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परिसीमन 2026 – 131वें संशोधन संबंधी बहस और भारत की संघीय दुविधा

Lokesh Pal April 22, 2026 03:15 9 0

संदर्भ

केंद्र सरकार ने लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने के लिए संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक प्रस्तावित किया तथा परिसीमन आयोग (2026) की स्थापना हेतु एक पृथक विधेयक प्रस्तुत किया। हालाँकि, यह संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका, जिसके परिणामस्वरूप परिसीमन विधेयक वापस ले लिया गया।

हालिया मुद्दे के बारे में 

  • क्षेत्र और प्रमुख प्रावधान: प्रस्तावित संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 ने संसदीय प्रतिनिधित्व में संरचनात्मक परिवर्तन के लिए तीन प्रमुख परिवर्तन प्रस्तावित किए:
    • लोकसभा की सदस्य संख्या का विस्तार: इसमें लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था, जो जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं और भविष्य की प्रतिनिधित्व आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए लगभग 50% की वृद्धि को दर्शाता है।
    • परिसीमन के आधार में प्रत्यास्थता: इसका उद्देश्य संसद को परिसीमन के लिए जनगणना आधार निर्धारित करने का अधिकार देना था, जिससे समय और पद्धति में विवेकाधिकार संबंधी प्रावधान की व्यवस्था होती, न कि एक निश्चित संवैधानिक प्रावधान।
    • महिला आरक्षण का क्रियान्वयन: इसमें महिलाओं के लिए 33% आरक्षण (106वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 के अंतर्गत) को वर्ष 2027 के बाद की जनगणना की शर्त से अलग करने का प्रस्ताव था, जिससे वर्तमान जनगणना आँकड़ों (जैसे 2011) के आधार पर इसे पहले लागू किया जा सके।
  • परिसीमन ढाँचे की रूपरेखा: इसके साथ प्रस्तुत परिसीमन विधेयक, 2026 में निम्नलिखित प्रस्तावित था:
    • परिसीमन आयोग (2026) का गठन: निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्समायोजन और सीटों के आवंटन के लिए।
    • उपलब्ध नवीनतम जनगणना आँकड़ों का उपयोग: तत्काल संदर्भ में यह वर्ष 2011 की जनगणना होने की संभावना थी, क्योंकि अगली जनगणना में विलंब हुआ है।
    • समवर्ती विस्तार और पुनर्वितरण का ढाँचा: वर्ष 2027 के बाद की जनगणना के आधार पर परिसीमन की प्रतीक्षा करने के बजाय एक साथ विस्तार और पुनर्वितरण की व्यवस्था।
  • सरकार का तर्क
    • महिला आरक्षण को बिना विस्थापन लागू करना: सीटों के विस्तार से अतिरिक्त स्थान उपलब्ध कराना, ताकि पुरुष प्रतिनिधियों की सीटों में कमी न हो और राजनीतिक विरोध कम हो।
    • संघीय संतुलन बनाए रखना (आनुपातिक आश्वासन): सरकार ने यह आश्वासन दिया कि सभी राज्यों की सीटें आनुपातिक रूप से बढ़ेंगी, जिससे किसी राज्य के प्रतिनिधित्व में सापेक्ष कमी नहीं होगी।
    • प्रतिनिधित्व घाटे को दूर करना: इस कदम को निर्वाचन क्षेत्रों के आकार में असंतुलन को व्यवस्थित करने और जनसंख्या वृद्धि के अनुरूप प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक बताया गया।
  • प्रमुख चिंताएँ और आलोचनाएँ
    • अत्यधिक कार्यपालिका विवेकाधिकार: संसद को जनगणना आधार चुनने का अधिकार देने से परिसीमन के समय और परिणामों में राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका बढ़ेगी।
    • संघीय असंतुलन की आशंका: आनुपातिक आश्वासनों के बावजूद विपक्षी दलों ने उच्च जनसंख्या वाले राज्यों को संभावित लाभ और राज्यों के मध्य राजनीतिक संतुलन में बदलाव की चिंता व्यक्त की।
    • अंतरिम परिसीमन की विश्वसनीयता: वर्ष 2011 की जनगणना के उपयोग को पुराना बताते हुए इसकी आलोचना की गई, जिससे तेजी से बदलती जनसंख्या के संदर्भ में प्रतिनिधित्व असंतुलित हो सकता है।
    • प्रक्रियात्मक एवं संवैधानिक चिंताएँ: आलोचकों ने तर्क दिया कि महिला आरक्षण को अगली जनगणना से अलग करना 106वें संशोधन के मूल संवैधानिक ढाँचे को कमजोर कर सकता है, जिसमें इसे स्पष्ट रूप से नए परिसीमन से जोड़ा गया था।
  • परिणाम: 131वाँ संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो पाया, जो गहरे राजनीतिक और संघीय मतभेदों को दर्शाता है, और इसके परिणामस्वरूप परिसीमन विधेयक, 2026 वापस ले लिया गया, जिससे प्रस्तावित सुधार प्रक्रिया रुक गई।

भारत में परिसीमन 

  • अवधारणा: परिसीमन उस प्रक्रिया को संदर्भित करता है, जिसके अंतर्गत राज्यों के बीच सीटों का आवंटन किया जाता है तथा लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है।
  • किसके द्वारा संचालित: यह एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है, जिसका गठन राष्ट्रपति द्वारा संसद द्वारा पारित विधि के माध्यम से किया जाता है।

परिसीमन आयोग के बारे में

  • एक स्वतंत्र, अर्द्ध-न्यायिक निकाय: परिसीमन आयोग को एक स्वायत्त, अर्द्ध-न्यायिक निकाय के रूप में स्थापित किया जाता है, ताकि परिसीमन प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जा सके और निष्पक्ष निर्णय-निर्माण सुनिश्चित किया जा सके।
  • संरचना और नेतृत्व व्यवस्था: इसकी अध्यक्षता एक सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश करते हैं तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं राज्य निर्वाचन आयुक्त पदेन सदस्य के रूप में कार्य करते हैं।
  • निर्णयों की अंतिमता और कानूनी वैधता: आयोग के आदेश अंतिम और बाध्यकारी होते हैं; अधिसूचित होने के बाद वे विधि के समान प्रभाव रखते हैं और उन्हें संसदीय स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती है।
  • संस्थागत ढाँचे का उद्देश्य: यह व्यवस्था परिसीमन प्रक्रिया में तटस्थता, पारदर्शिता और प्रशासनिक दक्षता सुनिश्चित करने के लिए निर्मित की गई है।

  • उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य एक नागरिक, एक वोट, एक मूल्य” के लोकतांत्रिक सिद्धांत को बनाए रखना है, जिससे निर्वाचन क्षेत्रों के बीच जनसंख्या का संतुलन सुनिश्चित हो सके।
  • संवैधानिक ढाँचा: परिसीमन की प्रक्रिया संविधान में अनेक प्रावधानों के माध्यम से सुदृढ़ रूप से निहित है, जो इसके क्षेत्र, अधिकार और सीमाओं को परिभाषित करते हैं।
    • अनुच्छेद-81(2) – समान प्रतिनिधित्व का सिद्धांत: अनुच्छेद-81(2) यह अनिवार्य करता है कि लोकसभा में प्रत्येक राज्य को आवंटित सीटों की संख्या और उसकी जनसंख्या के बीच अनुपात, यथासंभव, समान बना रहे, जिससे राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व में समानता को बढ़ावा मिले।
    • अनुच्छेद-82 – जनगणना के बाद आवधिक पुनर्समायोजन: अनुच्छेद-82 के अनुसार प्रत्येक जनगणना के बाद संसद को एक विधि बनाकर सीटों के आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों के विभाजन का पुनर्समायोजन करना होता है, जिससे प्रतिनिधित्व जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के अनुरूप बना रहे।
    • अनुच्छेद-170 – राज्य विधानसभाओं पर अनुप्रयोग: अनुच्छेद-170 समान सिद्धांतों को राज्य विधानसभाओं पर लागू करता है, जिसके अंतर्गत राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों का आवधिक पुनर्समायोजन आवश्यक है, ताकि जनसंख्या संतुलन बना रहे।
    • अनुच्छेद-327 – संसद की विधायी क्षमता: अनुच्छेद-327 संसद को निर्वाचन से संबंधित सभी पहलुओं पर विधि बनाने का अधिकार देता है, जिसमें परिसीमन आयोग का गठन, शक्तियाँ और कार्यप्रणाली शामिल हैं।
    • अनुच्छेद-329(a)– परिसीमन आदेशों की अंतिमता: अनुच्छेद-329(a) परिसीमन संबंधी विधियों और आदेशों की न्यायिक समीक्षा को स्पष्ट रूप से निषिद्ध करता है, जिससे अंतिमता, निश्चितता और निर्वाचन प्रक्रिया का निर्बाध संचालन सुनिश्चित होता है।

ऐतिहासिक विकास

  • प्रारंभिक चरण–नियमित परिसीमन (1950 के दशक–1970 के दशक): स्वतंत्रता के बाद के दशकों में भारत ने आवधिक पुनर्समायोजन के संवैधानिक प्रावधान का पालन किया।
    • परिसीमन अभ्यास वर्ष 1951, 1961 और 1971 की जनगणना के आधार पर किए गए, जिससे जनसंख्या में परिवर्तन परिलक्षित हुआ तथा निर्वाचन प्रतिनिधित्व व्यापक रूप से संतुलित बना रहा।
  • महत्त्वपूर्ण परिवर्तन – राज्यों के बीच सीट आवंटन पर स्थगन: एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के साथ आया, जिसने वर्ष 1971 की जनगणना के आधार पर राज्यों के मध्य लोकसभा सीटों के आवंटन पर स्थगन (freeze) लागू किया।
    • यह निर्णय जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से लिया गया था, विशेषकर उस समय जब भारत तीव्र जनसंख्या वृद्धि से जूझ रहा था।
    • मुख्य चिंता यह थी कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन उपायों को सफलतापूर्वक लागू किया (मुख्यतः दक्षिण और पश्चिम भारत में), उन्हें कम संसदीय प्रतिनिधित्व प्रदान कर दंडित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को अधिक सीटें प्राप्त होतीं।
  • स्थगन का विस्तार और संशोधन: 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने इस स्थगन को वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया, जिससे कई दशकों तक राज्यों के मध्य सीट आवंटन के लिए वर्ष 1971 की जनसंख्या का उपयोग जारी रहा।
    • इसके पश्चात् 87वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 ने एक सीमित सुधार प्रस्तुत किया, जिसके अंतर्गत वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण की अनुमति दी गई, जिसे वर्ष 2008 के परिसीमन के माध्यम से लागू किया गया।
    • हालाँकि, इस संशोधन ने राज्यों को आवंटित कुल सीटों की संख्या पर लगाए गए स्थगन को यथावत बनाए रखा, जिससे वर्ष 1976 में स्थापित अंतर-राज्यीय संतुलन संरक्षित रहा।
  • वर्तमान स्थिति: इन संवैधानिक प्रावधानों के परिणामस्वरूप, भारत लगभग पाँच दशकों से वर्ष 1971 की जनगणना के आधार पर राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व के साथ कार्य कर रहा है, जबकि देश में व्यापक जनसांख्यिकीय, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन हुए हैं।
    • यद्यपि राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का समय-समय पर पुनर्निर्धारण किया गया है, फिर भी राज्यों के मध्य संसदीय सीटों का अनुपात अपरिवर्तित रहा है, जिससे जनसंख्या-सीट अनुपात में बढ़ती असमानताएँ उत्पन्न हो रही हैं।
  • स्थगन के पीछे तर्क: परिसीमन पर स्थगन का उद्देश्य लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और विकासात्मक प्रोत्साहनों के बीच संतुलन स्थापित करना था।
    • एक ओर, यह राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण उपायों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता था, यह सुनिश्चित करते हुए कि प्रजनन दर में कमी से उनका राजनीतिक प्रभाव कम न हो।
    • दूसरी ओर, इसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता और संघीय स्थिरता को बनाए रखना था, ताकि विभिन्न क्षेत्रों के मध्य राजनीतिक शक्ति में तीव्र परिवर्तन को रोका जा सके।
  • वर्ष 2026 के बाद की संभावित स्थिति: संवैधानिक स्थगन वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के पश्चात् समाप्त होने वाला है, जिससे भारत अपने निर्वाचन और संघीय ढाँचे के एक महत्त्वपूर्ण चरण के निकट है। भविष्य के परिसीमन अभ्यास में निम्नलिखित शामिल होने की संभावना है:
    • नवीनतम जनसंख्या आँकड़ों के आधार पर राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का पुनः आवंटन, तथा
    • वर्तमान जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने हेतु निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का व्यापक पुनर्निर्धारण।

परिसीमन का महत्त्व

  • लोकतांत्रिक वैधता और निर्वाचन समानता: परिसीमन एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” के संवैधानिक सिद्धांत को वास्तविक रूप देता है, क्योंकि यह निर्वाचन क्षेत्रों के आकार में असमानताओं को सुधारता है।
    • वर्तमान में महत्त्वपूर्ण भिन्नताएँ देखी जाती हैं, जहाँ कुछ सांसद 20 लाख से अधिक नागरिकों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि अन्य बहुत कम, जिससे निर्वाचन समानता और लोकतांत्रिक निष्पक्षता कमजोर होती है।
  • संघीय संतुलन और क्षेत्रीय समानता: यह प्रक्रिया राज्यों के बीच राजनीतिक शक्ति के वितरण पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है।
    • जनगणना 2011 के आधार पर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य मिलकर भारत की लगभग एक-चौथाई जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो अधिक संसदीय प्रतिनिधित्व में परिवर्तित हो सकता है, जिससे दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक हाशिए पर जाने की चिंता उत्पन्न होती है।
  • लैंगिक न्याय और राजनीतिक समावेशन: परिसीमन का संबंध 106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम के अंतर्गत महिला आरक्षण के क्रियान्वयन से जुड़ा है।
    • चूँकि वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी केवल लगभग 15% है, इसलिए समयबद्ध परिसीमन वास्तविक राजनीतिक समावेशन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • संस्थागत क्षमता और संसदीय कार्यप्रणाली: भारत में सांसद-जनसंख्या अनुपात वैश्विक स्तर पर सबसे कम में से एक है, जिससे प्रतिनिधियों पर निर्वाचन क्षेत्र सेवा और विधायी दायित्वों का अत्यधिक दबाव पड़ता है।
    • एक संतुलित परिसीमन प्रक्रिया शासन की उत्तरदायित्वता और विधायी प्रभावशीलता को बढ़ाने में सहायक हो सकती है।
  • राजनीतिक स्थिरता और राष्ट्रीय एकता: द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग जैसे विशेषज्ञ निकायों ने यह रेखांकित किया है कि प्रतिनिधित्व में असंतुलन संघीय संबंधों को प्रभावित कर सकता है।
    • असमुचित परिसीमन प्रक्रिया विशेष रूप से जनसांख्यिकीय रूप से भिन्न राज्यों के मध्य क्षेत्रीय विभाजन को गहरा कर सकती है।

जनसंख्या गणितीय दृष्टिकोण-वैचारिक सीमाएँ

विस्तार का मुख्य औचित्य इस सिद्धांत पर आधारित है कि अधिक जनसंख्या के लिए अधिक प्रतिनिधित्व आवश्यक है ताकि लोकतांत्रिक समानता बनी रहे। यद्यपि यह सिद्धांत मानक रूप से उचित है, परंतु इसका एकांगी प्रयोग समस्याग्रस्त है।

  • यह प्रतिनिधित्व को केवल संख्यात्मक अनुपात तक सीमित कर देता है और सुलभता, उत्तरदायित्व तथा शासन दक्षता जैसे गुणात्मक पहलुओं की उपेक्षा करता है।
  • यह मान लेता है कि केवल सांसदों की संख्या बढ़ाना ही प्रतिनिधित्व सुधारने का एकमात्र तरीका है, जबकि संस्थागत विकल्पों पर विचार नहीं किया जाता है।
  • यह संचार प्रौद्योगिकी, प्रशासनिक पहुँच और नागरिक सहभागिता में हुए परिवर्तनों को भी पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखता, जिन्होंने प्रतिनिधियों की प्रभावी क्षमता को बढ़ाया है।
    • अतः मुख्य प्रश्न केवल निर्वाचन क्षेत्र के आकार का नहीं, बल्कि यह है कि संस्थागत क्षमता और शासन संरचना नागरिकों की प्रभावी सेवा के लिए पर्याप्त हैं या नहीं।
  • वैश्विक मानकों से विचलन: क्यूब रूट नियम” भारत की जनसंख्या के लिए लगभग 1100 सदस्यों वाले सदन का संकेत देता है; यद्यपि 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक के तहत 850 सीटों का प्रस्ताव इस दिशा में एक कदम है, फिर भी संस्थागत क्षमता की सीमाएँ एक महत्त्वपूर्ण चिंता बनी हुई हैं।

महत्त्वपूर्ण चिंताएँ और संवैधानिक दुविधा 

  • लोकतांत्रिक समानता बनाम संघीय संतुलन: संविधान के अनुच्छेद-81 और 82 जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देते हैं; तथापि 42वाँ संविधान संशोधन (1976) द्वारा लागू स्थगन संघीय संतुलन को बनाए रखने की आवश्यकता को दर्शाता है, जिससे एक स्थायी संरचनात्मक तनाव उत्पन्न होता है।
  • असमान जनसांख्यिकीय परिवर्तन: भारत के महापंजीयक के अनुसार, कई दक्षिणी राज्यों ने प्रतिस्थापन स्तर प्रजनन दर प्राप्त कर ली है, जबकि कुछ उत्तरी राज्यों में उच्च जनसंख्या वृद्धि जारी है।
    • यह अंतर इस चिंता को जन्म देता है कि परिसीमन उन राज्यों को दंडित कर सकता है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया।
  • अत्यधिक संस्थागत विवेकाधिकार: संसद को परिसीमन के लिए जनगणना आधार निर्धारित करने की अनुमति देने का प्रस्ताव, पारंपरिक नियम-आधारित संवैधानिक ढाँचे से विचलन को दर्शाता है, जिससे प्रक्रिया के राजनीतीकरण की आशंका बढ़ती है।
  • संसदीय विस्तार की अपरिवर्तनीयता: लोकसभा की सदस्य संख्या में कोई भी बड़ा विस्तार एक स्थायी संरचनात्मक परिवर्तन होगा।
    • उदाहरणतः, लगभग 850 सदस्यों तक विस्तार करने से यह विश्व की सबसे बड़ी विधायी संस्थाओं में से एक बन जाएगी, जिससे दक्षता, लागत और निर्णय-निर्माण पर प्रभाव पड़ेगा।
  • नीतिगत संबंधों का अनुचित निर्धारण: महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना एक महत्त्वपूर्ण सुधार के क्रियान्वयन में विलंब करता है।
  • पूर्व में भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति जैसे निकायों ने महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए समयबद्ध और स्वतंत्र उपायों की आवश्यकता पर बल दिया था।
  • स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं की उपेक्षा: द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग और भारत के वित्त आयोग की रिपोर्टों ने निरंतर यह रेखांकित किया है कि प्रभावी शासन काफी सीमा तक सशक्त स्थानीय निकायों पर निर्भर करता है, न कि केवल संसदीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर।
  • राजनीतिक और संघीय सहमति का अभाव: हालिया विधायी प्रस्तावों की विफलता यह दर्शाती है कि परिसीमन एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा है, जिसके लिए व्यापक सर्वसम्मति आवश्यक है।
  • उच्च सदन का कमजोर होना (संघीय असंतुलन): लोकसभा की सदस्य संख्या को 850 तक बढ़ाने पर, यदि राज्यसभा में समानुपातिक वृद्धि नहीं होती, तो अनुपात लगभग 2.2:1 से 3.4:1 हो जाएगा, जिससे संयुक्त बैठक (अनुच्छेद-108) में राज्यसभा की भूमिका कमजोर हो जाएगी और राज्यों की परिषद के रूप में उसका कार्य प्रभावित होगा।
  • जनसांख्यिकीय दंड” का विरोधाभास: केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों, जिन्होंने सफलतापूर्वक जनसंख्या नियंत्रण नीतियाँ लागू की हैं, को राजनीतिक प्रभाव में कमी का जोखिम हो सकता है, जिससे “सफलता प्रेरित दंड” की स्थिति उत्पन्न होती है, जहाँ विकासात्मक दक्षता राजनीतिक हाशिए पर जाने में परिवर्तित हो जाती है।
  • मूल संरचना के लिए खतरा: चूँकि संघवाद और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव को मूल संरचना का हिस्सा माना गया है (जैसा कि केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य और इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण मामलों में प्रतिपादित किया गया), इसलिए क्षेत्रीय रूप से पक्षपाती परिसीमन को असंवैधानिक ठहराया जा सकता है, भले ही अनुच्छेद-329(a) के अंतर्गत न्यायिक समीक्षा पर प्रतिबंध हो।

वैश्विक सर्वोत्तम अभ्यास एवं तुलनात्मक मॉडल 

  • घटती आनुपातिकता (यूरोपीय संघ मॉडल): यूरोपीय संसद में घटती आनुपातिकता का सिद्धांत अपनाया जाता है, जहाँ छोटे राज्यों को बड़े राज्यों की तुलना में प्रति व्यक्ति अधिक सीटें प्रदान की जाती हैं।
    • भारत के लिए यह दृष्टिकोण उत्तर–दक्षिण विभाजन को संतुलित कर सकता है, जिससे उच्च जनसंख्या वाले राज्यों को सीटें मिलें, जबकि जनसंख्या स्थिरीकरण प्राप्त करने वाले राज्यों का प्रभाव उनकी मात्रात्मक हिस्सेदारी से अधिक बना रहे।
  • ग्रैंडफादर क्लॉज” (कनाडाई मॉडल): कनाडा में संवैधानिक प्रावधान यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी प्रांत को अपनी पारंपरिक सीट संख्या से कम सीट प्राप्त न हों।
    • भारत में इसी प्रकार की न्यूनतम सीट सीमा” की गारंटी पूर्ण प्रतिनिधित्व में कमी को रोक सकती है और जनसांख्यिकीय दंड की आशंकाओं को दूर कर सकती है।
  • क्यूब रूट’ नियम (सैद्धांतिक मानक): एक व्यापक रूप से स्वीकृत राजनीति विज्ञान सिद्धांत के अनुसार, विधायिका का आकार जनसंख्या के घनमूल के लगभग होना चाहिए।
    • भारत (1.4 अरब) के लिए यह लगभग 1100 सदस्यों का संकेत देता है, जिससे स्पष्ट होता है कि 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक के अंतर्गत 850 सीटों का प्रस्ताव एक संतुलित एवं प्रमाण-आधारित विस्तार है, न कि मनमाना।
  • विचलन सीमाएँ (वेनिस आयोग मानक): वेनिस आयोग के अनुसार, निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या में अंतर सामान्यतः 10–15% से अधिक नहीं होना चाहिए, केवल विशेष परिस्थितियों के।
    • यह निर्वाचन समानता और एक नागरिक, एक वोट, एक मूल्य” के सिद्धांत को बनाए रखने की आवश्यकता को सुदृढ़ करता है।
  • सीमांकन बनाम पुनः आवंटन (अमेरिकी मॉडल): संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिनिधि सभा में सीटों की संख्या स्थिर (435) रहती है, जिसे समय-समय पर जनगणना के आधार पर पुनः आवंटित किया जाता है।
    • भारत अब सीमितता मॉडल (1976 के बाद का स्थगन) से हटकर विस्तार मॉडल की ओर बढ़ रहा है, ताकि बड़े निर्वाचन क्षेत्रों की समस्या का समाधान किया जा सके।
  • द्वि-बहुमत सिद्धांत (स्विस मॉडल): स्विट्जरलैंड में प्रमुख संवैधानिक परिवर्तनों के लिए द्वि-बहुमत आवश्यक होता है, जन समर्थन के साथ-साथ राज्यों (कैंटन) की स्वीकृति।
    • यह भारत में भी व्यापक संघीय सहमति तंत्र की आवश्यकता को दर्शाता है, जिससे परिसीमन सुधार केवल साधारण बहुमत पर आधारित न हों।

आगे की राह

  • संतुलित परिसीमन रणनीति अपनाना: एक संतुलित दृष्टिकोण में राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का तर्कसंगत पुनर्निर्धारण शामिल होगा, जिससे आंतरिक समानता सुनिश्चित हो, जबकि राज्यों के बीच सीटों के वितरण में अचानक परिवर्तन से बचा जा सके।
  • संघीय संतुलन की संस्थागत सुरक्षा: सभी राज्यों में सीटों का आनुपातिक विस्तार या मिश्रित आवंटन मॉडल जैसे नवोन्मेषी तंत्र लोकतांत्रिक समानता और संघीय न्यायसंगतता के बीच संतुलन स्थापित कर सकते हैं, जैसा कि संघीय व्यवस्थाओं के तुलनात्मक अनुभव से स्पष्ट होता है।
  • संवैधानिक, नियम-आधारित ढाँचे का संरक्षण: परिसीमन को अनुच्छेद-82 और 170 के अंतर्गत एक अनिवार्य एवं संवैधानिक रूप से निहित प्रक्रिया बनाए रखना चाहिए, न कि इसे विवेकाधीन राजनीतिक निर्णयों पर आधारित किया जाए।
  • महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करना: महिला आरक्षण को स्वतंत्र रूप से और बिना विलंब लागू किया जाना चाहिए, आवश्यक होने पर उपलब्ध आँकड़ों का उपयोग करते हुए, ताकि लैंगिक न्याय की समयबद्ध प्रगति सुनिश्चित हो सके।
  • जमीनी स्तर के लोकतांत्रिक संस्थानों को सुदृढ़ करना: भारत के वित्त आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार, पंचायतों और नगरपालिकाओं को अधिक वित्तीय हस्तांतरण तथा प्रशासनिक सशक्तीकरण प्रदान करना नागरिक-स्तर के शासन में सुधार के लिए आवश्यक है।
  • व्यापक राष्ट्रीय परामर्श का आयोजन: राज्यों, राजनीतिक दलों और विषय-विशेषज्ञों को सम्मिलित करते हुए एक संरचित परामर्श प्रक्रिया आवश्यक है, ताकि परिसीमन सुधारों पर व्यापक तथा स्थायी सहमति विकसित की जा सके।
  • दीर्घकालिक जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियों के अनुरूप सुधार: संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या प्रभाग के अनुमानों के अनुसार, भारत की जनसंख्या 2060 के दशक के आस-पास चरम पर पहुँच सकती है, जिससे स्पष्ट होता है कि सुधारों को दीर्घकालिक संस्थागत दृष्टिकोण के साथ डिजाइन किया जाना चाहिए।
  • अंतर-राज्य परिषद को सुदृढ़ करना (अनुच्छेद-263): सीटों के वितरण में किसी भी संशोधन को सर्वसम्मति-आधारित होना चाहिए। अंतर-राज्यीय परिषद को विधायी कार्रवाई से पूर्व उत्तर–दक्षिण प्रतिनिधित्व संतुलन पर वार्ता के लिए प्रमुख मंच के रूप में कार्य करना चाहिए।
  • भारित प्रतिनिधित्व मॉडल की खोज: भारत मिश्रित आवंटन या भारित मतदान तंत्र पर विचार कर सकता है, जिससे जर्मन बुंडेस्टाग के समान सीटों में वृद्धि को केवल जनसंख्या वृद्धि से आंशिक रूप से अलग किया जा सके,, ताकि जनसंख्या स्थिरीकरण प्राप्त राज्यों के हितों की रक्षा की जा सके।

निष्कर्ष

परिसीमन पर बहस केवल सीटों के विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक समानता और संघवाद के बीच मूल संतुलन से जुड़ी हुई है, जैसा कि 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक के पारित न होने से स्पष्ट होता है। केवल जनसंख्या-आधारित दृष्टिकोण संघीय असंतुलन का जोखिम उत्पन्न करता है, जबकि अत्यधिक कठोरता लोकतांत्रिक वैधता को कमजोर करती है; अतः भारत के लिए केवल एक बड़ी संसद नहीं, बल्कि एक संतुलित, दूरदर्शी संवैधानिक ढाँचा आवश्यक है।

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