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विवाह के उपरांत वित्तीय प्रभुत्व को’क्रूरता’ नहीं माना जा सकता

Lokesh Pal January 03, 2026 04:15 23 0

संदर्भ 

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है कि पति द्वारा पत्नी पर आर्थिक नियंत्रण को तब तक क्रूरता” नहीं माना जा सकता, जब तक उससे मानसिक या शारीरिक क्षति सिद्ध न हो।

पृष्ठभूमि

  • एक महिला ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (दहेज उत्पीड़न एवं क्रूरता) के अंतर्गत अपने पति और उसके परिवार के विरुद्ध प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई थी।
  • उसने उन पर वित्तीय नियंत्रण सहित क्रूरता का आरोप लगाया, जिसमें उसे घरेलू खर्चों की ‘एक्सेल शीट’ बनाए रखने के लिए मजबूर करना और प्रसव के बाद वजन बढ़ने के कारण उसे अपमानित महसूस कराना शामिल था।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

  • आर्थिक नियंत्रण क्रूरता नहीं: न्यायालय ने कहा कि केवल आर्थिक प्रभुत्व अपने आप में क्रूरता नहीं है, जब तक उससे मानसिक/शारीरिक क्षति न हो।
  • वैवाहिक यथार्थ: न्यायालय ने स्वीकार किया कि भारतीय घरों में पुरुषों का वित्तीय प्रभुत्व एक सामान्य सामाजिक वास्तविकता है।
  • वैवाहिक मामलों में सावधानी का आह्वान: व्यक्तिगत शिकायतों के निपटारे के लिए आपराधिक मुकदमों के दुरुपयोग से सतर्क रहने की चेतावनी दी गई।
  • मानसिक और भावनात्मक क्षति: न्यायालय ने महिला द्वारा अपने पति के आचरण को लेकर लगाए गए आरोपों, जैसे प्रसवोत्तर वजन पर ताने मारना तथा गर्भावस्था के दौरान समुचित देखभाल न करना, को पति की चरित्रहीनता का संकेत तो माना, किंतु उन्हें कानूनी कार्रवाई के लिए आवश्यक स्तर की ‘क्रूरता’ नहीं माना।
  • वर्णित व्यवहार कोवैवाहिक जीवन की सामान्य कठिनाइयों’ का हिस्सा माना गया।
  • पर्याप्त साक्ष्य की आवश्यकता: निर्णय में इस बात पर जोर दिया गया कि सामान्य या अस्पष्ट दावों के आधार पर क्रूरता सिद्ध नहीं की जा सकती।

भारतीय दंड संहिता की धारा 498A

  • भारतीय दंड संहिता की धारा 498A विवाहित महिला के प्रति पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की गई क्रूरता से संबंधित है।
  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 इसी प्रकार की क्रूरता से संबंधित प्रावधान से संबंधित है।
  • धारा 498A क्यों लाई गई?
    • 1980 के दशक में दहेज हत्याओं और घरेलू हिंसा की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर भारतीय दंड संहिता में धारा 498A जोड़ी गई थी।
    • इसका उद्देश्य उन महिलाओं को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना था, जो निम्नलिखित समस्याओं का सामना कर रही थीं:
      • शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न,
      • दहेज-संबंधी दुर्व्यवहार,
      • वैवाहिक जबरदस्ती एवं हिंसा।
  • परिभाषा (क्रूरता): इस खंड में क्रूरता को इस प्रकार परिभाषित किया गया है:
    • जानबूझकर किया गया ऐसा आचरण, जिससे महिला आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाए या उसके जीवन, शरीर या स्वास्थ्य (शारीरिक या मानसिक) को गंभीर चोट या हानि पहुँचे।
    • महिला या उसके किसी रिश्तेदार को संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूतियों के लिए गैर-कानूनी माँगों को पूरा करने के लिए विवश करने के उद्देश्य से किया गया उत्पीड़न।
  • धारा 498A की प्रमुख विशेषताएँ
    • दंड: कोई भी पति या पति का रिश्तेदार, जो किसी महिला पर क्रूरता करता है, उसे तीन वर्ष तक के कारावास और जुर्माने से दंडित किया जाएगा।
    • समय सीमा: इस धारा के अंतर्गत शिकायत कथित घटना के तीन वर्ष के भीतर दर्ज की जानी चाहिए।
    • शिकायतें: धारा 498A के अंतर्गत शिकायत पीड़िता स्वयं या उसकी ओर से कोई निकट संबंधी दर्ज करा सकता है, यदि वह स्वयं शिकायत दर्ज कराने में असमर्थ हो।
    • अपराध
      • धारा 498A के तहत अपराध संज्ञेय है, जिसका अर्थ है कि आरोपी को बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है।
      • यह गैर-जमानती भी है, जिसका तात्पर्य है कि जमानत स्वतः नहीं दी जाती और न्यायिक विवेकाधिकार के अधीन है।
    • प्रयोज्यता
      • केवल विवाहित महिलाओं के लिए: धारा 498A विशेष रूप से उन विवाहित महिलाओं पर लागू होती है, जो अपने पतियों या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता का शिकार होती हैं।
      • पति की परिभाषा: इस शब्द में ‘लिव-इन पार्टनर’ या पारंपरिक या दावा किए गए विवाह (जैसे शादीशुदा होने का दिखावा या साक्ष्य) में बँधे व्यक्ति भी शामिल हैं।
      • रिश्तेदारों की परिभाषा: इस शब्द में रक्त संबंध, विवाह या गोद लेने के माध्यम से महिला से संबंधित व्यक्ति शामिल हैं।
    • परिवार कल्याण समिति (FWC) का संदर्भ
  • अनिवार्य जाँच: धारा 498A के तहत दर्ज सभी FIR को मूल्यांकन के लिए परिवार कल्याण समितियों (FWC) को भेजा जाना अनिवार्य है।
  • अपवाद: दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराधों से संबंधित FIRFWC प्रक्रिया का पालन नहीं करती हैं।
  • निष्पक्ष संरचना: प्रत्येक FWC में तीन सेवानिवृत्त अधिकारी, मध्यस्थ या सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होते हैं।
  • गवाहों पर प्रतिबंध: FWC के सदस्य मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष के गवाह नहीं बन सकते।

महत्त्वपूर्ण न्यायिक निर्णय

  • अर्नेश कुमार फैसला (वर्ष 2014): सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 498A  के तहत अनावश्यक गिरफ्तारियों को रोकने के लिए दिशा-निर्देश स्थापित किए, जिनमें चेकलिस्ट की शुरुआत और पेशी के लिए नोटिस’ नियम को लागू करना शामिल था।
  • सतेंद्र कुमार अंतिल (वर्ष 2022): सर्वोच्च न्यायालय ने अर्नेश कुमार के निर्देशों का पालन न करने पर गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों के लिए जमानत का निर्देश देकर संस्थागत नियंत्रण को मजबूत किया।
  • मुकेश बंसल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (वर्ष 2022): इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने FIR के बाद दो महीने की ‘कूलिंग-ऑफ’ अवधि और मध्यस्थता के लिए परिवार कल्याण समितियों को मामला सौंपने का प्रावधान किया, जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने शिवांगी बंसल बनाम साहिब बंसल (वर्ष 2025) मामले में अनुमोदित किया।

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