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मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की प्रतिरक्षा

Lokesh Pal January 14, 2026 03:44 115 0

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 के तहत दी गई प्रतिरक्षा की संवैधानिक वैधता की जाँच करने पर सहमति जताई है।

संबंधित तथ्य

  • वर्ष 2023 के अधिनियम की धारा 16: इसमें कहा गया है कि “कोई भी न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो वर्तमान में या पूर्व में CEC या निर्वाचन आयुक्त रहा हो, अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए किसी भी कार्य, बोले गए शब्द या लिए गए निर्णय हेतु किसी भी दीवानी या आपराधिक कार्यवाही को न तो स्वीकार करेगा और न ही जारी रखेगा।”
  • चुनौती: याचिका में तर्क दिया गया है कि यह प्रावधान पद छोड़ने के बाद भी आजीवन प्रतिरक्षा प्रदान करता है।

चुनौती के अंतर्गत प्रमुख प्रावधान

  • आजीवन प्रतिरक्षा उपबंध: आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों के लिए CEC और निर्वाचन आयुक्तों को दीवानी तथा आपराधिक कार्यवाहियों से आजीवन प्रतिरक्षा प्रदान करता है।
  • प्रतिरक्षा की प्रकृति: याचिका में इस प्रतिरक्षा को “अभूतपूर्व” बताया गया है, क्योंकि यह पद छोड़ने के बाद भी जारी रहती है।

भारत निर्वाचन आयोग से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद-324(2): संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अधीन, राष्ट्रपति द्वारा CEC और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
  • अनुच्छेद-324(5):
    • CEC और निर्वाचन आयुक्तों की सेवा शर्तें निर्धारित करने का अधिकार संसद को प्रदान करता  है।
    • यह भी प्रावधान करता है कि CEC को केवल उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए निर्धारित है।

इस प्रावधान के विरुद्ध तर्क

  • संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संसद ऐसी प्रतिरक्षा प्रदान नहीं कर सकती, जो संविधान निर्माताओं ने अन्य संवैधानिक प्राधिकारियों को भी नहीं दी।
  • न्यायपालिका से तुलना: यह तर्क दिया गया कि संवैधानिक न्यायालयों के न्यायाधीशों को भी ऐसी आजीवन प्रतिरक्षा प्राप्त नहीं है, जिससे यह प्रावधान अत्यधिक निरंकुश बन जाता है।
  • समानता का सिद्धांत: याचिका के अनुसार, पूर्ण प्रतिरक्षा प्रदान करना कानून के समक्ष समानता को कमजोर करता है और संवैधानिक पदाधिकारियों के मध्य जवाबदेही को घटाता है।
  • अनुच्छेद-324(2) का दुरुपयोग: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि सरकार ने कानून को अनुच्छेद-324(2) के तहत उचित ठहराया, जबकि यह अनुच्छेद केवल CEC और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित है, न कि सेवा शर्तों या प्रतिरक्षा से।
  • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए खतरा: याचिका में आरोप लगाया गया कि यह प्रावधान समान अवसर के सिद्धांत को बाधित करता है, क्योंकि इससे CEC और निर्वाचन आयुक्तों को राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों के पक्ष अथवा  विपक्ष में बिना जवाबदेही के कार्य करने की खुली छूट मिल जाती है।

अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों से तुलना

  • राष्ट्रपति और राज्यपाल (अनुच्छेद-361): कार्यकाल के दौरान सीमित प्रतिरक्षा प्राप्त होती है, स्थायी प्रतिरक्षा नहीं।
  • अन्य निकाय (CAG, UPSC): कोई पूर्ण वैधानिक प्रतिरक्षा नहीं।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 के प्रमुख प्रावधान

  • विधायी अद्यतन: वर्ष 2023 का अधिनियम निर्वाचन आयोग (निर्वाचन आयुक्तों की सेवा शर्तें और कार्य संचालन) अधिनियम, 1991 का स्थान लेता है।
  • पात्रता मानदंड: मुख्य निर्वाचन आयुक्त या निर्वाचन आयुक्त के रूप में नियुक्त होने के लिए व्यक्ति को भारत सरकार के सचिव के समकक्ष पद पर कार्य किया होना चाहिए या कर रहा होना चाहिए।
  • सर्च कमेटी:
    • संरचना: सर्च कमेटी का नेतृत्व केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री करते हैं और इसमें सचिव स्तर या उससे ऊपर के दो सदस्य शामिल होते हैं।
    • कार्य: यह चयन समिति के विचार हेतु पाँच पात्र उम्मीदवारों का एक पैनल तैयार करती है।
  • चयन समिति
    • संरचना: चयन समिति में प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा में विपक्ष के नेता, और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।
    • कार्य: यह भारत के राष्ट्रपति को CEC या निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के लिए उपयुक्त उम्मीदवारों की सिफारिश करती है।
  • कार्यकाल
    • अवधि: CEC और निर्वाचन आयुक्त छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, जो भी पहले हो, पद पर रहते हैं।
      • यदि किसी निर्वाचन आयुक्त को CEC के रूप में पदोन्नत किया जाता है, तो कुल संयुक्त कार्यकाल छह वर्ष से अधिक नहीं हो सकता है।
    • पुनर्नियुक्ति: पुनर्नियुक्ति को स्पष्ट रूप से निषिद्ध किया गया है, जिससे निश्चित और कार्यकाल सुनिश्चित होता है।
  • वेतन और सेवा शर्तें: CEC और निर्वाचन आयुक्तों का वेतन और लाभ भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समकक्ष हैं, जिससे पद की गरिमा तथा स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है।
  • त्याग-पत्र और पदच्युति 
    • त्याग-पत्र: CEC या कोई निर्वाचन आयुक्त राष्ट्रपति को लिखित त्याग-पत्र देकर पद छोड़ सकता है।
    • CEC को हटाना: CEC को केवल उसी तरीके से हटाया जा सकता है, जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए निर्धारित है।
    • निर्वाचन आयुक्तों को हटाना: निर्वाचन आयुक्तों को केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है।
  • कानूनी संरक्षण: अधिनियम CEC और निर्वाचन आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों या बोले गए शब्दों के लिए दीवानी तथा आपराधिक कार्यवाहियों से संरक्षण प्रदान करता है।

चयन समिति की संरचना के संबंध में विभिन्न आयोगों/न्यायालयों द्वारा दिए गए सुझाव

निकाय

सदस्य

गोस्वामी समिति (1990)
  • CEC के लिए: राष्ट्रपति द्वारा, भारत के मुख्य न्यायाधीश + लोकसभा में विपक्ष के नेता (या लोकसभा में सबसे बड़े दल के नेता) से परामर्श के बाद नियुक्ति।
  • निर्वाचन आयुक्त के लिए: राष्ट्रपति द्वारा, भारत के मुख्य न्यायाधीश + लोकसभा में विपक्ष के नेता (या लोकसभा में सबसे बड़े दल के नेता) + CEC से परामर्श के बाद नियुक्ति।
संविधान (सत्तरवाँ संशोधन) विधेयक, 1990
  • राज्यसभा के सभापति + लोकसभा अध्यक्ष + लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े दल के नेता)।
  • निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की परामर्श प्रक्रिया में CEC को भी शामिल किया गया।
संविधान के कार्यकरण की समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट (2002) प्रधानमंत्री + लोकसभा में विपक्ष के नेता + राज्यसभा में विपक्ष के नेता + लोकसभा अध्यक्ष + राज्यसभा के उपसभापति।
विधि आयोग (2015) प्रधानमंत्री + लोकसभा में विपक्ष के नेता (या लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) + मुख्य न्यायाधीश।
सर्वोच्च न्यायालय (2023) प्रधानमंत्री + लोकसभा में विपक्ष के नेता (या लोकसभा में सबसे बड़े एकल विपक्षी दल के नेता) + मुख्य न्यायाधीश।

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