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आपराधिक न्याय प्रणाली में डिजिटलीकरण और दक्षता

Lokesh Pal July 17, 2026 04:01 8 0

संदर्भ 

भारत सरकार ने 1 जुलाई, 2027 से आपराधिक न्याय प्रणाली के पूर्णतः डिजिटल रूप से लागू करने की घोषणा की है।

संबंधित तथ्य

इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) क्या है?

  • यह गृह मंत्रालय (MHA) की एक राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पहल है, जो आपराधिक न्याय प्रणाली के पाँच स्तंभों को डिजिटल रूप से एकीकृत कर एजेंसियों के मध्य सुरक्षित एवं वास्तविक समय में सूचना के निर्बाध आदान-प्रदान को सुनिश्चित करती है।
  • पाँच एकीकृत स्तंभ:
    • पुलिस: CCTNS के माध्यम से अपराध पंजीकरण, जाँच और कानून प्रवर्तन।
    • न्यायालय: ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट के माध्यम से डिजिटल केस प्रबंधन और न्यायिक कार्यवाही।
    • कारागार (जेल): ई-प्रिजन्स (e-Prisons) के माध्यम से कारागार प्रशासन और बंदी प्रबंधन करना ।
    • अभियोजन: ई-प्रॉसिक्यूशन के माध्यम से अभियोजन की डिजिटल संवीक्षा और प्रबंधन करना।
    • न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशालाएं (FSLs): ई-फॉरेेंसिक्स (e-Forensics) के माध्यम से न्यायालयिक साक्ष्यों का इलेक्ट्रॉनिक प्रबंधन और ट्रैकिंग करना।

  • इस लागू होने के पश्चात्, नए आपराधिक कानूनों के अंतर्गत जाँच और विचारण संबंधी (ट्रायल)  प्रक्रियाओं को इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के माध्यम से डिजिटल अभिलेखन किया जाएगा।

अपराधिक न्याय प्रणाली (CJS) के बारे में:

  • अपराधिक न्याय प्रणाली वह संस्थागत ढाँचा है, जो कानून और व्यवस्था बनाए रखने, अपराधों की जाँच करने, अपराधियों पर अभियोजन चलाने और न्याय सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी है।

आपराधिक न्याय की प्रक्रियात्मक शृंखला

प्रक्रियात्मक दक्षता से अभिप्राय यह सुनिश्चित करना है कि आपराधिक न्याय प्रणाली का प्रत्येक प्रक्रियात्मक चरण विधिसम्मत, समयबद्ध एवं निर्बाध रूप से संपन्न हो। इसमें प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) का पंजीकरण, वैज्ञानिक एवं निष्पक्ष विवेचना, आरोप-पत्र) का न्यायालय में प्रस्तुतीकरण, विचारण के दौरान साक्ष्यों एवं गवाहों का परीक्षण तथा अंततः न्यायिक निर्णय के माध्यम से मामले का अंतिम निस्तारण सम्मिलित है।

  • उद्देश्य
    • प्राण, स्वतंत्रता और संपत्ति की सुरक्षा: यह संवैधानिक संरक्षण के तहत जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकारों को सुनिश्चित करते हुए अपराध के विरुद्ध व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करता है।
    • शीघ्र और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना: यह सम्यक प्रक्रिया (due process), निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप समयबद्ध अन्वेषण तथा ट्रायल को बढ़ावा देता है।
    • पीड़ितों एवं अभियुक्तों के अधिकारों का संरक्षण: यह व्यवस्था पीड़ितों के न्याय प्राप्त करने के अधिकार तथा अभियुक्तों के निष्पक्ष ट्रायल, विधिसम्मत प्रक्रिया एवं विधिक संरक्षण के अधिकारों के मध्य संतुलन स्थापित करती है।
    • विधि का शासन और जनविश्वास बनाए रखना: यह विधि की सर्वोच्चता को बनाए रखता है, अपराधों का निवारण करता है और न्याय वितरण प्रणाली में नागरिकों के विश्वास को सुदृढ़ करता है।

अपराधिक न्याय प्रणाली 

प्रतिपक्षी/आरोपात्मक प्रणाली (Adversarial System) अन्वेषणात्मक/जिज्ञासात्मक प्रणाली (Inquisitorial System)
न्यायाधीश एक तटस्थ निर्णायक के रूप में कार्य करता है, जो पक्षों द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर वादों का निस्तारण करता है। न्यायाधीश साक्ष्य संग्रह का पर्यवेक्षण और गवाहों की जाँच करके एक अन्वेषण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अभियोजन (Prosecution) और बचाव पक्ष (Defence) न्यायालय के समक्ष साक्ष्य और तर्क प्रस्तुत करके कार्यवाही को नियंत्रित करते हैं। न्यायाधीश अन्वेषण की प्रक्रिया का मार्गदर्शन करता है तथा सत्य की स्थापना हेतु स्वतंत्र रूप से प्रासंगिक साक्ष्यों का संकलन और परीक्षण करता है।
यह प्रक्रियात्मक निष्पक्षता तथा पक्षकारों के मध्य निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा सुनिश्चित करने पर बल देता है। यह वस्तुनिष्ठ सत्य की खोज को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए तात्विक न्याय (जो प्रक्रियागत त्रुटियों की अपेक्षा वास्तविक तथ्यों एवं न्यायोचित परिणाम पर आधारित होता है) की स्थापना पर बल देता है।
यह विधि भारत, यूनाइटेड किंगडम तथा संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे कॉमन लॉ परंपरा वाले देशों में प्रचलित है। यह विधि मुख्यतः फ्राँस, जर्मनी, इटली और स्पेन जैसे सिविल लॉ परंपरा पर आधारित देशों में प्रचलित है।
न्यायिक हस्तक्षेप (Judicial intervention) ट्रायल के दौरान निष्पक्षता बनाए रखने तक ही सीमित होता है। न्यायिक हस्तक्षेप व्यापक होता है, जिसमें न्यायाधीश संपूर्ण कार्यवाही के दौरान एक केंद्रीय भूमिका निभाता है।

पूर्ववर्ती आपराधिक न्याय प्रणाली वर्तमान ढाँचे से किस प्रकार भिन्न है?

पूर्ववर्ती ढाँचा (IPC और CrPC) वर्तमान ढाँचा (BNS और BNSS)
दंड-केंद्रित दृष्टिकोण (Punishment-centric approach), जो मुख्य रूप से अपराधी को दंडित करने पर केंद्रित था। न्याय-केंद्रित दृष्टिकोण (Justice-centric approach), जिसका उद्देश्य जवाबदेही बनाए रखते हुए निष्पक्ष, समयबद्ध और पीड़ित-उन्मुख न्याय सुनिश्चित करना है।
यह औपनिवेशिक दृष्टिकोण को दर्शाता था, जहाँ राज्य की सत्ता की रक्षा करना एक प्राथमिक उद्देश्य था। यह नागरिक-केंद्रित और लोकतांत्रिक दर्शन को अपनाता है, जिसमें व्यक्तिगत अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों पर अधिक बल दिया जाता है।
आपराधिक विचारणों में अभियुक्त को मुख्य रूप से एक ‘अपराधी‘ के रूप में देखा जाता था, जिसमें प्रतिस्पर्द्धी अधिकारों के मध्य संतुलन पर सीमित बल दिया जाता था। यह अभियुक्त को एक ऐसे नागरिक के रूप में देखता है, जिसे आरोप सिद्ध होने तक निर्दोष माना जाता है, अभियुक्त के अधिकारों के साथ पीड़ितों के अधिकारों का संतुलन सुनिश्चित करता है।
राज्य के अभियोजन तथा कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने पर अधिक बल दिया जाता था। प्रभावी अभियोजन के साथ-साथ यह पीड़ितों की सक्रिय भागीदारी, उनके अधिकारों के संरक्षण तथा पुनर्स्थापनात्मक न्याय को भी विशेष महत्त्व प्रदान करता है।
प्रक्रियाएँ अत्यधिक लंबी, जटिल एवं कागज-आधारित होने के कारण निर्णय लेने और सेवाओं के निष्पादन में अनावश्यक विलंब तथा प्रक्रियागत अक्षमताएँ उत्पन्न होती थीं। समयबद्ध अन्वेषणों, डिजिटल प्रक्रियाओं, ई-एफआईआर (e-FIRs), इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और प्रौद्योगिकी-सक्षम न्याय वितरण को बढ़ावा देता है।
मुख्य रूप से अपराध की घटना के बाद प्रतिशोधात्मक दंड पर केंद्रित था। यह त्वरित, पारदर्शी एवं नागरिक-केंद्रित न्याय वितरण सुनिश्चित करते हुए प्रतिशोधात्मक न्याय की अवधारणा को अधिक सुदृढ़ करता है।

अपराधिक न्याय प्रणाली में प्रमुख डिजिटल सुधार

  • शृंखलाबद्ध डिजिटल आपराधिक प्रक्रिया: यह प्रणाली आपराधिक न्याय प्रक्रिया को अधिक दक्ष, पारदर्शी एवं त्वरित बनाने के उद्देश्य से ई-एफआईआर, डिजिटल केस डायरी, इलेक्ट्रॉनिक आरोप-पत्र, डिजिटल समन एवं वारंट, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रबंधन, ऑनलाइन न्यायालयी अभिलेख तथा डिजिटल कारागार प्रबंधन जैसी डिजिटल व्यवस्थाओं को लागू करती है।
  • मेघराज गवर्मेंट क्लाउड (MeghRaj Government Cloud): यह आपराधिक न्याय के रिकॉर्ड को मेघराज गवर्मेंट क्लाउड पर सुरक्षित रखता है, जिससे सुरक्षित डेटा भंडारण, अधिकृत पहुँच, कागजी कार्रवाई में कमी और विभिन्न एजेंसियों के बीच सूचनाओं का निर्बाध साझाकरण सुनिश्चित होता है।
  • BNSS के तहत वैज्ञानिक अन्वेषण: यह सात वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय अपराधों के लिए न्यायिक जाँच को अनिवार्य बनाता है, जिससे साक्ष्य-आधारित अन्वेषण सुदृढ़ होता है; इस सुधार को सहायता प्रदान करने के लिए न्यायिक प्रयोगशालाओं की संख्या वर्ष 2023 के 129 से बढ़कर वर्ष 2025 में 154 हो गई है।
  • ई-साक्ष्य (डिजिटल साक्ष्य प्रबंधन): यह तस्वीरों, वीडियो और न्यायिक साक्ष्यों की डिजिटल रिकॉर्डिंग, भंडारण और हस्तांतरण को सक्षम बनाता है, जिससे अभिरक्षा मजबूत होती है और अन्वेषण की विश्वसनीयता में सुधार होता है।
  • ई-फॉरेेंसिक्स और मोबाइल फॉरेेंसिक इकाइयाँ (वैज्ञानिक अपराध स्थल अन्वेषण): यह अपराध स्थलों पर साक्ष्यों के समयबद्ध संग्रह, संरक्षण और परीक्षण को सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल फॉरेेंसिक उपकरणों, मोबाइल फॉरेेंसिक वैन और एआई-सहायता प्राप्त विश्लेषण का उपयोग करता है।
  • ई-कोर्ट्स एकीकरण (डिजिटलकृत न्यायिक प्रक्रियाएँ): यह ई-फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई, डिजिटल अभिलेखों के माध्यम से न्यायिक विलंब कम कर सुलभता, पारदर्शिता एवं दक्षता बढ़ाता है।
  • क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स (CCTNS): यह एक राष्ट्रव्यापी ई-गवर्नेंस आधारित पुलिस नेटवर्किंग प्रणाली है, जो देशभर के पुलिस थानों को डिजिटल रूप से जोड़कर ऑनलाइन एफआईआर पंजीकरण, अपराध एवं अपराधी रिकॉर्ड प्रबंधन, अन्वेषण सहायता तथा अपराध संबंधी सूचनाओं के वास्तविक समय में आदान-प्रदान की सुविधा प्रदान करती है।

अपराधिक न्याय प्रणाली के डिजिटलीकरण की आवश्यकता

  • प्रक्रियात्मक दक्षता में सुधार: डिजिटलीकरण ई-एफआईआर पंजीकरण, डिजिटल केस डायरी, इलेक्ट्रॉनिक आरोप-पत्र और रिकॉर्ड के निर्बाध हस्तांतरण को सक्षम बनाता है, जिससे कागजी कार्रवाई, दोहराव और प्रक्रियात्मक विलंब में कमी आती है।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही में वृद्धि: एक सुरक्षित डिजिटल ऑडिट ट्रेल अन्वेषण और अभियोजन के प्रत्येक चरण को रिकॉर्ड करता है, जिससे हेर-फेर, रिकॉर्ड के गुम होने और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं की गुंजाइश कम होती है।
  • न्याय वितरण में तेजी: एफआईआर, आरोप-पत्र, समन, वारंट और न्यायालयी रिकॉर्ड के इलेक्ट्रॉनिक प्रेषण से अन्वेषण और विचारण में तेजी आती है, जिससे प्रक्रियात्मक बाधाएँ और मामलों की लंबितता कम होती है।
  • साक्ष्य प्रबंधन का सुदृढ़ीकरण: डिजिटलीकरण डिजिटल साक्ष्यों के सुरक्षित संरक्षण, इलेक्ट्रॉनिक अभिरक्षा शृंखला तथा प्रमाणित न्यायालयिक रिपोर्टों को सुनिश्चित करता है, जिससे साक्ष्यों की सत्यनिष्ठा, विश्वसनीयता तथा न्यायालयों में उनकी स्वीकार्यता सुदृढ़ होती है। साथ ही, यह ICJS चरण-II के अंतर्गत एआई-सक्षम अन्वेषण एवं न्यायालयिक विश्लेषण को भी सशक्त बनाता है।
  • नागरिक-केंद्रित शासन को बढ़ावा: नागरिक ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकते हैं, एफआईआर को ट्रैक कर सकते हैं, पुलिस सत्यापन की माँग कर सकते हैं, मामले की स्थिति की निगरानी कर सकते हैं और डिजिटल रूप से न्याय सेवाओं तक पहुँच प्राप्त कर सकते हैं, जिससे पुलिस थानों के अनावश्यक चक्कर लगाने की आवश्यकता कम होती है और सुलभता व पीड़ित सहायता में सुधार होता है।
  • बेहतर समन्वय को सक्षम बनाना: ICJS पुलिस, न्यायालयों, कारागारों, अभियोजन और न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशालाओं के मध्य वास्तविक समय में सूचना साझाकरण को सक्षम बनाता है, जिससे संस्थागत अलगाव समाप्त होता है तथा समन्वित अन्वेषण, अभियोजन और न्यायनिर्णयन सुनिश्चित होता है।

अपराधिक न्याय प्रणाली के डिजिटलीकरण में चुनौतियाँ

  • डिजिटल विभाजन: विभिन्न राज्यों में डिजिटल अवसंरचना और इंटरनेट कनेक्टिविटी में व्यापक असमानताएँ प्रौद्योगिकी-सक्षम आपराधिक न्याय सेवाओं के एकसमान कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न करती हैं।
    • उदाहरण के लिए: यद्यपि भारत का इंटरनेट उपयोगकर्ता आधार 1.09 बिलियन को पार कर गया है, फिर भी ग्रामीण इंटरनेट पहुँच लगभग 47 सब्सक्रिप्शन प्रति 100 व्यक्ति है, जो शहरी दर की तुलना में आधी है।
  • साइबर सुरक्षा जोखिम: आपराधिक रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्य साइबर हमलों, डेटा उल्लंघन और अनधिकृत पहुँच के प्रति संवेदनशील होते हैं, जिसके लिए मजबूत साइबर सुरक्षा तंत्र की आवश्यकता होती है।
  • गोपनीयता संबंधी चिंताएँ: आपराधिक रिकॉर्ड के बड़े पैमाने पर डिजिटल भंडारण और साझाकरण के लिए डेटा संरक्षण सिद्धांतों के सख्त अनुपालन और दुरुपयोग के विरुद्ध सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है।
  • क्षमता संबंधी बाधाएँ: प्रभावी कार्यान्वयन, डिजिटल प्रौद्योगिकियों में पुलिस अधिकारियों, अभियोजकों, न्यायालयिक विशेषज्ञों और न्यायिक अधिकारियों के नियमित प्रशिक्षण पर निर्भर करता है।

अपराधिक न्याय सुधार में न्यायपालिका की भूमिका 

  • न्यायालय अपने निर्णयों के माध्यम से विधायी कमियों को दूर करते हैं, जिससे अपराधिक न्याय प्रणाली के क्रमिक विकास का मार्ग प्रशस्त  होता है।
  • उदाहरण: विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997): इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम हेतु विशाखा दिशा-निर्देश जारी किए तथा इसे संविधान के अनुच्छेद-14, 15 एवं 21 का उल्लंघन माना। इन दिशा-निर्देशों को बाद में कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध एवं प्रतितोष) अधिनियम, 2013 के माध्यम से वैधानिक स्वरूप प्रदान किया गया।

    • उदाहरण के लिए: गृह मंत्रालय ने 33 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में साइबर फॉरेंसिक-सह-प्रशिक्षण प्रयोगशालाएँ स्थापित की हैं, जिसके तहत 24,600 से अधिक कानून प्रवर्तन एजेंसी (LEA) कर्मियों, अभियोजकों और न्यायिक अधिकारियों को साइबर अपराध अन्वेषण तथा डिजिटल फॉरेंसिक्स पर विशिष्ट प्रशिक्षण प्रदान किया गया है।
  • अवसंरचनात्मक कमी: फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं, प्रशिक्षित विशेषज्ञों और विश्वसनीय ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी की कमी, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, इसके कुशल कार्यान्वयन को प्रभावित करती है।
  • अंतर-कार्यक्षमता संबंधी मुद्दे: विभिन्न राज्यों में अलग-अलग सॉफ्टवेयर प्रणालियाँ और भिन्न तकनीकी मानक, आपराधिक न्याय संस्थानों के बीच निर्बाध सूचना साझाकरण में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • कार्यान्वयन अंतराल: निरंतर चल रहे सुधारों के बावजूद, केवल 46% एफआईआर ही न्यायालयों में डिजिटल रूप से प्रेषित की जाती हैं , जो शृंखलाबद्ध डिजिटल एकीकरण में कमियों को दर्शाती हैं।

आगे की राह

  • पूर्ण ICJS एकीकरण: वास्तविक समय में सूचना साझाकरण सुनिश्चित करने के लिए इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) के माध्यम से पुलिस, न्यायालयों, कारागारों, अभियोजन और फॉरेंसिक संस्थानों को पूर्णतः एकीकृत किया जाए।
  • डिजिटल अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण: पुलिस थानों, न्यायालयों, फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं और डिजिटल संचार नेटवर्क को विश्वसनीय हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर तथा हाई-स्पीड इंटरनेट के साथ उन्नत किया जाए।
  • क्षमता निर्माण: अन्वेषकों, अभियोजकों, न्यायिक अधिकारियों और फॉरेंसिक पेशेवरों के लिए नियमित डिजिटल साक्षरता और प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।
  • सुदृढ़ साइबर सुरक्षा: आपराधिक न्याय डेटा की सुरक्षा के लिए एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन , बहु-कारक प्रमाणीकरण (Multi-factor authentication), आवधिक सुरक्षा ऑडिट और आपदा प्रबंधन तंत्र को लागू किया जाए।
  • समान राष्ट्रीय मानक: सभी राज्यों में एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल साक्ष्य, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, अंतर-कार्यक्षमता और डेटा साझाकरण के लिए सामान्य मानक विकसित किए जाएँ।
  • वैज्ञानिक अन्वेषण का सुदृढ़ीकरण: साक्ष्य-आधारित अन्वेषणों को सहायता प्रदान करने के लिए फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की संख्या बढ़ाई जाए, मोबाइल फॉरेंसिक इकाइयों को तैनात किया जाए और कुशल विशेषज्ञों की भर्ती की जाए।
  • नागरिक-अनुकूल डिजिटल सेवाएँ: सुलभता, पारदर्शिता और जनविश्वास में सुधार करने के लिए ऑनलाइन एफआईआर ट्रैकिंग, डिजिटल समन, वर्चुअल सुनवाई, बहुभाषी इंटरफेस और मोबाइल-आधारित सेवाओं को बढ़ावा दिया जाए।

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