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न्याय वितरण में विलंब: कारण और न्यायिक सुधार

Lokesh Pal May 13, 2026 03:21 10 0

संदर्भ

हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में बढ़ती देरी और लंबित मामलों को उजागर किया।

संबंधित तथ्य

  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार, पुलिस प्राधिकरणों और न्यायिक अधिकारियों को आपराधिक न्याय वितरण को सुव्यवस्थित करने के लिए कई निर्देश जारी किए।
  • निर्णय में यह पुनः स्पष्ट किया गया कि
    • त्वरित सुनवाई अनुच्छेद-21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है।
    • विलंबित न्याय न्यायपालिका में जन विश्वास को कमजोर करता है।
  • मार्च 2026 के अंत तक सर्वोच्च न्यायालय में 93,143 मामले लंबित थे।
    • यह फरवरी 2026 की तुलना में 1,141 मामलों की वृद्धि को दर्शाता है, जब न्यायालय में एक वर्ष में पहली बार लंबित मामलों में गिरावट देखी गई थी। 

न्यायिक सुधार के बारे में

  • न्यायिक सुधार से तात्पर्य उन उपायों से है, जिनका उद्देश्य न्यायिक प्रणाली की दक्षता, पारदर्शिता, सुलभता और जवाबदेही में सुधार करना है।
  • भारत में, मामलों के बढ़ते लंबित बोझ, न्यायाधीशों की कमी, उच्च मुकदमेबाजी लागत और न्याय वितरण में देरी के कारण सुधार आवश्यक हैं।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देश

  • न्यायालय अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण: राज्य सरकार को मामलों के भारी कार्यभार को ध्यान में रखते हुए जिला न्यायालयों में अतिरिक्त स्टाफ और अवसंरचना उपलब्ध कराने के मुद्दे पर विचार करना चाहिए।
  • फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं की स्वायत्तता: राज्य सरकार को गृह मंत्रालय (MHA) के अनुरोध के अनुसार, उत्तर प्रदेश फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) को गृह विभाग के अंतर्गत एक स्वायत्त विभाग बनाने पर विचार करना चाहिए।
  • FSL में रिक्तियों की पूर्ति: राज्य सरकार उत्तर प्रदेश की फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं में रिक्त पदों को भरने के लिए हर संभव प्रयास करेगी, साथ ही एक वर्ष के भीतर उच्च-स्तरीय उपकरण उपलब्ध कराएगी।
  • फोरेंसिक साक्ष्य संग्रह में प्रशिक्षण: राज्य सरकार/पुलिस विभाग यह सुनिश्चित करेगा कि पुलिस अधिकारियों को फोरेंसिक साक्ष्य संग्रहण के लिए प्रशिक्षण दिया जाए।
  • न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा: राज्य सरकार पंजाब और हरियाणा की तर्ज पर सभी जिला न्यायालय न्यायाधीशों को व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी प्रदान करने की व्यवहार्यता पर विचार करेगी।
  • मासिक निगरानी बैठकें: उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) सभी जिला पुलिस प्रमुखों, जिसमें पुलिस आयुक्त भी शामिल हैं, को निर्देश जारी करेंगे कि वे संबंधित जिला न्यायाधीश की अध्यक्षता में मासिक निगरानी बैठक में व्यक्तिगत रूप से भाग लें।
  • DNA मिलान की अनिवार्य जाँच: DGP सभी जाँच अधिकारियों को निर्देश जारी करेंगे कि वे हथियार और कपड़ों पर पाए गए रक्त के DNA का आरोपी और मृतक के DNA से मिलान कराने के लिए FSL से अनिवार्य रूप से पूछताछ करें, जब नमूने FSL भेजे जाएँ।
  • बयान दर्ज करने में AI का उपयोग: पुलिस को गवाहों के बयान दर्ज करने के लिए ‘स्पीच-टू-टेक्स्ट’ AI मॉड्यूल लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।
  • लापरवाही के लिए जवाबदेही: DGP सभी पुलिस अधिकारियों को एक परिपत्र जारी करने पर विचार करेंगे, जिसमें उल्लेख होगा कि न्यायालयीय प्रक्रियाओं के निष्पादन में लापरवाही अनुशासनात्मक कार्यवाही को प्रेरित कर सकती है।
  • ई-कोर्ट और डिजिटल प्रक्रियाओं को बढ़ावा: न्यायिक अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) नियम, 2024, ई-प्रक्रिया नियम, 2026 के अनुसार ई-समन, ई-वारंट और अन्य न्यायालयीय प्रक्रियाएँ भेजें तथा BNSS, 2023 के प्रावधानों के अनुसार, ई-एफआईआर और ई-चार्जशीट का उपयोग करें।

आपराधिक न्याय वितरण में देरी के प्रमुख कारण

  • न्यायालयों में स्टाफ की कमी: जिला न्यायालयों में लिपिकीय और सहायक स्टाफ की कमी के कारण न्यायिक अधिकारियों पर कार्यभार बढ़ता है और मामलों के निपटान में देरी होती है।
    • उदाहरण: स्टेनोग्राफर और प्रोसेस सर्वर की कमी से सुनवाई और दस्तावेजी कार्य धीमा हो जाता है।
  • पुलिस सहयोग की कमी: पुलिस अक्सर आरोपियों और गवाहों की समय पर उपस्थिति सुनिश्चित करने में विफल रहती है, जिससे बार-बार स्थगन (Adjournment) होता है।
    • उदाहरण: समन और वारंट के निष्पादन में देरी से मुकदमे की कार्यवाही टल जाती है।
  • कमजोर फोरेंसिक अवसंरचना: फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाएँ (FSL) विशेषज्ञों और आधुनिक उपकरणों की कमी से जूझ रही हैं, जिससे फोरेंसिक रिपोर्ट में देरी होती है।
    • DNA प्रोफाइलिंग रिपोर्ट लंबित रहने से हत्या और हमले की जाँच धीमी हो जाती है।
  • संस्थाओं के बीच समन्वय की कमी: पुलिस, अभियोजन और न्यायपालिका के बीच कमजोर समन्वय प्रभावी केस प्रबंधन और समयबद्ध सुनवाई को प्रभावित करता है।
    • जाँच अभिलेखों के साझा करने में देरी अभियोजन और न्यायालयीय कार्यवाही को प्रभावित करती है।
  • बार-बार स्थगन: पक्षकारों द्वारा बार-बार स्थगन लेने से मुकदमे लंबित रहते हैं और मामलों का बोझ बढ़ता है।
    • वकीलों द्वारा बार-बार तारीख लेने से न्याय में देरी होती है।
  • अपर्याप्त न्यायिक अवसंरचना: कई न्यायालयों में पर्याप्त न्यायालय कक्ष, डिजिटल सुविधाएँ और मूलभूत अवसंरचना का अभाव है।
    • सीमित स्थान में कई न्यायालयों के संचालन से सुनवाई की दक्षता कम होती है।
  • न्यायपालिका में रिक्तियाँ: न्यायाधीशों के बड़े पैमाने पर रिक्त पद न्यायालयों की मामलों को सँभालने की क्षमता को कम करते हैं।
    • न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी से मौजूदा न्यायालयों पर बोझ बढ़ता है।
  • जाँच में देरी: धीमी और अप्रभावी पुलिस जाँच के कारण चार्जशीट दाखिल करने और मुकदमे की शुरुआत में देरी होती है।
    • अधूरे साक्ष्य संग्रहण के कारण मामले लंबित बने रहते हैं

समयबद्ध न्याय का महत्त्व

  • मौलिक अधिकारों की सुरक्षा: समय पर न्याय अनुच्छेद-21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक है, क्योंकि लंबित मुकदमे जीवन, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं, चाहे वे पीड़ित हों या आरोपी।
    • विचाराधीन कैदी प्रायः दोषसिद्धि या बरी होने से पूर्व वर्षों तक जेल में रहते हैं।
  • न्यायपालिका में जन विश्वास को सुदृढ़ करना: मामलों के त्वरित निपटान से न्यायपालिका में जन विश्वास बढ़ता है और लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा विधि के शासन में विश्वास मजबूत होता है।
    • उच्च-प्रोफाइल भ्रष्टाचार या आपराधिक मामलों में विलंबित न्याय जन असंतोष और अविश्वास उत्पन्न करता है।
  • अपराध के विरुद्ध प्रभावी निवारण: त्वरित जाँच और समय पर दंड अपराधियों में कानूनी परिणामों का भय उत्पन्न कर आपराधिक गतिविधियों को रोकने में सहायक होते हैं।
    • यौन उत्पीड़न मामलों में त्वरित न्यायालय जवाबदेही और निवारण को मजबूत करते हैं।
  • पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा: समयबद्ध न्याय से पीड़ितों को राहत, मुआवजा और न्यायिक समापन मिलता है, जिससे भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक समस्या कम होती है।
    • घरेलू हिंसा या यौन अपराधों में देरी से पीड़ितों का आघात बढ़ता है।
  • न्यायालयों में लंबित मामलों में कमी: मामलों के त्वरित निपटान से न्यायालयों में बैकलॉग कम होता है और न्यायिक प्रणाली की कुल दक्षता बढ़ती है।
    • ई-कोर्ट और वर्चुअल सुनवाई का प्रभावी उपयोग मामलों के निपटान को तेज कर सकता है।
  • आर्थिक और सामाजिक स्थिरता सुनिश्चित करना: न्यायिक निर्णयों में देरी से व्यापारिक विश्वास, निवेश और सामाजिक समरसता प्रभावित होती है, क्योंकि विवाद समाधान में अनिश्चितता बनी रहती है।
    • लंबे समय तक चलने वाले वाणिज्यिक विवाद घरेलू और विदेशी निवेश को हतोत्साहित करते हैं।
  • कानूनी प्रक्रियाओं के दुरुपयोग को रोकना: समय पर मुकदमे से प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा स्थगन का दुरुपयोग, गवाहों को प्रभावित करना या साक्ष्यों में हस्तक्षेप करने की संभावना कम होती है।
    • आपराधिक मामलों में बार-बार देरी से अभियोजन पक्ष कमजोर हो जाता है।
  • सुशासन और कानून के शासन को बढ़ावा देना: प्रभावी न्याय वितरण संवैधानिक शासन को मजबूत करता है और जवाबदेही, पारदर्शिता तथा कानून के समान अनुप्रयोग को सुनिश्चित करता है।
    • प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मामलों में समय पर न्यायिक हस्तक्षेप संस्थागत जवाबदेही को बढ़ावा देता है।

न्यायपालिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की भूमिका

  • मामलों का तीव्र प्रबंधन: AI न्यायालयों को मामलों को छाँटने, वर्गीकृत करने और प्राथमिकता निर्धारित करने में सहायता कर सकता है, जिससे लंबित मामलों में कमी तथा न्यायिक दक्षता में सुधार होता है।
    • AI-आधारित सॉफ्टवेयर तत्काल जमानत या संवैधानिक मामलों की पहचान कर उन्हें शीघ्र सूचीबद्ध कर सकते हैं।
  • स्पीच-टू-टेक्स्ट रिकॉर्डिंग: AI-सक्षम स्पीच-टू-टेक्स्ट तकनीक मौखिक बयानों को तुरंत लिखित रिकॉर्ड में परिवर्तित कर सकती है, जिससे दस्तावेजीकरण में देरी कम होती है।
    • पुलिस और न्यायालय गवाहों के बयान को सटीक रूप से दर्ज करने के लिए AI उपकरणों का उपयोग कर सकते हैं।
  • विधिक अनुसंधान में सहायता: AI उपकरण न्यायाधीशों और वकीलों को संबंधित ‘केस लॉ’, उदाहरण और कानूनी प्रावधानों की त्वरित पहचान में सहायता करते हैं।
    • AI-आधारित विधिक डेटाबेस निर्णयों और तर्कों की तैयारी को तीव्र करते हैं।
  • पूर्वानुमान विश्लेषण और केस ट्रैकिंग: AI लंबित मामलों के पैटर्न का विश्लेषण कर देरी का पूर्वानुमान लगा सकता है, जिससे मामलों का प्रबंधन बेहतर होता है।
    • AI डैशबोर्ड अत्यधिक लंबित मामलों वाले न्यायालयों की पहचान कर प्रशासनिक हस्तक्षेप को संभव बनाते हैं।
  • ई-कोर्ट को बढ़ावा: AI स्वचालित शेड्यूलिंग, ई-फाइलिंग, ई-समन और वर्चुअल सुनवाई के माध्यम से डिजिटल न्यायालयों को समर्थन देता है।
    • ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना के साथ AI का एकीकरण सुलभता और पारदर्शिता को बढ़ाता है।
  • अनुवाद और सुलभता: AI-आधारित अनुवाद प्रणाली न्यायालयीय कार्यवाही को विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में सुलभ बना सकती है।
    • उदाहरण: रियल-टाइम अनुवाद उपकरण वादियों को उनकी मातृभाषा में कार्यवाही समझने में सहायता करते हैं।
  • मानवीय त्रुटियों में कमी: AI दस्तावेजीकरण, डेटा प्रविष्टि और केस रिकॉर्ड में लिपिकीय त्रुटियों को कम कर सकता है, जिससे प्रशासनिक सटीकता बढ़ती है।
    • दस्तावेजों का स्वचालित सत्यापन प्रक्रियात्मक त्रुटियों की संभावना को कम करता है।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही में सुधार: AI-आधारित निगरानी प्रणाली जाँच, फाइलिंग और सुनवाई में देरी को ट्रैक कर संस्थागत जवाबदेही को मजबूत करती है।
    • समन और वारंट की डिजिटल निगरानी पुलिस द्वारा उनके समयबद्ध निष्पादन को सुनिश्चित करती है।

मामलों के लंबित भार को कम करने के लिए किए गए प्रयास

  • ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना: ई-कोर्ट समेकित मिशन मोड परियोजना, जिसे वर्ष 2007 में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना के अंतर्गत शुरू किया गया, का उद्देश्य भारत के जिला और अधीनस्थ न्यायालयों का डिजिटल रूपांतरण करना है।
    • यह न्यायालयों के कंप्यूटरीकरण, न्यायिक सेवाओं की ऑनलाइन उपलब्धता और वादियों, वकीलों तथा न्यायाधीशों के लिए दक्षता में सुधार को बढ़ावा देता है।
  • वर्चुअल न्यायालय: वर्चुअल न्यायालय दूरस्थ सुनवाई के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग तकनीक का उपयोग करते हैं, जिससे भौतिक उपस्थिति और लॉजिस्टिक बाधाओं के कारण होने वाली देरी कम होती है।
    • यह पहल सुलभता बढ़ाती है, समय बचाती है और मामलों के निपटान को तेज करती है
  • ई-फाइलिंग प्रणाली: ई-फाइलिंग तंत्र वादियों और वकीलों को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से मामले तथा दस्तावेज जमा करने की सुविधा देता है।
    • यह कागजी कार्यवाही को कम करता है, प्रशासनिक देरी कम करता है और न्यायिक प्रक्रिया को तीव्र करता है।
  • ई-भुगतान सुविधाएँ: ऑनलाइन भुगतान प्रणाली न्यायालय शुल्क, दंड और जुर्माने का डिजिटल भुगतान संभव बनाती है, जिससे नकद लेन-देन पर निर्भरता कम होती है।
    • यह न्यायालयीय कार्य में पारदर्शिता, सुविधा और प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाता है।
  • अंतर-संचालित आपराधिक न्याय प्रणाली (ICJS): ICJS प्लेटफॉर्म पुलिस, न्यायालय, कारागार, अभियोजन और फोरेंसिक प्रयोगशालाओं के बीच निर्बाध डेटा साझाकरण को संभव बनाता है।
    • संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय से तीव्र जाँच, सुनवाई और मामलों के निपटान में सहायता मिलती है।
  • फास्ट ट्रैक’ न्यायालय:फास्ट ट्रैक’ न्यायालय विशेष श्रेणी के मामलों, विशेषकर लंबे समय से लंबित और संवेदनशील मामलों के शीघ्र निपटान के लिए स्थापित किए जाते हैं।
    • ये न्यायालय ‘बैकलॉग’ कम करने और त्वरित न्याय वितरण सुनिश्चित करने में सहायक होते हैं।
  • वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) तंत्र: लोक अदालत, ग्राम न्यायालय, मध्यस्थता और ऑनलाइन विवाद निवारण (ODR) जैसेADR तंत्र पारंपरिक मुकदमेबाजी के तीव्र और कम लागत वाले विकल्प प्रदान करते हैं।
    • ये नियमित न्यायालयों पर भार कम करते हैं और विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान को बढ़ावा देते हैं।

निष्कर्ष 

न्यायिक देरी संवैधानिक शासन, जन विश्वास और न्याय तक पहुँच को कमजोर करती है। न्यायिक अवसंरचना, पुलिस जवाबदेही, फोरेंसिक आधुनिकीकरण और प्रौद्योगिकी एकीकरण से संबंधित व्यापक सुधार भारत में त्वरित, सुलभ और दक्ष न्याय वितरण सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं।

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