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कैस्पियन सागर का संकुचन

Lokesh Pal July 17, 2026 04:15 9 0

संदर्भ:

हाल ही में किए गए एक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि कैस्पियन सागर जलवायु परिवर्तन तथा मानवीय हस्तक्षेपों के कारण तीव्र गति से सिकुड़ रहा है, जिससे पारिस्थितिकीय, जलवैज्ञानिक तथा क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधी गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही हैं।

कैस्पियन सागर के बारे में:

  • विश्व का सबसे बड़ा अंतर्देशीय जल निकाय: कैस्पियन सागर विश्व का सबसे बड़ा संलग्न अंतर्देशीय जल निकाय (Enclosed Inland Water Body) है (जिसे प्रायः विश्व की सबसे बड़ी झील भी माना जाता है), जिसका क्षेत्रफल लगभग 3,71,000 वर्ग किलोमीटर है।
    • इसके उत्तरी भाग का जल लगभग मीठा है, जबकि दक्षिणी भाग की ओर बढ़ने पर यह क्रमशः अधिक लवणीय हो जाता है।
  • अवस्थिति: यह यूरोप और एशिया के बीच स्थित है तथा इसकी सीमाएँ रूस, कजाखस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान और अजरबैजान से लगती हैं।
  • एंडोरहिक बेसिन: यह ऐसा बंद अपवाह क्षेत्र है, जहाँ नदियों का जल महासागरों तक नहीं पहुँचता, बल्कि झीलों या अंतर्देशीय जल निकायों में एकत्र होकर अंततः वाष्पित हो जाता है।

  • प्रमुख जल प्रवाह: इसमें लगभग 130 नदियों का जल आता है, जिनमें वोल्गा नदी कुल मीठे जल के प्रवाह का लगभग 80% योगदान देती है।
  • जैव विविधता का हॉटस्पॉट: इसकी लगभग 80% जलीय प्रजातियाँ स्थानिक हैं, जिनमें कैस्पियन सील तथा स्टर्जन (Sturgeon) की अनेक प्रजातियाँ शामिल हैं, जो ऐतिहासिक रूप से विश्व के लगभग 90% ब्लैक कैवियार (Black Caviar) का उत्पादन करती थीं।
  • सामरिक महत्त्व: इसमें तेल एवं प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार मौजूद हैं तथा यह यूरोप, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया को जोड़ने वाला एक प्रमुख परिवहन गलियारा है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) से जुड़े मार्ग भी शामिल हैं।

संकुचन के कारण

  • नदी जल प्रवाह में कमी: विशेषकर वोल्गा नदी से मीठे जल के प्रवाह में कमी, जो बाँधों, जलाशयों, नदियों के मार्ग में परिवर्तन (River Diversions) तथा सिंचाई हेतु अत्यधिक जल दोहन के कारण हुई है।
  • जलवायु परिवर्तन: बढ़ते तापमान के कारण वाष्पीकरण की दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो समुद्र में आने वाले मीठे जल के प्रवाह से अधिक हो गई है।
  • सतही तापमान में वृद्धि: 20वीं शताब्दी के मध्य से समुद्री सतह का औसत तापमान लगभग 1°C बढ़ गया है, जिससे जल हानि की प्रक्रिया तीव्र हुई है।
  • बदलती जलवायु परिस्थितियाँ: पवन प्रतिरूपों में परिवर्तन तथा दीर्घकालिक तापवृद्धि ने इस संलग्न बेसिन में वाष्पीकरण को और अधिक तीव्र कर दिया है।

इसके प्रमुख पारिस्थितिकीय एवं सामाजिक-आर्थिक प्रभाव:

  • जैव विविधता का ह्रास: उथले जल क्षेत्रों के सिकुड़ने से स्थानिक प्रजातियों के प्रजनन आवास संकट में हैं, जिनमें संकटग्रस्त कैस्पियन सील तथा बेलूगा स्टर्जन शामिल हैं।
  • मत्स्य पालन में गिरावट: जल स्तर में कमी तथा आवासों के क्षरण से मछलियों की आबादी घट रही है, जिससे वैश्विक कैवियार उद्योग (अधिकांश कैवियार कैस्पियन सागर की स्टर्जन मछलियों से प्राप्त होता है ) प्रभावित हो रहा है।
  • शैवाल प्रस्फुटन (एल्गल ब्लूम्स): क्लोरोफिल-ए की बढ़ती सांद्रता हानिकारक शैवाल प्रस्फुटन में वृद्धि का संकेत देती है, जिससे जल गुणवत्ता में गिरावट आ रही है।
  • आर्द्रभूमियों का क्षरण: आर्द्रभूमियों के नष्ट होने से यूरोप-एशिया-अफ्रीका प्रवासी पक्षी फ्लाइवे के साथ स्थित प्रवासी पक्षियों के आवास खतरे में पड़ रहे हैं।
  • धूल एवं लवणीय तूफान: समुद्री तल के उजागर होने से विषैली धूल के कण एवं लवणीय तूफान मानव स्वास्थ्य एवं कृषि के लिए खतरा बनेंगे।
  • नौवहन संबंधी चुनौतियाँ: जल स्तर में गिरावट से नौवहन क्षमता कम हो रही है, जिससे समुद्री परिवहन, क्षेत्रीय व्यापार तथा ऊर्जा परिवहन प्रभावित हो रहे हैं।
  • आजीविका पर प्रभाव: मत्स्यपालन, समुद्री परिवहन तथा पर्यटन पर निर्भर तटीय समुदायों की सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलता बढ़ रही है।

भारत के लिए इसका महत्त्व क्यों है?

  • अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC): नौवहन क्षमता में कमी से INSTC की दक्षता प्रभावित हो सकती है, जो भारत को मध्य एशिया, रूस तथा यूरोप से जोड़ने वाला एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक गलियारा है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: कैस्पियन क्षेत्र के विशाल तेल एवं प्राकृतिक गैस भंडार, भारत के दीर्घकालिक ऊर्जा विविधीकरण के लिए सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
  • क्षेत्रीय कनेक्टिविटी: पर्यावरणीय क्षरण से यूरेशियाई क्षेत्र के साथ भारत की बढ़ती आर्थिक सहभागिता प्रभावित हो सकती है।

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