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MSMEs को सशक्त बनाने हेतु पहल

Lokesh Pal May 28, 2026 03:41 4 0

संदर्भ

मुंबई में भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) के 37वें स्थापना दिवस पर केंद्रीय वित्त मंत्री ने नए डिजिटल पोर्टल एवं MSME-केंद्रित योजनाओं का शुभारंभ किया।

  • पश्चिम एशिया संकट के मध्य केंद्रीय वित्त मंत्री ने भारत की आर्थिक क्षमता पर बल देते हुए “3Fs” — फ्यूल (Fuel), फर्टिलाइजर (Fertiliser) और फॉरेक्स (Forex) के महत्त्व को रेखांकित किया।

भारत के MSME क्षेत्र के बारे में

  • MSMEs भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं तथा समावेशी विकास को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • योगदान: MSME क्षेत्र कृषि के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता है, जो 7.47 करोड़ से अधिक उद्यमों के माध्यम से 32.82 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है।
    • यह क्षेत्र भारत के GDP में लगभग 31.1%, विनिर्माण उत्पादन में 35.4% तथा कुल निर्यात में 48.58% का योगदान देता है।

  • रोजगार सृजन: देशभर में लगभग 7.47 करोड़ उद्यमों के माध्यम से 32 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है।

सिडबी (SIDBI) द्वारा शुरू की गई नई रणनीतिक पहलें

  • सिडबी मैकफिन मार्ट (मशीनरी पोर्टल): यह एक केंद्रीकृत, निवेश-उन्मुख डिजिटल B2B मार्केटप्लेस के रूप में कार्य करता है। इसका उद्देश्य पुरानी एवं अप्रचलित मशीनरी को आधुनिक एवं स्वचालित असेंबली लाइनों से प्रतिस्थापित करना है।
    • इसमें एक पारदर्शी मूल्य खोज प्रणाली एवं अनिवार्य गुणवत्ता मानदंड (क्वालिटी बेंचमार्क) फिल्टर शामिल हैं।
  • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRB) को-लेंडिंग पोर्टल:  यह SIDBI एवं क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) के मध्य परिचालन एवं डेटा-साझाकरण सेतु स्थापित करता है। इसका उद्देश्य दूरस्थ एवं बैंकिंग सेवाओं से वंचित ग्रामीण सूक्ष्म उद्यमों तक औपचारिक पूँजी की पहुँच सुनिश्चित करना है।
    • यह SIDBI की पूँजी को RRBs के स्थानीय नेटवर्क के साथ जोखिम-साझाकरण ढाँचे (Risk-Sharing Framework) के माध्यम से जोड़ता है।
  • मॉडर्नाइजेशन ऑफ रूरल एंटरप्राइजेज प्रोग्राम (MoRE Programme): यह वर्ष 2026–2029 की अवधि हेतु लक्षित तीन-वर्षीय परिवर्तनकारी कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य गैर-कृषि गतिविधियों से जुड़े 10,000 ग्रामीण सूक्ष्म एवं कारीगर इकाइयों का आधुनिकीकरण करना है। इसमें क्लस्टर-आधारित हस्तक्षेपों का उपयोग किया जाएगा, ताकि विखंडित व्यक्तिगत वित्तपोषण से बचा जा सके।
  • माइक्रो क्रेडिट कार्ड योजना: यह औपचारिक वित्तीय समावेशन का एक साधन है। इसके अंतर्गत उद्यम-पंजीकृत सूक्ष्म उद्यमों को ₹5 लाख तक का असुरक्षित/प्रतिभूति-रहित आवर्ती परिचालन ऋण (Unsecured Revolving Operational Credit) प्रदान किया जाएगा। इसमें 75% गारंटी कवरेज की सुविधा उपलब्ध होगी।

भारत के MSME क्षेत्र के सशक्तीकरण हेतु प्रमुख सरकारी पहलें

  • क्रेडिट गारंटी योजना (Credit Guarantee Scheme-CGS): यह सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को कोलैटरल-फ्री एवं तृतीय-पक्ष गारंटी-मुक्त ऋण उपलब्ध कराती है।
    • वाणिज्यिक बैंकों हेतु संस्थागत गारंटी सीमा ₹5 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ कर दी गई है। ट्रांसजेंडर उद्यमियों हेतु गारंटी शुल्क में 10% रियायत एवं 85% तक जोखिम कवरेज का विशेष प्रावधान किया गया है।

  • उद्यम एवं उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म (Udyam & Udyam Assist Platform-UAP): यह एक व्यापक डिजिटल औपचारीकरण अवसंरचना है, जो अपंजीकृत सूक्ष्म इकाइयों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ती है।
    • UAP विशेष रूप से ऐसे अनौपचारिक सूक्ष्म उद्यमों (IMEs) का पंजीकरण करता है, जिनके पास GST दस्तावेज नहीं हैं। इससे उन्हें कम लागत वाले प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) तक त्वरित पहुँच सुनिश्चित होती है। दोनों प्लेटफॉर्म मिलकर 7.9 करोड़ से अधिक लघु व्यवसायों का औपचारीकरण कर चुके हैं।
  • आत्मनिर्भर भारत (SRI) फंड: यह विकासोन्मुख MSMEs के समक्ष जोखिम पूँजी एवं इक्विटी वित्तपोषण की कमी को दूर करने हेतु स्थापित किया गया है। यह “मदर फंड–डॉटर फंड” संरचना के माध्यम से कार्य करता है, जिसका प्रबंधन SEBI-पंजीकृत श्रेणी-II वैकल्पिक निवेश कोष (AIF) द्वारा किया जाता है। ₹50,000 करोड़ के इक्विटी सहायता कोष के माध्यम से MSMEs को ऋण बोझ बढ़ाए बिना विस्तार करने में सहायता मिलती है।
  • पीएम विश्वकर्मा योजना: 18 पारंपरिक हस्तशिल्प एवं मैनुअल व्यवसायों (जैसे- कुम्हार, बुनकर आदि) से जुड़े कारीगरों को समग्र सहायता प्रदान करती है।
    • इसमें औपचारिक कौशल प्रमाणन, प्रतिदिन ₹500 का प्रशिक्षण भत्ता तथा ₹15,000 के टूलकिट ई-वाउचर प्रदान किए जाते हैं। साथ ही 5% की रियायती ब्याज दर पर ₹3 लाख तक का कोलैटरल-फ्री उद्यम ऋण उपलब्ध कराया जाता है, जिसे 8% राज्य ब्याज सब्सिडी का समर्थन प्राप्त है।
  • TReDS एवं समाधान (SAMADHAAN) फ्रेमवर्क: यह MSMEs की कार्यशील पूँजी एवं तरलता संकट को दूर करने हेतु विकसित कानूनी-डिजिटल ढाँचा है।
  • MSMED अधिनियम, 2006 के अंतर्गत 45 दिनों के भीतर चालान भुगतान अनिवार्य किया गया है। इसमें ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम  (TReDS) के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक बिल डिस्काउंटिंग तथा ऑनलाइन विवाद समाधान (ODR) पोर्टल के माध्यम से डिजिटल विवाद समाधान की सुविधा प्रदान की जाती है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नई रणनीतिक पहलों का महत्त्व

  • SIDBI के अधिदेश का विकास: केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा ₹5,000 करोड़ की अतिरिक्त इक्विटी सहायता के समर्थन से SIDBI एक पारंपरिक ऋण-वितरण संस्था से “मार्केट मेकर” एवं जोखिम-साझाकरण भागीदार (Risk-Sharing Partner) के रूप में परिवर्तित हो रहा है। इसका उद्देश्य वर्ष 2028 तक 25 लाख नए लाभार्थियों को जोड़ना है।
  • ग्रामीण उद्योग का औपचारीकरण: मॉडर्नाइजेशन ऑफ रूरल एंटरप्राइजेज प्रोग्राम (MoRE Programme) जैसी क्लस्टर-आधारित योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करके ये पहलें ग्रामीण विनिर्माण एवं संगठित शहरी आपूर्ति शृंखलाओं के मध्य उत्पादकता अंतराल को कम करती हैं। यह “विकसित भारत 2047” के विजन को आगे बढ़ाने में सहायक है।

भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) के बारे में

  • सांविधिक आधार: SIDBI की स्थापना 2 अप्रैल, 1990 को संसद द्वारा पारित भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अधिनियम, 1989 के अंतर्गत की गई।
  • शीर्ष नियामकीय वर्गीकरण: इसे भारत की पाँच अखिल भारतीय वित्तीय संस्थाओं (AIFIs) में वर्गीकृत किया गया है।
    • यह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियामकीय एवं पर्यवेक्षी नियंत्रण के अंतर्गत कार्य करता है, नाबार्ड (NABARD), एक्सिम बैंक (EXIM Bank), NHB एवं NaBFID के साथ।
  • नोडल मंत्रालय: यह भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के अंतर्गत वित्तीय सेवा विभाग (Department of Financial Services) के अधीन कार्य करता है।
  • मुख्यालय: लखनऊ, उत्तर प्रदेश।
  • इक्विटी संरचना: प्रारंभ में यह भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (IDBI) की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी थी। बाद में इसकी शेयरधारिता में विविधीकरण किया गया।
    • वर्तमान में इसकी पूँजी भारत सरकार एवं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों तथा भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) सहित राज्य-समर्थित संस्थानों के पास है।
  • सांविधिक अधिदेश एवं प्रमुख उद्देश्य: SIDBI अधिनियम की धारा-13 के अंतर्गत SIDBI को MSME क्षेत्र के लिए प्रमुख वित्तीय संस्था के रूप में नामित किया गया है। इसके तीन प्रमुख उद्देश्य हैं:
    • प्रोत्साहन: उद्यमिता को बढ़ावा देना एवं पारंपरिक, असंगठित ग्रामीण उद्योगों का औपचारीकरण करना।
    • वित्तपोषण: ऋण एवं इक्विटी पूँजी के प्रवाह को अधिकतम बनाकर ऋण-वंचित औद्योगिक क्षेत्रों तक पहुँच सुनिश्चित करना।
    • विकास एवं समन्वय: लघु उद्योग विकास में संलग्न विभिन्न राज्य एवं केंद्रीय वित्तीय संस्थाओं के कार्यों का समन्वय करना।
  • ऑपरेशनल लेंडिंग फ्रेमवर्क
    • अप्रत्यक्ष लेंडिंग /रीफाइनेंसिंग इंजन: SIDBI की क्रेडिट बुक का अधिकांश भाग इसी श्रेणी में आता है।
      • यह प्रत्यक्ष रूप से प्रत्येक इकाई को ऋण देने के बजाय वाणिज्यिक बैंकों, लघु वित्त बैंक (SFBs) एवं गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) को पुनर्वित्त की सुविधा प्रदान करता है। इससे क्रेडिट मल्टीप्लायर प्रभाव उत्पन्न होता है।
    • प्रत्यक्ष लेंडिंग /डेमॉन्स्ट्रेटिव गैप फाइनेंसिंग: यह उन क्षेत्रों को लक्षित करता है, जहाँ पारंपरिक बैंक जोखिम लेने से बचते हैं।
      • SIDBI स्वच्छ ऊर्जा इकाइयों, उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण एवं निर्यातोन्मुख सूक्ष्म उद्यमों को प्रत्यक्ष ऋण प्रदान करता है।
    • इक्विटी एवं वेंचर कैपिटल (स्टार्ट-अप ट्रैक): SIDBI, स्टार्ट-अप्स हेतु फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्ट-अप्स (FFS) का प्रबंधन करता है। यह सीधे स्टार्ट-अप्स में निवेश करने के बजाय SEBI-पंजीकृत वैकल्पिक निवेश कोषों (AIFs) में निवेश करता है।
  • विशेषीकृत सहायक एवं सहयोगी संस्थाएँ: MSME की अवधि के दौरान उत्पन्न विशिष्ट कार्यात्मक बाधाओं को दूर करने हेतु SIDBI ने अलग-अलग सहयोगी संस्थाओं की स्थापना की है।
    • मुद्रा (MUDRA- माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट एंड रीफाइनेंस एजेंसी): यह SIDBI की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) के अंतर्गत ₹10 लाख तक के सूक्ष्म ऋणों का पुनर्वित्त करती है। ऋण तीन श्रेणियों — शिशु, किशोर एवं तरुण — में प्रदान किए जाते हैं।
    • क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज (CGTMSE): इसे MSME मंत्रालय के साथ संयुक्त रूप से स्थापित किया गया है, ताकि एक पूँजी कोष (Capital Pool) संचालित किया जा सके, जो प्राथमिक संस्थागत ऋणदाताओं को कोलैटरल-फ्री क्रेडिट गारंटी प्रदान करता है।
    • रिसीवेबल्स एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड (RXIL): यह TReDS फ्रेमवर्क के अंतर्गत कार्य करने वाला विशेष व्यापार देय मंच है। यह MSMEs को अपने आपूर्ति चालानों (Supply Invoices) की नीलामी कर कार्यशील पूँजी प्राप्त करने में सहायता प्रदान करता है
    • अक्यूइटे (Acuité) रेटिंग्स एंड रिसर्च लिमिटेड: यह MSMEs के लिए कम लागत वाली मानकीकृत क्रेडिट रेटिंग सुविधा प्रदान करने हेतु स्थापित संस्था है।
  • मार्केट मेकर” बनने की दिशा में संक्रमण (2026 के बाद की रणनीति): केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत ₹5,000 करोड़ की अतिरिक्त इक्विटी पुनर्पूंजीकरण (Equity Recapitalization) सहायता के समर्थन से SIDBI की कार्यात्मक संरचना में परिवर्तन हुआ है।
    • यह एक पारंपरिक पास-थ्रू’ क्रेडिट हाउस से बदलकर एक आक्रामक मार्केट मेकर’ और रिस्क-शेयरिंग पार्टनर’ बन गया है। इसमें ऑटोमेटेड और डेटा-केंद्रित टेक्नोलॉजी टूल्स का उपयोग शामिल है।
    • सिडबी मैकफिन मार्ट: एक डिजिटल B2B मार्केटप्लेस, जो प्रतिस्पर्द्धात्मक एवं वेंडर-तटस्थ मशीनरी खोज को कम-ब्याज परिसंपत्ति वित्तपोषण से जोड़ता है।
    • RRB को-लेंडिंग पोर्टल: एक डेटा-साझाकरण डिजिटल इंटरफेस, जो SIDBI की अंडरराइटिंग पूँजी को क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) की स्थानीय भौगोलिक पहुँच के साथ एकीकृत करता है।
    • माइक्रो क्रेडिट कार्ड योजना: उद्यम-पंजीकृत सूक्ष्म इकाइयों को ₹5 लाख तक की असुरक्षित आवर्ती परिचालन ऋण (Unsecured Revolving Operating Credit) सुविधा प्रदान करता है, जिसे 75% राज्य गारंटी कवरेज का संरक्षण प्राप्त है।
    • GST सहाय: एक ऐप्लीकेशन अवसंरचना, जो भौतिक संपार्श्विक पर निर्भर रहने के बजाय वास्तविक समय एवं प्रमाणित GST चालान फाइलिंग के मूल्यांकन के आधार पर नकदी-प्रवाह आधारित ऋण उपलब्ध कराती है।
  • संस्थागत बाधाएँ
    • परिसंपत्ति गुणवत्ता चुनौतीयाँ: भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) को उच्च-जोखिम वाले सूक्ष्म उद्यमों को समर्थन देने के अपने विकासात्मक दायित्व तथा विवेकपूर्ण अंडरराइटिंग मानकों एवं स्वस्थ परिसंपत्ति गुणवत्ता बनाए रखने के मध्य संतुलन स्थापित करना होता है।
    • सूचना विषमता: अनेक ग्रामीण उद्यमों के पास औपचारिक वित्तीय अभिलेख, GST-संबंधित डेटा तथा सत्यापित नकदी-प्रवाह विवरण उपलब्ध नहीं होते, जिससे सटीक एल्गोरिदम-आधारित ऋण मूल्यांकन कठिन हो जाता है।
    • डिजिटल अनुकूलन अंतराल: सीमित डिजिटल साक्षरता एवं अपर्याप्त इंटरनेट कनेक्टिविटी प्लेटफॉर्म-आधारित ऋण प्रणालियों की प्रभावशीलता एवं पहुँच को सीमित कर सकती है।
    • विलंबित भुगतान संकट: कॉरपोरेट संस्थाओं एवं सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (PSUs) द्वारा लंबित बड़े भुगतान MSMEs की कार्यशील पूँजी चक्र को कमजोर करते हैं तथा नए ऋण प्रवाह के प्रभाव को कम कर देते हैं।
    • को-लेंडिंग  में क्रेडिट जोखिम: क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) के साथ को-लेंडिंग (Co-lending) व्यवस्था हेतु मजबूत स्थानीय सत्यापन, निगरानी तंत्र एवं स्पष्ट जोखिम-साझाकरण ढाँचे आवश्यक हैं, ताकि भविष्य में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPAs) की समस्या को रोका जा सके।

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