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भारत–UAE: विकसित होती रणनीतिक साझेदारी

Lokesh Pal May 18, 2026 01:43 4 0

संदर्भ

भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने प्रधानमंत्री के यूरोप के पाँच देशों के दौरे के पहले चरण के रूप में खाड़ी राष्ट्र में संक्षिप्त दौरे के दौरान महत्त्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए।

संबंधित तथ्य

  • प्रधानमंत्री ने UAE पर हुए हाल के हमलों की कड़ी निंदा की और UAE के नेतृत्व तथा जनता के साथ अपने देश की एकजुटता व्यक्त की।

मुख्य समझौते

  • रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार: इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड और अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के मध्य एक रणनीतिक सहयोग समझौता।
  • ऊर्जा सुरक्षा: भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा देने और दीर्घकालिक LPG आपूर्ति को सुदृढ़ करने के लिए तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) की आपूर्ति पर एक रणनीतिक समझौता।

  • रणनीतिक रक्षा साझेदारी: रक्षा निर्माण, नवाचार, सैन्य प्रशिक्षण, समुद्री सुरक्षा, साइबर रक्षा और सुरक्षित संचार में सहयोग का विस्तार करने के उद्देश्य से रणनीतिक रक्षा साझेदारी पर एक रूपरेखा समझौता।
  • समुद्री अवसंरचना: गुजरात के वडिनार में ‘शिप रिपेयर क्लस्टर’ स्थापित करने पर समझौता ज्ञापन।
  • अवसंरचना: भारतीय अवसंरचना, RBL बैंक और ‘सम्मान’ कैपिटल में 5 बिलियन डॉलर के निवेश की घोषणा।
  • सुपर कंप्यूटर क्लस्टर: भारत के सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग और UAE की G-42 के सहयोग से आठ एक्साफ्लॉप सुपर कंप्यूटर क्लस्टर की स्थापना।
  • कौशल विकास: शिप रिपेयर में कौशल विकास पर एक व्यवस्था, जिससे भारत के समुद्री कार्यबल की क्षमताओं को उन्नत किया जा सके और देश को कुशल शिपबिल्डिंग तथा शिप रिपेयर पेशेवरों का केंद्र बनाया जा सके।

समकालीन संदर्भ में भारत–UAE संबंधों का महत्त्व

  • ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक क्षमता: संयुक्त अरब अमीरात भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण ऊर्जा साझेदारों में से एक है, जो कच्चे तेल और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) आयात का एक बड़ा हिस्सा आपूर्ति करता है।
    • इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड और अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के बीच समझौते स्थिर आपूर्ति शृंखलाओं, रणनीतिक भंडार तथा भू-राजनीतिक संघर्षों एवं मूल्य अस्थिरता से उत्पन्न वैश्विक ऊर्जा व्यवधानों के विरुद्ध सुरक्षा सुनिश्चित करके भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करते हैं।
  • विस्तारित आर्थिक और निवेश साझेदारी: UAE भारत के शीर्ष व्यापार और निवेश साझेदारों में से एक के रूप में उभरा है, जहाँ भारत-UAE व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) के क्रियान्वयन के बाद द्विपक्षीय व्यापार लगभग 85 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया है।
    • अबू धाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी (ADIA) सहित UAE के सॉवरेन फंड भारतीय अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स, नवीकरणीय ऊर्जा, फिनटेक और शहरी विकास में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे हैं, जिससे भारत के विकास और अवसंरचना आधुनिकीकरण लक्ष्यों को समर्थन मिल रहा है।
  • रणनीतिक और रक्षा सहयोग: भारत और यू.ए.ई. भारतीय महासागर क्षेत्र और पश्चिम एशिया में उभरती सुरक्षा चुनौतियों के प्रत्युत्तर में रक्षा और रणनीतिक सहयोग को सुदृढ़ कर रहे हैं।
    • समुद्री सुरक्षा, साइबर रक्षा, सैन्य प्रशिक्षण और रक्षा निर्माण में सहयोग भारत की महत्त्वपूर्ण समुद्री संचार रेखाओं (SLOCs) की सुरक्षा क्षमता को बढ़ाता है, जिनके माध्यम से भारत के लगभग 80% कच्चे तेल का आयात होता है।
  • पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप के लिए प्रवेश द्वार: UAE भारत को पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप से जोड़ने वाला एक प्रमुख रणनीतिक और वाणिज्यिक प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है।
    • दुबई और अबू धाबी जैसे शहर वैश्विक लॉजिस्टिक्स, विमानन और वित्तीय केंद्रों के रूप में उभरे हैं, जो उन्नत बंदरगाह अवसंरचना और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नेटवर्क के माध्यम से भारतीय निर्यात, निवेश तथा व्यवसाय विस्तार को सुगम बनाते हैं।
  • उभरती प्रौद्योगिकी और डिजिटल सहयोग: भारत-UAE संबंध कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सुपरकंप्यूटिंग, फिनटेक और डिजिटल अवसंरचना जैसे भविष्य उन्मुख क्षेत्रों में सहयोग द्वारा संचालित हो रहे हैं।
    • भारत के सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) और UAE की G-42 के सहयोग से आठ एक्साफ्लॉप सुपर कंप्यूटर क्लस्टर स्थापित करने का समझौता नवाचार, वैज्ञानिक अनुसंधान, डेटा प्रोसेसिंग और डिजिटल परिवर्तन को सुदृढ़ करने वाली तकनीकी साझेदारी को दर्शाता है।
  • आतंकवाद-रोधी और क्षेत्रीय स्थिरता: भारत और UAE खाड़ी और दक्षिण एशियाई क्षेत्रों में आतंकवाद, उग्रवाद और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा खतरों से निपटने में मजबूत अभिसरण साझा करते हैं।
    • खुफिया साझाकरण, सुरक्षा सहयोग और आतंक वित्तपोषण के विरुद्ध संयुक्त प्रयासों ने द्विपक्षीय रणनीतिक विश्वास को सुदृढ़ किया है तथा पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में योगदान दिया है।
  • भारतीय प्रवासी और प्रेषण समर्थन: संयुक्त अरब अमीरात में 3.5 मिलियन से अधिक भारतीय निवास करते हैं, जिससे यह विश्व के सबसे बड़े प्रवासी भारतीय समुदायों में से एक बनता है।
    • भारतीय प्रवासी निर्माण, स्वास्थ्य सेवा, वित्त, प्रौद्योगिकी और सेवाओं जैसे क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं, जबकि UAE से भेजे गए प्रेषण (Remittances) भारत में घरेलू आय और विदेशी मुद्रा अर्जन को समर्थन देते हैं।
  • समुद्री संपर्क और ब्लू इकोनॉमी सहयोग: भारत और UAE क्षेत्रीय संपर्क और व्यापार दक्षता बढ़ाने के लिए बंदरगाह विकास, शिपिंग, लॉजिस्टिक्स और ब्लू इकोनॉमी के क्षेत्रों में सहयोग को सुदृढ़ कर रहे हैं।
    • गुजरात के वडिनार में शिप रिपेयर क्लस्टर के विकास जैसे समझौते भारत के समुद्री अवसंरचना को मजबूत करते हैं, सागरमाला कार्यक्रम के विकास को समर्थन देते हैं और भारत को शिपबिल्डिंग, शिप रिपेयर और वैश्विक समुद्री वाणिज्य के उभरते केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं।

चुनौतियाँ

  • क्षेत्रीय भू-राजनीतिक अस्थिरता: संयुक्त अरब अमीरात रणनीतिक रूप से संवेदनशील पश्चिम एशियाई क्षेत्र में स्थित है, जहाँ प्रायः भू-राजनीतिक संघर्ष, सुरक्षा तनाव और समुद्री व्यवधान होते रहते हैं।
    • खाड़ी क्षेत्र में संघर्षों की वृद्धि भारत के ऊर्जा आयात, व्यापार मार्गों और वहाँ निवास कर रहे बड़े भारतीय प्रवासी समुदाय की सुरक्षा को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती है।
  • ऊर्जा संक्रमण की चुनौतियाँ: नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ते वैश्विक संक्रमण और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता में कमी से भारत-UAE की पारंपरिक हाइड्रोकार्बन आधारित साझेदारी में परिवर्तन हो सकता है।
    • दोनों देशों को ग्रीन हाइड्रोजन, स्वच्छ ऊर्जा और सतत् प्रौद्योगिकियों जैसे उभरते क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर अपने संबंधों का पुनर्संतुलन करना होगा।
  • प्रतिस्पर्द्धी रणनीतिक हितों का संतुलन: भारत के लिए ईरान, इजरायल, सऊदी अरब और UAE जैसे प्रमुख क्षेत्रीय देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना एक कूटनीतिक चुनौती है।
    • पश्चिम एशिया में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और क्षेत्रीय गठबंधनों के बीच भारत को अपने रणनीतिक तथा आर्थिक हितों की रक्षा हेतु संतुलित विदेश नीति अपनानी होगी।
  • भारतीय श्रमिकों से संबंधित चिंताएँ: UAE में बड़ी संख्या में कार्यरत भारतीय प्रवासी श्रमिकों का कल्याण, सुरक्षा और श्रम अधिकार द्विपक्षीय संबंधों में महत्त्वपूर्ण मुद्दे बने हुए हैं।
    • कार्य परिस्थितियों, वेतन विवादों, कानूनी सुरक्षा और संकट के समय आर्थिक असुरक्षा से जुड़े मुद्दों के समाधान हेतु निरंतर संस्थागत सहयोग तथा श्रम सुधार आवश्यक हैं।
  • वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता: वैश्विक आर्थिक मंदी, मुद्रास्फीति दबाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भारत-UAE के बीच द्विपक्षीय व्यापार, प्रेषण प्रवाह और निवेश प्रतिबद्धताओं को प्रभावित कर सकते हैं।
    • वैश्विक बाजारों में अस्थिरता अवसंरचना निवेश और दीर्घकालिक वित्तीय सहयोग को भी प्रभावित कर सकती है।
  • प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्द्धा और विनियामक चुनौतियाँ: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल अवसंरचना, साइबर सुरक्षा और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में तीव्र प्रगति के लिए निरंतर निवेश, नीतिगत समन्वय तथा विनियामक सामंजस्य आवश्यक है।
    • प्रौद्योगिकी मानकों, डेटा गवर्नेंस और डिजिटल नियमों में भिन्नताएँ दीर्घकालिक तकनीकी सहयोग के विस्तार में बाधा बन सकती हैं।
  • समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला की संवेदनशीलता: भारत और UAE हॉर्मुज जलडमरूमध्य और अरब सागर से गुजरने वाले सुरक्षित समुद्री व्यापार मार्गों पर अत्यधिक निर्भर हैं।
    • समुद्री डकैती, ड्रोन हमले, क्षेत्रीय संघर्ष और वैश्विक शिपिंग मार्गों में व्यवधान जैसे खतरे ऊर्जा परिवहन, व्यापार प्रवाह और क्षेत्रीय आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं।
  • व्यापार असंतुलन और सीमित निर्यात विविधीकरण: भारत-UAE के बीच द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, फिर भी भारत का निर्यात बास्केट मुख्यतः पेट्रोलियम उत्पाद, रत्न और आभूषण जैसे क्षेत्रों में केंद्रित है।
    • उदाहरण के लिए, वित्त वर्ष 2025 में व्यापार 100 बिलियन डॉलर से अधिक होने के बावजूद, तेल आयात के कारण भारत का व्यापार घाटा लगभग 26 बिलियन डॉलर रहा।
      • साथ ही, भारत को आशंका है कि UAE तीसरे पक्ष के सामान (जैसे- सोना/चाँदी) के लिए माध्यम बन रहा है, जिससे शुल्क की बचत होती है और व्यापार में तनाव उत्पन्न होता है।
  • कफाला’ श्रम प्रणाली: UAE में लागू कफाला प्रणाली के तहत प्रवासी श्रमिकों का निवास और रोजगार उनके नियोक्ताओं से कानूनी रूप से जुड़ा होता है।
    • यद्यपि यह प्रणाली खाड़ी क्षेत्र में श्रम गतिशीलता को समर्थन देती है, लेकिन विशेष रूप से कम वेतन वाले श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करती है।
  • पाकिस्तान के साथ UAE की वित्तीय भागीदारी: पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद के समर्थन के इतिहास को देखते हुए, उसे दी जाने वाली वित्तीय सहायता और रणनीतिक समर्थन व्यापक भू-राजनीतिक प्रभावों को लेकर चिंताएँ उत्पन्न कर सकते हैं।

आगे की राह

  • CEPA के प्रभावी क्रियान्वयन को सुदृढ़ करना: भारत और संयुक्त अरब अमीरात को व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान देना चाहिए, ताकि द्विपक्षीय व्यापार और निवेश प्रवाह को और बढ़ाया जा सके।
    • दोनों देशों को पेट्रोलियम उत्पादों से परे जाकर सेवाएँ, फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य प्रसंस्करण और प्रौद्योगिकी उत्पादों जैसे क्षेत्रों में निर्यात को बढ़ावा देकर एक अधिक संतुलित और लचीली आर्थिक साझेदारी विकसित करनी चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी साझेदारी को गहरा करना: भारत और UAE को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, फिनटेक और डिजिटल अवसंरचना जैसे उभरते क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना चाहिए।
    • अनुसंधान और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र, स्टार्ट-अप सहयोग और उन्नत कंप्यूटिंग परियोजनाओं में संयुक्त निवेश दोनों देशों को वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में प्रमुख अभिकर्ता के रूप में स्थापित करने में मदद कर सकता है।
  • रक्षा और रणनीतिक सहयोग का विस्तार: दोनों देशों को रक्षा निर्माण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, साइबर सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा में सहयोग को गहरा करना चाहिए, ताकि उभरते क्षेत्रीय खतरों का सामना किया जा सके।
    • हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में बढ़ा हुआ नौसैनिक सहयोग और संयुक्त अभ्यास समुद्री स्थिरता को मजबूत कर सकते हैं तथा वैश्विक व्यापार और ऊर्जा परिवहन के लिए आवश्यक समुद्री संचार रेखाओं (SLOCs) को सुरक्षित कर सकते हैं।
  • नवीकरणीय ऊर्जा सहयोग को बढ़ावा देना: भारत और UAE को ग्रीन हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा, स्वच्छ प्रौद्योगिकियों और सतत् अवसंरचना विकास में सहयोग बढ़ाना चाहिए।
    • जलवायु कार्रवाई और ऊर्जा संक्रमण में मजबूत साझेदारी दोनों देशों को दीर्घकालिक सततता लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता करेगी तथा जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम करेगी।
  • प्रवासी कल्याण और कौशल विकास में सुधार: दोनों देशों को UAE में कार्यरत बड़े भारतीय प्रवासी समुदाय के सुरक्षा और कल्याण के लिए तंत्र को सुदृढ़ करना चाहिए।
    • कौशल मानक समझौते, श्रम मानकों में सुधार और समुद्री सेवाएँ, स्वास्थ्य सेवा तथा डिजिटल प्रौद्योगिकी जैसे उन्नत क्षेत्रों में कार्यबल प्रशिक्षण को बढ़ावा देकर रोजगार अवसरों को बढ़ाया जा सकता है।
  • संपर्कता और क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ाना: भारत और UAE को बंदरगाह, शिपिंग कॉरिडोर, रेल संपर्क और लॉजिस्टिक्स अवसंरचना के माध्यम से मजबूत मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी नेटवर्क विकसित करना चाहिए।
    • भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसी रणनीतिक पहलों के साथ एकीकरण व्यापार दक्षता, क्षेत्रीय एकीकरण और भारत की पश्चिम एशिया, यूरोप तथा अफ्रीका से कनेक्टिविटी को सुदृढ़ करेगा।
  • खाद्य और ऊर्जा आपूर्ति शृंखला का लचीलापन बढ़ाना: भारत और UAE को भू-राजनीतिक संघर्षों और वैश्विक बाजार अस्थिरता से उत्पन्न व्यवधानों से निपटने के लिए लचीली तथा विविधीकृत आपूर्ति शृंखलाएँ विकसित करनी चाहिए।
    • रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि-लॉजिस्टिक्स और दीर्घकालिक वस्तु समझौतों में सहयोग आर्थिक स्थिरता को बढ़ाएगा तथा महत्त्वपूर्ण संसाधनों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करेगा।
  • समुद्री और ब्लू इकोनॉमी क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार: दोनों देशों को ब्लू इकोनॉमी, बंदरगाह विकास, शिपबिल्डिंग, शिप रिपेयर, तटीय अवसंरचना और सतत् समुद्री संसाधन प्रबंधन में सहयोग को सुदृढ़ करना चाहिए।
    • समुद्री अवसंरचना परियोजनाओं और लॉजिस्टिक्स हब में संयुक्त निवेश भारत को भारतीय महासागर क्षेत्र में एक वैश्विक समुद्री और ट्रांसशिपमेंट केंद्र के रूप में उभरने में सहायता कर सकता है।

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