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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal June 16, 2026 02:22 5 0

सामुदायिक बीज बैंक के लिए भारतीय मानक 

भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच स्वदेशी फसल किस्मों के संरक्षण को सुदृढ़ करने हेतु सामुदायिक बीज बैंकों के मानकीकरण के लिए IS 20201:2026 जारी किया है।

IS 20201:2026–सामुदायिक बीज बैंक प्रबंधन आवश्यकताओं के बारे में

  • IS 20201:2026 भारत का पहला मानकीकृत ढाँचा है, जो पूरे देश में सामुदायिक बीज बैंकों (Community Seed Banks – CSBs) की स्थापना और प्रबंधन के लिए विकसित किया गया है।
  • विकसितकर्ता: यह मानक भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा उपभोक्ता मामले विभाग के अंतर्गत पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी विभाग के माध्यम से विकसित किया गया है।
  • तकनीकी सहयोग: इसका मसौदा ICAR–नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (NBPGR) के नेतृत्व में तैयार किया गया, जिसमें जैव विविधता एवं किसान अधिकार संस्थानों का सहयोग रहा।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • मानकीकृत बीज बैंक संचालन: बीजों के संग्रह, अधिग्रहण, प्रसंस्करण, भंडारण, दस्तावेजीकरण और आदान-प्रदान के लिए समान प्रक्रियाएँ निर्धारित करता है।
    • गुणवत्ता आश्वासन एवं व्यवहार्यता परीक्षण: यह बीजों की अंकुरण क्षमता के आकलन, गुणवत्ता नियंत्रण, पुनर्जनन प्रक्रियाओं तथा जोखिम प्रबंधन के लिए मानक प्रोटोकॉल स्थापित करता है, जिससे बीजों की गुणवत्ता एवं आनुवंशिक शुद्धता बनी रहती है।
    • सामुदायिक-आधारित विकेंद्रीकृत मॉडल: स्थानीय स्तर पर प्रबंधित बीज भंडारों को बढ़ावा देता है, जिससे किसान जलवायु-लचीली पारंपरिक किस्मों का संरक्षण और आदान-प्रदान कर सकें।
    • स्वैच्छिक प्रमाणन योग्य मानक: यह एक स्वैच्छिक प्रबंधन-प्रणाली मानक है, जिसे सामुदायिक बीज बैंक और कृषि संगठन अपनाकर प्रमाणित करा सकते हैं।

भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के बारे में (UPSC CSE Pre 2026)

  • भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) भारत का राष्ट्रीय मानक निकाय है, जो वस्तुओं और सेवाओं के मानकीकरण, गुणवत्ता प्रमाणन तथा अनुरूपता मूल्यांकन के लिए उत्तरदायी है।
  • नोडल मंत्रालय: यह उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है।
  • सांविधिक स्थिति: यह भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 2016 के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है, जिसने भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 1986 का स्थान लिया।
  • मुख्य कार्य
    • मानक निर्धारण: BIS उत्पादों की गुणवत्ता, सुरक्षा, विश्वसनीयता और पर्यावरणीय संधारणीयता सुनिश्चित करने हेतु भारतीय मानकों का निर्माण करता है।
      • उदाहरण: BIS ने सुरक्षा बलों के बीच अंतर-संचालन सुधार हेतु बम निष्क्रियकरण प्रणालियों के परीक्षण के लिए पहला राष्ट्रीय मानक IS 19445:2025 जारी किया।
    • उत्पाद प्रमाणन: यह BIS मानक चिह्न (Standard Mark) प्रमाणन योजना संचालित करता है, जो सामान्यतः स्वैच्छिक होती है, परंतु गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCOs) के माध्यम से अनिवार्य की जा सकती है।
    • हॉलमार्किंग प्राधिकरण: BIS सोना एवं चाँदी जैसे कीमती धातुओं के हॉलमार्किंग लाइसेंस जारी करने वाली एकमात्र अधिकृत संस्था है।
    • उपभोक्ता संरक्षण: यह सुनिश्चित करता है कि बाजार में उपलब्ध उत्पाद निर्धारित गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों का पालन करें, जिससे उपभोक्ता हितों की रक्षा होती है।

भारत में प्रयुक्त महत्त्वपूर्ण प्रमाणन चिह्न

  • ISI चिह्न: यह भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा जारी किया जाता है। यह प्रमाणित करता है कि औद्योगिक एवं उपभोक्ता उत्पाद निर्धारित भारतीय गुणवत्ता एवं सुरक्षा मानकों के अनुरूप हैं।
  • BIS हॉलमार्क: यह सोना, चाँदी एवं अन्य कीमती धातुओं की शुद्धता और महीनता (Purity and fineness) को प्रमाणित करता है। इसे BIS द्वारा जारी किया जाता है।
  • इको मार्क: BIS द्वारा जारी यह चिह्न उन उत्पादों को दर्शाता है, जो पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और जिनका पारिस्थितिकी प्रभाव न्यूनतम होता है।
  • एगमार्क (कृषि विपणन चिह्न): यह कृषि एवं संबद्ध उत्पादों की गुणवत्ता और ग्रेडिंग को सरकारी मानकों के अनुसार प्रमाणित करता है।
  • FPO मार्क: यह दर्शाता है कि प्रसंस्कृत फल उत्पाद निर्धारित गुणवत्ता एवं सुरक्षा मानकों के अनुरूप हैं।
  • FSSAI लोगो: यह खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता मानकों के अनुपालन को दर्शाता है, जिसे भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा निर्धारित किया जाता है।
  • इंडिया ऑर्गेनिक: यह प्रमाणित करता है कि कृषि उत्पाद राष्ट्रीय जैविक उत्पादन मानकों और जैविक खेती पद्धतियों के अनुरूप हैं।

बीज बैंक के लिए भारतीय मानक (IS) का महत्त्व

  • यह पहल पौध किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार अधिनियम, 2001 तथा जैव विविधता अधिनियम, 2002 के उद्देश्यों को सुदृढ़ करती है।
  • यह सतत् विकास लक्ष्य (SDG) 2–जीरो हंगर (Zero Hunger) की प्राप्ति में भी योगदान देती है, क्योंकि यह खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत करती है।
  • इसके माध्यम से पारंपरिक एवं स्वदेशी फसल किस्मों का संरक्षण सुनिश्चित होता है, जिससे कृषि जैव विविधता बनी रहती है।
  • यह किसानों की बीज स्वायत्तता को बढ़ावा देता है और बाहरी बीजों पर निर्भरता कम करता है।
  • जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के संदर्भ में यह जलवायु-लचीली कृषि प्रणालियों को समर्थन प्रदान करता है।

दूरसंचार (टेलीविजन, रेडियो एवं संबद्ध सेवाएँ) नियम, 2026 

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने दूरसंचार (टेलीविजन, रेडियो एवं संबद्ध सेवाएँ) नियम, 2026 का मसौदा सार्वजनिक परामर्श हेतु जारी किया है।

प्रारूप दूरसंचार (टेलीविजन, रेडियो एवं संबद्ध सेवाएँ) नियम, 2026

  • ये प्रारूप नियम दूरसंचार अधिनियम, 2023 के अंतर्गत टेलीविजन, रेडियो एवं संबद्ध प्रसारण सेवाओं के लिए एक एकीकृत नियामक ढाँचा स्थापित करने का लक्ष्य रखते हैं।
  • यह अधिनियम भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 जैसे औपनिवेशिक कानूनों का स्थान लेता है।
  • नोडल मंत्रालय: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय टेलीविजन, रेडियो एवं संबद्ध सेवाओं से संबंधित प्रावधानों का प्रशासन करता है।
  • मुख्य प्रावधान
    • एकीकृत नियामक ढाँचा: विभिन्न प्रसारण दिशा-निर्देशों को समेकित कर एक सरल एवं एकीकृत नियमावली तैयार की गई है, जिससे अनुपालन आसान हो सके।
    • प्रसारण सेवाओं का दायरा: इसमें उपग्रह टीवी अपलिंकिंग एवं डाउनलिंकिंग, डायरेक्ट-टू-होम (DTH), हेडएंड-इन-द-स्काई (HITS), निजी FM रेडियो, सामुदायिक रेडियो तथा IPTV सेवाएँ शामिल हैं।
    • डिजिटल अनुमोदन प्रक्रिया: पूर्णतः डिजिटल एवं सुव्यवस्थित अनुमति प्रणाली का प्रस्ताव किया गया है, जिससे पारदर्शिता एवं दक्षता बढ़े।
    • सरलीकृत अनुपालन: ग्रांट ऑफ परमिशन एग्रीमेंट (GOPA) की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है, जिससे प्रक्रियागत बोझ कम होगा।
    • पारदर्शी न्यायनिर्णयन तंत्र: नियामकीय विवादों के निष्पक्ष एवं पारदर्शी समाधान हेतु एक संरचित न्यायनिर्णयन ढाँचा प्रस्तावित किया गया है।

महत्त्व

  • ईज ऑफ डूइंग बिजनेस: एकल नियामक ढाँचे के कारण अनुपालन की जटिलता कम होती है तथा प्रसारकों के लिए नियामकीय स्पष्टता बढ़ती है।
  • नीतियों का समन्वय: यह नियम विभिन्न दिशा-निर्देशों को सुव्यवस्थित कर सभी प्रसारण प्लेटफॉर्म्स पर एकसमान मानक स्थापित करते हैं।
  • मौजूदा अनुमतियों की निरंतरता: वर्तमान लाइसेंस एवं अनुमतियाँ यथावत जारी रहेंगी, साथ ही उन्हें नए नियामकीय ढाँचे के अनुरूप समायोजित किया जाएगा।
  • डिजिटल गवर्नेंस को बढ़ावा: डिजिटल प्रक्रियाओं और सरलीकृत अनुमोदन प्रणाली से प्रसारण क्षेत्र में पारदर्शिता, दक्षता एवं जवाबदेही में वृद्धि होगी।
  • परामर्श प्रक्रिया: इस प्रारूप नियमावली को सार्वजनिक परामर्श हेतु जारी किया गया है तथा हितधारकों से सुझाव आमंत्रित किए गए हैं।

वैश्विक सामाजिक न्याय गठबंधन (GCSJ)

हाल ही में श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री ने स्विट्जरलैंड के जिनेवा में आयोजित 114वें अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (ILC) के दौरान वैश्विक सामाजिक न्याय गठबंधन (GCSJ) की समन्वय समूह बैठक में भाग लिया।

संबंधित तथ्य

  • अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने राइड-हेलिंग और फूड डिलीवरी जैसे क्षेत्रों में कार्यरत गिग वर्कर्स के लिए पहली बार बाध्यकारी रोजगार मानकों (Binding Employment Standards) को अपनाने पर सहमति व्यक्त की है। इससे उन्हें वेतन, सुरक्षा और सामाजिक लाभों से संबंधित अधिकार मिल सकते हैं।

वैश्विक सामाजिक न्याय गठबंधन (GCSJ) के बारे में

  • यह एक ILO-नेतृत्व वाली पहल है, जो सरकारों, नागरिक समाज, व्यवसायों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को एक साथ लाकर वैश्विक स्तर पर सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने के लिए कार्य करती है।
  • स्थापना: इसे नवंबर 2023 में लॉन्च किया गया था।
  • मिशन: बहु-हितधारक सहयोग को बढ़ावा देना, नीतिगत समन्वय, तकनीकी सहयोग, ज्ञान आदान-प्रदान और क्षमता निर्माण के माध्यम से सामाजिक न्याय एवं सतत् विकास में तेजी लाना।
  • मुख्य फोकस क्षेत्र
    • समावेशी विकास: न्यायसंगत आर्थिक विकास को बढ़ावा देना।
    • सामाजिक सुरक्षा: कल्याण एवं सुरक्षा-नेट प्रणालियों को मजबूत करना।
    • श्रम अधिकार: गरिमामय कार्य और श्रमिक अधिकारों को आगे बढ़ाना।
    • उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवसाय: सतत् एवं नैतिक व्यावसायिक प्रथाओं को प्रोत्साहित करना।
    • लचीला श्रम बाजार: आर्थिक और तकनीकी परिवर्तनों के अनुरूप अनुकूलन को समर्थन देना।
    • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: श्रम एवं सामाजिक चुनौतियों पर सामूहिक कार्रवाई को बढ़ावा देना।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के बारे में

  • अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) संयुक्त राष्ट्र की एक विशेषीकृत एजेंसी है, जो विश्वभर में सामाजिक न्याय, श्रम अधिकारों और गरिमामय कार्य को बढ़ावा देने के लिए कार्य करती है।
  • स्थापना: इसे वर्ष 1919 में वर्साय की संधि के तहत स्थापित किया गया था।
  • अधिदेश: सामाजिक न्याय, श्रम अधिकार, गरिमामय कार्य और सामाजिक सुरक्षा को बढ़ावा देना।
  • मुख्यालय: जिनेवा, स्विट्जरलैंड।
  • त्रिपक्षीय शासन व्यवस्था: यह संयुक्त राष्ट्र की एकमात्र एजेंसी है जिसमें सरकारों, नियोक्ताओं और श्रमिकों की संयुक्त भागीदारी नीति-निर्माण एवं निर्णय-प्रक्रिया में होती है।

मोहनजोदड़ो की नर्तकी मूर्ति

हाल ही में एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 9 की नई कला एवं संस्कृति  पाठ्यपुस्तक में मोहनजोदड़ो की प्रतिष्ठित “नर्तकी” (Dancing Girl) मूर्ति के संशोधित चित्रण ने ध्यान आकर्षित किया है।

मोहनजोदड़ो की ‘नर्तकी’ मूर्ति के बारे में  – UPSC CSE Pre 2025

  • ‘नृत्य करती लड़की’ (Dancing Girl) सिंधु घाटी सभ्यता  की एक प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा है, जिसे लगभग 2500 ईसा पूर्व का माना जाता है और इसे हड़प्पा कला की एक उत्कृष्ट कृति माना जाता है।
  • खोज: इसकी खोज वर्ष 1926 में पुरातत्वविद् अर्नेस्ट मैके (Ernest Mackay) द्वारा मोहनजोदड़ो के HR क्षेत्र (हर्ग्रीव्स क्षेत्र) से की गई थी।
    • HR क्षेत्र का नाम ब्रिटिश पुरातत्वविद् हेरोल्ड हरग्रीव्स के नाम पर रखा गया था, जो इसके प्रारंभिक उत्खनन से जुड़े थे। यह क्षेत्र मोहनजोदड़ो के निचले शहर में स्थित एक प्रमुख आवासीय एवं वाणिज्यिक भाग है।
  • वर्तमान स्थान: वर्ष 1947 के भारत विभाजन के बाद यह कलाकृति भारत को आवंटित की गई। वर्तमान में यह राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में संरक्षित है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • सामग्री एवं तकनीक: यह ताम्र-कांस्य मिश्रण  (Copper-alloy Bronze) से बनी है। इसे लॉस्ट-वैक्स (Cire perdue) विधि से निर्मित किया गया है, जो हड़प्पा सभ्यता की उन्नत धातु तकनीक को दर्शाती है।
    • विशिष्ट मुद्रा: मूर्ति में एक आत्मविश्वासपूर्ण खड़ी युवती को दर्शाया गया है, जिसका एक हाथ कमर पर रखा हुआ है, जो गतिशीलता और आत्म-आश्वासन को प्रकट करता है।
    • कलात्मक शैली: यह केवल 10.5 सेमी ऊँची है। इसमें लंबी भुजाएँ, प्राकृतिक मुद्रा, उभरे हुए चेहरे के लक्षण और जूड़े में बँधे बाल दिखाए गए हैं, जो उच्च स्तरीय कलात्मक कौशल को दर्शाते हैं।
    • आभूषण एवं सजावट: यद्यपि मूर्ति नग्न अवस्था में है, फिर भी इसे चूड़ियों और एक पेंडेंट युक्त हार से सुसज्जित दिखाया गया है।
      • यह हड़प्पा समाज में आभूषणों के महत्त्व को दर्शाता है।

लखपति दीदी हेतु पहलें 

सरकार ने दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के अंतर्गत महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों को सशक्त बनाने हेतु लखपति दीदी (Lakhpati Didi) से संबंधित पहल की घोषणा की है।

लखपति दीदी हेतु पहल

  • इस पहल का उद्देश्य महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण को मजबूत करना है तथा सतत् आजीविका अवसरों के माध्यम से 6 करोड़ लखपति दीदियों का लक्ष्य प्राप्त करना है।
    • लखपति दीदी वह स्वयं सहायता समूह (Self-Help Group – SHG) सदस्य है, जो सतत् आजीविका गतिविधियों के माध्यम से कम-से-कम ₹1 लाख वार्षिक आय अर्जित करती है।
  • लखपति दीदी योजना वर्ष 2023 में शुरू की गई थी।
  • उद्देश्य: ग्रामीण महिलाओं में आय सृजन, उद्यमिता एवं वित्तीय स्वतंत्रता को बढ़ावा देना।
  • कार्यान्वयन: यह पहल दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के अंतर्गत लागू की जा रही है, जो SHGs, वित्तीय समावेशन एवं ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देता है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • शी मार्ट (सेल्फ हेल्प एंटरप्रेन्योर्स–मार्केटिंग एवेन्यूज फॉर रूरल ट्रांसफॉर्मेशन – SHE MARTS): लगभग 700 शी मार्ट उच्च संभावनाओं वाले वाणिज्यिक स्थानों पर स्थापित किए जाएँगे, जिससे महिला SHGs द्वारा निर्मित उत्पादों के लिए समर्पित बाजार उपलब्ध होगा।
    • जिला पूर्ति केंद्र: लगभग 1,000 केंद्र ग्रामीण उद्यमों के लिए भंडारण, लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग और वितरण नेटवर्क को सुदृढ़ करेंगे।
    • उत्कृष्टता केंद्र: ब्रांडिंग, नवाचार, उत्पाद विकास और क्षमता निर्माण के लिए विशेष केंद्र स्थापित किए जाएँगे।
    • डिजिटल बाजार एकीकरण: उन्नत ई-सरस (e-SARAS)  प्लेटफॉर्म एक मल्टी-वेंडर, ओम्नी-चैनल मार्केटप्लेस के रूप में कार्य करेगा, जिससे SHG उत्पादों की राष्ट्रीय स्तर पर पहुँच बढ़ेगी।
    • एकीकृत राष्ट्रीय ब्रांडिंग: ‘सरस आजीविका’ (Saras Aajeevika) ब्रांड SHG उत्पादों की एक साझा राष्ट्रीय पहचान विकसित करेगा, जिससे दृश्यता और उपभोक्ता पहचान बढ़ेगी।

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