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ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक

Lokesh Pal May 18, 2026 01:54 4 0

संदर्भ

ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के प्रति समर्थन की पुनर्पुष्टि की गई तथा गाजा और होर्मुज स्ट्रेट (जलसंधि) को लेकर व्याप्त मतभेदों को उजागर किया गया।

ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक 2026 के बारे में

ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक एक वार्षिक राजनयिक मंच है, जो ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए कार्यसूची (एजेंडा) तैयार करता है। भारत सितंबर 2026 में इस शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा।

  • मेजबान और आयोजन स्थल: भारत ने नई दिल्ली स्थित  ‘भारत मंडपम’ में  वर्ष 2026 की ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक की मेजबानी की।
  • मुख्य विषय  (Theme): इस बैठक का आयोजन “बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी” (Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability) विषय के अंतर्गत किया गया था।
  • अध्यक्षता: भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर।
  • प्रमुख प्रतिभागी: इस बैठक में ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया के विदेश मंत्रियों तथा प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के प्रमुख बिंदु

  • फिलिस्तीन को राज्य के दर्जे का समर्थन: ब्रिक्स सदस्यों ने वर्ष 1967 से पूर्व की सीमाओं के भीतर, पूर्वी येरूशलम को इसकी राजधानी मानते हुए, एक संप्रभु और स्वतंत्र फिलिस्तीन राज्य के प्रति अपने समर्थन की पुनर्पुष्टि की।
  • ‘द्वि-राष्ट्र’ समाधान (Two-State Solution): भारत ने इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष को सुलझाने के लिए बातचीत के माध्यम से एक ‘द्वि-राष्ट्र समाधान’ के प्रति अपने समर्थन को दोहराया।
  • गाजा पट्टी पर मतभेद: सदस्य देशों के बीच गाजा पट्टी के भविष्य के प्रशासन तथा हमास एवं फिलिस्तीनी प्राधिकरण (Palestinian Authority) की भूमिका को लेकर वैचारिक असहमति प्रकट हुई।
  • होर्मुज स्ट्रेट विवाद: होर्मुज स्ट्रेट (जलसंधि) में समुद्री नियंत्रण और नौवहन से संबंधित मुद्दों पर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के विचार भिन्न थे।
  • कूटनीति और समुद्री सुरक्षा पर ध्यान: ब्रिक्स सदस्यों ने अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों के माध्यम से संवाद, कूटनीति और निर्बाध समुद्री वाणिज्य  पर विशेष बल दिया।

‘द्वि-राष्ट्र समाधान’ के बारे में 

  • यह समाधान इजरायल के साथ-साथ एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के निर्माण का प्रस्ताव करता है।

संघर्ष समाधान हेतु प्रमुख प्रस्ताव                                                                                                           

  • यह प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमाओं और पारस्परिक सुरक्षा के माध्यम से इजरायल और फिलिस्तीन के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की माँग करता है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: यह अवधारणा वर्ष 1947 की संयुक्त राष्ट्र विभाजन योजना (UN Partition Plan) से उभरी और वर्ष 1991 के मैड्रिड शांति सम्मेलन के बाद इसे व्यापक गति मिली।
  • इसने पहली बार ऐसा अवसर प्रदान किया जब इजरायल ने एक संयुक्त जॉर्डन-फिलिस्तीनी प्रतिनिधिमंडल के साथ-साथ सीरिया और लेबनान के साथ सीधे बातचीत (वार्ता) की थी।
  • मुख्य घटक: यह प्रस्ताव सामान्यतः गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक में एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना का समर्थन करता है, जिसकी राजधानी पूर्वी येरूशलम  हो।
  • संयुक्त राष्ट्र का दृष्टिकोण: संयुक्त राष्ट्र पश्चिम एशिया में दीर्घकालिक और स्थायी शांति प्राप्त करने के लिए ‘द्वि-राष्ट्र’ समाधान को अपरिहार्य (अनिवार्य) मानता है।

ब्रिक्स (BRICS) के बारे में

ब्रिक्स प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है, जिसका उद्देश्य बहुध्रुवीयता, आर्थिक सहयोग और ‘ग्लोबल साउथ’ के प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देना है।

  • उत्पत्ति: ब्रिक्स की उत्पत्ति वर्ष 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ “BRIC” के रूप में हुई थी, जबकि दक्षिण अफ्रीका वर्ष 2010 में इसमें शामिल हुआ।
  • वर्तमान सदस्य (11): ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात (UAE)।
  • संरचना: ब्रिक्स बिना किसी स्थायी सचिवालय के, वार्षिक शिखर सम्मेलनों, मंत्रिस्तरीय बैठकों और सर्वसम्मति-आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया के माध्यम से कार्य करता है।

प्रमुख पहल

  • न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB): ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ उभरती अर्थव्यवस्थाओं में अवसंरचना और सतत् विकास परियोजनाओं को वित्तपोषित करता है।
  • आकस्मिक आरक्षित  व्यवस्था (CRA): यह व्यवस्था भुगतान संतुलन संबंधी संकट के दौरान सदस्य देशों  को वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
  • ब्रिक्स पे (BRICS Pay) और स्थानीय मुद्रा व्यापार: अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से ब्रिक्स राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार निपटान को प्रोत्साहन देता है।
  • प्रौद्योगिकी और ऊर्जा में सहयोग: ब्रिक्स देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ऊर्जा सुरक्षा और डिजिटल अभिशासन जैसे क्षेत्रों में परस्पर सहयोग करते हैं।

ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक का महत्त्व

  • ‘ग्लोबल साउथ’ की अभिव्यक्ति को सुदृढ़ करना: इस बैठक ने वैश्विक शासन  से संबंधित विमर्शों में विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक सुदृढ़ मंच के रूप में ब्रिक्स की स्थिति को पुनः स्थापित किया।
  • पश्चिम एशिया के संघर्षों का समाधान: बैठक की चर्चाओं ने पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका (WANA क्षेत्र) में जारी संघर्षों को संबोधित करने में ब्रिक्स की बढ़ती राजनयिक भूमिका को रेखांकित किया।
  • समुद्री एवं ऊर्जा सुरक्षा: इस बैठक में सुरक्षित समुद्री व्यापारिक मार्गों और स्थिर ऊर्जा अवसंरचना के महत्त्व पर विशेष बल दिया गया।
  • भारत की कूटनीति के लिए प्रासंगिकता: अमेरिका-चीन के मध्य निरंतर बढ़ती प्रतिद्वंद्विता और पश्चिम एशिया के तनाव, ब्रिक्स के माध्यम से भारत के ‘रणनीतिक संतुलन’ के महत्त्व में और अधिक वृद्धि करते हैं।

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