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सिंधु नदी तंत्र पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

Lokesh Pal July 11, 2026 03:35 8 0

संदर्भ

हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गांधीनगर के एक अध्ययन में पाया गया कि पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास एवं सतलुज) के जलग्रहण क्षेत्रों में वर्ष 1951 से 2024 के मध्य वर्षा में लगभग 20% की कमी दर्ज की गई है। यह अध्ययन वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत करता है कि जलवायु परिवर्तन ने सिंधु नदी बेसिन में जल उपलब्धता को उल्लेखनीय रूप से प्रभावित किया है।

संबंधित तथ्य

  • ये निष्कर्ष सिंधु जल संधि (1960) की समीक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

  • पूर्वी नदियों में वर्षा में गिरावट
    • वर्ष 1951 से वर्ष 2024 के बीच रावी, ब्यास एवं सतलुज के जलग्रहण क्षेत्रों में वर्षा में लगभग 20% की कमी दर्ज की गई।
    • सिंधु जल संधि के अंतर्गत इन नदियों का जल विशेष रूप से भारत को आवंटित है।
  • पश्चिमी नदियों में वर्षा अपेक्षाकृत स्थिर
    • सिंधु, झेलम एवं चिनाब में केवल 6% की गिरावट दर्ज की गई, जो सांख्यिकीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नहीं है।
    • पाकिस्तान को आवंटित नदियों में जल उपलब्धता अपेक्षाकृत स्थिर बनी रही।
  • भूजल का क्षरण
    • रावी एवं सतलुज के उप-जलग्रहण क्षेत्र में भूजल स्तर में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई।
    • पश्चिमी नदी जल ग्रहण क्षेत्र में अपेक्षाकृत बेहतर भूजल स्थिति पाई गई, जिसके प्रमुख कारण:
      • कृषि का कम दबाव।
      • कम जनसंख्या घनत्व।
      • हिमपात एवं वर्षा से अधिक भूजल पुनर्भरण।
  • जलाशयों में जल प्रवाह में कमी
    • भारत के प्रमुख जलाशयों में वार्षिक जल प्रवाह में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।
      • पोंग बाँध: वर्ष 1951 से वर्ष 2020 के मध्य लगभग 34% की कमी।
      • भाखड़ा एवं थीन (रंजीत सागर) जलाशयों में भी जल प्रवाह में गिरावट दर्ज की गई।
    • इसके विपरीत, पाकिस्तान के मंगला एवं तर्बेला जलाशयों में केवल मामूली गिरावट देखी गई।

अध्ययन का महत्त्व

  • यह अध्ययन पहली बार वैज्ञानिक एवं तथ्य-आधारित साक्ष्य प्रस्तुत करता है  कि जलवायु परिवर्तन ने सिंधु नदी बेसिन की जल-वैज्ञानिक परिस्थितियों को प्रभावित किया है।
  • यह भारत के इस तर्क को सुदृढ़ करता है कि सिंधु जल संधि (1960) जिन जल वैज्ञानिक मान्यताओं पर आधारित थी, उनमें मूलभूत परिवर्तन हो चुका है।
  • यह भी रेखांकित करता है कि जल उपलब्धता अब उन परिस्थितियों के अनुरूप नहीं रही, जो संधि पर हस्ताक्षर के समय विद्यमान थीं।

सिंधु जल संधि पर भारत का दृष्टिकोण

भारत का तर्क है कि निम्नलिखित कारणों से संधि की समीक्षा एवं संशोधन आवश्यक है:

  • जलवायु परिवर्तन के कारण नदी प्रवाह में परिवर्तन।
  • जनसंख्या वृद्धि के कारण जल की माँग में वृद्धि।
  • स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार हेतु जलविद्युत की बढ़ती आवश्यकता।
  • विकास संबंधी आवश्यकताओं में परिवर्तन।
  • वर्षा एवं जल उपलब्धता में बढ़ती अनिश्चितता।

वर्ष 2025 के पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को “स्थगित” घोषित कर दिया तथा स्पष्ट किया कि यह स्थिति तब तक बनी रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमापार आतंकवाद को पूर्णतः समाप्त नहीं करता है।

भारत के लिए निहितार्थ

  • जल सुरक्षा: पूर्वी नदियों में जल उपलब्धता में कमी का प्रभाव निम्नलिखित पर पड़ सकता है:
    • सिंचाई।
    • पेयजल आपूर्ति।
    • कृषि उत्पादकता।
  • जलविद्युत: जलाशयों में जल प्रवाह घटने से उत्तरी भारत में जलविद्युत उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
  • जलवायु अनुकूलन: यह जलवायु-सहिष्णु नदी बेसिन प्रबंधन तथा भू-जल शासन को सुदृढ़ करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
  • सीमापार जल शासन: यह दर्शाता है कि जल बँटवारा समझौतों में जलवायु परिवर्तनशीलता एवं अनुकूलनशील प्रबंधन को सम्मिलित किया जाना चाहिए।

सिंधु नदी तंत्र

नदी उद्गम प्रमुख विशेषताएँ किसमें मिलती है
सिंधु तिब्बत में मानसरोवर झील के निकट (कैलाश पर्वत के समीप) देमचोक (लद्दाख) से भारत में प्रवेश करती है; लद्दाख से होकर पाकिस्तान में प्रवाहित होती है तथा अंततः अरब सागर में गिरती है। अरब सागर
झेलम कश्मीर में वेरीनाग स्रोत वुलर झील एवं श्रीनगर से होकर प्रवाहित होती है; प्राचीन ग्रंथों में वितस्ता के नाम से प्रसिद्ध। चिनाब (पाकिस्तान में)
चिनाब चंद्र एवं भागा नदियों के टांडी (हिमाचल प्रदेश) में संगम से सिंधु की सबसे लंबी सहायक नदी; प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएँ—सलाल, बगलिहार एवं रतले। सिंधु (पाकिस्तान में पंजनद के माध्यम से)
रावी रोहतांग दर्रे के निकट, हिमाचल प्रदेश भारत–पाकिस्तान सीमा के एक भाग का निर्माण करती है; प्राचीन नाम इरावती चिनाब (पाकिस्तान में)
ब्यास ब्यास कुंड, रोहतांग दर्रे के निकट, हिमाचल प्रदेश पूर्णतः भारत में प्रवाहित होने वाली नदी; प्राचीन नाम विपाशा। सतलुज (हरिके, पंजाब में)
सतलुज तिब्बत में राक्षसताल झील (कैलाश पर्वत के निकट) पंजाब की पाँच नदियों में सबसे लंबी; शिपकी ला से भारत में प्रवेश करती है; भाखड़ा–नाँगल बाँध इसी पर स्थित है। चिनाब (पाकिस्तान में पंजनद के माध्यम से)

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