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केंद्र ने NGOs के लिए FCRA नियमों को और सख्त किया

Lokesh Pal June 25, 2026 03:29 19 0

संदर्भ 

हाल ही में गृह मंत्रालय ने विदेशी अंशदान का उपयोग करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के लिए नियमों को और अधिक कठोर बनाया है।

  • इन संशोधनों के तहत कार्य क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, नेतृत्व की जवाबदेही का दायरा बढ़ाया गया है तथा विदेशी धन के उपयोग की निगरानी और धर्मांतरण की गतिविधियों पर रोक लगाने के उद्देश्य से जुर्माने की राशि में वृद्धि की गई है।

प्रमुख परिवर्तन

  • स्थान एवं गतिविधियों से संबंधित कड़े नियम
    • निर्धारित विकल्प: NGOs को अपनी गतिविधियों का चयन पाँच निर्धारित श्रेणियों सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और धार्मिक के अंतर्गत ही करना होगा।
    • राज्य/केंद्रशासित प्रदेश की निश्चित सीमा: NGOs को यह स्पष्ट रूप से बताना होगा कि वे विदेशी अंशदान किस राज्य या केंद्रशासित प्रदेश में व्यय करेंगे। पहले से पंजीकृत NGOs को अपने कार्यक्षेत्र का चयन करने हेतु एक वर्ष के भीतर फॉर्म FC-6F जमा करना होगा।
    • प्रत्येक राज्य के लिए अलग शुल्क: अब एक समान शुल्क के स्थान पर NGOs को प्रत्येक गतिविधि तथा राज्य के लिए अलग-अलग शुल्क का भुगतान करना होगा।
  • धर्मांतरण पर प्रतिबंध: सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन धार्मिक श्रेणी से संबंधित हैं। विदेशी अंशदान का उपयोग पूजा स्थलों के निर्माण या सामुदायिक रसोई (लंगर) संचालन के लिए किया जा सकता है। हालाँकि, विदेशी धन का उपयोग धर्मांतरण (Proselytisation) के उद्देश्य से निम्नलिखित गतिविधियों में सख्ती से प्रतिबंधित किया गया है:
    • धार्मिक शिक्षा देना, ध्यान शिविर आयोजित करना या धार्मिक प्रवचन करना।
    • धार्मिक इतिहास एवं धर्मशास्त्र का अध्ययन या प्रलेखन करना।
    • जनजातीय अथवा स्थानीय आस्था-परंपराओं का संरक्षण एवं पुनर्जीवन करना।
  • व्यय सीमा एवं धन संबंधी नियम
    • ₹10 लाख की न्यूनतम व्यय शर्त: अपने पंजीकरण के नवीनीकरण के लिए किसी NGO को यह प्रदर्शित करना होगा कि उसने पिछले दो वर्षों में विदेशी अंशदान की कम से कम ₹10 लाख राशि का सक्रिय रूप से उपयोग किया है।
    • 75% नियम: यदि किसी NGO को धनराशि किश्तों में प्राप्त होती है, तो सरकार अगली किश्त तभी जारी करेगी, जब पूर्व में प्राप्त राशि का 75% व्यय हो चुका हो तथा उसका फील्ड वैरिफिकेशन (Field Verification) हो जाए।
    • दाता की पहचान का खुलासा: यदि धनराशि किसी मध्यवर्ती कोष (Middle-man Funds) या प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्राप्त होती है, तो NGO को वास्तविक मूल दाता (Original Donor) की जानकारी अनिवार्य रूप से देनी होगी।
  • कौन होगा उत्तरदायी?
    • अधिक पदाधिकारियों को दायरे में लाना: अब “प्रमुख पदाधिकारी ” की परिभाषा में न्यासी, निदेशक, साझेदार तथा हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के कर्ता को भी शामिल किया गया है।
    • विदेशी नागरिकों पर प्रतिबंध: विदेशी नागरिकों द्वारा संचालित NGOs (भारतीय मूल के व्यक्तियों को छोड़कर) को सामान्यतः FCRA लाइसेंस प्राप्त करने की अनुमति नहीं होगी, जब तक कि सरकार विशेष अनुमति न दे।
    • सोशल मीडिया एवं प्रकाशनों का खुलासा: NGOs को अपनी सभी वेबसाइटों, सोशल मीडिया हैंडल्स तथा उनके पदाधिकारियों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों और लेखों की जानकारी देना अनिवार्य होगा।
  • संशोधित जुर्माना: सरकार ने इन नियमों के उल्लंघन पर लगाए जाने वाले जुर्मानों में संशोधन किया है। अब न्यूनतम जुर्माना ₹1 लाख निर्धारित किया गया है।

त्रुटि / उल्लंघन नया जुर्माना
अनुमोदित कार्यों या राज्यों के अतिरिक्त अन्य कार्यों/राज्यों में धन का उपयोग ₹1 लाख या दुरुपयोग की गई राशि का 30% (जो भी अधिक हो)।
जोखिमपूर्ण परिसंपत्तियों (सट्टेबाजी) में निवेश ₹1 लाख या निवेशित राशि का 30% (जो भी अधिक हो), साथ ही अर्जित समस्त लाभ की 100% वसूली।
कार्यालय/प्रशासनिक व्ययों पर निर्धारित सीमा से अधिक खर्च ₹1 लाख या अतिरिक्त व्यय की गई राशि का 5% (जो भी अधिक हो), यदि 20% की अनुमत सीमा का उल्लंघन किया गया हो।

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) के बारे में

  • यह अधिनियम कुछ संगठनों द्वारा विदेशी अंशदान की स्वीकृति एवं उपयोग को विनियमित तथा प्रतिबंधित करता है, यदि ऐसी गतिविधियाँ राष्ट्रीय हित के प्रतिकूल हों।
    • यह अधिनियम चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों, पत्रकारों, समाचार-पत्रों एवं मीडिया प्रसारण कंपनियों, न्यायाधीशों, सरकारी सेवकों, विधायिका के सदस्यों, राजनीतिक दलों एवं उनके पदाधिकारियों तथा राजनीतिक प्रकृति के संगठनों द्वारा विदेशी अंशदान प्राप्त करने पर भी प्रतिबंध लगाता है।
  • उद्गम: FCRA को वर्ष 1976 के आपातकाल के दौरान अधिनियमित किया गया था, जब यह आशंका व्यक्त की गई थी कि विदेशी शक्तियाँ स्वतंत्र संगठनों के माध्यम से धन भेजकर भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रही हैं।
  • स्वीकृति की अवधि: FCRA पंजीकरण पाँच वर्षों के लिए वैध होता है।
    • NGOs को पंजीकरण की समाप्ति तिथि से छह माह के भीतर नवीनीकरण हेतु आवेदन करना होता है। नवीनीकरण के लिए आवेदन न करने पर पंजीकरण स्वतः समाप्त माना जाता है।

किन आधारों पर स्वीकृति रद्द की जा सकती है?

  • यदि जाँच में निम्नलिखित तथ्य सामने आते हैं, तो पंजीकरण रद्द किया जा सकता है:
    • आवेदन में झूठा विवरण दिया गया हो।
    • NGO द्वारा प्रमाण-पत्र अथवा नवीनीकरण की किसी शर्त का उल्लंघन किया गया हो।
    • यदि NGO लगातार दो वर्षों तक समाज के हित में अपने चयनित क्षेत्र में कोई उचित गतिविधि न कर रहा हो।
    • यदि NGO निष्क्रिय (Defunct) हो गया हो।
  • पंजीकरण रद्द करने के अन्य आधार
    • यदि केंद्र सरकार की राय में जनहित में प्रमाण-पत्र रद्द करना आवश्यक हो।
    • यदि लेखा-परीक्षण (Audit) में विदेशी अंशदान के दुरुपयोग अथवा वित्तीय अनियमितताएँ पाई जाएँ।
  • उपाय: सरकार के सभी आदेशों को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

FCRA में संशोधन

  • FCRA संशोधन, 2010: विदेशी अंशदान के उपयोग से संबंधित कानून को सुदृढ़ करने तथा राष्ट्रीय हित के प्रतिकूल गतिविधियों में इसके उपयोग को रोकने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया।
  • FCRA संशोधन, 2020: सरकार को NGOs द्वारा विदेशी अंशदान की प्राप्ति एवं उपयोग पर अधिक कड़ा नियंत्रण और निगरानी प्रदान करने हेतु कानून में पुनः संशोधन किया गया।
  • विदेशी अंशदान (विनियमन) (संशोधन) नियम, 2022: जुलाई 2022 में गृह मंत्रालय (MHA) ने FCRA नियमों में संशोधन करते हुए अधिनियम के अंतर्गत समझौतायोग्य अपराधों की संख्या 7 से बढ़ाकर 12 कर दी।
    • अन्य प्रमुख परिवर्तन निम्नलिखित थे
      • ₹10 लाख से कम के विदेशी अंशदान पर सरकार को सूचना देने से छूट प्रदान की गई; पूर्व सीमा ₹1 लाख थी।
      • बैंक खाता खोलने की सूचना देने की समय-सीमा में वृद्धि की गई।

नए परिवर्तनों का महत्त्व

  • संप्रभुता की सुरक्षा: यह देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को बाहरी वित्तीय प्रभाव से सुरक्षित रखने का प्रयास करता है, ताकि विदेशी धन के माध्यम से स्थानीय समुदायों को प्रभावित न किया जा सके अथवा कृत्रिम सामाजिक अभियानों को बढ़ावा न मिले।
  • लक्षित वित्तीय निगरानी: गतिविधियों को विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों से जोड़ने से निगरानी एजेंसियों को धन के दोहरे उपयोग (Double-Dipping) अथवा सहायता कार्यों से धन को अन्य अनधिकृत गतिविधियों में स्थानांतरित किए जाने की पहचान करने में सुविधा होती है।
  • निष्क्रिय संगठनों की पहचान: न्यूनतम वित्तीय व्यय सीमा निर्धारित करने से निष्क्रिय अथवा केवल नाममात्र के संगठनों (Shell Groups) को अलग किया जा सकता है, जो प्रायः निगरानी संसाधनों पर अनावश्यक दबाव डालते हैं तथा अवैध धन हस्तांतरण के माध्यम बन सकते हैं।
  • नेतृत्व की प्रत्यक्ष जवाबदेही: प्रमुख पदाधिकारियों की परिभाषा का विस्तार करने से संगठन के प्रबंधक एवं नेतृत्व सीधे तौर पर संस्थागत कार्यों के लिए उत्तरदायी बनते हैं, जिससे वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा मिलता है और त्रुटियों में कमी आती है।

FCRA की आवश्यकता

  • राष्ट्रीय हित एवं सुरक्षा: यह कानून व्यक्तियों और संगठनों को प्राप्त विदेशी अंशदान को विनियमित करने के लिए बनाया गया था, ताकि उनकी गतिविधियाँ एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य के मूल्यों के अनुरूप रहें।
    • वर्ष 2015 में फोर्ड फाउंडेशन को राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में कुछ समय के लिए पूर्व स्वीकृति (Prior Approval) श्रेणी में रखा गया तथा गृह मंत्रालय की निगरानी सूची में शामिल किया गया।
  • विदेशी वित्तपोषण का विनियमन: FCRA विदेशी अंशदान को विनियमित करने हेतु एक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है, जिससे ऐसे धन के उपयोग में पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।
  • धन शोधन एवं अवैध गतिविधियों की रोकथाम: FCRA भारतीय कानून के तहत प्रतिबंधित अथवा अवैध गतिविधियों के लिए विदेशी धन के उपयोग को रोकने में सहायता करता है।
    • उदाहरण के लिए, वर्ष 2020 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने धन शोधन के आरोपों के आधार पर एमनेस्टी इंटरनेशनल (AI) इंडिया के बैंक खातों को फ्रीज कर दिया था।
  • वैध उद्देश्यों का सुनिश्चित उपयोग: यह अधिनियम सुनिश्चित करता है कि विदेशी अंशदान का उपयोग सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक गतिविधियों जैसे वैध उद्देश्यों के लिए किया जाए, जो भारत के लोगों के हित में हों। यह विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों की प्रामाणिकता की जाँच के लिए भी तंत्र स्थापित करता है।
    • वर्ष 2016 में गृह मंत्रालय (MHA) ने NGO लॉयर्स कलेक्टिव का FCRA लाइसेंस कथित रूप से विदेशी अंशदान का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग करने के कारण रद्द कर दिया था।

चुनौतियाँ

  • प्रशासनिक जटिलता: प्रत्येक राज्य अथवा केंद्रशासित प्रदेश के लिए अलग-अलग पंजीकरण प्रक्रिया और शुल्क भुगतान अनिवार्य करने से प्रशासनिक बोझ बढ़ सकता है, जिससे त्वरित सार्वजनिक सहायता प्रदान करने की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है।
  • अस्पष्ट परिचालन प्रावधान: “वैचारिक सामग्री (Ideological Content)” जैसे शब्द स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं हैं। ऐसी अस्पष्टता के कारण स्थानीय अधिकारी मानवाधिकार, लोककला या अन्य वैध अध्ययनों को भी अनुचित रूप से रोक सकते हैं।
  • आपदा राहत में संभावित विलंब: अगली किस्त जारी करने से पूर्व 75% राशि के व्यय और भौतिक सत्यापन की अनिवार्यता अचानक आने वाली जलवायु आपदाओं या स्वास्थ्य संकटों के दौरान राहत कार्यों को प्रभावित कर सकती है।
  • सूक्ष्म NGOs के अस्तित्व पर खतरा: बड़े और संसाधन-संपन्न अंतरराष्ट्रीय संगठन जटिल अनुपालन प्रक्रियाओं को सँभाल सकते हैं, जबकि छोटे स्थानीय जमीनी संगठन पर्याप्त मानव संसाधन के अभाव में अपनी गतिविधियाँ बंद करने के लिए विवश हो सकते हैं।

आगे की राह

  • स्पष्ट एवं वस्तुनिष्ठ नियमावली: सरकार को राजनीतिक एवं वैचारिक गतिविधियों की सीमाओं के संबंध में स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ परिभाषाएँ जारी करनी चाहिए, ताकि शांतिपूर्ण सामाजिक कार्यकर्ताओं को अनुचित कार्रवाई का सामना न करना पड़े।
  • स्वचालित फाइलिंग प्रणाली: सुरक्षा और कार्यकुशलता के मध्य संतुलन बनाए रखने हेतु नई रिपोर्टिंग आवश्यकताओं तथा फॉर्म FC-6F घोषणाओं के लिए एक त्वरित एवं स्वचालित ऑनलाइन डैशबोर्ड विकसित किया जाना चाहिए, जिससे अनावश्यक प्रशासनिक विलंब कम हो सके।
  • आनुपातिक जोखिम मूल्यांकन: वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (FATF) के अंतरराष्ट्रीय ढाँचों की तर्ज पर सरकार को जोखिम-आधारित निगरानी व्यवस्था अपनानी चाहिए, जिसमें संदिग्ध स्रोतों और चैनलों पर अधिक ध्यान दिया जाए तथा स्वच्छ रिकॉर्ड वाले सामाजिक संगठनों के लिए अनुपालन प्रक्रिया को सरल बनाया जाए।
  • घरेलू वित्तीय समर्थन को प्रोत्साहन: मानव विकास संबंधी गतिविधियों के लिए विदेशी वित्तपोषण पर निर्भरता कम करने हेतु भारत को कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) प्रोत्साहनों का विस्तार करना चाहिए, जिससे परोपकारी संसाधनों का आधार देश के भीतर ही सुदृढ़ हो सके।

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