन AI, 5G/6G, रक्षा प्रौद्योगिकियों, स्मार्ट मोबिलिटी, ऑटोमेशन और टिकाऊ औद्योगिक प्रणालियों में अत्याधुनिक नवाचार के लिए जाना जाता है।
    • स्वीडिश कंपनियाँ भारत के डिजिटल और विनिर्माण परिवर्तन में सहयोग कर सकती हैं।
  • फिनलैंड – दूरसंचार, साइबर सुरक्षा और शिक्षा: फिनलैंड दूरसंचार, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा, क्वांटम तकनीक और डिजिटल गवर्नेंस में अग्रणी है। फिनलैंड के विश्व प्रसिद्ध शिक्षा और कौशल मॉडल भी भारत के लिए मूल्यवान सीख प्रदान करते हैं।
  • आइसलैंड – भू-तापीय और जलवायु लचीलापन संबंधी विशेषज्ञता: आइसलैंड के पास भू-तापीय ऊर्जा, ज्वालामुखीय अध्ययन और जलवायु अनुकूलन में वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त विशेषज्ञता है। भारत इस ज्ञान का उपयोग हिमालयी और विवर्तनिक रूप से सक्रिय क्षेत्रों में सतत् ऊर्जा उत्पादन के लिए कर सकता है।
  • नॉर्डिक मॉडल – सतत् विकास और शासन: नॉर्डिक देश सामूहिक रूप से कल्याणकारी शासन, लैंगिक समानता, शहरी नियोजन, सर्कुलर इकोनॉमी, स्वच्छ तकनीक और जलवायु-अनुकूल विकास में सर्वोत्तम प्रथाओं की पेशकश करते हैं, जो भारत के सतत् विकास के लक्ष्यों के अनुरूप हैं।

भारत नॉर्डिक देशों को क्या दे सकता है?

  • विशाल उपभोक्ता बाजार: भारत दुनिया के सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजारों में से एक प्रदान करता है, जो हरित प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, दूरसंचार, गतिशीलता और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में नॉर्डिक कंपनियों के लिए बड़े अवसर उत्पन्न करता है।
  • कुशल मानव संसाधन और IT क्षमता: भारत इंजीनियरों, IT पेशेवरों, स्टार्ट-अप प्रतिभाओं और अनुसंधान जनशक्ति का एक विशाल पूल प्रदान करता है, जो नॉर्डिक नवाचार पारिस्थितिकी प्रणालियों (इनोवेशन इकोसिस्टम) को सहायता प्रदान करता है और यूरोप में कौशल की कमी को पूरा करता हैं।
  • विनिर्माण और आपूर्ति शृंखला विविधीकरण: “मेक इन इंडिया” और प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी भारत की पहलें, चीन पर वैश्विक अत्यधिक निर्भरता के बीच इसे एक आकर्षक वैकल्पिक विनिर्माण और आपूर्ति-शृंखला हब बनाती हैं।
  • रणनीतिक भारत-प्रशांत भागीदार: भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक स्थिर और विश्वसनीय लोकतांत्रिक भागीदार के रूप में देखा जाता है। इसकी रणनीतिक स्वायत्तता और बढ़ती भू-राजनीतिक भूमिका इसे एशिया में विविधीकृत साझेदारियों की तलाश करने वाले नॉर्डिक देशों के लिए महत्त्वपूर्ण बनाती है।
  • हरित ऊर्जा संक्रमण के अवसर: भारत के महत्त्वाकांक्षी नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा और जलवायु पहलें, नॉर्डिक कंपनियों के लिए निवेश और प्रौद्योगिकी सहयोग के अवसर उत्पन्न करती हैं।
  • अनुसंधान, नवाचार और स्टार्टअप सहयोग: भारत का तेजी से विस्तार करता स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र, डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचा (DPI) और अनुसंधान संस्थान AI, फिनटेक, बायोटेक, सेमीकंडक्टर, हेल्थ-टेक और स्मार्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर में संयुक्त नवाचार के अवसर प्रदान करते हैं।

सहयोग के क्षेत्र: भारत-नॉर्डिक

  • द्विपक्षीय व्यापार: भारत और नॉर्डिक क्षेत्र के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग $19$ बिलियन डॉलर तक पहुँच गया है, जबकि $700$ से अधिक नॉर्डिक कंपनियाँ पहले से ही भारत में कार्य कर रही हैं।
    • वर्ष 2025 में भारत-EFTA व्यापार और आर्थिक भागीदारी समझौते (TEPA) के कार्यान्वयन ने निवेश और प्रौद्योगिकी प्रवाह के दायरे को और बढ़ा दिया है, विशेष रूप से नॉर्वे और आइसलैंड से।
  • हरित प्रौद्योगिकी और स्वच्छ ऊर्जा सहयोग: भारत और नॉर्डिक देशों ने नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर, टिकाऊ शहरी समाधानों और ऊर्जा संक्रमण पहलों पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपने संबंधों को हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी” के रूप में उन्नत किया है।
  • डिजिटल प्रौद्योगिकी, AI और 6G अनुसंधान: भारत और नॉर्डिक देश उन्नत डिजिटल बुनियादी ढाँचे में सहयोग कर रहे हैं, जिसमें AI, 5G/6G प्रौद्योगिकियाँ, साइबर सुरक्षा, दूरसंचार नवाचार और विश्वसनीय डिजिटल प्रणालियाँ शामिल हैं। इसके साथ ही संयुक्त STEM अनुसंधान और स्टार्ट-अप सहयोग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • ब्लू इकोनॉमी और समुद्री सहयोग: इस साझेदारी में टिकाऊ शिपिंग, मत्स्यपालन (फिशरीज), अपतटीय नवीकरणीय ऊर्जा, समुद्री बुनियादी ढाँचे, महासागर शासन और भारत-प्रशांत समुद्री सहयोग शामिल हैं।
  • आर्कटिक और ध्रुवीय अनुसंधान: आर्कटिक परिषद में एक पर्यवेक्षक के रूप में भारत ध्रुवीय अनुसंधान, जलवायु विज्ञान, पर्यावरणीय निगरानी और आर्कटिक शासन में नॉर्डिक देशों के साथ सहयोग का विस्तार कर रहा है।
  • रक्षा और सुरक्षा सहयोग: भारत और नॉर्डिक देश रक्षा विनिर्माण, रक्षा प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा और औद्योगिक साझेदारियों में सहयोग को गहरा कर रहे हैं, जिसमें भारत के रक्षा गलियारों और FDI ढाँचे के तहत अवसर शामिल हैं।
  • अंतरिक्ष सहयोग और नवाचार: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और नॉर्डिक अंतरिक्ष एजेंसियों के मध्य साझेदारियों के माध्यम से बाहरी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग में सहयोग का विस्तार हुआ है, जिसमें उपग्रह पेलोड, अंतरिक्ष अनुसंधान और निजी क्षेत्र का नवाचार शामिल हैं।
  • शिक्षा, अनुसंधान और गतिशीलता: भारत और नॉर्डिक देश शैक्षणिक आदान-प्रदान, STEM क्षेत्रों में संयुक्त अनुसंधान, नवाचार पारिस्थितिकी प्रणालियों, छात्र गतिशीलता और स्टार्ट-अप्स तथा इनक्यूबेटर्स के बीच सहयोग को बढ़ावा दे रहे हैं।

नॉर्डिक देश बनाम स्कैंडिनेवियाई देश

आधार  नॉर्डिक देश स्कैंडिनेवियाई देश
अर्थ  उत्तरी यूरोपीय देशों का व्यापक क्षेत्रीय समूह संकीर्ण सांस्कृतिक-भौगोलिक समूह
शामिल देश  डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे, स्वीडन डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन
भाषा समूह  इसमें नॉर्थ जर्मेनिक और फिनो-उग्रिक भाषाएँ शामिल हैं। मुख्य रूप से नॉर्थ जर्मेनिक (स्कैंडिनेवियाई) भाषाएँ
भौगोलिक क्षेत्र उत्तरी अटलांटिक द्वीपों सहित पूरे नॉर्डिक क्षेत्र को कवर करता है। मुख्य रूप से स्कैंडिनेवियाई प्रायद्वीप और डेनमार्क।
राजनीतिक सहयोग  नॉर्डिक परिषद (Nordic Council) के माध्यम से सहयोग करते हैं। कोई विशेष स्कैंडिनेवियाई राजनीतिक संस्था नहीं है।
संबद्ध क्षेत्र  इसमें ग्रीनलैंड, फरो द्वीपसमूह और ओलैंड द्वीपसमूह शामिल हैं। आमतौर पर इसमें ये क्षेत्र शामिल नहीं होते हैं।
उपयोग  राजनीतिक, आर्थिक और क्षेत्रीय सहयोग के संदर्भों में उपयोग किया जाता है। मुख्य रूप से सांस्कृतिक, भाषायी और ऐतिहासिक संदर्भों में उपयोग किया जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ  मजबूत कल्याणकारी राज्य और उच्च जीवन स्तर; उन्नत हरित तकनीक और स्थिरता प्रथाएँ; नवाचार और डिजिटल विकास के उच्च स्तर; मजबूत लोकतांत्रिक शासन और लैंगिक समानता। मुख्य रूप से साझा स्कैंडिनेवियाई सांस्कृतिक और भाषायी विरासत के लिए जाने जाते हैं।

निष्कर्ष

भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन उन गहरी प्राथमिकताओं (आर्थिक कूटनीति, तकनीकी आत्मनिर्भरता, साझेदारियों का विविधीकरण और उभरते रणनीतिक क्षेत्रों के साथ जुड़ाव) को उजागर करता है, जो भारतीय विदेश नीति को आकार दे रही हैं।

  • यह इस बात का संकेत है कि समकालीन कूटनीति अब केवल संकटों के प्रबंधन या शक्ति संतुलन तक ही सीमित नहीं है; बल्कि यह प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और आपूर्ति शृंखलाओं में लचीलापन लाने के बारे में भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है।

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