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गरिमा का अधिकार बनाम पुलिस अतिक्रमण

Lokesh Pal June 16, 2026 02:09 5 0

संदर्भ

हाल ही में, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने राज्य पुलिस की कड़ी आलोचना की, क्योंकि उसने गिरफ्तार संदिग्धों को रस्सियों से बाँधकर सार्वजनिक रूप से घुमाया।

  • न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि यद्यपि पुलिस के पास किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का वैधानिक अधिकार है, परंतु उसे सार्वजनिक प्रदर्शन या राज्य-प्रायोजित मानहानि (State-Sponsored Defamation) के लिए प्रस्तुत करने का कोई अधिकार नहीं है।

निर्णय के प्रमुख बिंदु

  • सार्वजनिक अपमान संबंधी फटकार: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पुलिस के पास अपराध की जाँच हेतु गिरफ्तारी करने का अधिकार है, परंतु किसी अभियुक्त को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने का कोई अधिकार नहीं है।
  • वीडियो प्रसारण की निंदा: न्यायालय ने सोशल मीडिया पर प्रसारित उन वीडियो पर कड़ी आपत्ति जताई, जिनमें संदिग्धों को कमर में रस्सी बाँधकर सड़कों पर घुमाया जा रहा था और इसे नागरिकों की गरिमा का दृश्य हनन बताया।
  • जवाबदेही की माँग: एक अवकाश पीठ ने राज्य पुलिस को तीन सप्ताह के भीतर औपचारिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया, जिससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों को अपने कृत्यों का कानूनी औचित्य स्पष्ट करना पड़े।

अवकाश पीठ (Vacation Bench)

  • परिभाषा: अवकाश पीठ वह विशेष न्यायिक पीठ है, जो न्यायालयों के अवकाश काल में तत्काल मामलों की सुनवाई के लिए कार्य करती है।
  • संरचना: इसका गठन मुख्य न्यायाधीश द्वारा किया जाता है तथा इसमें सामान्यतः सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के सीमित संख्या में न्यायाधीश शामिल होते हैं।
  • मामलों का स्वरूप: यह मुख्यतः आपातकालीन मामलों—जैसे जमानत याचिका, स्थगन आदेश, हेबियस कॉर्पस याचिकाएँ तथा मौलिक अधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई करती है।
  • सामान्य मामलों पर प्रतिबंध: सामान्य या गैर-आपात मामलों की सुनवाई प्रायः नहीं की जाती, जब तक कि विलंब से अपूरणीय क्षति या गंभीर अन्याय की संभावना न हो।
  • महत्त्व: यह व्यवस्था न्यायिक प्रणाली की निरंतरता सुनिश्चित करती है तथा न्यायालय अवकाश के दौरान भी समयबद्ध न्याय के सिद्धांत को बनाए रखती है।

संवैधानिक एवं विधिक प्रावधान

  • सार्वजनिक परेड हेतु कोई लिखित नियम नहीं: भारत में ऐसा कोई संहिताबद्ध कानून नहीं है, जो पुलिस को संदिग्धों को सार्वजनिक रूप से घुमाने या मीडिया के सामने प्रदर्शित करने की अनुमति देता हो।
  • संयम का सिद्धांत: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 43(3) हथकड़ी के उपयोग के नियम निर्धारित करती है। यह प्रावधान कहता है कि अधिकारी अपराध की गंभीरता के आधार पर हथकड़ी का उपयोग “कर सकता है”, जैसे कारणों के संदर्भ में कर सकते हैं, परंतु इसे केवल विशेष रूप से गंभीर अपराधों-जैसे आतंकवाद, हत्या, बलात्कार या बार-बार अपराध करने की स्थिति तक सीमित रखा गया है।
  • विकल्प, न कि नियमित प्रक्रिया: चूँकि कानून में “कर सकता है” शब्द का प्रयोग हुआ है, न कि “करना ही होगा”, इसलिए नियमित रूप से हथकड़ी लगाना अवैध है। पुलिस अधिकारियों को यह लिखित रूप में दर्ज करना अनिवार्य है कि उन्हें क्यों लगता है कि अभियुक्त फरार हो सकता है या हिंसक हो सकता है।
  • पुलिस मैनुअल केवल दिशा-निर्देश हैं: कैदियों की न्यायालय में उपस्थिति अधिनियम, 1955 तथा स्थानीय पुलिस संहिताएँ कैदियों की सुरक्षा हेतु नियम प्रदान करती हैं। हालाँकि, ये केवल आंतरिक प्रशासनिक दिशा-निर्देश हैं और पुलिस को मौलिक अधिकारों की अनदेखी करने की पूर्ण शक्ति प्रदान नहीं करते हैं।

पूर्व न्यायालयीय निर्णयों की समय-रेखा

वर्ष न्यायालयीय मामला न्यायालय का निर्णय
1980 प्रेम शंकर शुक्ला बनाम दिल्ली प्रशासन स्वतंत्रता ही नियम है: सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि नियमित रूप से हथकड़ी लगाना क्रूर और मनमाना है, जो अनुच्छेद-14 और 21 का उल्लंघन करता है। बंधन अंतिम उपाय होना चाहिए और इसके कारणों को न्यायाधीश के समक्ष लिखित रूप में प्रस्तुत करना आवश्यक है।
1995 सिटिजन्स फॉर डेमोक्रेसी बनाम असम राज्य पूर्ण प्रतिबंध: सर्वोच्च न्यायालय ने भारत में किसी भी कैदी को परिवहन के दौरान या जेल के भीतर हथकड़ी या जंजीरों में बांधने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया। इस नियम का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों पर न्यायालय की अवमानना का मामला संचालित हो सकता है।
2026 इस्लाम खान बनाम राजस्थान राज्य (जनवरी) सोशल मीडिया पर अपमान नहीं: पुलिस को संदिग्धों को पुलिस थाने के बाहर बैठाकर अपमानजनक फोटो लेने और साझा करने के लिए मजबूर करने पर प्रतिबंध लगाया गया। न्यायालय ने इसे अनुच्छेद-21 के तहत अवैध बताया।
2026 संग्राम सिंह राजूट बनाम मध्य प्रदेश राज्य (अप्रैल) उद्देश्य परीक्षण: एक मामले में संदिग्ध को पैदल अदालत ले जाने की जाँच की गई। न्यायालय ने कहा कि पैदल चलना स्वयं में उल्लंघन नहीं है, लेकिन यदि पुलिस ने जानबूझकर अपमानित करने के उद्देश्य से ऐसा किया, तो यह अनुच्छेद-21 के तहत अवैध होगा।
2026 वर्तमान मामला (कलकत्ता उच्च न्यायालय आदेश) (जून) गिरफ्तारी बनाम अपमान: न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि जाँच की शक्ति पुलिस को लोगों को अपमानित करने का अधिकार नहीं देती। न्यायालय ने रस्सियों के उपयोग के कारणों को स्पष्ट करते हुए औपचारिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

महत्त्वपूर्ण आयाम एवं विश्लेषणात्मक अंतर्दृष्टि

  • निर्दोषता की धारणा एवं अनुच्छेद-14: अनुच्छेद-14 एवं 21 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक कि उसका दोष सिद्ध न हो जाए।
    • यह सिद्धांत केवल न्यायालय तक सीमित नहीं है, बल्कि मुकदमे से पूर्व पुलिस के व्यवहार पर भी समान रूप से लागू होता है।
    • सार्वजनिक परेड न्यायिक निर्णय से पूर्व ही दंड का स्वरूप ले लेती है — यह ‘निर्दोषता की धारणा’ के मौलिक सिद्धांत का सुस्पष्ट उल्लंघन है।
  • निजता का अधिकार एवं मानहानि से संरक्षण: किसी संदिग्ध को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना या उसकी तस्वीरें लीक करना, अनुच्छेद-21 के अंतर्गत निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है, जिसे पुट्टास्वामी वाद, 2017 में स्थापित किया गया।
    • यह अनुच्छेद 19 के अंतर्गत उपलब्ध मानहानि से संरक्षण के भी विरुद्ध है।
    • गिरफ्तारी के दृश्यों का सार्वजनिक प्रदर्शन किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को ऐसी स्थायी क्षति पहुँचाता है, जिसे न्यायालय द्वारा निर्दोष घोषित किए जाने के पश्चात् भी पूर्णतः पुनर्स्थापित नहीं किया जा सकता  है।
  • डिजिटल उपेक्षा का स्थायी प्रभाव: पूर्व में सार्वजनिक अपमान केवल एक अस्थायी घटना होती थी, जिसे सीमित लोग ही देखते थे।
    • वर्तमान में, सोशल मीडिया पर साझा की गई तस्वीरें एवं वीडियो एक स्थायी डिजिटल सामग्री बना देते हैं।
    • यह डिजिटल सामग्री लंबे समय तक इंटरनेट पर बनी रहती है, जिससे व्यक्ति को सामाजिक बहिष्कार एवं मानसिक क्षति का सामना करना पड़ता है, भले ही न्यायिक प्रक्रिया समाप्त हो चुकी हो।

अंतरराष्ट्रीय एवं वैश्विक ढाँचे

  • यू.एन. नेल्सन मंडेला नियम (UN Nelson Mandela Rules): नियम 47 के अनुसार, कैदियों पर जंजीर, बेड़ियाँ या अपमानजनक बंधन का उपयोग पूर्णतः प्रतिबंधित है। यदि किसी स्थिति में बंधन आवश्यक हो, तो कैदी के न्यायिक निकाय के समक्ष प्रस्तुत होने पर इन्हें तुरंत हटा दिया जाना चाहिए।
  • यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय (ECHR): यह न्यायालय नियमित रूप से यह निर्णय देता है कि संदिग्धों को लोहे के पिंजरों या भारी जंजीरों में सार्वजनिक रूप से दिखाना अपमानजनक व्यवहार पर प्रतिबंध (अनुच्छेद-3) का उल्लंघन है, क्योंकि इससे उनकी गरिमा नष्ट होती है तथा जनता में उनके प्रति पूर्वाग्रह उत्पन्न होता है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका एवं यूनाइटेड किंगडम के मानक: इन देशों में संदिग्धों को सार्वजनिक दृष्टि से दूर बंद वाहनों (Closed Vehicles) में ले जाया जाता है। न्यायालय कक्ष के भीतर सामान्यतः हथकड़ियाँ हटा दी जाती हैं, ताकि जूरी (Jury) अभियुक्त के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त न हो। साथ ही, मीडिया पर भी गिरफ्तारी की तस्वीरें लेने पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाते हैं।

आगे की राह

  • BNSS में संशोधन: संसद को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष प्रावधान जोड़ना चाहिए, जिसमें संदिग्धों की सार्वजनिक परेड एवं अनधिकृत फोटोग्राफी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए, ताकि किसी प्रकार की विधिक अस्पष्टता समाप्त हो।
  • आंतरिक अनुशासन: राज्य सरकारों को स्थानीय पुलिस मैनुअल में संशोधन कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अनधिकृत मीडिया लीक एवं सार्वजनिक परेड को गंभीर दुराचार माना जाए तथा इसके लिए पर्यवेक्षक अधिकारियों को सीधे उत्तरदायी ठहराया जाए।
  • न्यायिक निगरानी: अधीनस्थ न्यायालयों के मजिस्ट्रेटों को यह जाँचना चाहिए कि संदिग्ध के साथ हिरासत से न्यायालय तक लाते समय कैसा व्यवहार किया गया। यदि पुलिस द्वारा अनधिकृत बंधनों का उपयोग या सार्वजनिक परेड की गई हो, तो न्यायाधीश को तुरंत संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध न्यायिक अवमानना की कार्यवाही प्रारंभ करनी चाहिए।

निष्कर्ष 

यह विषय राज्य की कानून-व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति तथा व्यक्ति के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के मध्य संतुलन को रेखांकित करता है। न्यायालयों ने स्पष्ट कर दिया है कि यद्यपि पुलिस को जाँच के दौरान किसी संदिग्ध की भौतिक स्वतंत्रता को सीमित करने का अधिकार है, परंतु उसे उसकी मानव गरिमा को छीनने का कोई अधिकार नहीं है

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