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अब्राहम समझौता

Lokesh Pal May 30, 2026 02:33 9 0

संदर्भ

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रमुख मुस्लिम-बहुल देशों (सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, मिस्र, तुर्किए और जॉर्डन) से आग्रह किया कि वे ईरान के साथ चल रहे युद्ध को समाप्त करने के लिए प्रस्तावित शांति समझौते को अंतिम रूप देने से पहले सामूहिक रूप से अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करें।

  • उन्होंने इजरायल के साथ संबंधों के सामान्यीकरण को पश्चिम एशिया में स्थायी शांति और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए इसे आवश्यक बताया।

अब्राहम समझौते के बारे में

  • अब्राहम समझौते अमेरिका की मध्यस्थता में संपन्न कूटनीतिक समझौतों की एक शृंखला हैं, जिनकी शुरुआत वर्ष 2020 में डोनाल्ड ट्रंप के प्रथम राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान हुई थी।
    • इनका उद्देश्य इजरायल और अरब/मुस्लिम-बहुल देशों के मध्य राजनयिक, आर्थिक तथा सुरक्षा संबंधों का सामान्यीकरण करना है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: इन समझौतों से पूर्व, अरब देशों ने वर्ष 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद से उसे औपचारिक राजनयिक मान्यता देने से निषेध किया था। वे किसी भी प्रकार के सामान्यीकरण को फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना के मुद्दे के समाधान से जोड़ते थे।
  • आधार: इन समझौतों का नाम बाइबिल के पैगंबर इब्राहिम के नाम पर रखा गया है, ताकि यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्मों के मध्य साझा धार्मिक विरासत तथा पूर्वज संबंध को रेखांकित किया जा सके।
  • मुख्य तंत्र: यह ढाँचा द्वि-राष्ट्र समाधान के विवादास्पद मुद्दे को सीधे संबोधित करने के बजाय द्विपक्षीय व्यापार, रक्षा सहयोग, प्रौद्योगिकी आदान-प्रदान, निवेश और हवाई मार्गों तथा पर्यटन को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।

वर्तमान सदस्यता आधार

  • मूल हस्ताक्षरकर्ता (2020): संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन।
  • बाद में शामिल होने वाले देश/क्षेत्र: मोरक्को तथा बाद के विस्तारों में कजाखस्तान और सोमालीलैंड शामिल हैं।

ट्रंप ईरान समझौते को अब्राहम समझौतों से क्यों जोड़ रहे हैं? 

  • एक सफल समझौताकार की छवि स्थापित करना: गाजा और यूक्रेन के लंबे समय से चल रहे संघर्षों को शीघ्र समाप्त करने के प्रयासों में अपेक्षित सफलता न मिलने तथा घरेलू आलोचनाओं के बाद, प्रशासन पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष पर अपना नियंत्रण एवं कूटनीतिक प्रभाव प्रदर्शित करना चाहता है।
  • घरेलू राजनीतिक चुनौतियों से निपटना: ईरान के विरुद्ध सैन्य अभियान के प्रबंधन को लेकर जन असंतोष बढ़ा है। मई 2026 में दर्ज 62% अस्वीकृति दर  ने प्रशासन पर राजनीतिक दबाव बढ़ा दिया है।
  • आर्थिक दबाव और मुद्रास्फीति की आशंकाएँ: होर्मुज जलडमरूमध्य में परिचालन बाधाओं के कारण, जहाँ से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20% गुजरता है, आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी है।
    • इसके परिणामस्वरूप गैलप आर्थिक विश्वास सूचकांक घटकर -45 तक पहुँच गया है, जिससे आगामी नवंबर के मध्यावधि चुनावों से पहले ट्रंप से संबंधित रिपब्लिकन पार्टी समर्थन प्रभावित होने की आशंका है।
  • इजरायल की सहमति प्राप्त करना: प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को अरब देशों की व्यापक मान्यता और समर्थन का आश्वासन देकर, ट्रंप इजरायल पर ईरान के साथ प्रस्तावित 60-दिवसीय अस्थायी युद्धविराम की शर्तों को स्वीकार करने का दबाव बनाना चाहते हैं।

क्षेत्रीय प्रभाव एवं कूटनीतिक विरोधाभास

ट्रंप द्वारा अब्राहम समझौतों के व्यापक विस्तार के प्रयास ने पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया में गहरे वैचारिक मतभेदों को पुनः उभार दिया है।

  • ईरान-विरोधी गुट का सुदृढ़ीकरण: मूल योजना का उद्देश्य ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव का मुकाबला करने के लिए अमेरिका समर्थित एक मजबूत सुरक्षा समूह का निर्माण करना था, जिसमें इजरायल को क्षेत्रीय व्यवस्था में गहराई से एकीकृत किया जाए।
  • सऊदी अरब का रुख: क्षेत्रीय पुनर्संरेखण के प्रमुख केंद्र के रूप में सऊदी अरब अपने रुख पर अडिग है। उसका कहना है कि इजरायल के साथ संबंधों का सामान्यीकरण तभी संभव है, जब एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना के लिए स्थायी, विश्वसनीय और समयबद्ध मार्ग सुनिश्चित किया जाए।
  • मध्यस्थ (पाकिस्तान) की दुविधा: अमेरिका और ईरान के मध्य मध्यस्थ के रूप में सक्रिय भूमिका निभाने वाले पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया।
    •  पाकिस्तान ने दोहराया कि इजरायल को मान्यता देना, एक संप्रभु फिलिस्तीनी राज्य के प्रति उसके संवैधानिक समर्थन के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
  • राजनीतिक परिदृश्य में परिवर्तन: वर्ष 2020 की भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ अब काफी परिवर्तित हो चुकी हैं।
  • जनाक्रोश में वृद्धि: गाजा, लेबनान और सीरिया में इजरायल के लगातार सैन्य अभियानों ने मुस्लिम दुनिया में व्यापक जनाक्रोश को बढ़ाया है, जिससे क्षेत्रीय सरकारों के लिए इजरायल के साथ खुले राजनयिक संबंध स्थापित करना एक बड़ा राजनीतिक जोखिम बन गया है।

भारत के लिए सामरिक प्रभाव

अब्राहम समझौतों का विस्तार, स्थगन या पुनर्गठन सीधे तौर पर पश्चिम एशिया में भारत की विदेश नीति संबंधी गणनाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को नया स्वरूप देता है।

  • भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) का भविष्य: अब्राहम समझौते IMEC की प्रमुख राजनीतिक पूर्व शर्त हैं।
    • यदि सऊदी अरब, जॉर्डन और इजरायल के मध्य प्रभावी कूटनीतिक समन्वय नहीं होता, तो UAE के बंदरगाहों को इजरायल के हाइफा बंदरगाह से जोड़ने वाले स्थलीय रेल नेटवर्क का निर्माण अत्यंत कठिन हो जाएगा।
    • निरंतर कूटनीतिक विरोध और असहमति इस अवसंरचना परियोजना में देरी कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य अस्थिर स्वेज नहर पर निर्भरता कम करना और चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) का विकल्प प्रस्तुत करना है।
  • I2U2 समूह का भविष्य: भारत, इजरायल, UAE और अमेरिका को शामिल करने वाला यह लघुपक्षीय ढाँचा सीधे तौर पर वर्ष 2020 के प्रारंभिक अब्राहम समझौतों से उत्पन्न हुआ था। समझौतों में रणनीतिक तनाव या उनके ठहराव से इस समूह के अंतर्गत प्रस्तावित संयुक्त खाद्य सुरक्षा परियोजनाएँ, हरित हाइड्रोजन केंद्र और स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकी निवेश कमजोर पड़ सकते हैं।
  • गंभीर ऊर्जा सुरक्षा आवश्यकताएँ: ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष और उसके परिणामस्वरूप होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री अवरोध ने भारत की चिंताओं को बढ़ा दिया है।
    • एक विस्तारित और स्थिर समझौता ढाँचा, जो तत्काल युद्धविराम सुनिश्चित करे, भारत के लिए अत्यंत लाभकारी है, क्योंकि इससे घरेलू आर्थिक विकास के लिए आवश्यक कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित होती है।
  • भारतीय प्रवासी समुदाय एवं प्रेषण की सुरक्षा: पश्चिम एशिया में लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी कार्यरत हैं, जो भारत को प्राप्त होने वाले 135 अरब डॉलर के वैश्विक प्रेषण का एक बड़ा हिस्सा भेजते हैं।
    • भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने हाल ही में सक्रिय संघर्ष क्षेत्रों से 67,000 भारतीय नागरिकों की सुरक्षित निकासी में सहायता प्रदान की है।
    • अब्राहम समझौतों के अंतर्गत व्यापक क्षेत्रीय सामान्यीकरण महत्त्वपूर्ण भू-आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है, जिससे प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
  • व्यावहारिक संतुलन की कूटनीति: भारत एक संतुलित बहु-आयामी कूटनीति अपनाता है, जिसमें इजरायल के साथ मजबूत रक्षा संबंध, GCC देशों के साथ प्रमुख ऊर्जा साझेदारियाँ तथा ईरान के चाबहार बंदरगाह में महत्त्वपूर्ण लॉजिस्टिक संचालन शामिल हैं।
    • यद्यपि भारत क्षेत्रीय एकीकरण के लिए अब्राहम समझौतों का समर्थन करता है, लेकिन ईरान को संरचनात्मक रूप से अलग-थलग करने की दिशा में अमेरिका का अत्यधिक आक्रामक प्रयास भारत को एक कठिन कूटनीतिक संतुलन की स्थिति में ला सकता है।

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